कैसे ब्रिटेन की प्रशासनिक व्यवस्था स्वायत्तता प्राप्त करती है राजनैतिज्ञ वर्ग से

ब्रिटेन में bbc को कैसे समाज को सही मार्ग या सत्मार्ग दिखाने वाली खबर और जानकारी देने की स्वायत्तता मिल जाती है, बिना इस बात के डर से की कुछ शीर्ष पदों के तबादले, निलम्बन या सेवामुक्ति देखने पड़ सकते हैं ?

यहां दूरदर्शन के दो मुलाजिम प्रधानमंत्री के भाषण की रिकॉर्डिंग के दौरान मात्र हंस क्या दिए, उनको नौकरी से हाथ धोना पड़ गया। किसी एक मुलाज़िम ने जनता के बीच जा कर सच क्या बोल दिया कि कोई एक भाषण वाकई में किस तारीख में रिकॉर्ड हुआ था, उसे भी परिणाम भुगतने के लिए नौकरी से निकाल दिया गया। 

Whatsapp के सदवाणी संदेश कहते है कि संसार का बुरा किसी बुराई के कर्म करने वालो से इतना अधिक नही होता है, जितना कि भले लोगो के चुप रहने से, और बर्दाश्त कर जाने से होता है।

अबोध भारत की बहोत बड़ी आबादी अपने भ्रमकारी कुतर्क से यह समझती/समझाती है कि समाज को भ्रष्टाचार मुक्ति दिलाने के लिए प्रशासनिक तंत्र आवश्यक नही है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को भ्रष्टाचार विमुक्त आचरण से ही मुक्ति मिलेगी। खास तौर पर वर्तमान काल के राजनैतिक वर्ग यही कुतर्क जनता में बेचना चाहता है, और लोकपाल क़ानूम जैसे विधान आने के बावजूद उन्हें लागू करने से बचना चाहता है। 

   सवाल लोकपाल कानून या जनलोकपाल कानून का नही है, बल्कि यह है कि भ्रष्टाचार, राजनैतिक स्वार्थ लिए controversy, मीडिया के पक्षपात, इत्यादि से मुक्ति दिलाने के लिये आवश्यक संसाधन क्या है ---? क्या समाज को ईमानदारी का फल तभी खाने को मिलेगा जब प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार बनेगा, या तब जब समाज के कुछ एक व्यक्ति जो ईमानदारी की मिसाल है, जो कि कभी जीवन मे एक ईमानदारी का निर्णय लेते है, उन्हें सहायक माहौल देने वाले प्रशासनिक तंत्र की स्थापना होगी?

ऐसा नही की भारतिय समाज मे ईमानदार लोगो की कमी थी, जिस कमी की वजह से भारत मे अथाह भ्रष्टाचार है। बल्कि भारत के प्रशासनिक राजनैतिक तंत्र मे ईमानदारों के संग जो हश्र हुआ है - उन्हें अशोक खेमखा और संजीव चतुर्वेदी बना दिया जाता है, जज की संदेहास्पद हत्या हो जाती है, और मनपसंद जज को राज्यपाल पद दे दिया जाता है, 
तो खुद ही सोचिए कि बुराई पर चुप्पी नही रखने वाला, बर्दाश्त नही करने वाला कोई ईमानदार कैसे पनपे का इस समाज मे और मुक्ति दिलाएगा ?

मगर ब्रिटेन की प्रशासनिक व्यवस्था में यह मुक्ति कैसे मिलती है ? वहां की मीडिया और उच्च शिक्षा संस्थान कैसे बिना किसी प्रशासनिक प्रतिक्रिया के भय के अपने विचार को सुदृढ़ता से प्रकट कर देते है, निष्पक्षता और सदमार्ग का प्रसार कर लेते है, समाज को जागृत बनाये रखते हैं ?

