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भारतीय संकृति में आत्म-पूजन मनोविकार का प्रवाह

(inspired from this blog : http://www.inebriateddiscourse.com/2009/06/cosmic-narcissism-new-psychological.html#comment-form_3158647758726353159)

एक ख़ास मनोवैज्ञानिक समस्या जो भारत नाम की त्रासदी के कई कमियों को समझने में बहुत उपयोगी है वह है आत्म-पूजन मनोविकार / साधारण भारतीय भाषा में इसे " अहंकार ", "घमंड", इत्यादि कह कर पुकारा जाता है / मगर इसके ख़ास लक्षणों को समझा नहीं गया है / मनोवैज्ञानिक दिक्कतों की भारत में ज्यादी स्वीकृति और मान्यता नहीं है / मनोविज्ञान से सम्बंधित पुस्तकें और मेग्जीनें ज्यादा प्रकाशित  नहीं होती है / हालाँकि 'अमेरिकेन सायेकोलोजिस्ट असोसीएशान (APA )' की तर्ज़ पर भारत में भी 'भारतीय सायेकीएटट्रिस्ट सोसाईटी' नाम की संस्था है / भारत में आत्म-पूजन मनोविकार की चर्चा प्राचीन कल में भी मिलती है / रामायण में रावण को अहंकार से ग्रस्त एक बहोत ही उच्च कोटि का विद्वान् ब्रह्मिन के रूप में पहचाना जाता है / भारतीय जात प्रथा में जहाँ ब्रह्मण को सर्वोच्च सामाजिक स्थान प्राप्त है , वही दलित और शूद्र नामे के वर्ग को मानव स्थान से भी नीचे देखा जाता रहा है / इस तरह के चरम वर्गीकरण में भी आम जनता में आत्म-पूजन विकार की योगदान है /
आम भारतीय जनसँख्या में आत्म-पूजन मनोविकार तमाम रूप में देखा है / भारतीय संस्कृति इसे "गर्व " के रूप में पीड़ी दर पीड़ी प्रसारित किया गया है / जैसे की, ' हमे अपने देश पर गर्व करना चाहिए ', 'अपनी संस्कृति पर गर्व करना चाहिए ', "अपने माता-पिता पर गर्व करो", "अपनी संतान पर नाज़ करो ", / एक साधारण आत्म-सम्मान की भावना में आत्म-पूजन के मनोविकार का मिश्रण इसे पीड़ीयों  में आगे यहाँ तक ले आया है / आत्म पूजन में मनुष्य सिर्फ अपनी ही विषय वस्तु को अच्छा और बेहतर मानता है , किसी अन्य की विषय-वस्तु को खराब / आत्म पूजन में मनुष्य अपनी विषय-वस्तु की कमियों और गलत पहलुओ को अनदेखा करता है / वह विषय-वस्तु में सुधार के सम्भावना को नकार देता है / 
आत्म-पूजन विकार हमारी सभ्यता में कई रूप में प्रसारित होता है/ एक अन्य किस्म का जटिल आत्म-पूजन विकार , जिसे ब्रह्मांडीय -आत्म-पूजन विकार के रूप में चिन्हित किया जाता है , में इंसान प्रतक्ष रूप में खुद अपना गुण-गान न कर के किसी इष्ट देव , किसी अन्य वस्तु, व्यक्ति इत्यादि की पूजा कर रहा होता है मगर अन्दर में भाव अपने खुद की पूजन-विकृति के पोषण का होता है / इस समझ से अगर हम कुछ एतिहासिक इमारते और ऐतिहासिक घटनाओ, रित-रिवाजों  को समझाने का प्रयास करे तो पता चलेगा की आत्म-पूजन विकार भारतीय संस्कृति में कितने गंभीर रूप में विद्यमान है / 
भारत में समूह के नेतृत्व में भी यही विकार से ग्रस्त व्यक्ति के गुण को 'दमदार', 'प्रभावशाली ' नेता मन जाता है / भावुक नेतृत्व को कमज़ोर , या कहें तो "ना-मर्द " नेता समझा गया है / 

1 comment:

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