Services are not Professionals, although they call themselves so in a cliché

Services are not Professionals, although they call themselves so in a cliché
It can be put as a blind bet that the district administration Official must not even have made a visit to the site to make the safety and security assessment before signing the permit application.

'Services" are highly unprofessional people. They have no system operation manual, neither is there any check-list system, no system audits, no review meetings, no pieces of training, nothing.
Truthfully speaking, no man who collects his salary from the exchequer fund is a 'Professional". For the simple reason that such a man does not have to run in any market competition in order to improve his skills by which he may improve his income.

"Services" people very often mistakenly think and label themselves as "Professional ". But the fact is that no working person who does not have to suffer the force of Market, the pressure of demand and supply, can qualify to think of himself as a Professional.
The academic knowledge in Commerce can testify the above statement.

You may hear even the top defence Official also calling themselves to be "Professional". But the insight of the Commerce can tell you that Services- Military or the Civil Services -- are merely "professional-like", but not "professional" per se
.
Further, their behaviour pattern will also confirm the statement made above. The "services" work for "honour ", as they like to say it, as against a "Professional", whose best demand is the money. The result of the honour-driven thought process is that these people are very often very egoistic, self-centred, and sometimes even narcissistic.
They do not have any fair process of working, have no "Rule of Law", very regularly love to work by use of Discretion and arbitrary decision-making system. They simply pretend to be "rule of law " compliant, whereas even an ordinary system audits can reveal the truth to be otherwise.

The Civil Services originally were meant to serve as the Clerks to the companies founded, very regularly, by the Professional. So the Professional were the true bosses, and the clerks, the office staff.
Even the renowned East India company was founded by the 12 Great Livery Companies. The Company of the Professional is called as Livery Company. The Livery Companies function under the direct Royal Charter granted by the Monarch.

All the great economic powerhouse countries in Europe have this system. But the Indian system has, owing to the topsy-turvy history of Slavery and Independence, have adopted the UPSC system where the so-called clerks have been made the boss, and the Professionals now take orders from them. 
Quite obvious that India now runs short of the talent and skills, to boost its economic growth, and the bureaucracy is worst known business facilitator in the world.
The services, particularly the Civil Services, do not even have a working dress- and yet very simply think of themselves as "highly Professional". Of course, they acquire their knowledge and idea of the "professional" from the English dictionary, not from the lessons of the economic history of the big developed countries.
So, it can be straight assumed that the permission to hold the festival gathering would only be Paperwork, without even holding any assessment survey. When they don't have even the working dress, one can easily come to the thought they don't ordinarily have to take such activities. Clearly, such behaviour is contrary to how "professionals" truly work all over the world.
The professionals know the need to quickly update their working manual after acquiring any lessons from an incident or the court judgement. Because, they have to meet the market force and must act urgently always, in order to improve their income. But a "service" man will have no such sense of urgency, as his income is fixed, and guaranteed from the Tax-collected the exchequer fund. This lacking sense of urgency is that proverbial "Red Tapism" or the "bureaucratic-hurdle" behaviour

प्रशासनिक लापरवाही : गोरखपुर अस्पताल हादसे से बनारस पुल हादसा और अब अमृतसर रेल हादसे तक का सफर

गोरखपुर अस्पताल हादसे से बनारस पल हादसे तक क्या कोई जिम्मेदारी तय हो सकी? यदि नहीं, तो फिर तो अमृतसर ट्रैन हादसा तो बस एक कड़ी है, और न जाने ऐसी कितनी और कड़ियाँ अभी तो घटना बाकी है।

क्या आपने कभी मंथन किया है कि क्या होता है उस समाज मे जिसमे लापरवाही के लिए किसी की जिम्मेदारी तय नही होती है।

अरररे, मगर एक मिनट -- जिम्मेदारी तो तय हुई है एक केस में - मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई असम गए किसी मंदिर में दर्शन के लिए, और वहां हुई उनकी सुरक्षा की चूक में तुरंत जिम्मेदारी तय होते हुए एक आईपीएस अधिकारी को निलंबन किया गया।

मगर फिर गोरखपुर हादसे में कैसे किसी डॉक्टर कफील को पकड़ा गया था, जिन्हें की बाद में कोर्ट से बरी किया गया ?
या फिर की बनारस पुल हादसे में सवाल तो उठे ,-- मगर कॉन्ट्रेक्टर पर, --और बाद में तो वह भी बरी रहा।

तो फिर कब और कैसे तय होता की मुख्य न्यायाधीश की सुरक्षा चूक में तो कोई आईपीएस अधिकारी की जवाबदेही थी, मगर गोरखपुर अस्पताल हादसे में समय पर ऑक्सिजन सिलिंडर मुहैया नही करवाने के लिये, या फिर बनारस पुल हादसे में जिला या राज्य प्रशासन में बैठा कोई भी लोक सेवा स्तर का अधिकरी की जवाबदेही नही बनती है?