इस सवाल का जवाब वहां के प्रशासन व्यवस्था के उपज के सामाजिक-इतिहासिक घटनाओं में छिपा है।

बीबीसी जैसी जनसूचना की उच्च संस्था *संसदीय कानून* से नही बल्कि *शाही फरमान* से चलती है। ब्रिटेन में सरकार को चलाने के लिए एक नही, दो अलग अलग उच्च केंद्र है। *act of parliament (संसदीय कानून)* अलग है , और *royal charter (शाही फरमान)* अलग है।

बीबीसी और इसके ही जैसे सेकड़ो उच्च संस्थान , उनकी शास्त्र सेनाएं, professional associations इत्यादि *संसदीय कानून* की बजाए *शाही फरमान* के आधीन निर्मित हुए और कार्य करते है। यह *प्रधानमंत्री कार्यालय* के जगह *crown services*  से आदेश प्राप्त करती है। विकिपीडिया के अनुसार 15वी शताब्दी से लेकर आज तक 900 से अधिक शाही फरमान जारी हुए हैं जिनसे वहां के उच्च शिक्षण संस्था, professional association, इत्यादि निर्माण हुई है और वह संसदीय कानूनों का पालन तो करती है, मगर प्रधानमंत्री कार्यालय के आधीन नही आती है, इसलिए राजनैतिक वर्ग उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार निलंबन, बर्खास्त, या तबादला नही कर सकता है। 

भारत मे राष्ट्रपति है, राजशाही है ही नही। और राष्ट्रपति खुद ही पांच साल की नौकरी वाले है; अधिकांश राष्ट्रपति और राज्यपाल राजनीतिज्ञों की पृष्टभूमि वाले है;राष्ट्रपति  पद किसी बुज़ुर्ग राजनीतिज्ञ को पार्टी की वफादारी का इनाम देने के लिए, या किसी विरोधी की राज्यसरकार का चक्का केंद्र सरकार के हाथों डगमगाने के लिए।

शाही फरमान जैसी व्यवस्था भारत मे presidential order है। मगर साधारण गूगल सर्च से बात मालूम देती है की  presidential order आज तक एक ही निकला है, वह भी गुप्त तरीके से , राजनैतिक -प्रजातांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध , संविधान में अनुच्छेद 35A डालने के लिए, राष्ट्रहित के विरुद्ध !

भारत में अमूमन एक कच्ची गिनती से १३ हज़ार से अधिक कानून है, मगर राष्ट्रपति फरमान (presidential order ) सिर्फ एक बार ही निकला है | ब्रिटैन में भी संसदीय कानून बहोत हैं , मगर शाही फरमान 900 से अधिक बार निकला है | तरह ब्रिटैन में राजनीतिज वर्ग और शाही घराना , दोनों ही एक दूसरे से मुक्ति ,  स्वायत्तता प्राप्त करते हैं |   


रेफरी विहीन shouting मैच है भारत की राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्था

प्रश्न:-
Via Mani M

अपना मानना है कि यदि नरेंद्र मोदी लड़कपन में संघ दफ्तर नहीं पहुंचते और उसकी जगह शेयर बाजार पहुंचते तो वे अरबपति बने हुए होते । वे राजनीति में आए तो धुन ने ही उनको संघ परिवार के शीर्ष पर पहुंचाया। इस धुन का कोर तत्व मार्केंटिग है। मोदी के जीवन के हर चरण में मार्केटिग ही सफलता की सीढ़ी रही है | मार्केटिंग का पहला और अंतिम मूल मंत्र यह है कि ग्राहक को रिझाने के लिए ऐसा कुछ लगातार होता रहे जिससे वह लगातार विश्वास दिए रहे।

