The effects of Helmet laws on the Intellectual courage of liberated people

this kind of video is custom-generated just to spread scare ! Think critically, if u may, you should notice that Helmet is a mitigating device, not a preventive device. The better action is the preventing action, not the curative or mitigating action. A helmet makes ZERO contribution in preventing an accident. The helmet, may , IF AT ALL, come of use POST AN ACCIDENT, not before an accident.

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Sometimes there is no actual horror in the story. It is only the work of cameraman by shaking the camera, taking some acute angle shots, and then the sound editors adding the background score , which give a feeling of scare.

The Helmet wearing "inspirational" videos are in the same line. The logic of un-avoid-ability of the helmet device has never been found. The Video-makers generate them only from their own imaginary stories. One can create such "inspirational" stories for other devices as well -like, for driving gloves, the windsheeter jackets, the knee caps, the shoes, and even the pedestrian Helmets

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The issue of Driving helmet devices connects closely with the Intellectual COURAGE of the Indians who believe they have been liberated some 70 odd years ago. This piece of legislation, found in the Motor Vehicles Act, sets the power abnormally high in favour of the "government", and therefore it goes in anti-thesis to the idea of Democracy. Through this, the government gains the unfavourably high power to capture and imprison the Intellectual Courage of the liberated people, and thus make them habituated to accept and to mistake the big-brother'o'cracy for a Democracy.
That is the trouble with this law.

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Just saw a video, a CCTV footage of how a man taking a walk early morning is hit by a passing car. (I avoid posting the upsetting video over here. However one can see it elsewhere on intenet).
NOw this is one video which may perhaps make a worthwhile case for why not the PEDESTRIAN HELMETS should also be made compulsory! Rather, this real-life footage video is more "inspirational" than those director-and-cameraman made video on wearing of driving helmet, about its purpose. Infact, it is possible to stretch the piece of logic to make case for the BiCycle Helmets, the Rickshaw and Autorickshaw Helmets, and so on , so forth.

This thought should actually make each of us think. To think about what is the worth of a helmet, it's purpose and its contribution to making the Indian roads safer, which are notoriously the most unsafe road on the planet.

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वैज्ञानिक चिंतन यानी scientific temper की पहचान तो बस यही तक है की इंसान को cause and effect समझना आ जाता है। मगर scientific temper अपने आप में पर्याप्त विकास नही है इंसानी बुद्धि का। इसलिये क्योंकि नकली cause के माध्यम से इंसान और उसका समूचा समाज अभी भी धोखे में रखा जा सकता है।

तो scientific temper के आगे भी बाधा होती है इंसानी दिमाग के चिंतन की। नकली causes में उलझ जाने की। इस बाधा को पार लगाने का रास्ता clericalism  और secularism की बहस में से दिखाई पड़ता है। घटनाओं के पीछे reasoning , यानी causes, जब clericalism में से आते हैं तो वह ऐसे होते हैं की उनका मुआयना करना, मापना, विशेलेष्ण करना सम्भव नही रह जाता है। जबकि secularism में बताये गये causes में यह सब लाभ होता है।

उदाहरण के लिए यह helmet अनिवार्यता के लिए  बनाये inspirational video को देखे। यह सब video असल में clericalism की पंक्ति में बनाये गये हैं। इसमे से एक भी वीडियो पर्याप्त कारण नही बताता है। बल्कि सभी video एक नकली कारण ही बता देतें है जो की director की मनमर्जी से तैयार हैं। एक फॉर्मूला सा तैयार हो जाता है कृत्रिम cause को निर्माण कर देने का। अगर driving gloves का महत्व बताना है तो बस इतना करना है की वीडियो में गाड़ी की ठोकर हाथों-उंगलियों पर दिखा दो। अगर chest gurad का महत्व दिखाना है तो गाड़ी की ठोकर छाती पर दिखा दो !
यह है fake reasoning और उसमे उलझे इंसानों का उदाहरण।

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Philosophy का यही फायदा होता है। बातें कहां से निकलती है, और कहां तक की घटनाओं को तलाशते-तलाशते कहां पहुँच जाती है। पश्चिमी देशों में विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली philosophy में यही प्रभावित करने वाला है। कई सारे पश्चिमी देशों के लेखों के किताबों में यह देखने को मिलेगा। बात artifical intelligence और super conducting material पर होते होते गौतम बुद्ध और aristotle की philosophy के बीच अंतर ढूंढने तक निकल जाती है। बल्कि computer और diode valve , जो की semi conductors के पूर्वज हैं , उनके उत्थान की कहानी को गौतम बुद्ध से aristotle की philosophy से गुज़रता हुआ देख और समझ सकते हैं।