सच यह है कि जवाबदेह तय किया जाना तो वास्तव में शब्दों का खेल होता है। प्रशासनिक शक्ति के मज़े लूटते लोक सेवा के अधिकारियों को यह बात अच्छे से पता हैं जनता में अपना खुद का चैतन्य कमजोर है , और इसलिये *मार्केटिंग* रणनीति से सवालों को उठवा कर ज़िमेदारी और जवाबदेही के केंद्र को मनवांछित तरीकों से बदला जा सकता है। अधिकारियों की दिक्कत बस यह है कि वह यह खेल किसी चैतन्य विहीन , शक्ति विहीन जनता के साथ कर सकते है, मुख्यन्यायाधीश के साथ नही। इसलिए उसकी सुरक्षा चूक में तुरंत वह लपेटे जाते हैं।

लोक सेवा अधिकारियों के बीच संदेश शायद साफ है-- चाहे लाखो , हज़ारो नागरिक मर जाएं, मगर इस देश में कानून और प्रशासनिक तंत्र का जंजाल ऐसा बुना है कि एक भी लोक सेवा अधिकरी की नौकरी पर आंच नही आएगी,
बस मगर किसी और अपने से ऊपर के पद के अधिकारी की सेवा में कोई चूक नही आनी चाहिए, वरना आपकी नौकरी पर गाज गिर जाएगी।

ज़िम्मेदारी और जवाबदेही तय करना , यदि जांचकर्ता अप्रशिक्षित हो और खुद भी भीषण व्यक्तिनिष्ठ भावों से ग्रस्त हो तब, आसानी से भटकाया जा सकता है। सवाल यूँ भी उठाया जा सकता है कि आखिर स्थानीय प्रशासन ने किन सुरक्षा बिनहों पर अनुमति दी थी अमृतसर में उस स्थान पर , जीवंत पटरियों के नज़दीक रामलीला होने की,
और सवाल यूँ भी उठाया जा सकता है कि आखिर ट्रैन ड्राइवर ने ब्रेक क्यों नही लगाया !

जांच में यही पर खेल किया जाता है। पहले वाले सवाल के लपेटे में स्थानीय प्रशासन के लोक सेवा अधिकारी आ जाते, इसलिए जाहिराना दूसरा वाला सवाल ही  *उचित* ' दिशा का सवाल बना कर जांच करि गयी। आखिर जांच भी तो उसी पुलिस के पास है जिनके उच्च अधिकारियों ने ही तो अनुमति दी रही होगी।

गोरखपुर अस्पताल हादसे मे भी तो खेल यूँ ही हुआ है । किसी भी अस्पताल को ऑक्सीजन सिलिंडर की सप्लाई तो निरंतर चाहिए रहती होगी। और इसको उपलब्धता की अनुमति के पेपर तो शीर्ष स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षरों के ही मोहताज़ होते होंगे। है न?
तो फिर क्यों नही जांच का सवाल किसी छोटी मछली "ट्रैन ड्राइवर" को बनाया जायेग - गोरखपुर मामले  में डॉकटर कफील-- जिससे कि *बडी मछलियों* के मुंह पर जवाबदेही और जिम्मेदारी का कांटा फंसे ही न !