इस बात को और बारीकी से समझना है तो सोचें क्या राहुल गांधी झाडू ले कर स्वच्छ भारत का आईडिया या इवेंट बना सकते थे? क्या ममता बनर्जी संकट की घड़ी में अपनी मां को बैंक में भेज कर नोट निकलवाने का आईडिया सोच सकती थीं? क्या नीतीश कुमार अरबपतियों का जमावड़ा कर मेक इन इंडिया जैसा इवेंट कर सकते हैं? क्या अरविंद केजरीवाल अचानक लाहौर पहुंच कर नवाज शरीफ के साथ पकौड़े खा सकते थे? क्या मनमोहनसिंह हैदराबाद हाउस में बराक ओबामा के आगे लखटकिया सूट पहन चाय पिलाने, उन्हें तू और मैं के संबोधन वाले दोस्त का फोटो सेशन का आईडिया बना सकते थे? क्या आटे की बात करने वाले लालू यादव डिजिटल इंडिया का आईडिया निकाल सकते हैं? क्या नीतीश कुमार न्यूयार्क में प्रवासी भारतीयों का जमावड़ा बना कर रॉक स्टार शो दे सकते हैं? क्या कोई भी एक्सवाई नेता एक दिन टीवी पर यह घोषणा कर सकता था कि आज रात 12 बजे बड़े नोट बंद? क्या अखिलेश यादव गंगा में नरेंद्र मोदी की भगवा, रूद्राक्ष माला वाली पोशाक के साथ आरती का आईडिया बना सकते? क्या मायावती पीओके के भीतर सर्जिकल स्ट्राइक कर उससे देश को सन्ना देने का आईडिया सोच सकती थीं?

य़े सब आईडिया हैं, घटनाएं हैं जो चौबीस घंटे जनता को मैसेज देने की धुन के मकसद से हैं। हर दिन ऐसा कुछ जिससे लोगों में मैसेज बने और आंखों के आगे, दिमाग में नरेंद्र मोदी का चेहरा घूमता रहे। इसमें पूरा महत्व विजुअल का है। तस्वीर को, बात को अलग-अलग तरीकों से पैठाने का है। कभी दहाड़ कर, कभी रो कर, कभी अपनी कुर्बानी को याद दिला कर, कभी राम बन कर, कभी सेवक बन कर तो कभी ललकार कर!

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उत्तर :-
बात सही है। मगर मार्केटिंग की ऐसी ट्रिक्स कामयाब ही इसलिए हो रही है कि right knowledge देने वाली जनमान्य संस्था देश मे कोई बची ही नही है।

मोदी जी की मार्केटिंग तकनीक से वाशिंगटन पोस्ट, बीबीसी , न्यूयॉर्क टाइम्स , या nobel prize विजेता, लंदन school ऑफ economic जैसी संस्थाएं प्रभावित कभी भी नही करि जा सकती है।जैसा कि हम देख भी रहे हैं।

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मोदी की मार्केटिंग तकनीक नही है, यह भारत के राजनैतिक प्रशासनिक तंत्र की कुव्यवस्था का नतीजा है कि झूठ ज्यादा बिक रहा है सच से।

*क्योंकि भारतीय व्यवस्था में कोई भी स्थायी संस्था नही है जो कि व्यवस्था में keeper of the conscience की भूमिका अदा कर सके।*

क्या है यह भूमिका इसको समझने के लिये कुछ अन्य व्यवस्थाओं से तुलनात्मक अध्ययन करने पड़ेंगे।

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भारत ने अपना प्रशासनिक तंत्र ब्रिटेन से हस्तांतरण में प्राप्त किया था।
और ब्रिटेन ने यह तंत्र स्वयं अपने विशिष्ट सामाजिक -ऐतिहासिक घटनाओं से trial and error से रचा बुना था।
इसीलिये उनके तंत्र की खासियत आज भी यह है कि वह republican डेमोक्रेसी नही, बल्कि monarchical डेमोक्रेसी है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहां डेमोक्रेसी तब आयी जब जनता के आक्रोश ने राजा को आंतरिक युद्ध के बाद हरा दिया था।

मगर उनके विचारक चालक बुद्धिमान थे। उन्होंने यह मानवीय ज्ञान प्राप्त कर लिया की power corrupts, absolute power absolutely corrupts। तो उन्हें पावर को नियंत्रित करने का तरीका ढूंढा power balance (या checks and balance) के सिद्धांत पर। इसके लिए राजशाही को खत्म नही किया बल्कि संसद बना कर राजशाही को लगाम में कर दिया।

इससे क्या मिला , जो कि भारत मे नकल करके लिए republican democracy तंत्र में नही है ?