बरहाल, अभी ताज़ा ताज़ा ढूंढें गये विषय, fake reasonings , जो की driving helmet की अनिवार्यता के विषय की बहस से शोध किया गया है, इसके प्रभावों और उपयोग को तलाश करते हैं।

क्या आप यह महसूस कर सकते हैं कि चुनावी विश्लेषण एक fake reasonings से लबालब कार्य होता है? टीवी पर दिखाये जा रहे तमाम विश्लेषण की कोई पार्टी क्यों चुनाव जीत गयी और कोई पार्टी क्यों चुनाव हार गयी, सब का सब fake reasonings से भरा हुआ है। कारण यह है की एक भी कारण measurable नही है अपनी वैधता को सिद्ध करने के लिए ! Measurable यानी माप कर सकने का गुण fake reasonings की पहचान करवाता है। अगर cause genuine होता है तो फिर वह आगे की जांच-परख, measurability, मापन, करने पर vaild पाये जा सकते हैं।

भक्त और liberals के बीच में एक अंतर यह है। liberals के पास योग्यता और संसाधन हैं fake reasonings को पहचान कर सकने की। Cause बताने का गुण तो दोनों ही सामाजिक माहौल में है - clericalism में भी और secularism में भी। मगर clericalism में fake reasonings होते है जिनको भक्त गण पहचान कर सकने की काबलियत ही नहीं रखते हैं। जो भक्तों के लिए reasoning होती है, वह liberals के लिए मात्र एक hypothesis हो सकती है।

Hypothesis - याद करें की कुछ महीनों पहले सिंगापुर में किसी press conference के दौरान किसी भक्त-छाप व्यक्ति ने राहुल गांधी से ने कांग्रेस पार्टी और महंगाई को जबरन, fake reasoning, से जोड़ते हुए सवाल किया था तब राहुल गांधी ने यही शब्द बोल कर उसको हतप्रभ किया था - "what's your hypothesis?"

भक्त और liberals में अन्तर यह भी है की भक्त fake reasonings को पहचान नही कर सकते हैं। यही अंतर है clericalism और secularism के बीच का भी। clericalism में बताई गयी reasoning ऐसी होती हैं की वह "इस दुनिया" में जांच के लिए उपलब्ध नही होती है, "इस दुनिया" में उपलब्ध संसाधनों के बाहर चली जाती हैं।