यहि हुआ है बनारस पुल हादसे में भी।

जांच तो उन्हीं लोग के हाथों में है जो कि *बढ़ी मछली* है जवाबदेही और जिम्मेदारी के कांटे के। मगर यह लोग इतना तो अनुभवी है कि उनको पता है कि जांच के सवाल व्यक्तिनिष्ठ होते है, तो जांच को कैसे मनमर्ज़ी तरीकों से गुमराह करना होता है।

बस *बेचारे* यह उच्च अधिकारी तब ही फंसते है जब कोई इनका "बाप" शिकार बन जाता है।

क्यों बढ़ रही है मनोविकृति भारतीय प्रजातन्त्र में

भारत मे बढ़ती मनोविकृति का एक कारण है कि हमारे प्रजातन्त्र में liberal schools नही है।
वैसे तो शिक्षा पर जोर सभी किस्म के राजनैतिक तंत्र देते आये है, चाहे साम्यवाद हो, या फिर समाजवाद।मगर प्रजातन्त्र एक खास किस्म की शिक्षा पद्धति पर टिकते है। वह है liberal schools। इनके बिना कोई भी प्रजातन्त्र कुछ ही समय में मूर्खिस्तान और पागलों , मनोविकृत लोगो की तानाशाही में तब्दील हो जाते हैं।
प्रजातन्त्र की खास पहचान है अभूतपूर्व  स्वतंत्रता -- अभिव्यक्ति की। अनियंत्रित अभिव्यक्ति से पागलपन या मनोविकृती का निकलना सहज और स्वाभाविक ही है।
तो उसे रोकने का एक समाधान यही है कि प्रजातन्त्र देशो में उच्च प्रतिस्पर्धा से जड़े liberal schools होने चाहिए जो कि समाज की अंतरात्मा को भ्रमित होने से बचाये।
वरना फिर यह तो होता ही रहेगा -- रुपया गिरा नही, डॉलर मजबूत हुआ है,
121 राफ़ाएल विमान कम होते हैं 36 राफ़ाएल विमान से, मल्ल्या भागा इसलिए है क्योंकि वह इस सरकार से डरता है, और एनकाउंटर सही हुआ है क्योंकि पुलिस के भय के बिना समाज को चलाया ही नही जा सकता है।
और दूसरा कारण की मनोविकृति बढ़ रही है कि अब IT cells और बिकाऊ मीडिया perception war के पायेदे बने विकृत नज़रिए को आसानी से बिना रोक टोक या किसी प्रतिस्पर्धा के प्रसारित कर रहे हैं।

Disservice by the UPSC to Indian society

The expectations of the police personnel is that when they are armed , the common people should apply restraints on themselves when dealing with the police .

Not the other way round , that, when a police man is armed with the fire power, it is his responsibilty to keep his power in restraints when dealing with the common people of a country which promises of freedom and democracy !

Dear UPSC,
Are you sure you are not doing disservice to the society and the Constitution by taking such persons on policing job ?

Defects in the Constitution - its inability to eradicate Partiality and Discrimination

Societies crack up, when the  justice takes partiality, and the administration becomes discriminatory.
The big irony and a defect of the Constitution remains that although it is written under the leadership of those who faught against systemic partiality and discrimination, yet it has failed to guarantee these values within the Indian governance systems.

Without the school of Liberal Arts democracy is an abode of madness

Without the schools of Liberal Arts, the democracy remains an abode of madness

There is misreading of some random statement made by Lord Macaulay to the British Parliament.

Because , if his statement were to hold true, then the credit must go the Mughals for having given India the kind of government system which ought to have been at the root of the society which Macaulay's statement is describing.

Truth is that like in Laws there is a subject called the Interpretation of Statutes, a similar logic will apply when we have to read and construe the most agreeable meaning of someone's statement.

It takes huge lessons and experiences from the intellectually challenging field of Liberal Arts to know and interpret what one person's statement may be meaning. His moods, his compulsion, his own political tendencies-- all of it maybe contributory to his thoughts those which maybe behind the words that he may be uttering. So it is incorrect to simply buy out in the face whatever he has spoken .

There , what  India needs is the school of Liberal Arts in order to make its mind free from the rustic and parochial way of seeing things , particularly when making a reading of History . History , without having the open mind, is a great source of social troubles as each parochial mind has his own way of reading and saying his own version of History.

Without the training of Liberal Arts, the talks are surely going to let loose in unwanted directions , such as the utility or the futility of the Ramayan and Mahabharata, which then will unleash more sorrows on a society which is made of half-baked intellectualism .

Therefore, For the intellectualism to ripe , the schools of Liberal Arts are necessary for it is these which yield the pure truth when the raw material of every common man's arguments goes into it.

a Democracy can become a abode of madness unless the furnace of Liberal Arts come to it's rescue.

