The process of how discrimination is carried out by teachers, professors and those pretending to be someone's mentor

There used to be student in my class who would indulge in theft activities right in full view of everyone's eyes ,but of course by a very clever way of shielding himself in case he would get caught. He would freely pick things from other's school bag and if caught, he would say that he was only giving the person a practise in keeping his stuff nicely secured, as if only being a good mentor in training him to keep his guard fast.
And ofcourse, the other times if the person failed to notice, the object stealing mission would get successful.
This method of theiving was not a sure shot, targeted mechanism, but it was surely a more successful, more guarded path to doing a wrong, that too in full view of everyone, and  thus this method worked on a statistically higher bet of success.

Teachers, professors in college and the appraising officers in offices indulge in discrimination behaviour on the very similar lines. The easier method of indulging in discrimination is by pretending to be playing someone's Mentor and then giving the person more difficult and harder task so as to induce a wrong, a fault , a mistake or an accident by him. This way, the discrimination-doer manages to hide away his true intentions of whom he wishes to favour, as he works by fouling the prospects of the person whom he wishes to disfavor.

Such practitioners of discrimination tactics can be heard making accusations on the person of dislike of "not having enough confidence in him", and then subjecting the person to actions or task in order to "test his performance" while themselves departing from 'rule of law'. The instant defence available, if caught, is that "he is only testing his abilities".

The difficulty of victim in this method is that it is very difficult to report and convince his own peer of how he was not actually being tested for his performance and abilities, but truly being subjected to discrimination by being induced to making errors, mistake and an accident by being subjected to more difficult conditions than his other favoured colleague. The victim is not able to draw support of his true peers.

For many centuries, the teachers and professors and office senior managers alike , having ill- intentions of discriminating against someone, have acted like the above and thereof produced better "merit" in their favoured pupil as against "poor performance" in their disfavoured pupil.
And ofcourse , these people have then argued against the social-justice policies by calling it to be working against the "deserved" by promoting the "reserved"

श्रीमान न्यायालय जी, एकान्तता का अधिकार तो राज्य की असीम शक्ति को ही सीमित करने के लिए होता है !

(fb post dated 25 Aug 2017)
 
एकान्तता यानी privacy के विषय में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी नागरिक की एकान्तता को भेद सकने के संसाधन और क्षमता सिर्फ और सिर्फ राज्य कर पास ही होते हैं; नागरिक अपने पड़ोसी नागरिक की एकान्तता को भेद सकने की क्षमता नही रखता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि एकान्तता का अधिकार को मौलिकता का स्थान देने का उद्देश्य ही यह है कि वास्तव में यह अधिकार राज्य बनाम नागरिक की ही आपसी खिंचा तनी का विषय है, और इस अधिकार का महत्व है राज्य और नागरिक के बीच मे शक्ति संतुलन को प्राप्त करने का।
गलतियां तो प्रतिपल हर कोई कर रहा होता है, राज्य या न्यायालय भी कोई दैविक आतरात्मा से निर्मित संस्थान नही है जो कि कभी कोई गलती करे ही ना। ऐसे में राज्य को असीम शक्तियों को नियंत्रित करने के लिए एकांकता का अधिकार का मौलिक बनाये जाना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पूर्ण करता है। और हम नागरिक वर्ग शायद इसी लिए ऐसा समझ सकते हैं कि एकान्तता का अधिकार भी उस श्रेणी में आता है जो कि किसी तथाकथित प्रजातंत्र को उसकी वह प्रकृति प्रदान करवाता हैं जिससे वह प्रजातंत्र कहलाने लायक बन सके। अन्यथा, लोगो को स्मरण रहना चाहिए कि उत्तरी कोरिया भी तो खुद को अपने संविधानिक ढांचे के तहत एक प्रजातंत्र ही कहलवाता है।
तो यह समझा जा सकता है कि किसी भी तानाशाही राज्य के प्रयास हमेशा यही रहते होंगे कैसे भी, किसी भी बहाने एकान्तता की मौलिक अधिकारों की दीवार को भेदा जा सके ताकि राज्य की शक्तियों का प्रयोग करके वास्तविक विपक्ष को नष्ट किया जा सके और नकली , बहरूपिया विपक्ष के निमार्ण को प्रोत्साहित करें जो कि असल मे शासस्त पार्टी कर गलत उद्देश्यों को पूर्ण करने में सहयोग ही दे।
तानाशाह राज्य ऐसा करने में अधिक आसानी प्राप्त कर सकता है यदि उसके पास नागरिकों की एकान्तता को भेद सकने की वैधता प्राप्त हो जाये। क्योंकि अब तो मात्र राज्य के पास ही यह क्षमता रह जायेगी की वह यह तय करे कि एकांकता में गलत नागरिक को उसकी गलतियों के लिए सज़ा दिलवा दे और किसको बच कर निकल जाने दे।
एकान्तता के अधिकारों के आधीन ही वह क्षमता वास करती है जिससे विपक्ष राज्य की असीम शक्तियों का मुकाबला करके बदलाव को प्राप्त करने के लिए प्रयास कर सकता है। किसी भी वास्तविक प्रजातंत्र में विपक्ष का आर्थिक आर्थिक शसक्त होना इस दिशा से महत्वपूर्ण भी है। एकांकता के अधिकार उस श्रेणी के अधिकार है जो कि प्रजातंत्र को उसी प्रकृति को प्राप्त करने में मार्ग उपलब्ध करवाता है। इसलिए इसका मौलिक और अभेद होना महत्वपूर्ण था।
मगर सर्वोच्च न्यायलय ने इस अधिकार के प्रति जो कुछ निर्णय दिया है उसने भारतीय प्रजातंत्र की उसकी प्रजातांत्रिक प्रकृति ही भीतर से नष्ट कर देने के मार्ग को खोल दिया है। तानाशाही राज्य के हमेशा ही यह प्रयास रहते रहे है कि किसी भी बहाने -चाहे वह राष्ट्रीय सुरक्षा हो, चाहे जनहित मूलभूत जीवन सामग्री आवंटन हो, या फिर अपराध नियंत्रण का बहाना हो -- वह अपने मनमर्ज़ी से अपने तरह के विपक्ष का निर्माण प्रोत्साहित करें जो कि असल मे तानाशाह को कष्ट न दे, बल्कि जनता को प्रजातंत्र के खोखले ढांचे पर नियंत्रित करने का माध्यम बन जाये।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से राज्य के पास मनमर्ज़ी भेदभाव करने का अस्त्र आधिकारिक रूप से आ गया है जिससे वह खुद तय करे कि उसके समक्ष किस तरह का विपक्ष खड़ा हो। राज्य अपनी शक्ति से मनपसंद लोगों की गलतियों को अनदेखा कर सकेगा और नापसंदों को दंडित करेगा उनकी एकांकता में भेद करके उनकी गलतियों को दिखा कर।