लोक सेवा भर्ती में घटाई गयी उम्र

अब लोक सेवा की भर्ती की उम्र घटाने से देश का कौन सा भला हो जाने वाला है?
एक सेवादार लोकप्रशासन किसी भी लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी ज़रूरत है। मगर जिस तरह की अजब-गज़ब आदेश हमारे देश की सरकारें देती रहती है - जैसे कि हाल का आदेश जनता के कंप्यूटर डाटा का बे-रोकटोक ताका झाँकी, और बढ़ती महंगाई में बार बार भाजपा-कांग्रेस के कुचक्र में फँसता हुआ राजनैतिक विकल्प,--
तो आखिर आयोग में भर्ती की उम्र को कम कर देने से क्या मुक्ति मिलेगी आम आदमी को?
लोकसेवा आयोग से ज्यादा तो जनता और मिडिल क्लास को यह बात समझनी पड़ेगी की लोकसेवक लोग आखिरकार समाज के आर्थिक पटल पर production से जुदा लोग है, जो की आखिरकार खाते तो हैं professionals, agriculturist और businessmen के जमा कराये टैक्स से ही हैं। तो फिर हम क्यों यह उम्मीद करें की लोक सेवा वाले कभी भी एक real solution देंगे समाज में कुप्रशासन और बढ़ती महंगाई के?
Fake Reasonings की ही तरह Fake Solutions भी होते हैं। प्रबंधन शास्त्रियों के द्वारा दी जाने वाली मिसाल Dakota Indians Dead Horse Theory एक समूचा उदाहरण हैं की कैसे लोक सेवक देश में बढ़ती सड़क दुघर्टनाओं का समाधान हेलमेट पहनने की अनिवार्यता के कानून में ढूंढ़ कर पूरे समाज को उल्लू बनाता है।
और अब यह लोक सेवा के चयन में घटायी उम्र का मसला देखिये। आम नागरिक और किसी professional की दृष्टि से समझना मुश्किल है की कम उम्र में चयन करने से कैसे देश को बेहतर लोकसेवक मिलने लगेंगे? क्या कम उम्र के चयन से उनकी अकल खुल जायेगी की भ्रश्टाचार को रोकने के लिए नेताओं से मिलीभगत नही करनी चाहिए? या की जनता की फरियाद पर FIR तुरंत दायर करनी चाहिये चाहे आरोपी कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो?
भई, professionals के प्रशिक्षण में journeyman years होते थे, apprenticeship होती थी, और freeman बनने में युगों का समय लगता था जिसके चलते कम उम्र से ही आरम्भ करना बेहतर समझा जाता था। मगर क्या लोकसेवक के लिए भी यही तर्क मान्य होंगे?कहीं उल्टा न हो की कम उम्र में चयन से अक्ल खुलने में दिक्कते और बढ़ गयी क्योंकि गलत को सीखते और करते हुए यह लोग ऐसे प्रशिक्षित हो चले हैं कि उसी को सही समझने लगे थे! और अब बचपन की आदतों को छुड़ाना और भी मुश्किल हो चला है!
हमारे एक सहयोगी ने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक
के पहले अपने जीवन भर के अनुभव का एक सबक सांझा किया था - यहां सब कुछ गड़बड़ है, गलत है, जानते हो क्यों? क्योंकि लोग गलत करते हैं, वही गलत को अपने जूनियर को भी सीखाते हैं, और गलत की ही परिपाटी बन जाती है, वही चलन बन कर स्वीकृत हो जाता है, लोग उसी को जायज़ ठहराने के तर्क देने लगते हैं।
सोचने वाली बात है कि क्या लोक सेवा की घटाई गयी आयु सीमा से लोकसेवा और कुप्रशासन के इस एक मूल कारण का कोई समाधान निकल सकता है?
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Question
All your arguments are against the profession and not against the perils of reducing the age bar
Reply
Towards the end part i do mention, from my perspective of the common man, what risk can happen by taking even younger entrants - the closed mindset, the "stubborn/arrogant" behaviour , that may come owing to longer exposure to the wrongly functioning PubAd machinery which they will get their trainings on .
Also, the common man cannot be holding the specialised knowledge and theories on what should be the right age for entry ..the common man can only be making a demand for what He wants from his PubAdmin Machinery . His view is limited to the limitations and shortcomings he has experienced, and thus he will surely try to co-relate the "reformative action" w.r.t their effects on the limitations and shortcomings that he knows of. Although, these guy may have some other "inside",  not publicly known, theory on why the entry age limit should be changed . The problem with the 'inside' unknown theory could also be that -perhaps there is no theory but maybe their some self-centred idea on whom they want to give entry to , and whom they don't!
You see, from my perspective the question of age-limit entry to the PubAdmin Machinery can be posted from opposite angle too ! Like, why at all to take younger guys and train them on longer duration so to help then acquire the specialised knowledge of a chosen fields , instead why not allow the entry to the matured professionals of those very field who have already acquired long experiences in those fields ! Maybe , it is possible to convert the professionals into good administrators with the help of small training module, instead of doing the opposite!
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Also, my peculiar grudge is that those guys are not "professionals" but "services " guys. Let me state that i do make a distinction between the "professionals" and the "services", which i do from my understanding of the economic history of the European countries, and particularly the economic history of my profession in the first place .
Although i understand that the common dictionaries do not reveal the distinction so deeply, and hence the words "profession" and "services" are used inter-changeably , but i believe that the knowledge of this distinction, and its historical offshot can change our understanding and reasoning on what is wrong with the PubAdmin Machinery in our country , how the current machinery itself is a lucunae to the fulfilling of legitimate expectation of the citizens.
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For you kind consideration purpose ,
I would like to draw your attention to the idea of Royal Charter, the grant of it towards the formation of the Royal Societies, the "worshipful" Profession companies , the formation of college and Universities of world class order in the UK.
Once we learn about them, our attention might also get drawn to understanding the relationship of those agencies with the PubAdmin Machinery, how these agencies act to counter-balance the over-done influence of the Bureaucracy.
We might also begin to ponder of the Indian Bureaucracy in its current format, that is, the absence of the counter-balance force, due to which they might not at all be having any genuine interest in controlling the Inflation and the Corruption in this country , because we might just come to a realisation that these guys themselves are the first-order beneficiaries of the tremendous corruption, exacting taxation, and the related Inflation in our economy system!

Loyalty versus Dharma :- Challenges due to varying standards in the Indian society

They surely don't see it as a war between Good and Evil, truth and lie, righteousness and wrong,

They see it as loyal versus traitors !

