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The effects of Helmet laws on the Intellectual courage of liberated people

this kind of video is custom-generated just to spread scare ! Think critically, if u may, you should notice that Helmet is a mitigating device, not a preventive device. The better action is the preventing action, not the curative or mitigating action. A helmet makes ZERO contribution in preventing an accident. The helmet, may , IF AT ALL, come of use POST AN ACCIDENT, not before an accident.

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Sometimes there is no actual horror in the story. It is only the work of cameraman by shaking the camera, taking some acute angle shots, and then the sound editors adding the background score , which give a feeling of scare.

The Helmet wearing "inspirational" videos are in the same line. The logic of un-avoid-ability of the helmet device has never been found. The Video-makers generate them only from their own imaginary stories. One can create such "inspirational" stories for other devices as well -like, for driving gloves, the windsheeter jackets, the knee caps, the shoes, and even the pedestrian Helmets

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The issue of Driving helmet devices connects closely with the Intellectual COURAGE of the Indians who believe they have been liberated some 70 odd years ago. This piece of legislation, found in the Motor Vehicles Act, sets the power abnormally high in favour of the "government", and therefore it goes in anti-thesis to the idea of Democracy. Through this, the government gains the unfavourably high power to capture and imprison the Intellectual Courage of the liberated people, and thus make them habituated to accept and to mistake the big-brother'o'cracy for a Democracy.
That is the trouble with this law.

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Just saw a video, a CCTV footage of how a man taking a walk early morning is hit by a passing car. (I avoid posting the upsetting video over here. However one can see it elsewhere on intenet).
NOw this is one video which may perhaps make a worthwhile case for why not the PEDESTRIAN HELMETS should also be made compulsory! Rather, this real-life footage video is more "inspirational" than those director-and-cameraman made video on wearing of driving helmet, about its purpose. Infact, it is possible to stretch the piece of logic to make case for the BiCycle Helmets, the Rickshaw and Autorickshaw Helmets, and so on , so forth.

This thought should actually make each of us think. To think about what is the worth of a helmet, it's purpose and its contribution to making the Indian roads safer, which are notoriously the most unsafe road on the planet.

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वैज्ञानिक चिंतन यानी scientific temper की पहचान तो बस यही तक है की इंसान को cause and effect समझना आ जाता है। मगर scientific temper अपने आप में पर्याप्त विकास नही है इंसानी बुद्धि का। इसलिये क्योंकि नकली cause के माध्यम से इंसान और उसका समूचा समाज अभी भी धोखे में रखा जा सकता है।

तो scientific temper के आगे भी बाधा होती है इंसानी दिमाग के चिंतन की। नकली causes में उलझ जाने की। इस बाधा को पार लगाने का रास्ता clericalism  और secularism की बहस में से दिखाई पड़ता है। घटनाओं के पीछे reasoning , यानी causes, जब clericalism में से आते हैं तो वह ऐसे होते हैं की उनका मुआयना करना, मापना, विशेलेष्ण करना सम्भव नही रह जाता है। जबकि secularism में बताये गये causes में यह सब लाभ होता है।

उदाहरण के लिए यह helmet अनिवार्यता के लिए  बनाये inspirational video को देखे। यह सब video असल में clericalism की पंक्ति में बनाये गये हैं। इसमे से एक भी वीडियो पर्याप्त कारण नही बताता है। बल्कि सभी video एक नकली कारण ही बता देतें है जो की director की मनमर्जी से तैयार हैं। एक फॉर्मूला सा तैयार हो जाता है कृत्रिम cause को निर्माण कर देने का। अगर driving gloves का महत्व बताना है तो बस इतना करना है की वीडियो में गाड़ी की ठोकर हाथों-उंगलियों पर दिखा दो। अगर chest gurad का महत्व दिखाना है तो गाड़ी की ठोकर छाती पर दिखा दो !
यह है fake reasoning और उसमे उलझे इंसानों का उदाहरण।

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Philosophy का यही फायदा होता है। बातें कहां से निकलती है, और कहां तक की घटनाओं को तलाशते-तलाशते कहां पहुँच जाती है। पश्चिमी देशों में विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली philosophy में यही प्रभावित करने वाला है। कई सारे पश्चिमी देशों के लेखों के किताबों में यह देखने को मिलेगा। बात artifical intelligence और super conducting material पर होते होते गौतम बुद्ध और aristotle की philosophy के बीच अंतर ढूंढने तक निकल जाती है। बल्कि computer और diode valve , जो की semi conductors के पूर्वज हैं , उनके उत्थान की कहानी को गौतम बुद्ध से aristotle की philosophy से गुज़रता हुआ देख और समझ सकते हैं।

बरहाल, अभी ताज़ा ताज़ा ढूंढें गये विषय, fake reasonings , जो की driving helmet की अनिवार्यता के विषय की बहस से शोध किया गया है, इसके प्रभावों और उपयोग को तलाश करते हैं।

क्या आप यह महसूस कर सकते हैं कि चुनावी विश्लेषण एक fake reasonings से लबालब कार्य होता है? टीवी पर दिखाये जा रहे तमाम विश्लेषण की कोई पार्टी क्यों चुनाव जीत गयी और कोई पार्टी क्यों चुनाव हार गयी, सब का सब fake reasonings से भरा हुआ है। कारण यह है की एक भी कारण measurable नही है अपनी वैधता को सिद्ध करने के लिए ! Measurable यानी माप कर सकने का गुण fake reasonings की पहचान करवाता है। अगर cause genuine होता है तो फिर वह आगे की जांच-परख, measurability, मापन, करने पर vaild पाये जा सकते हैं।

भक्त और liberals के बीच में एक अंतर यह है। liberals के पास योग्यता और संसाधन हैं fake reasonings को पहचान कर सकने की। Cause बताने का गुण तो दोनों ही सामाजिक माहौल में है - clericalism में भी और secularism में भी। मगर clericalism में fake reasonings होते है जिनको भक्त गण पहचान कर सकने की काबलियत ही नहीं रखते हैं। जो भक्तों के लिए reasoning होती है, वह liberals के लिए मात्र एक hypothesis हो सकती है।

Hypothesis - याद करें की कुछ महीनों पहले सिंगापुर में किसी press conference के दौरान किसी भक्त-छाप व्यक्ति ने राहुल गांधी से ने कांग्रेस पार्टी और महंगाई को जबरन, fake reasoning, से जोड़ते हुए सवाल किया था तब राहुल गांधी ने यही शब्द बोल कर उसको हतप्रभ किया था - "what's your hypothesis?"

भक्त और liberals में अन्तर यह भी है की भक्त fake reasonings को पहचान नही कर सकते हैं। यही अंतर है clericalism और secularism के बीच का भी। clericalism में बताई गयी reasoning ऐसी होती हैं की वह "इस दुनिया" में जांच के लिए उपलब्ध नही होती है, "इस दुनिया" में उपलब्ध संसाधनों के बाहर चली जाती हैं।

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