भारतीय तंत्र में ब्रिटेन के मुकाबले Keeper of the conscience की भूमिका देने वाला पद कोई भी नही बचा। britain में चूंकि राजशाही dynasticism पर है, इसलिए वह आजीवन उस पद पर रहते हैं , और उनके उपरांत पद का उत्तराधिकारी संसद के चुनाव से नही, बल्कि वंशवाद पद्धति से आता है। यानी राजा स्वंत्र चिंतन का व्यक्ति है।
भारत मे राष्ट्रपति संसद ही चुनता है, और वह पांच साल में रिटायर भी होता है। इसलिए वह मोहताज़ है अपने अगले कार्यकाल के लिए politicial class का।तो वह keeper of conscience की भूमिका नहीं देता है । अगर राष्ट्रपति कलाम साहब की तरह propriety का सवाल करे तो फिर फाइल को उनकी मेज़ तक नही पहुचने दो, उसके  रिटायरमेंट के इंतेज़ार कर लो !!। तंत्र को छकाने के जुगाड़ी तरीके तमाम है। मगर ब्रिटेन में तो आजीवन बने रहने वाली राजशाही है। और britain के बढ़े शिक्षण संस्थाएं, और बीबीसी जैसे जन सूचना संस्थाएं सीधे राजा के अधीन है, संसद के नही। और उनका  धन खर्च गणितीय फॉर्मूले से स्वतः मिलता है।

अमेरिका का republican democracy सिस्टम का उत्थान उसकी अपना सांस्कृतिक-इतिहासिक घटना क्रम है। यह तंत्र व्यवस्था भी check एंड3 balance सिद्धांत पर टिका है, मगर यहां power के पदाधिकारी britain व्यवस्था से पूरे भिन्न है। वहां यह check and balance संसद (जिसे Congress बोलते है) और वहां के राष्ट्रपति के बीच का है। राष्ट्रपति को जनता के बीच से सीधा चुनाव से निर्वाचित किया जाता है। मगर वहां के न्यायायलय के पद स्वतंत्र है और यहां तक कि  मुख्य न्यायालय के  न्यायधीश रिटायर नही होते। वह आजीवन कार्यकाल के होते है, या फिर की जब तक वह अपनी इच्छा से retirement न ले, या फिर unsound mind की वजह से हटाए न जाएं।

भारत ने दोनों देशो की भिन्न भिन्न तंत्र व्यवस्था का मिला जुला तंत्र बनाया है, और असल मे सब गुड़गोबर कर दिया है।

EVM fraud और इसका सामाजिक विश्वास पर प्रभाव

सुब्रमण्यम स्वामी ने 2013 में जब evm fraud की शिकायत करि थी, तब भी कांग्रेस की सरकार के दौरान कोर्ट इतने पक्षपाती न थे और मामले के समाधान में vvpat उसी शिकायत के समाधान में लाया गया था। सच को स्वीकार करना ही पड़ेगा, तब भी जब की सच कांग्रेस के पक्ष में खड़ा हो--कि, अगर कांग्रेस की सरकार evm fraud में गंभीरता से लिप्त होती तब फिर शायद 2014 के लोकसभा चुनावों में सत्ता परिवर्तन कभी होता ही नही।

मगर क्या आज भी ऐसा ही है ?

आज देश की बड़ी आबादी evm और vvpat की शिकायत कर रही है। 2013 में सिर्फ भाजपा और सुब्रमण्यम स्वामी ही शिकायत कर्ता थे। आज देश की करीब करीब सभी चुनावी पार्टी इसकी शिकायत कर चुके है।

कोर्ट कितना पक्षपाती हो सकता , इस पर समूचे देशवासियों की नज़र है। कोर्ट के किसी भी पक्षपाती फैसले या टालमटोल से तकनीयत में भले ही बड़ीआबादी को चुप रहने पर मजबूर करा जा सकता है, मगर समाज मे आपसी विश्वास यानी public trust को नष्ट होने से नही रोका जा सकता है।