And that may best explain why people of this country fail to unite as one nation. There is a thread missing,  that of Morality , which should be understood in terms mutually acceptable.

And that is because the best string that ties the members of a society into oneness is the thread of Morality . Morality connects with Conscientiousness.

Loyalty unfortunately connects through the surrender of Voice of Reason and Voice of Conscience. Loyalty leads to bondage and Slavery . They fail to understand that.

What are the different standards of Trust in the contemperory Indian society

Most Bhakts think that Trust is an emanation of Heart, a kind of Emotion which comes when someone have devotion towards something.
Of course , because they think so, and that is why they are called out as Bhakts.
सभी भक्त यह समझते हैं की विश्वास (Trust) एक उत्सर्जन है मानव हृदय का, एक प्रकार की भावना है जो की तब प्रवाहित होती है जब इंसान किसी अन्य व्यक्ति में अपनी श्रद्धा डालता है।
जाहिर है की ऐसे लोगों को तभी ही भक्त पुकारा गया है।
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Trust यानी विश्वास के अलग अलग अभिप्राय होते हैं भक्त वर्ग और secular वर्ग में।
असल में trust के प्रति यह अलग अलग दृष्टिकोण वही है जो की आस्तिक और नास्तिक के विवाद केंद्र में है; जो sacramentalist और secular के विवाद के केंद्र में है, जो rationalism और superstition के केंद्र में हैं।
ज्यादातर आधुनिक विज्ञान में trust मस्तिष्क के चिंतन से निकलता है,  इंद्रियों के परीक्षण से ही प्रमाणित माना गया है।
पुराने युग में , जब ज्ञान के शोध इतना गहरा नही हुआ करता था, तब विश्वास एक भावना हुआ करती थी। भक्त वह वर्ग है जो आज भी trust को वैसे ही समझता है। जाहिर भी है, आप खुद महसूस कर सकते हैं की भक्त वर्ग में आधुनिक शैक्षिक योग्यता कम है।
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Try imagining how a Bhakt would solve a Mathematics question :- Prove that 2 is the only even number which is also a prime number .
A Bhakt might just write for an answer ,
" 2 IS the only even prime number , Trust me"
And if his answer is marked wrong by the examiner, he will proceed only to accuse the examiner "of not having trust in him". Maybe some of the Bhakts even go on to accuse the examiner of being "a traitor", "gaddar".
For the unintiated, there is a due logical proof even to this simple looking statement in the mathematics. You can easily search it out on the internet.
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The question of having Trust or NOT having Trust on the Courts  is being raised by those who themselves do not know on what principles the judiciary functions and what are the Procedural laws.
A logical man would work by demonstrating the correctness or the mistakes of the judicial process, instead of pleading to the people to accept or reject the court's judgement
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The question of having Trust or NOT having Trust on the Courts  is being raised by those who themselves do not know on what principles the judiciary functions and what are the Procedural laws.
A logical man would work by demonstrating the correctness or the mistakes of the judicial process, instead of pleading to the people to accept or reject the court's judgement
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Based on their culturally ingrained judicial tendencies, the present population of India can be categorised into two broad blocks.
TYPE A : the Sacarmentalist type:- who use the yardstick of TRUST to accept or reject a proposition.
TYPE B : the Secularist type: who use the yardstick of SENSORY DEMONSTRATION to accept or reject a proposition.
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Trust जब भी भावना बन जाता है, तब वह शोध गंगा के प्रवाह को रोक देता है, ज्ञान का बहता पानी थम जाता है, उसमे काई जमने लगती है।
शोध, अन्वेषण और अविष्कार में ही ज्ञान का निवास है। trust जब भावना बन जाता है तब इन्ही प्रक्रियों को बंधित कर देता है। trust के तमाम स्वरूप faith, loyalty, belief सब का यही असर है इंसानी समाज पर। एक तरफ जहां इनका फायदा यह है की वह मन मस्तिष्क को शांति प्रदान करते हैं, जीवन की अनिश्चित का सामना करने का साधन प्रदान करते हैं, वही इनका नुकसान यह है की समाज की बौद्धिक, आर्थिक, मानवीय प्रगति को रोक देते हैं।
ईश्वर शायद दोनों जगह बसता है। हालांकि faith वाले लोग समझते हैं की ईश्वर सिर्फ आस्था में ही निवास करता है। मगर एक फिल्म Oh My God अच्छे से समझती है की ईश्वर दोनों ही जगहों पर है।

