EVM fraud के सामाजिक प्रभाव

ग़ुलामी की ओर तो बढ़ने लगे हैं, हालांकि यह होगी यूँ की अब फर्जी राष्ट्रवाद सफल होकर असली राष्ट्रीय एकता की भावना को ही समाप्त कर देगा।
Evm fraud वाली राजनीति की आवश्यकता होगी कि हर महत्वपूर्ण पद पर अपने गुर्गे बैठाए जाएं ताकि तैयारी बनी रहे यदि कोई जन विद्रोह सुलगना शुरू हो तो तुरंत बुझाया जा सके।

तो अपने गुर्गे बैठाने की हुड़क में भेदभाव, पक्षपात वैगेरह जो कि पहले से ही चलते आ रहे थे, और अधिक तूल पकड़ लेंगे। फिर,भाजपा-समर्थक और भाजपा-विरोधी जो की पहले से ही आरक्षण नीति के व्यूह में जाति आधार पर विभाजित होते हैं, भाजपा के गुर्गे अधिकांश उच्च जाति और उच्च वर्ग के लोग ही होंगे जो कि भेदभाव और पक्षपात करके ऊपर के पद ग्रहण करेंगे।

तो भेदभाव और पक्षपात एक व्यापक isolation की भावना फैलाएगा, जो कि राष्ट्र भाव को धीरे धीरे नष्ट कर देगा।

सेनाओं में अधिकांश लोग व्यापारिक परिवारों से नही बल्कि किसानी वाले पिछड़े वर्गों के है। औपचारिक गिनती भले ही टाली जाए,वास्तविक सत्य से निकलते प्रभाव को रोका नही जा सकता है। सत्य के प्रभाव चमकते सूर्य की ऊष्मा जैसे ही होते हैं। जितना भी पर्दा करके सूर्य को छिपा लो, वह अपने अस्तित्व के प्रमाण दे कर रहता हैं।

तो evm fraud के सामाजिक प्रभाव यूँ पड़ सकते है कि सेनाओं के मनोबल कमज़ोर पड़ने लगे। सिर्फ एक-तरफा विचारधारा ही प्रसारित और सफल होती रहेगी, और जो कि विपरीत विचार के लोगो को हताश और निराश करेगी। उनके लिए कोई स्थान और सफलता का मुकाम बचेगा ही नही। वह स्वयं आत्म बल खो करके असफलता को स्वीकार कर लेंगे, मनोबल से टूट जाएंगे, और ग़ुलामी को अपना चीरभाग्य मान लेंगे।

और फिर ग़ुलामों की फौज से राष्ट्र की रक्षा होती है क्या ?

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Evm fraud की आवश्यकताओं के चलते अब प्रशासन के समर्थकों की सोच के विपरीत विचारधारा के लिए कोई भी स्थान बचेगा नही। आलोचना करके फायदा नही रहेगा, क्योंकि भय होगा, कब कहाँ क्या हानि कर दी जाए। वैसे भी, आलोचनाओं का कोई असर नही पड़ने वाला होगा, क्योंकि अब उम्मीद नही बचेगी की evm fraud से आगे बढ़ कर उस विपरीत विचार के समर्थक जीत जाये और अपनी नीतियों को लागू करके उसकी सफलता को साबित कर सकें।

तो विपरीत विचार रखने का अर्थ ही नष्ट हो जाएगा, शून्य चित हो कर वापस मन मस्तिष्क को चीर निंद्रा में डुबो देना ही आत्म शांति का मार्ग बनेगा। राजनैतिक और सामाजिक राष्ट्रीय जागरूकता प्राप्त करने से पहले ही वापस सुला दी जाएगी। किसी भी बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य को प्राप्त करने का मूल संसाधन सामाजिक जागृति ही है। वरना गुलामो की फौज से ही तो उत्तरी कोरिया भी एक बेहद अनुशासित और सजा-धजा, chaos रहित देश है।

संविधान निर्माताओं की गलती के परिणामों को भुगत रहा वर्तमान भारत

*मानो न मानो इन सब अंधेर नगरी प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था के लिए अम्बेडकर का कानून ही जिम्मेदार है।*

अम्बेडकर के संविधान की असली महिमा तो यूँ है कि अगर इसे राम राज्य में भी लगा दिया गया तो वह भी कुछ सत्तर-एक सालो में आज के भारत जैसे अंधेर नगरी में तब्दील हो जाएगा।

*आखिर इस संविधान में गलती क्या है जिसकी वजह से यह सब हो रहा है ?*

इस संविधान की गलती है कि इसमें अंतःकरण की ध्वनि की रक्षा करने वाली भूमिका के लिए कोई भी पद या संस्था है ही नही !

