Fraternity और व्यापार तथा उद्योगों के उत्थान की कहानी

किसी भी business के लिए मन और शरीर का सहयोग होना ज़रूरी है, साथ मे अपने नजदीकी रिश्तों और दोस्तों का।
इतना विशाल किस्म का सहयोग बिना किसी एक धार्मिक मान्यता के संभव नही होता। कि वह मन को भी शांत रखे, शरीर को भी, और यार-दोस्तों, रिश्तों को भी सहयोग के लिए प्रेरित करता रहे।
क्योंकि बिज़नेस अनिश्चितताओं से भरा होता, इसलिए इसमें stress बहोत बनता है। हर काम मे अनदेखी बाधा, गड़बड़, और न जाने क्या क्या। ऐसे में लोग तनाव ग्रस्त होकर एक दूसरे से उलझ पड़ते हैं। तनाव शरीर और पेट पर भी तुरंत असर करता है।
सफल वही होगा जो शांत बना रहे,मन से प्रसन्न चित रहे, और जिसके पास अपनो से बातचीत करते हुए, मुस्कराते हुए तमाम बाधाओं का तोड़ निकालने का माहौल हो।
शायद इसीलिए ज्यादातर बड़े बिज़नेस किसी न किसी धर्म गुरु के इर्दगिर्द में ही बसते हैं। शायद इसलिए गुजरात मे ही बाबा लोगों की industry भी है और देश के बड़े बिज़नेस men भी।
गौर करें तो करीब करीब सभी बड़े businessmen अपनी बिरादरी की ही देन हैं। tata लोग पारसी समुदाये से, अम्बानी लोग -गुजराती माढ़वाड़ी, अडाणी - जैन माड़वाड़ी, अज़ीम प्रेमजी - बोरा मुस्लिम।
गुजरात के इस क्षेत्रो के कई समुदाये सदियों से खुद को व्यापार  के लिए ढाल चुके हैं। वहां धर्म का उद्देश्य ही आर्थिक फल प्राप्त करना है, जिसके लिए धर्म पूरे समुदाये में आवश्यक शिष्टाचार, मान्यता, आपसी विश्वास इत्यादि को पिरोता है। यही से बिरादरी यानी fraternity बनती है। और बरादरी संग मिल कर उद्यम करती है , उससे आने वाले आर्थिक लाभ से फलती फूलती है।
दुनिया भर में पालन किया जाने वाला company law भी असल मे ऐसे ही अस्तित्व में आया है। विकिपीडिया पर history of company law विषय मे इस घटनाक्रम को पढ़ा जा सकता है।
पहले छोटे छोटे परिवार होते थे ,जो कि कुछ कौशल नुमा काम करके जीवन बसर करते थे। बाकी जनता जहां शिकार (hunting) और खेती (farming) करके भोजन लाती थी, यह छोटे-छोटे समुदाये जो कि कुछ और नही बल्कि एक थोड़ा अधिक विस्तृत परिवार के सदस्य ही होते थे, उन्ही ने कुछ कौशल कार्य से कुछ अदला बदली करके भोजन खाना तलाश लिया था। कौशल जैसे कि लोहे को ढालना हतियार और औज़ार बनाने के लिए ; या लकड़ियों से नाव बनाना, समुन्द्र में जा कर मछली पकड़ने के लिए; जानवरों के शरीर से खाल उतार कर पौषक बनाना, या थैली बनाना; पत्तियों से कागज़ और लेखन सामग्री बनाना।
इंगलैंड में ऐसी तमाम छोटी छोटी बिरादरियों ने राजा से मैत्री करके उसके लिए यह सब काम करने का स्थायी ठेका ले लिए। राजा को यह सब कामों की ज़रूरत तो पड़ती ही रहती थी। तो इस तरह हर एक बिरादरी को अपना-अपना शाही फरमान यानी royal charter मिल गया, एक एकाधिकार यानी monopoly की अब से यह काम देश मे सिर्फ और सिर्फ वही बिरादरी ही कर सकेगी। खास तौर पर किसी भी राजसी उद्देश्य के लिए।
किसी भी बड़े विस्तृत काम मे बहोत सारे कौशल की एक संग ज़रूरत पड़ती थी। इसलिए राजा ने इस सब बिरादिरियों को एक संग बसाने के लिए जमीन भी मुहैया करवाई।
Thames नदी के किनारे मिली इस जमीन पर इंग्लैंड के एक शहर अस्तित्व में आया जिसे की आज london के नाम से जाना जाता है। यही दुनिया का पहला महानगर बना और समूची दुनिया का आर्थिक राजधानी।
London में आज भी यह केंद्रीय व्यापारिक क्षेत्र अपना अलग अस्तित्व रखता है। उसका अपना अलग नगर अध्यक्ष होता है, जिसको प्रतिवर्ष वहीँ पर बसी यहि बिरादरियां ही चुनती हैं।
आधुनिक london बहोत फैल गया है, और उस बाकी के रिहायशी क्षेत्र का अलग मेयर होता है। फिलहाल लंदन के मेयर एक श्री सादिक़ खान करके पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति है।
मगर london व्यापारिक क्षेत्र में अलग अध्यक्ष है। उन्हें city corporation of london कह कर पुकारा जाता है।
बल्कि अंग्रेजों ने भारत मे भी इसी मॉडल को लागू किया था। मुम्बई और दिल्ली में इसीलिये एक नही, बल्कि दो नगर निगम होते हैं। बम्बई में BMC अलग है और South Mumbai का अलग अध्यक्ष है।
उसी तरह दिल्ली में MCD अलग है और NDMC अलग है।
Business district को अलग बसाने के पीछे यही मकसद है। दुनिया मे आज भी यही मॉडल सफल है। अमेरिका में silicone valley के बसने में यही इतिहासिक कहानी ही प्रेरणा है। भारत मे बंगलोर और हैदराबाद के पीछे भी यही कहानी है।