पब्लिक ट्रस्ट क्या है, मैंने इस विचार को समझता हुआ एक निबंध कभी पढ़ा था जो कि किसी साहित्य में नोबल पुरस्कार प्राप्त लेखक ने लिखा था। वास्तव में  इंसानों को समाज मे जीवन आचरण कर सकने का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व सामाजिक विश्वास यानी पब्लिक  ट्रस्ट है। बुनियादी सामाजिक सहवास में से राष्ट्र का निर्माण public trust के खाते के निर्माण से ही होता है। संस्थाएं बनाई जाती है इसी खाते की देख रेख और रख-रखाव के लिए। public ट्रस्ट ही सुनिश्चित करता है राष्ट्र में सभी की बराबर की हिस्सेदारी होगी। कोई समुदाये किसी दूसरे की कुर्बानी और बलिदानों पर आराम नही भोगेगा। न्यायालय और न्याय के सूत्र public trust की रक्षा करते हुए ही कार्य करते हैं।

भक्तों को गांधी की उपलब्धि नही समझ में  आई कि गांधी ने कैसे पब्लिक ट्रस्ट को रचा बुना था। गांधी की हत्या करि और अब evm के झोल पर मिली जीत से भक्त वापस गांधी की बनाई बहमूल्य सौगात public trust को नष्ट करने लगे हैं। भारत बहु सांस्कृतिक आबादी और समुदायों वाला देश है। और आज का भारत एक कठिन राजनयिक भूगौलिक स्थान पर बसा हुआ देश है। public ट्रस्ट को लगे  आघात से हमारी विविधता  कभी भी हमारी कमज़ोरी बन सकती है।

पता नही की भक्त, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका को यह सब समझ आता है या नही।

Modern times habit of revisionism

Btw, revisionism is in high gear these days. And not just in History, but also in mythology.

Whatsapp messages are in circulation speaking Ravan was not a symbol of evil, but rather an ideal brother who was out to revenge his sister's dishonor.

Almost all thing that we know of the Hinduism is being put to revisionism. The problem is that while freedom of expression has come to the people, armed with the tool of social media where quick dissemination is possible, most people are not articulate thinkers, practised enough in the Critical Thinking. Moreover , India does not have institution as the high brand colleges of liberal arts and other think tank organization which may help to provide to the masses the right knowledge.

Result is that Intolerance has grown along with the growth of power to achieve wider dissemination of one's idea - namely, the social media.

Of course the evil bend  political outfits have rushed to capture the intolerance of masses to propel themselves to power.

मुस्लिम घृणा से राष्ट्र निर्माण का कोई मूल्य नही बनता

मुस्लिम-घृणा कोई ऐसा सामाजिक मूल्य नही है जिसके आधार पर इंसानों की बड़ी आबादी को शांति पथ पर चल कर सामना अचार संहिता यानी संविधान का आपसी संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया जा सके।

मुस्लिम घृणा से सिर्फ वोट बैंक कमाया जा सकता है, इंसानों को संतुष्ट नही किया जा सकता है कि सभी के लिए कुछ है।
जब जस्टिस कर्णनं एक पदस्थ जज हो कर भी भ्रष्टाचार के मात्र आरोप लगाने पर जेल भेज दिए जाते है, और जस्टिस दीपक मिस्र न्यायलय के आंतरिक कानून का हवाला दे कर अपने ही खिलाफ कार्यवाही के मुकदमे में खुद जज बन कर फैसला करते है,
तब बड़ी आबादी को पोल खुल कर पता चल जाता है की अब इस समाज के मूल्य क्या है, और किसके हितों की रक्षा के लिए है, जबकि फौजो में लहू कौन सी आबादी बहाने के लिए आगे जाती है।

जब कोर्ट के फैसले किसी पैसे वालो के हक़ में रहस्मयी क़त्ल में जाने लगते है तब बड़ी आबादी को पता चल जाता है जी आखिर किस आबादी के धन और सुख-सुविधा के हित मे कौन सी आबादी अपना लहू बहाती है सैनिक बन कर।