इसलिए यहां अंतःकरण की ध्वनि पर काम करने वाले का हश्र अशोक खेमखा या संजीव चतुर्वेदी या सत्येंद्र दुबे हो जाएगा।

असल मे भारत के राष्ट्रपति का पद भी एक नौकरी के रूप में है, अन्तःकरण की रक्षा की भूमिका के लिए बना ही नही है। कारण है राष्ट्रपति के चयन का तरीका उन्ही सांसदों के हाथ मे है जिनकी शक्ति को उसे संतुलित करने के किये check and balance देना था, और उसका कार्यकाल 5 पंचवर्षीय ही है।

तो अब यहाँ संसदीय political class सर्वशक्तिशाली है जिसका चेक एंड बैलेंस के लिए कोई भी नही है। सर्वोच्च न्यायालय की judicial review की शक्ति को भी गुपचुप राष्ट्रपति पद के माध्यम से अपने पसंद के व्यक्ति की वरिष्ठता से आगे बढ़ा कर पदासीन करके नियंत्रित किया जा सकता है। कम से कम अपना ही जज मामले की सुनवाई को टाल करके सरकार के कुकर्म और असफलताओं के लिए उन्हें सजा से बचा सकेगा।

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अम्बेडकर शायद किसी भी राजशाही से घृणा करते थे। इसलिए उन्होंने किसी भी किस्म की राजशाही को भारत मे लागू नही करने का पूर्वग्रहीत मन बना लिया था।
तो drafting committee ने प्रजातंत्र में राजशाही की उपयोगिता को खुले मन से समझा ही नही की किसी राजशाही प्रजातंत्र की शक्ति संतुलन व्यवस्था में कैसे राजशाही और संसद एक दूसरे के पूरक और शक्तिपीठ विपरीत भूमिका निभाते हैं। हाँ, राजशाही पर कुछ व्यक्तिगत अंकुश और प्रतिबंध भी इन्ही वजह से थे। जैसे कि राजशाही का किसी भी रूप में राजनैतिक बयान या निर्णय प्रतिबंधित हैं। वर्तमान संविधान में राष्ट्रपति के पद में वह अंकुश तो लगाए, titular head बनाया, मगर अन्तःकरण भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार ही नही, उसके चयन और कार्यकाल की दृष्टि से।

यह अकस्माक नही है कि दुनिया के सफल प्रजातंत्रों में अधिकांश आज भी *राजशाही प्रजातंत्र* हैं। सिर्फ अमेरिका ही उदाहरण से कुछ हद तक एक सफल *गणराज्य प्रजातंत्र* है।
1947 से 1950 के बीच संविधान निर्माण समिति ने गलत प्रयोग यह करि की उन्होंने राजशाही प्रजातंत्र वाले administrative gear यंत्र में सिर्फ राजशाही के स्थान पर राष्ट्रपति को बैठा करके उसे एक गणराज्य प्रजातंत्र बनाने का प्रयास कर दिया।

यह प्रयोग कुछ ऐसा ही साबित हुआ कि BMW गाड़ी के पहिये बदल कर ट्रक के पहिये लगा दिया और फिर उम्मीद करि कि यह नई गाड़ी BMW की तरह तेज़ी से भी चलेगी और ट्रक की तरह मजबूत और अधिक भार भी उठाएगी।

*सच यह है कि किसी राजशाही प्रजातन्त्र के संवैधानिक प्रशासनिक ढांचा एक दम अलग होता है गणराज्य प्रजातन्त्र से। दोनों को आपस मे मिक्स करके एक से दूसरे में तब्दील नही किया जा सकता है।* drafting committee ने यह गलती कर दी, जिसकी सज़ा आज वर्तमान भारत भुगत रहा है।

फिर , तत्कालीन भारत के संविधान निर्माण समिति में एक गुपचुप गुट ऐसा भी बैठा था जो कि वाकई सामंतवादी मानसिकता का था, और जो कि चाहता ही नही था कि नागरिकों का किसी आदर्श प्रजातंत्र के जैसा पूर्ण सशक्तिकरण किया है। वह पूर्ण सशक्तिकरण को नागरिको की अशिक्षा और अबोधता के बहाने किसी विस्मयी दिन तक के लिये टलवा देने का हिमायती था, क्योंकि ऐसा करने से वास्तविक प्रशासन शक्ति और दंड उन्हें गुट के हाथों में थमा रह जायेगा जो कि अतीत से इसे थामते रहे है -- सामंत। बस सामंतों का चेहरा बदल जायेगा, प्रकृति वही रहेगी - vvip culture का रूप ले लेगी।

Why there is no SANTA CLAUS in Catholic Christianity ?