A big story to explain the issue of Logical Ambiguity

[21/10 23:18]
*Wisdom Beyond Logic*

A young man in his mid-twenties knocks on the door of a renowned Guru. He says: “I’ve come to you because I wish to study Vedas.”

“Do you know Sanskrit?” the Guru asks.

“No,” replies the young man.

“Have you studied any Indian philosophy?”

“No. But don’t worry. I just finished my doctoral dissertation at Harvard on Socratic logic. So now, I would just like to round out my education with a little study of the Vedas.”

“I doubt,” the Guru says, “that you are ready to study Vedas. It is the deepest knowledge ever known. If you wish, however, I am willing to examine you in logic, and if you pass that test I will teach you Vedas.”

The young man agrees.

Guru holds up two fingers. “Two men come down a chimney. One comes out with a clean face; the other comes out with a dirty face. Which one washes his face?”

The young man stares at the Guru. “Is that really a test in logic?”

The Guru nods.

”The one with the dirty face washes his face“- he answers confidently.

“Wrong. The one with the clean face washes his face. Examine the logic. The one with the dirty face looks at the one with the clean face and thinks his face is clean. The one with the clean face looks at the one with the dirty face and thinks his face is dirty. So, the one with the clean face washes his face.”

“Very clever,” the young man says. “Give me another test.”

The Guru again holds up two fingers. “Two men come down a chimney. One comes out with a clean face, the other comes out with a dirty face. Which one washes his face?”

“We have already established that. The one with the clean face washes his face.”

“Wrong. Each one washes his face. Examine the logic. The one with the dirty face looks at the one with the clean face and thinks his face is clean. The one with the clean face looks at the one with the dirty face and thinks his face is dirty. So, the one with the clean face washes his face. When the one with the dirty face sees the one with the clean face wash his face, he also washes his face. So, each one washes his face.”

“I didn’t think of that,” says the young man. It’s shocking to me that I could make an error in logic. Test me again.”

The Guru holds up two fingers. “Two men come down a chimney. One comes out with a clean face; the other comes out with a dirty face. Which one washes his face?”

“Each one washes his face.”

“Wrong. Neither one washes his face. Examine the logic. The one with the dirty face looks at the one with the clean face and thinks his face is clean. The one with the clean face looks at the one with the dirty face and thinks his face is dirty. But when the one with the clean face sees the one with the dirty face doesn’t wash his face, he also doesn’t wash his face. So, neither one washes his face.”

The young man is desperate. “I am qualified to study Vedas. Please give me one more test.”

He groans, though, when the Guru lifts two fingers. “Two men come down a chimney. One comes out with a clean face; the other comes out with a dirty face. Which one washes his face?”

“Neither one washes his face.”

“Wrong. Do you now see why logic is an insufficient basis for studying Vedas? Tell me, how is it possible for two men to come down the same chimney, and for one to come out with a clean face and the other with a dirty face? Don’t you see? The whole question is nonsense, foolishness, and if you spend your whole life trying to answer foolish questions, all your answers will be foolish, too.”

May we all have the wisdom to ask, and answer, the wise questions!

*Courtsey* : _Dibyendu Mitra Mustafi_

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[21/10 23:20]  *The limitations of logic - _Ambiguity_*

The guru seem not to teach that Logic is always filled with AMBIGUITY !
Seems that vedas miss this basic information and hence making mountain stories out of a molar knowledge about the Logics !

Even as simple as the mathematics, a subject which is almost completely based  on the application of the Logics, knows from the simple - standard 6 level formula of a(sq) + b(sq) = c(sq) that the results are filled with logical ambiguity.

How did you miss this basic information !

*Logics*
_Advantage_ :- objective in nature, and hence liberates the decision making process from the claims of Bias and Partiality

_Disadvantage_ : suffers from ambiguity very often.
Also, cannot be applied in all the cases, as limitations of human knowledge exists.

*Judgement skills :*
- _advantage_ :- can be applied in most types of cases.

_Disadvantage_ :- highly subjective , causes conflict between two people looking at the same set of problem, as the results vary with the variance in the perception of each person.

The shrewd Administration in case of Tort Negligence

[23/10 02:18]: The general legal understanding on determining the responsiblilty in case of Negligence is described as the Tort Law.