तीन बातें याद रखें



तानाशाही और ज़मीदारी प्रशासन पद्धति एक नैसर्गिक प्रबंधन कला है

ऐसा सोचना गलत है की प्रबंधन सीखने के लिए इंसान का पढ़ा लिखा होना ज़रूरी है। प्रबंधन के तमाम पद्धितियों में ज़मीदारी वाला तरीका तो हर इंसान नैसर्गिक तौर पर जानता है। ज़मीदारी पद्धति में जोर जबर्दस्ती, bullying, तथकथित indiscipline की सज़ा, तिकड़म बाज़ी, धूर्तता-मक्कारी, सारे दुर्गुणी व्यवहार एक मान्य युक्तियाँ होती है प्रबंधन करने की।
बल्कि पढ़ाई लिखाई की ज़रूरत तो दूसरे उच्च मानसिक स्तर के प्रबंधन को सीखने के लिए ही होती है। जिसमे की आधुनिक प्रजातांत्रिक प्रबंधन पद्धति खास है। वरना तो अनपढ़ता या 'देहाती गिरी' की भी अपनी प्रबंधन पद्धति होती है- तानाशाही। देहाती गिरी इसलिए, क्योंकि अनपढ़ता देहात(=गाँव) में सहजता से मिलती है, वहां जीवन यापन में अनपढ़ता कोई  बाधा नहीं होती है।
कई सारे प्रबंघकिये कहावते जो हम अक्सर सुनते पढ़ते रहते हैं, वह वास्तव में देहाती प्रबंधन व्यवस्था में ही लागू होती है। जैसे Wheel that makes the loudest noise gets the largest grease . तानाशाही "देहाती" पद्धति में ही किसी प्रकार के व्यवहार को प्रसारित करने का एक वजह कारन यह भी होता है की "Management  wants  it "

भई, अब देहाती प्रबंधन पद्धति में ही तो निर्णय सिद्धांतों के बाहर "अन्य कारणों" के आधार पर होते हैं। तो फिर ज्यादा हो-हल्ला करना भी एक "अन्य" कारण दे सकता है। प्रजातांत्रिक प्रबंधन पद्धति में चलने के लिए सिद्धांत विकसित करने पड़ते हैं, जो की तमाम निर्णयों की भूमध्य रेखा का कार्य करते हैं। तो यहां हो-हल्ला , जोड़ जुगत जैसे कारण तो ज़मीदारी प्रशासन पद्धति में ही हो सकते हैं , जबकि प्रजातन्त्र पद्धति में किसी निर्णय के कारण सिद्धांत ही होते है।
इस तरह से देहाती प्रबंधन प्रद्धति की अपनी खुद की प्रबंधकीय सूत्रों की विस्तृत सूची बनायी जा सकती है। हमारे देश में सबसे प्रचुरता से दिखने वाली प्रबंधकीय पद्धति यही वाली है

राजनीति से ऊपर उठाने की ज़रूरत सिर्फ नेता नही, जनता की भी है

👆👆✍

यह ऊपर लिखा मैसेज व्हाट्सएप्प पर कही से त्वरित हो रहा है।

अगर बात सच भी है, तो भी एक बात हर एक भारतीय को सोचनी चाहिए। *वह यह कि हम लोग कब तक ऐसी नाकामियों को कभी भाजपा का और कभी कांग्रेस पार्टी की नाकामी सिद्ध करने में अपना दम लगते रहेंगे?*

ऐसी नाकामियां किसी राजनैतिक पार्टी की नही, देश की होनी चाहिए जब देश में महंगाई ताबड़तोड़ बढ़ती जाए और एक दिन बैंकिंग प्रणाली का भी भट्टा बैठ जाये तो। अगर यह सब गुज़र जाए तो हमे राजनैतिक पार्टी की व्यवस्था से ऊपर उठ कर अपने तंत्र का मुआयना करने पर ध्यान देना होगा क्योंकि तंत्र तो दोनों ही पार्टियों को एक समान मिला था। तो फिर कैसे तंत्र खुद में विफल हो गया कि ऐसी चालबाजी करने में भाजपा अकेली, या कांग्रेस पार्टी अकेली, या की दोनों ही पार्टियां आपसी किसी मिलिभगति मे सफल हो गयी? आखिर खामियाजा तो भारत के नागरिक की जेब से जाएगा? आर्थिक स्वतंत्रता ही तो राजनैतिक स्वतंत्रता और जीवन मुक्ति का प्रथम गणतव्य स्थल होता है। जब इतनी बड़ी आर्थिक त्रासदी घटती है तब ही हम सब लोग आर्थिक ग़ुलाम बनते है , और तब हम और ज्यादा भाजपा-दोषी-कांग्रेस-दोषी के खेल में फँसते है। हमारी मुक्ति के द्वार और अधिकः बंद हो जाते हैं।

क्या आपको पता है कि कमलनाथ जो कि कांग्रेस पार्टी की ओर से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मनोनीत हुए हैं, वह सन 2011 में देश के सबसे अमीर कैबिनेट मंत्री घोषित हुए थे , और उनकी संपत्ति $59million की आंकी गयी थी?
यह सब तब है जब कमलनाथ सिर्फ राजनीति करते हैं, कोई पेशा, उद्योग या व्यापार नही !