Notice that Santa Clauz is a typical invent of the Protestant Christianity, and not Catholic .
Santa Clauz comes in England, Norway, Denmark and these Protestant nations, but not in Vetican, the country of Pope.

Since Protestant see a direct communion between Man and God, therefore, they don't like or promote any Church based diktat to regulate the life of common man. Therefore, the saints of the fold of Protestant also have easy, happy-go-lucky nature, who can sing around, and make merry, and go around distributing gifts as a pleasant surprise for children and adults alike. This behavior is unlike the saints of Catholic fold, where a saint is a high figure, sombre, revered, strict-looking, serious person, does not joke around, and who will never 'indulge' in merry-making, or even singing and galloping. Perceivably because he needs to put such demeanour by which he may regulate the conduct and behavior of common man every now and then.
   
Saint Nicholus has transformed into Santa Claus in Protestanism , not in Catholism.

Protestant Christianity, Secularism, और democracy में जोड़

पश्चिम में ज्यादातर डेमोक्रेसी आज भी राजपाठ वाली monarchical democracy हैं।  बड़ी बात यह भी है कि यह सब की सब protestant christianity का पालन करती हैं, catholic christianity का नही। secularism एक विशेष सामाजिक और धार्मिक आचरण है जो कि सिर्फ protestant christianity में ही मिलता है, catholic christianity में नही। और secularism को ही संरक्षित करने के लिए आज भी  यहां तक कि शासक और उसके परिवार को protestant समूह में ही शादी करना अनिवार्य है, catholic में शादी करने से राजपाठ गवां देने पड़ेगा। सिर्फ ब्रिटेन के संसद ने अभी सं2013 में कानून पारित करके करीब 500 सालों बाद राजशाही परिवार को catholic लोगो मे विवाह की अनुमति दी है। स्वीडन , नॉर्वे, denmark में तो अभी भी प्रतिबंध लागू है।

राजशाही को तो राजशाही के भीतर ही शादी अनिवार्य भी थी। राजकुमार विलियम और शुश्री केट का विवाह विशेष अनुमति से हुआ है।

राजनैतिक शास्त्र में दिलचस्पी रखने वालों को इन सब बातों का सामाजिक प्रशासनिक अभिप्राय समझना चाहिए। power balance theory में यह सब अनिवार्यता और प्रतिबंध कैसे पश्चिम की डेमोक्रेसी को शक्तिशाली और सफल बनाते हैं।

आरएसएस और भक्तों को यह बात समझ मे नही आ रही है। उनको सभी christanity एक जैसी दिखती है - protestant और catholic। इसका भेद और सामाजिक इतिहास भक्तो को पता नही है। आरएसएस आरक्षण विरोधी upper क्लास, upper caste लोगो का समूह है। इसलिए इनके दिमाग खुलेंगे ही नही protestant christianity और secularism का वास्तव अभिप्राय-गठजोड़ को समझने के लिए। और democracy क्यों secularism से जुड़ता है।

आरएसएस को सिर्फ यह दिखता है कि सब देश christian देश है । वहाँ christainity की शिक्षा स्कूलों में दी जाती है।
जब सामाजिक इतिहास का ज्ञान नही होता है,और खुद की अकल किसी आत्म मुग्ध विश्वास से बंद होती है, तब वह भक्त ही बनता है।

संविधान का आलोचनात्मक अध्ययन

संविधान का आलोचनात्मक अध्ययन

ऐसा नही की यह संविधान बिना किसी आलोचना के, सर्वस्वीकृत पारित किया था। खुद अम्बेडकर जी ,जो कि ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष थे, उन्हें भी संविधान के अंतिम स्वरूप को एक workable document कहकर पुकारा था, यह समझते हुए की इस डॉक्यूमेंट से सभी गुटों की मांगें और जायज आलोचनाएं पूर्ण नही हो सकी है, मगर इससे अधिकांश जायज आलोचना को शांत करने का मात्र एक प्रयास हुआ है। उन्होंने संविधान के अंतिम प्रपत्र को सभा को देते हुए उम्मीद जताई कि शायद भविष्य में इन के द्वारा निर्मित प्रक्रियों को अपना करके हमारा देश भविष्य काल मे कभी सारी जायज आलोचना को शांत कर सकेगा। 

क्या थी भारत के संवीधन की आलोचनाएं, यह इस लेख में चर्चा का बिंदु है।

1) सर्वप्रथम आलोचना थी कि अधिकांश उच्च वर्ग, उच्च जाति (upper class, upper caste) गुटों ने आरक्षण सुविधा को स्वीकृत नही किया था। यह गुट वैसे भी भारतीय समाज मे हुए भेदभाव के ऐतिहासिक तथ्य को सत्य नही मानता है, और इसलिए भेदभाव के उपचार को भी स्वीकार आखिर क्यों करता ?