Tort Law is no Parliamentary Act per se. It is the socio cultural practice of making perceptions to determine the liability in case of a 'Wrong' (used in Legal sense). But in course of time the Logic has blended with the socio - cultural practice to give to the world the current practices of the Tort Law.

Determining the Negligence is highly subjective process and depends on the different perceptionability viewpoints of the same set of problem . But certain logical test has emerged over time in order to correct out and filter out the unacceptable perception angles from the accepted perception viewpoints.

Those perception viewpoints which put the liability on the victims itself are very often outrightly rejected. Particularly when a large set of the common people are the victims. It is because the very source of all the Public Administration Powers is the welfare of the people which covers within its ambit the General safety and the security issues of the Public. So , logically, when the Public Administration official derive their Administration powers from these sources, which of course they use for collecting the taxes and the fees , often times unwantingly interfere in the private life of the people, other times to do moral policing , and for collecting the never-ending "cess", then how can they be relieved of the responsiblilty by merely shifting the liability by a twist of the language or a shift of the perception viewpoint. If ever the Logic settles out in favour of the Public Administration official, then no official will ever be held responsible for loss of life of enormous set of common people , covering all the age gaps and physical and mental condition !

The Public Administration Official will certainly have a sunny day if ever the Logic and the Perception viewpoint of the civil society ends up sitting in their side, as now they will have access to enormous money sources to blood-sucking taxation which will help to pocket huge salaries  , ans giving an additional bonus of never to be held responsible for any Negligence when large set of people have lost their life! What more can a corrupt minded public Official ask for !

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[23/10 03:28] : अनुशासन से अभिप्राय आत्म-प्रतिबंध लगता है जब सवाल के घेरे में 500 व्यक्ति हों ! प्रशासन जो की इसी लापरवाह जनता से टैक्स वसूल कर ही अपनी तनख्वाह बटोरता है, क्या उसको पता नहीं है कि रेलवे क्रासिंग पर पूरी की पूरी बारात ही ट्रेन के चपेट में आती है इस मुल्क में !

Negligence की थ्योरी में यह मामला पलटी यही से खा सकता है , की क्या 500 लोग, जो कि रामलीला का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए हैं, जिसमे छोटे छोटे बच्चे भी थे, जहां संस्कृति के अनुसार एक विशाल आकार के पुतले का दहन किया जाता है, जिससे बचने के संभावित दृश्य में भगदड़ से लेकर कुछ भी संभव है,

तो क्या जिम्मेदारी उन्ही मृतकों की बन जायेगी, जबकि कार्यक्रम करने की अनुमति के शासन शक्ति लोक सेवा अधिकारियों के पास रहेगी ! यह शक्ति क्या सिर्फ टैक्स और फीस वसूलने की होती है !

सही उत्तरदायित्व तय होता है सही सवाल पूछने से। सवाल सही उठते हैं अगर नज़रिया सही हो।
वरना गोरखपुर अस्पताल कांड में भी मृतक छोटे मासूम ही जिम्मेदार माने जाएंगे, और खून चूस कर वसूले टैक्स से लाखों जी तनख्वाह उठाते, बड़े रुतबे वाला "उच्च कोटि दिमागी दर्जे का" IAS एग्जाम पास कर के आये लोकसेवा अधिकारी तो बस यूँ ही सेलिब्रिटी बने घूमते रहेंगे, मात्र exam को top कर देने की उपलब्धि से। और समाज को योगदान होगा -- घंटा !

प्रशासन यूँ है कि हेलमेट नही पहन कर चलने पर फाइन वसूलता है, और रोड ओर5 गड्ढा नही भरने पर नागरिक को ही जिम्मेदार बनाता है -- लोगों को दिमाग को इसीलिए उल्टा नज़रिया ही हमेशा दिखा कर सेट रखता है।

Court Judgement versus Executive Decision

25Oct2018

नौकशाही के आगे सर्वोच्च न्यायालय की भी नही चलती है जब नौकरशाही एक संग मिल कर मूर्खता की चादर ओढ़े कुछ करती हैं।

रात के 2 बजे सीबीआई निर्देशक आलोक वर्मा को जबरन पद निरस्त करने का आदेश निकाला गया है जबकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के अनुसार निर्देशक का कार्यकाल 2 सालों के लिए सुनिश्चित (guaranteed) है।

यह है नौकरशाही का असली दम सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के आगे।

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Administrative Neutrality and the control of the PMO

The courts and the Judiciary have been manned with the most stupid people since Independence
As it is there is no competitive exam held to pick the judges for the higher Judiciary. Whatever little Judiciary competitive exams are done, the services of  those people stay confined to the lower Judiciary only.