Why Indian form of "Republican Democracy" is a flawed system

(from Facebook post dated 20Nov2017)

भारत ने अपना प्रशासनिक तंत्र ब्रिटेन से हस्तांतरण में प्राप्त किया था।
और ब्रिटेन ने यह तंत्र स्वयं अपने विशिष्ट सामाजिक -ऐतिहासिक घटनयेओं से trial and error से रचा बुना था।
इसीलिये उनके तंत्र की खासियत आज भी यह है कि वह republican डेमोक्रेसी नही, बल्कि monarchical डेमोक्रेसी है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहां डेमोक्रेसी तब आयी जब जनता के आक्रोश ने राजा को आंतरिक युद्ध के बाद हरा दिया था।
मगर उनके विचारक चालक बुद्धिमान थे। उन्होंने यह मानवीय ज्ञान प्राप्त कर लिया की power corrupts, absolute power , absolutely corrupts। तो उन्हें पावर को नियंत्रित करने का तरीका ढूंढा power balance (या checks and balance) के सिद्धांत पर। इसके लिए राजशाही को खत्म नही किया बल्कि संसद बना कर राजशाही को लगाम में कर दिया।
इससे क्या मिला , जो कि भारत मे नकल करके लिए republican democracy तंत्र में नही है ?
भारतीय तंत्र में ब्रिटेन के मुकाबले Keeper of the conscience की भूमिका देने वाला पद कोई भी नही बचा। britain में चूंकि राजशाही dynasticism पर है, इसलिए वह आजीवन उस पद पर रहते हैं , और उनके उपरांत पद का उत्तराधिकारी संसद के चुनाव से नही, बल्कि वंशवाद पद्धति से आता है। यानी राजा स्वंत्र चिंतन का व्यक्ति है।
भारत मे राष्ट्रपति संसद ही चुनता है, और वह पांच साल में रिटायर भी होता है। इसलिए वह मोहताज़ है अपने अगले कार्यकाल के लिए politicial class का।तो वह keeper of conscience की भूमिका नहीं देता है । अगर राष्ट्रपति कलाम साहब की तरह proprietary का सवाल करे तो फिर फाइल को उसकी मेज़ तक नही पहुचने दो, उसके रिटायरमेंट के इंतेज़ार कर लो। मगर ब्रिटेन में तो आजीवन वाली राजशाही है। और britain के बढ़े शिक्षण संस्थाएं, और बीबीसी सीधे राजा के अधीन है, संसद के नही। और उनका धन खर्च गणितीय फॉर्मूले से स्वतः मिलता है।
अमेरिका का republican democracy सिस्टम की उपज कर अपना सांस्कृतिक-इतिहासिक घटना क्रम है। वहां मुख्य न्यायालय के न्यायधीश रिटायर नही होते।
भारत ने दोनों का मिला जुला तंत्र बनाया है, और असल मे सब गुड़गोबर कर दिया है।

ग़ुलामी के लिये अभिशप्त है भारतीय संस्कृति

Via Mani S

कभी कभी यूँ लगता है कि big bang से लेकर आज तक के सामाजिक इतिहास को अपने सामने संक्षिप्त रूप में घटते देख रहा हूँ।