2) संविधान की एक आलोचना यह थी कि वह इतना विस्तृत और घुमावदार भाषा , तथा अनुच्छेद वाला है कि साधारण, विशेष अध्ययन किये बिना किसी को उसके भीतर की मंशा और तर्क प्रवाह समझ मे ही नही आएगा।
   खास तौर पर अमेरिका के नागरिक अधिकार, ब्रिटेन के सरल कानूनों के समक्ष भारत का संविधान बहुत ही जटिल लेखा जोखा है।
   इस आलोचना के प्रतिउत्तर में अंबेडकर और अन्य लोगो ने कहा कि इतना जटिल , विस्तृत करने से दोहरे उच्चारण की संभावना निम्म हो जाती है।

हालांकि वर्तमान में पलट कर देखें तो लगेगा कि असल मे आलोचक ही सही साबित हुए। संविधान की जटिलता के चलते कानून में से predictibility का गुण नष्ट हो गया है। आज वास्तव में कोई भी नागरिक पूर्ण विश्वास के साथ अंदाज़ा नही लगा सकता है कि किस स्थिति में सही उच्चारण क्या है !? कानून सिमट करके के कोर्ट के चौखटे के भीतर जज की मनमर्ज़ी बन गया है, और जज सही कह रहा है या  नही, इसको माप करने का कोई मापदंड बचा ही नही है।। कोर्ट के चौखटे के बाहर सिर्फ जज का निर्णय निकलता है, उसका तर्क और विपक्ष की आलोचना या कटाक्ष नही, और जिसका कुछ किया भी नही जा सकता।

3) एक आलोचना यह भी रही थी कि केंद्रीय सरकार कही अधिक बलवान और शक्तिशाली हो जाएगी राज्य सरकारों से, और राज्य सरकार शक्तिशाली हो जाएगी स्थानीय सरकारों से।
  इस आलोचना के प्रतिउत्तर में अम्बेडकर जी का जवाब था कि यह तो दुनिया भर में सर्व सत्य है , और इसे रोकना बहोत मुश्किल होगा। संविधान में प्रयास है कि राज्य सरकारों या स्थानीय सरकारों के लिए कुछ विषय संरक्षित किये जा सकें। इतना भी यदि प्राप्त कर सके तो काफी होगा।
   मगर आज यदि हम पलट कर सोचे तो देखेंगे कि आलोचक ही सही साबित हुए। केंद्र कही अधिक शक्तिशाली हो कर सरकारों को राज्यपाल के हस्तक्षेप से गिरवा भी लेता है। या स्थानीय सरकार में विपक्ष आ जाये तो असहयोग करके, या बजट के चाबुक से उसे जनहित कार्य करने में बंधित करता है। ताकि जनता में उस पार्टी की छवि धूमिल कर के अपने नंबर बढ़ा लें।

4) एक आलोचना यह थी कि न्यायपालिका के अवैध, अनैतिक आचरण के प्रति संविधान में कोई भी रोकथाम उपलब्ध नही है। यदि न्यायपालिका ही नागरिक हित को खाने लगे तो फिर आगे कुछ भी मार्ग नही बचता।

इस आलोचना के जवाब में अम्बेडकर जी ने man is vile by nature , then कहकर खंडन किया और  उम्मीद रखी कि शायद महामहिम राष्ट्रपति जी का शक्तियों का प्रयोग इसको रोक सकेगा, और यदि राष्ट्रपति भी अंतरात्मा के रक्षक की भूमिका नही दे सके तो फिर शायद हम सबको स्वीकार कर लेना होगा कि इंसान का स्वाभाविक चरित्र निर्माण ही अनैतिकता से हुआ है और ऐसे में दुनिया का कोई भी संविधान बेकार हो जाने वाला है।

आलोचकों ने यहाँ राष्ट्रपति पद के नियुक्ति और कार्यकाल प्रक्रिया पर कटाक्ष किया कि अपरिपक्व हैं , इसमे ही गलती है। अम्बेडकर जी के man is vile वाले प्रतिउत्तर के premature होने की आलोचना हुई कि अभी सभी प्रयास और विकल्प तलाशे बिना ही अम्बेडकर जी इस विचार पर आ गए। मगर इस आलोचना को अनदेखा , अनसुना से कीया गया। राष्ट्रपति के non-partisan या bi-partisan होने का debate यही से आरम्भ हुआ था। आज तो उल्टे partisan व्यक्ति ही राष्ट्रपति बनते हैं। 

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