The result is that the India's public Administration's undoing is a result of the stupid judgements passed by the higher Judiciary itself .

The Administration Neutrality has gone for a toss , as the institution called the PMO came into scene to take over the entire public Administration machinery within its control.

The courts have themselves become an isolated power centers having power to the extent to preserving their private self centred interest in the garb of "Independence of Judiciary".

That's where the public Administration apparatus in the Indian democracy stands

स्वतंत्र अभिव्यक्ति , समाज में बढ़ती मनोविकृति और Liberal Schools

भारत मे बढ़ती मनोविकृति का एक कारण है कि हमारे प्रजातन्त्र में liberal schools नही है।
वैसे तो शिक्षा पर जोर सभी किस्म के राजनैतिक तंत्र देते आये है, चाहे साम्यवाद हो, या फिर समाजवाद।मगर प्रजातन्त्र एक खास किस्म की शिक्षा पद्धति पर टिकते है। वह है liberal schools। इनके बिना कोई भी प्रजातन्त्र कुछ ही समय में मूर्खिस्तान और पागलों , मनोविकृत लोगो की तानाशाही में तब्दील हो जाते हैं।
प्रजातन्त्र की खास पहचान है अभूतपूर्व  स्वतंत्रता -- अभिव्यक्ति की। अनियंत्रित अभिव्यक्ति से पागलपन या मनोविकृति का निकलना सहज और स्वाभाविक ही है।
तो उसे रोकने का एक समाधान यही है कि प्रजातन्त्र देशो में उच्च प्रतिस्पर्धा से जड़े, नायाब liberal schools होने चाहिए जो कि समाज की अंतरात्मा को भ्रष्ट होने से रोक सकें।
वरना फिर यह तो होता ही रहेगा -- रुपया गिरा नही, डॉलर मजबूत हुआ है,
121 राफ़ाएल विमान कम होते हैं 36 राफ़ाएल विमान से, मल्ल्या भागा इसलिए है क्योंकि वह इस सरकार से डरता है, मैं मल्ल्या से नहीं मिला था, वह मुझसे मिला था  और एनकाउंटर सही हुआ है क्योंकि पुलिस के भय के बिना समाज को चलाया ही नही जा सकता है
और दूसरा कारण की मनोविकृति बढ़ रही है कि अब IT cells और बिकाऊ मीडिया perception war के पायेदे बने विकृत नज़रिए को आसानी से बिना रोक टोक या किसी प्रतिस्पर्धा के प्रसारित कर रहे हैं।

What is UPSC giving to the Indian society

The expectations of the police personnel is that when they are armed , the common people should apply restraints on themselves when dealing with the police .

Not the other way round , that, when a police man is armed with the fire power, it is his responsibilty to keep his power in restraints when dealing with the common people of a country which promises of freedom and democracy !

Dear UPSC,
Are you sure you are not doing disservice to the society and the Constitution by taking such persons on policing job ?

हज़ार साल की गुलामी से आज़ादी हुए भारत की संस्कृति क्या होनी चाहिए

संस्कृति एक इंसान के कर्मों से तय नही करि जाती है। संस्कृति तय होती है जब बहोत सारे इंसान, जिनके बीच कोई इस समान भाषा, धर्म, जन्म क्षेत्र रंगरूप की पहचान हो, वह कोई एक समान बात-व्यवहार और आचरण करते हों।

अभी हाल फिलहाल में आयी कुछ खबरें आज हम भारतीयों को अपनी संस्कृति की self criticism करने पर बाध्य कर रही है।
पहली खबर है की ऑस्ट्रेलिया के एक विलासपूर्ण प्रमोद पर्यटन जहाज़ पर यकायक 1300 भारतीयों ने आ कर जिस प्रकार का आनंद का आचरण किया ,वह बहुराष्ट्रीय वातावरण में बेहद दुखद रहा । इस कदर की जहाज़ के मालिकों ने अन्य राष्ट्रीयता के पर्यटकों को हुई असुविधा के चलते उनके पैसे वापस कर दिया।