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आदर्श और सैद्धांतिक दॄष्टि से समझे तो फिर संविधान जो भी राजनैतिक ढांचा बनाता है, वह चिरंतर रहता है। राजनैतिक पार्टियों को उसके भीतर रहते हुए जनकल्याण के काम करने चाहिए।

तो ढांचे की खुद की जिम्मेदारी होती है कि वही सुनिश्चित करता रहे कि पार्टियाँ जो कि सरकार में रहें, काम वह जनकल्याण का ही करें।
अगर गौर से देखें तो इसी मूल उद्देश्य से ही तमाम और सिद्धांत निकलते हैं जो आधार देते हैं संसद नाम की संस्था को बसाने के, उसमे दो सदनों को बैठाने के, उनके कार्यकाल की अवधि और प्रक्रिया देने में, न्यायापालीका को जुडिशल review की शक्ति देने के, किसी बिल को विधान बनने तक के सफर का मार्ग निर्धारण करने का।

अब अगर इतना होने के बावजूद अगर जनकल्याण के काम हो नही पा रहे हैं, जन प्रतिनिधि दिनबदिन ताबड़तोड़ अमीर हो रहे हों, और बैंकिंग प्रणाली, पुलिस प्रशासन प्रणाली, सब के सब यूँ ही विफलता के सूचक चमकाते रहे,

तो क्या अभी भी समझदारी यह है कि हम इसे कांग्रेस पार्टी या भाजपा पार्टी का संवैधानिक तंत्र को चकमा देना समझ लें?

आखिर सोचने की बात है कि कहीं हम कांग्रेस-भाजपा-कांग्रेस के कुचक्र में तो नही फंस चुके हैं, और अन्तत अपने ऊपर टैक्स के बढ़ते बोझ, प्रणालियों का ठप्प होना, प्रशासन का आदमखोर होते रहने बस बेवकूफी में देख रहे हैं, कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस की विफलता मान कर।

सोचिए। छिछली दल गत राजनीति से ऊपर उठ कर, संवैधानिक तंत्र की खुद की काबलियत के कोंण से।

संविधान के ढांचे में ही गड़बड़ होने से नौकरशाही बन जाती है अल्लाद्दीन का चिराग

एक बार यदि हम इस सच को समझ लें की गड़बड़ी के बीज संविधान में ही बोये हुए हैं, और वह क्या हैं,
तब इस सच के ग्रहण से अलग ही logic और विचारधारा प्रफुल्लित होने लगेगी, जिसके अलग ramifications होंगे। उदाहरण के लिए, आप केजरीवाल जी से लोकपाल की मांग को किनारे रखने की बात सहर्ष करने लगेंगे।।आप को समझ आ जायेगा कि अगर सिसोदिया जी को यूँ ही स्कूलों का निर्माण और जैन जी को मोहल्ला क्लीनिक खुलते देखना है तो एकमात्र तरीका यही हैं की इन लोगों को सत्ता में बनाये रखने के लिए वोट दो। आप यह भी समझ जाएंगे की मात्र निर्माण हो जाने से सिसोदिया जी के स्कूल और सत्येंद्र जैन जी के क्लीनिक देश निर्माण में योगदान देंगे यह आवश्यक नही है। क्योंकि जब भी सत्ता पलटेगी, वापस इनको ध्वस्त भी आसानी से किया जा सकता है।

 यह सब भारत के संविधान के चौखटे में हो रहा है। यहाँ निर्माण से ज्यादा आसान है ध्वस्त कर देना। यहां नौकरशाही एक लावारिस पड़े अल्लादिन्न का चिराग की तरह है, जिसकी मर्ज़ी ही अंतिम सच है जो कि कुछ भी काम को हो जाने का तिलिस्मी भ्रम प्रदान करता रहता है आदमियों की आँखों में। सच यह है कि चिराग के जिन्न की मर्ज़ी है वह कोई काम कर दे, और अपने अगले मालिक की मांग आने पर वापस उसी काम को undo कर दे !