EVM Fraud - an attack on the public trust

सुब्रमण्यम स्वामी ने 2013 में जब evm fraud की शिकायत करि थी, तब भी कांग्रेस की सरकार के दौरान कोर्ट इतने पक्षपाती न थे और मामले के समाधान में vvpat उसी शिकायत के समाधान में लाया गया था।

आज देश की बड़ी आबादी evm और vvpat की शिकायत कर रही है। 2013 में सिर्फ भाजपा और सुब्रमण्यम स्वामी ही शिकायत कर्ता थे। आज देश की करीब करीब सभी चुनावी पार्टी इसकी शिकायत कर चुके है।

कोर्ट कितना पक्षपाती हो सकता , इस पर समूचे देशवासियों की नज़र है। कोर्ट के भी पक्षपाती फैसले या टालमटोल से तकनीयत में भले ही बड़ीआबादी को चुप रहने पर मजबूर करा जा सकता है, मगर समाज मे आपसी विश्वास यानी public trust को नष्ट होने से नही रोका जा सकता है।

पब्लिक ट्रस्ट क्या है, मैंने इस विचार को समझता हुआ एक निबंध कभी पढ़ा था जो कि किसी साहित्य में नोबल पुरस्कार प्राप्त लेखक ने लिखा था। वास्तव में  इंसानों को समाज मे जीवन आचरण कर सकने का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व सामाजिक विश्वास यानी पब्लिक  ट्रस्ट है। बुनियादी सामाजिक सहवास में से राष्ट्र का निर्माण public trust के खाते के निर्माण से ही होता है। संस्थाएं बनाई जाती है इसी खाते की देख रेख और रख-रखाव के लिए। public ट्रस्ट ही सुनिश्चित करता है राष्ट्र में सभी की बराबर की हिस्सेदारी होगी। कोई समुदाये किसी दूसरे की कुर्बानी और बलिदानों पर आराम नही भोगेगा। न्यायालय और न्याय के सूत्र public trust की रक्षा करते हुए ही कार्य करते हैं।

भक्तों को गांधी की उपलब्धि नही समझ में  आई कि गांधी ने कैसे पब्लिक ट्रस्ट को रचा बुना था। गांधी की हत्या करि और अब evm के झोल पर मिली जीत से भक्त वापस गांधी की बनाई बहमूल्य सौगात public trust को नष्ट करने लगे हैं। भारत बहु सांस्कृतिक आबादी और समुदायों वाला देश है। और आज का भारत एक कठिन राजनयिक भूगौलिक स्थान पर बसा हुआ देश है। public ट्रस्ट को लगे  आघात से हमारी विविधता  कभी भी हमारी कमज़ोरी बन सकती है।

पता नही की भक्त, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका को यह सब समझ आता है या नही।

The law is working such that the justice is no more for the agragarians

THe law of this country is nothing but another mechanism to fool the people that there is justice for everyone
The truth is that when Tej Bahadur Yadav complains of the bad food and ill-treatment and private-servant ship of the senior military brass, the law acts such that he is persecuted and relieved from his services.

But when there are eye witness statement of who was driving the vehicle when the poor , home less people , failed by the governance of this country, sleeping over the footpath , died crushed by the wheels, the Justice itself creates a whodunnit from the documented statement of the witnesses as to who was responsible.

The law works such that when a low-represented judge makes a complain of corruption in this country, he suffers imprisonment without having to go impeachment. But the law function such that an other judge accused of corruption cannot be prosecuted because there is no permission from the president or the CJI.
And then, the law works such that a sitting Chief Justice can overthrow all the principles of justice only to apply the local, internal administrative rules so to decide over a case where he himself is implied by the police report.