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अंग्रेज़ी शब्द company असल मे देन है latin भाषा के शब्द com और penis ने मिल कर बन कर। com का अर्थ है "संग में ",  और penis का अर्थ है  "भोजन करना "( penis शब्द का अर्थ latin भाषा मे लिंग नही होता है ।)
तो company का अर्थ ही है जो लोग संग में भोजन करते थे, यानी बिरादरी । बिरादरी शब्द फारसी भाषा से आया है। इसका हिंदी अर्थ है समुदाये।
इंग्लैंड में आरम्भ की बसी 12 बिरादरियों का लेखा जोखा एक पुस्तक the twelve great livery companies में दर्ज है। इस पुस्तक को एक ऐतिहासिक दसतावेज का दर्जा प्राप्त है। इसे google books पर पढ़ा या खरीदा जा सकता है।
यह बिरादरियां अपने अपने किस्म की पौषक भी पहनती थी। आज जो हम डॉक्टर को सफेद कोट, वकील को काला कोट, सैनिक को वर्दी, वगैरह का चलन देखते हैं, वह सब असल मे इन्ही बिरादरियों के आपसी रिवाज़ की देन है ।
आरंभिक 12 बिरादरियां ने मिल कर एक कंपनी बनाई थी जो कि दुनिया की प्रथम joint stock कंपनी थी, यानी इस बिरादरियों के मिले झूले धन से बना उद्यम। यही joint stock कंपनी प्रचलित भाषा मे east india company कहलाई, हालांकि इसका वास्तविक , औपचारिक नाम यह नही है।
इसमे खाद्य मसालों के उतपाद बनाने वाली बिरादरी यानी mercator थे, इसमे मछुआरे की बिरादरी थे, बुनकरों की बिरादरी थी जो कि silk के धागों से कपड़ा बनाने का कौशल रखती थी, वगैरह।
विकिपीडिया पर यह सब जानकारी आसानी से मिलति है।
समय काल मे यह सब बिरादरियां बदलती तकनीक के साथ ढलते ढलते अपने मूल कौशल को छोड़ कर अलग उद्यमो में बस गए। मगर जाहिराना हर एक बिरादरी अपनी अपनी अभिरुचि की रेखा में ही ढलती गयी। मिसाल के तौर पर पत्तों से कागज़ बनाने का कौशल रखने वाली बिरादरी ,stationers , समय मे अखबारों में चले गए और प्रिंटिंग प्रेस के मालिक बने, बड़े बड़े अखबारों के मालिक बने। और फिर वही लोग आगे समय मे टीवी के आजाने पर मीडिया के मालिक बने और मीडिया moghul बनते चले गए।
खाद्य मसालों की बिरादरी, mercators, चाय के बागानों की मालिक बनी, फिर hotel resort के उद्योग में भी चली गयी।
इंग्लैंड के आरंभिक उच्च शिक्षण संस्थान भी इन्ही बिरादरियों की देन है। ऑक्सफ़ोर्ड के स्कूल और विश्वविद्यालय इन्ही mercators से ही आया।
Mercators ने बाद में बीमा उद्योग में भी प्रसार किया और grashim assurance जैसे बड़े उद्यम किये थे। आज़ाद भारत की बड़ी बीमा कंपनी , भारतीय जीवन बीमा निगम, भी ढलती हुई इन्ही grashim assurance में ही बनती आयी है। grashim परिवार के सदस्य thomas grashim और उनके पुत्र -पौत्र कई बार लंदन के व्यापारिक स्थानीय क्षेत्र , city corporation of london के अध्यक्ष रह चुके हैं।
आरंभ काल के सोने की कढ़ाई के कौशल कारीगर ही सुनार बने, वही आगे जा कर हीरे जवाहरात के व्यापारी बने और फिर आगे बैंकिंग उद्योग में निवेश करते हुए आधुनिक banker बने गए।
तो इस तरह यह बिरादरियां ही जन्म दाता बनी आज के बड़े उद्यगोपतियों की।
छोटे कौशल वाली कारीगर आपस मे मिल कर partnership बनाते थे। मगर partnership की आयु सिर्फ उन दो सहयोगी कौशल कर्मियों की जीवन की ही होती थी। तो partnership का और बड़ा स्वरूप बना, company।
और कंपनी जब कई देशों में फैलने लगी तो उसका भी बड़ा स्वरूप बना corporation।