दूसरी खबर खुद हमारे ही देश से रेलवे के अधिकारियों से आई है कि हमारे देशवासी जब ट्रेनों से यात्रा करते हैं तब वह प्रतिवर्ष कितनी संख्या में यात्रा में उपलब्ध कराए गए छोटे towel , कंबल, चादर इत्यादि को "चोरी" कर ले जाते हैं, या गलती से घर उठा ले जाते हैं।

तीसरी खबर है कि दुनिया मे सबसे अधिकः अवधि और "परिश्रम" से ऑफिसों में काम करने वाली राष्ट्रियता हम भारतीयों की है।

यह तीन खबरें  आज हम भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान बन कर निकले हैं।।यह वह खबरें है जो हमारी पहचान बनाते है कि हम कितने अनसुलझे, निम्म सामाजिक आचरण वाले लोग है, जिनका नैतिक विकास अभी भी पर्याप्त नही हो सका है क्योंकि यह आज भी बड़े समाज मे अपनी स्वचेतना से वह आचरण नही कर सकते है जिससे सामाजिकता बनती है, जिसे सभ्यता या भद्रता कहा जाता है।

अधिकः परिश्रम करना भी कोई अच्छा आचरण नही होता है। इससे एक ईर्ष्या गत प्रतिस्पर्धा का माहौल बनता है, जो कि दूसरे साथी को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी दौड़ में शामिल होने के लिए बाध्य करता है। फिर वह अपनी स्वतंत्र चाहत से अपनी पसंद का कार्य करने के लिए तैयार नही हो पाता है।

अधिकः परिश्रम यदि उत्पादन को बढ़ा न सके तब तो वह निश्चय ही "गधा मेहनत" ही होती है, जो कि संभवतः किसी श्रमिक शोषण के लिए विकृति में किया गया वर्णन है।

भारत की इतिहासिक पहचान यह है कि यह देश पिछले एक हज़ार सालो से हर के बाहरी आक्रमणकारी के हाथों रौंदा गया है, दास प्रथा से पीड़ित हुआ है, और अभी हाल ही में यकायक, बिना किसी विशेष सामाजिक धार्मिक क्रांति के ही, तथाकथित "स्वतंत्र" हो गया है।

भक्त Zombies बनाने का फार्मूला

Photoshop कृत तस्वीरों , वीडियो के फैलाने का एक फायदा मिलता है अराजकता वादी कूटनीति में,
कि आम आदमी झूठी तस्वीरों , प्रपंचों को सच मान कर शेयर करने की गलती करने के बाद अपनी अक्ल से भरोसा ही खो बैठेगा कि पता ही नही क्या सच है, और क्या झूठ। वह प्रचंड अविश्वास वाली मनोस्थिति में आ जाता है।
और फिर घोर अविश्वास से ग्रस्त इंसान , जब सत्य ज्ञान/सूचना के केंद्र को खो चुका होता है, तब वह सच और झूठ को पहचानने के विषय मे किसी छोटे बच्चे की तरह हो जाता है। यानी, जो उसके peer यानी यार-दोस्त सच मानते होंगे, वह भी उनके पीछे-पीछे उसी को सच मानेगा, और झूठ मानेगा।

बस।
तो अब इंसान तैयार कर दिया जाता है *भक्त* "zombie" बनाये जाने के लिए।

किसी राजनैतिक दल को इंसानों को *भक्त* बनाना एक दूर की युक्ति ही है, सोचा जाए तो। इसके लिए  IT Cell के टीम जानबूझकर झूठी तस्वीरों बनाती है, और जानबूझकर खुलासा भी करती हैं कि यह तो झूठी तस्वीर थी। यह दोनों कृत्य मिल कर ही इंसानी दिमाग के आसपास भ्रम का वह व्यूह बनाते है , वह माहौल बनाते हैं कि आम आदमी अपना चैतन्य प्रयोग करना ही खुद ही बंद कर देता है। और तब वह खुद ही *भक्त* 'zombie' बनने की राह पर चल पड़ता है।

जो सत्य के अन्वेषण के प्रयास भी छोड़ दे, वही तो होता है *भक्त* ।

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भले ही आप उन्हें सूट ,टाई और चमकते बूटों  में देख कर चंकचौध हो जाते हो, और उनकी प्रवेश परीक्षा की कठिनता के चलते आप पहले से ही उनके प्रति नत...

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