   संविधान एक विशाल चौखटे की तरह है जिसके भीतर ही सब घटने वाला है। आप जब यह समझ जाएंगे की असल में कुछ नुकीली कीलें तो चौखटे में ही धंसी हुई है,  तो शायद आप अन्ना जी को भी यही सलाह देंगे की अब 2019 में दुबारा कोई आंदोलन नही करे "लोकपाल, सौर-मंडल पाल" के लिए क्योंकि इस संविधानिक चौखटे में ऐसा कुछ कभी भी काम करने वाला ही नहीं है। अगर करना ही है तो अन्ना जी सबसे प्रथम तो संविधान में ही बदलाव के लिए जनता को जागृत करें। मगर ऐसी कुछ भी मांग के आंदोलन से अन्ना जी का मज़ाक ही बन जायेगा। अम्बेडकर समर्थकों के लिए ऐसे आंदोलन कभी भी हलाक के नीचे नही उतरने वाले हैं।

संविधान में ही गड़बड़ है, इसके एहसास आ जाने से आप को शायद यह भी समझ आ जायेगा की भारत में कुछ भी भली कामना करने के लिए एकमात्र तरीका है की आप खुद सत्ता में जैसे भी,-जोड़तोड़ करके- पहुंचे और फिर उसे लागू कर दें। लेकिन यह भी हमेशा याद रखना पड़ेगा की वह भली इच्छा की जन-नीति बस तभी तक जीवित रहेगी जब तक आप सत्ता में हैं। अगला आयेगा तो वह अपने जैसे नीति चलायेगा।  स्थायी बस वही रहने वाला है जो की नौकरशाही के व्यक्तिगत लाभ को नष्ट न करे, उनको विचलित और परेशान न करे।  वरना बाकी सब को नौकरशाही जानती है की वह आसानी से "संभाल लेगी' क्योंकि सब कुछ तो क्षणभिंगुर है भारतीय सविधान के ढांचे की कलाकारी के चलते। 

सविधान के ढांचे में ही कील और छिद्र जड़े हुए है, यह समझने से आप शायद यह भी समझ जाएंगे की निष्पक्षता भारतीय संविधान के ढांचे की logic के अनुसार एक मूर्खता है। यहां इस ढांचे में जीने की कला यही है की किसी न किसी पार्टी से जुड़े रहे। वरना फिर सभी पार्टियों से जमाये रखने से ही निष्पक्षता का एहसास मिल सकता है। राजनैतिक निष्क्रियता में रहते हुए निष्पक्षता आसान नही है। क्योंकि अनजाने में आप संविधान विरोध को समर्थन दे बैठने की गलती कर सकते हैं। 
   तो फिर आप यह सच स्वीकार करना सीख जाएंगे की आपको भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक को चुनना ही है। तीसरे विकल्प आपको संविधान विरोध की ओर ले जा सकता है, जो की खुद यहां की जनता ही आपको समर्थन नही देगी। 
तीसरे विकल्प का अस्थायी उत्थान संभव तो है मगर इन प्रथम दो विकल्पों की कृपा से ही हो सकेगा अगर इन्होंने उसे पनपने का मौका दिया , तो। वह भी एक निश्चित हदों तक ही उठ सकता है, ज्यादा आगे नही।

संविधान का ढांचा की कलाकारी है ही ऐसी की यहां आप बस "आशा के दीप" जला कर ही चल सकते हैं, अगर आपने "जागृति का प्रकाश" फैलाने की कोशिश करि तो  आपको यह संविधानिक ढांचा ही ध्वस्त कर देगा। कहने का मतलब है की हर केजरीवाल के विरुद्ध एक नजीब जंग और अनिल बैजल बैठा है उसे छकाने के लिए। और जो मस्ती में है वह है रोबेर्ट वाड्रा से लेकर अमित शाह , चिदंबरम और बाकी सब। यह सब होने के पीछे की कलाकारी संविधान में है की शक्ति संतुलन का जंजाल कैसे बिछाया गया है।

नौकरशाही अधीनस्थ समझौते में रहती है राजनेताओं के संग

यूपी पुलिस इत्मीनान से बोलती है कि वह गौहत्यारों को पकड़ने की प्राथमिकता रखती है।

अब बात को समझने के लिए न ही कोई "UPSC की तैयारी"  वाला हदों का ज्ञान चाहिए, न ही कोई राकेट साइंस लगेगी की राजनेताओं और नौकरशाह के बाच में शक्ति-संतुलन किस ओर झुका हुआ है, और क्यों और कैसे ऐसा हुआ है।