विविधता श्राप बन जाती है, अगर नीति निर्माण का एक-सूत्र तलाशना न आये

मात्र विविधता से कोई देश प्रजातन्त्र राष्ट्र नही बन जाता हैं। क्योंकि देश मे से राष्ट्र बनता है एक-सूत्र से बंधने पर। यहां सवाल उठेगा की सबको बांधने वाला वह एक-सूत्र क्या होगा ?
कहने का मतलब है कि कोई भी देश विचारों की विविधता तो रख सकता है, मगर देश के संचालन के लिए नीतियां एक ही रखनी पड़ती है।
तो असली समस्या अब शुरू होती है जो कि जन्म लेती है विविधता से ही। वह है कि विविध विचारों में से एक-सूत्र में बांधने वाली नीति कैसे निर्माण करि जाए?
इसी सवाल का जवाब दूंढ सकने की काबलियत ही देश मे प्रजातन्त्र और विविधता दोनों को ही कायम रख सकेगा, अन्यथा विविधता तो एक श्राप बन जाएगी, और फिर प्रजातन्त्र और विविधता धीरे-धीरे आत्म-मुग्ध तानाशाही में तब्दील हो जाएगा।
तो समझा जा सकता है कि कैसे प्रजातन्त्र को कायम रख सकने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है विविधता में से नीति निर्माण का आवश्यक एकाकी सूत्र ढूंढ सकने की काबलियत। इसीलिए सभी प्रजातंत्रों को संसद जैसी संस्था की आवश्यकता महसूस हुई।
अब इसके आगे बात आती है उस एकाकी सूत्र की स्थिरता की। क्योंकि गलतियां और बेवकूफियां कोई समाज यूँ भी कर सकता है कि वह नीति संचालन वाले एक-सूत्र को हर पांच साल पर पूरा ही बदलता रहे। ऐसे करने से दिक्कत यह हो जाएगी कि किसी भी नीति में आत्म-सुधार की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। जबकि इंसानी समाज के विकास की गाथा से ज्ञान यही मिलता है कि विकास की प्रक्रिया आत्म-सुधार से ही निकलती है, जिसे trial-and-error नाम से भी बुलाते हैं।
तो इसके लिए नीतियों का लंबी अवधि तक स्थायी होना अगली बड़ी चुनौती है।
इसके जवाब में ही "सत्य के केंद्र" की स्थापना आवश्यक है। एक ऐसी संस्था जो कि बहोत ही दीर्घायु हो और साथ ही साथ जो कुछ भी प्रकट होते जा रहे सुधार हैं, उनको क्रियान्वित भी होने दे।
अब अगर सभी पद, सभी संस्थान पंच-वर्षीय आयु की ही रहेंगी, तब फिर "सत्य के केंद्र" स्थापित कैसे होगा ?

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