आआपा के अंदरूनी संघर्ष में वह सब मसालों के चुटकी भर मात्रा के अंश है जो कि आज तक के भारत के सामाजिक इतिहास की दास्तां को बयां करते हैं।
समझ मे आता है आखिर क्यों और कैसे इस देश की किस्मत में ही लिखा था कि इसे हज़ारो सालों की ग़ुलामी ही भुगतनि थी। और फिर सौ-एक सालो की आज़ादी के बाद में वापस ग़ुलामी में चला जायेगा।

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Via Mani M

ये हमारी भारतीय मूल के डीएनए की तासीर है भाई । इसलिए ग़ुलामी तो अभिशप्त हैं हम

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Via Mani M

क्या करेंगे , क्या न करेंगे ये तो भविष्य के गर्त में हैं । यहाँ तो कुछ विश्लेषण और क़यास लगाए जा रहे हैं । भाजपा तो ऐसे मौक़े के तलाश में ही रहती है और कुमार इसमें किस रूप में बैठेंगे ये एक अनुमान है । और पार्टी की उपेक्षा कुमार को ऐसा करने पर विवश भी कर सकती है ।

दूसरी बात ‘आप’ पर्सेप्शन की लड़ाई हार चुकी है ! अब ये सवार्थसिद्धि और चाटुकारों का एक समूह लगता है

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Via Mani S

चलिए....यही सही।

बहाने /कारण तो यूँ भी बनाये जा सकते है कि -
यहां good samaritan जनता साला है ही कौन ??सभी तो अपने अपने स्वार्थ के लिए है यहां।

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Via Mani M
सब मौक़े और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं । सत्य है

केशवानंद भारती फैसला : समीक्षकों की राय : भारत में प्रजातंत्र को दफन करने का ताबूत

Judicial review की power सिर्फ supreme court के पास होती है और इसका प्रयोग तब हुआ था जब मोदी सरकार ने National Judicial Accountability Bill लाया था। कोर्ट ने यह कह कर इस कानून को खारिज़ कर दिया कि इस बिल के मध्यस्थ आवश्यक separation of power नष्ट हो जाएगा।
मगर judicial review की power का सर्वोच्च न्यायालय ने प्रयोग तब नही किया है जब मोदी सरकार सभी लोगो को अपने आधार कार्ड अनिवार्य करने को कहती है। सर्वोच्च न्यायालय ने आज नागरिक एकांकता और सरकार के अनिच्छित surveillance से नागरिकों को बचाने के लिए कार्यवाही नही करि है।
तो कुल मिला कर सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ अपने स्वार्थी हक़ की खातिर अपनी एक विशिष्ट शक्ति का प्रयोग करता है, वरना प्रजातंत्र और जनता के हित और सरकार के भक्षण से बचाव जाए भाड़ में !
यह सब हुआ कैसे ?
न्यायविदों के बीच इस सवाल के जवाब की खोज में सर्वोच्च न्यायलय में लिए गए इस सब निर्णयों का अध्ययन जारी है।
कुछ न्यायविदों ने खोज निकाला है कि इन सब विषयों पर उठी तार्किक debate के पीछे में एक उल्टा पुल्टा न्यायपालिका का निर्णय पड़ा हुआ है जिसे की *केशवानंद भारती मुकद्दमा* नाम से जाना जाता है।
न्यायशास्त्र विषय के छात्र , यानी LLB उपाधि के छात्रों को इस मुकद्दमे के बारे में बखूभी पता होगा। LLB के कोर्स में *केशवानंद भारती मुकद्दमा* की वही अहमियत है जो कि गणित विषय मे pythogoras theorem की, या रसायन शास्त्र में gas law की। यानी यह एक मुकदमा इतना महत्वपूर्ण बिंदु है। इसका इतना उच्च दर्जे के पद देते हुए llb के छात्रों को पढ़ाया जाता रहा है।
मगर आज कल घट रहे न्याययिक फैसलों के उल्टे पुल्टे सामाजिक प्रभावों को देखते हुए जब समीक्षकों ने फैसलों के आधारभूत तर्क को छानबीन करना शुरू किया तो उन्होंने पाया है कि यही केशवानंद भारती मुकद्दमा ही मूल जड़ है उल्टा पुल्टा होने का जिसने की प्रजातंत्र और जनता की मर्ज़ी के स्थान पर न्यायपालिका की मर्ज़ी ने ले लिया है और जनता को हमेशा के लिए पीड़ित और सरकारी आदेशो के विरोध का परिणाम भुगतने के लिए छोड़ दिया गया है।
इसी *केशवानंद भारती मुकद्दमे* के फैसले से निकले तर्कों के प्रवाह में आज भारत मे प्रजातंत्र नष्ट हो चुका है और जो कुछ चल रहा है वह असल मे न्यायपालिका और संसद के बीच एक अवैध सांठगांठ है कि तुम हमे मत सत्ताओं और हम तुम्हे नही सतायेंगे, बाकी प्रजातन्त्र, जनता की मर्ज़ी, उनके मौलिक अधिकारों तक को नष्ट कर दो, हड़प लो, या जो कुछ करते रहो। !!

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