यह पहली बार नही है पुलिस या किसी नौकरशाह की खुद 'कर्तव्य परायणता" की इज़्ज़त खराब हुई है राजनेता के आगे। इससे पहले उन्नाव कांड में एक साल लग गए FIR ही दर्ज करने में। कठुआ में यही "कर्तव्य परायणता "की इज़्ज़त लगी थी पुलिस की। सुनन्दा केस में सब छुट्टी पर भागने के चक्कर मे लगे रहे। dk ravi कर्नाटका IAS कांड में यही दिखा। सोहराबुद्दीन कांड और गुजरात के हालात तो पूछिये ही नही।

जब पुलिस या कहें तो पूरी नौकरशाही का मुखिया- भारत का राष्ट्रपति- खुद ही एक पांच वर्षीय नौकरी वाला कोई पुराना, मार्गदर्शक मंडल वाला राजनेता हो, और उसके पद का चुनाव भी संसदीय लोगो को हाथों में बागडोर हो-- तो नतीजे यही मिलना तयशुदा है।

अब यह गड़बड़ खुद संविधान में ही बोई हुई है।

आखिर कौन सा नया व्यावसायिक कौशल खोज निकाला है सेवानिवृत नौकशाही ने?

सेवानिवृत्ति के बाद नौकरशाहों को आजकल भारतीय उद्योग घराने बहमुल्य वेतन पर contract सेवा में लेने लग गये हैं।

सोचने वाली बात है की ऐसा कौन सा professional skill set होता है इन सेवानिवृत नौकरशाहों में की उनकी इतनी कीमत आंकी जाती है?

शायद political manipulatuion , bribery और fool proof contractual scandal कर लेना भी अपने आप में एक professional skill माना जाने लगा है। वरना आखिर ऐसा कौन सा बाज़ार में चलने वाला कौशल इज़ाद कर लिए है service class लोगों ने ?

किसी समय दुनिया के इतिहास में रसायन शास्त्रियों के कौशल ने साबुन बनाने के अपने कौशल से दुनिया का प्रथम multi national corporation दिया था - lever brothers। वर्तमान काल में information technology वालों ने आधुनिक दुनिया को silicon valley दी, बंगलुरु दिया। 
मगर अब हज़ारो सालों की ग़ुलामी से तथाकथित ताज़ा ताज़ा "आज़ाद " हुए भारतीयों ने अपने आप में एक नया ही professional skill सेट खोज निकाला है जो की शायद न तो किसी कॉलेज में पढ़ाया जा सकता, और न ही एक इस खास पेशेवर बिरादरी के बाहर कोई आसानी से सीख ही सकता है -- manipulation !

जी हाँ। आप गौर करें evm setting से लेकर राफ़ाएल तक के घोटालों को। कागजों पर इतना fool proof व्यूह रचा गया है की आम आदमी के लिए एकदम सम्भव ही नही है सबित करने के लिए की कोई घोटाला हो रहा है। कानूनों का चक्रव्यूह को इतने बारीकी से समझ कर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, गोपनीयता कानूनों के इतने बेहतरीन configuration के साथ व्यहु रच सकने की यह काबलियत तो सिर्फ retired bureaucrats में ही पायी जा सकती है। किसी भी आम आदमी को , चाहे जितने ही अच्छे विश्वविद्यायल से पढ़ा हो और जितने भी वर्षों का work experience हो, ऐसा professional skill सेट वह विकसित नही कर सकता है। भारतीय उद्योगिक घरानों ने तो बाकायदा इसकी बहमुल्यता को पहचान कर के इसकी अच्छी कीमत भी देना शुरू कर दिया है। 
पहले के समय में retired अधिकारियों को अक्सर इसलिए भी लेते थे की sporadic आने वाले कार्यों के लिए regular व्यति मिलना मुश्किल था। मगर आजकल retired bureaucrats के कुछ और उपयोगिता भी उद्योगों को दिखाई पड़ गयी है।
अपने batchmates और पुराने in-service सहयोगियों की मदद से यह सेवानिवृत उच्च अधिकारी public contract उठाने के ऐसे व्यूह रचना सीख चुके हैं की आम आदमी देख कर भी कभी सबित कर ही नही सकता है की गड़बड़ कहां और कैसे करि गयी है। france के एक अधिकारी ने तो बोल भी दिया है की अगर paper पर देखा जाये तो कहीं भी कोई घोटाला हुआ ही नही है।

यही असली तारीफ और असल कीमत है सेवानिवृत्त नौकरशाहों के professional skills की।

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