The whatsapp forwards speak of how the small , handful Jain community has the economic might , which the business class community has made even without reservation. The whatsapp also reports of how economic powerful are the Parsis and the Sikhs. But there is no one to speak of the poor, un represented agragarian communities who earn their meal only by ploughing the fields and sending their children to the defence forces to secure the borders of it. The day the people of these agragarian communities of farmers and small time professionals, fall in conflict with the mighty people, the law rolls over, the lights of justice extinguished and these people are put to persecution, punishment and subjugation. The freedom and the fruits of it are only for the mighty who can make the justice work for them. The poor are only meant to become a farmer and a soldier, or service professional,  and then be made to sing , standing in attention position, the national anthem and to salute the piece of cloth which they are told is the national flag.

The law works such the justice is never with them.

hierarchy of courts in India

Criminal Courts
The judiciary is divided along the lines of Nature of case they deal with - Civil, Criminal or Revenue



And along the lines of territorial distribution, with respect to the size of population of the place which they are going to give their service to - City or Metropolitan

Hence, the lower Criminal Courts are divided as follows as per the Criminal 
Constitution of criminal courts are per territorial division



The power of the court is also defined in the CrPC Code, which is summaried as below
Powers of various criminal courts





Civil Judiciary
The lower civil judiciary is divided as describe below
Lower Civil judiciary 

Lateral Inversion of the socio-political ideas during "adoption" of the Constitution

Physics विषय मे जब भी Light and Reflection के बारे में पढ़ाया जाता है तब प्रतिबिम्ब में lateral inversion का सबक भी सामने आता है। lateral inversion उस प्रत्यय का नाम है जब किसी आईने (mirror) में उत्पन्न प्रतिबिम्ब किसी मूल वस्तु के दाहिने हिस्से को बायां दर्शाता है।
कहते हैं कि नकल करने में भी अकल की ज़रूरत होती है। और कभी कभी नकल करना किसी को अपने अंदर प्रतिबिम्बित करने का जैसा ही होता है। और तब ही इस प्रत्यय की अकल रखनी पड़ती है जी नकल करने में हम कही किसी प्रत्यय को उल्टा पुल्टा तो नही लागू कर दे रहे हैं।

भारत का संविधान भी अपने किस्म का एक नकल ही है, क्योंकि वह जिन कानूनी मूल्यों को लागू करने का आपसी संकल्प करता है उन मूल्यों का क्रमिक विकास या सामाजिक उत्थान भारत भूमि पर हुआ नही हैं। इसलिए भारत के संविधान की दास्तान भी शायद कुछ ऐसे ही गलतियों से भरी हुई है।

मूल सामाजिक घटनाओं के चलते उत्पन्न संविधान के लिए आवश्यक सामाजिक चेतना अलग होती है, और नकल करके लाये गए संविधान को लागू करने के लिए दूसरे समाज या देश मे वह सामाजिक चेतना विलुप्त होती है। यहां से नकल करने में अक्ल की कमी का भेद खुलने लग जाता है।

भारत मे भी कुछ ऐसा ही घट रहा हैं। हम भारतीयों ने वैसे तो प्रजातंत्र को ही अपना सामाजिक-प्रशासनिक मूल्य संविधान में लिख लिया है, मगर गलती यह है कि हमने किसी राजा या सम्राट की शक्तियों को नियंत्रित करने की बजाए आम नागरिक की शक्तियों को ही नियंत्रित कर दिया है।

यही होता है असल और नकल का फर्क। पश्चिमी देशों में जहां संविधान के कानूनी और प्रशासनिक प्रत्यय वहां के सामाजिक इतिहास से प्राप्त पाठ से आये हैं, और इस लिए उनके संरक्षण के लिए आवश्यक भावनात्मक सामाजिक चेतना सहज उपलब्ध है, भारत मे उन प्रत्ययों के लिए नासमझी अधिक है और इसलिए संविधान का आवश्यक संरक्षण नही हो पा रहा हैं। नतीजे यह है कि किसी अधिक बलवान समूह को जब भी आवश्यकता पड़ती है वह संस्थाओं और न्याय को संविधान के विरुद्ध जा कर तोड़ कर नतीज़ों को अपने पक्ष में कर लेता है।

चाहे चुनाव आयोग का दंत रहित संस्था होने की बात हो, या सीबीआई का राजनैतिक चाबी होने का मुद्दा हो, या जस्टिस कर्णनं का sitting judge रहते हुए बिना impeachment करे सज़ा देने का मुद्दा हो, कुछ अगोचर गुटों ने आसानी से संविधान को भेद करके यह सब प्राप्त कर के दिखाया है और संविधान के संकल्प को संरक्षण देने की आवश्यक सामाजिक चेतना वस्तुतः अनुपलाध ही रही है बीच बचाव करने संविधान की मर्यादा बचाने के लिए।

*यह सब हुआ ही क्यों ?*

सर्वप्रथम तो हमारे सामाजिक इतिहास में यह सबक है ही नही की प्रजा का शत्रु राजा , सामंतवाद , निकृष्ट मानसिकता, असमान कपट न्याय, और राजा के सिपहसालार और सैनिक ही थे। हमारे यहाँ राष्ट्रवाद हमे स्कूली किताबो के माध्यम से ठूस जाता है, वह स्वेच्छा से प्राकृतिक प्रवाह में उत्पन्न नही हुआ है। शायद ऐसा इसलिए कि भारत भूमि ने अत्यधिक आपसी, अंतर जातिय या अंतर धर्मी संधर्ष नही देखा। यहाँ दंगे होते हैं क्योंकि अतीत से लेकर आज तक जंग हुई ही नही है।

नतीज़ों में शक्तियों को नियंत्रण करने वाले आवश्यक शक्ति संतुलन के सबक प्राप्त ही नही हुए और फिर नकल नकल के खेल में हमने किसी राजा और उसके सैनिकों की शक्तियां संतुलित-नियंत्रित करने की बजाए उन्हें और अधिक बलशाली बना दिया है, सैनिक और फौजों को परम बलिदानी और पूजनीया मानना शुरू कर दिया है, और प्रशासन शक्ति पूरा ही राजनेताओं और अधिकारियों को सौंप दिया है।

राष्ट्रवाद का सबक भारत में खुद उत्पन्न नही होने का ही यह नतीजा है। पश्चिम देशों में राष्ट्रवाद और उसके मूल्य अत्यधिक आपसी संघर्ष के उपरांत समाज में शांति कायम करने के मद्देनजर पैदा हुए।
यहां भारत मे राष्ट्रवाद के मूल्य की मंशा ठीक उल्टा ही, सामाजिक शांति कायम करने की बजाए दुश्मन देश से रक्षा करने के लिए है।
अभी हाल में व्हाट्सएप्प पर भी किसी सद्गुरु की वीडियो क्लिप देखी जिसमे वह राष्ट्रवाद के सबक को बाल्यकाल से ही पढ़ाने का हिमायत कर रहे थे । मैं वह क्लिप देख कर आस्चर्य चकित था की हमारा देश नकल करने के प्रयासों में lateral inversion के प्रभावों से कितने भीतर तक प्रभावित हो गए हैं। हमारे धार्मिक मूल्य भी राष्ट्रवाद और सामाजिक व्यवस्था और शांति के अभेद संबंध को समझ नही सके है और ठीक उल्टा राष्ट्रवाद के मूल्यों को brainwash करके करवाई जाने वाली सैनिकीय हिंसा को प्रसारित करने के लिए दूषित कर रहे है।

वर्तमान भारत मे कही कोई भी गुट नही है जो कि भारत के संविधान में भारत के राजदंड द्वारा किये गए इन अपवादों का विरोध दर्ज करने के किये राष्ट्रवाद की भावना को जागृत करे। मगर राष्ट्रवाद भावना के माध्यम से दुश्मन देश से शत्रुता निभाने के लिए बहोत सारे वाचक और गुट सामने खड़े हैं। शायद इसलिए क्योंकि दुश्मन देश से लड़ाई के माध्यम से ही सैनिक, पुलिस और प्रशासन के सम्मान का विचार निकलता है जिससे राजदंड का नियंत्रित कर रहे लाभान्वित गुट सत्ता सुख का भोग कर रहा है।

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