Technical datasheet on the Psychopaths and The Good Conscience

Regarding Psychopaths, the understanding given in the wikipedia and also various Literature from the professional association of the practising Psychologists is that Psychopaths are people who RUN AFTER THE SUCCESS such that they don't take any self-adopted stopover in their deeds , and decisions. This , the psychologists , explain is due to the absence/developmental troubles of the basic 'organ'  available in the human being which helps every man judge the Right and the wrong by himself. This is what the Sceince and the laws yet don't know much about , although they admit the existence of it , and call it by a name 'Conscience', a name which have been awarded to the organ by various religious systems.

So, a Psychopath is basically a Conscience less person.

This discussion leads the Psychologists to describe as to what the Conscience is like. Basically, the study is somewhat similar to how in the Mathematics, the scholar study about the Complex Number theory. The exact value of the underroot of -1 is not known, but it is yet nicely known and understood the properties and the nature of that unknown answer. It is in the same sense that the science does not know what organ exactly is the Conscience, but it knows few things about the nature of it.
For example, one of the most common function of the Conscience is it's ability to give every owner of it a self-adopted limits of the deeds and the decisions that it may undertake in order to meet it's survival necessities (or "the Success'). A Conscience -borne person is very often a SELF-DEFEATING person. The extreme example of a Self-defeating , truthful and honest man is Raja Harishchandra of the Hindu mythology fame. (Remember the first Bollywood cinema was made on this person). Most of the Hindu Gods will show signs of self-defeat in their character and stories . Lord Rama undertook "vanwas" and adopted by himself to fulfil the promises of his father . That is the Good Conscience. Similarly, Lord Krishna himself lived between the Gwals and dispossessed of his kingdom rights. His friends , the pandavs also practsied extreme self-defeating self-control through the incidents of Lakshyagrih, the Chausar play, the Vanwas and the Agyatwas.

Anyways , that is nature of the Good Conscience- if there is Conscience in a person - it acts to put some VOLUNTARY limitations on the person which very often lead to his self-defeat
 Many of you may, therefore, find it foolish and may curse the organ of Conscience because of this particular nature of it. But believe you me, if you don't accept the reality of it, you are most likely a Psychopath, and you need to visit a psychiatrist to help you !.

The good conscience also motivates - in extreme cases- FORCES or COMPELS the owner of the organ to protest any slightest act of INJUSTICE and the UNFAIRNESS that it may have accidentally witness of even if on someone else. This makes the CONSCIENCE-borne person a NATURAL BORN LEADER. 

Wikipedia has a detail list of people and incidents in the history where acts of GOOD CONSCIENCE have saved the mankind and humanity from catastrophe even at the cost of SELF SACRIFICE .
The famous historical episode of "The man who saved the world" (from a Nuclear halaucast) is one example listed over there.

Simple , basic lessons on Criticism of Socialism

Socialism क्या है ?

Socialism कुछ नही बस सामंतवाद का ही एक आदि रूप है।

संविधान की मूल प्रति में socialism नही था। यह 1976 के 42nd संसोधन करके लाया गया है।

प्रजातंत्र और समाजवाद उतने ही बेमेल (immiscible) होते हैं जितना कि तेल और पानी।
 समाजवाद का ही by product होता है bureacratism और crony capitalism।

Simple , basic lessons on Criticism of Socialism

Conscience, the Spiritual Education are intermediate stops on the path of development of the civilised and progressed society

There is one thing I have made observation of, from my background of receiving "divine education" 🤪😃 from CMS, and then later have interactions with people from other parts of our country as well as people from many other countries  of the world ,

That, there is a spiritual sense and an existential need of the being, which is at the heart of formation of a civilized and progressed society .

In laws , in psychology and perhaps somewhere in the neurology too, there is existence of thing called as the  *Conscience* . Spirituality is the method to feed and nuture in a positive , productive way, the *Conscience*

Remember , reading about the Conscience in Class V by Neeta Zaidi madam ?

The conscience is necessary so to apply the principles of fairness and justice .  The correct application of these principles is necessary so that we may build a civilised society.

So, if we end up corrupting the spiritual environment of our society, for example , by way of the Sainthood and Priesthood going away into the hands of bad people - the fraudsters and imposters , we are destined to make or society a living hell.

Once the spiritual environment is tampered in a society, We will have in abundance the psychopaths , the lunatics ,

कैन्हैया कुमार को एक खुला पत्र - समाजवाद और प्रजातंत्र के विषय मे

https://www.youtube.com/watch?v=0fYaSIY5yxQ

कन्हैया कुमार की बैंक कर्मियों के सम्मलेन में दिये गए भाषण को सुना रहा था।  बेहद लज़्ज़तदार बिहारी लहज़े में दिए गए संवाद ,और किसी रमणीक पर्वत स्थल की घुमावदार सड़क की तरह गोलगोल तर्कों से भरा कन्हैया का भाषण देश के काफी सारे लोगों की तरह मुझे भी अक्सर बहोत पसंद आता है।  दिक्कत बस एक है--कि , क्योंकि मैंने कोई PhD  नहीं करि है, इसलिए मैं कभी कभार अपने  अनुभव और ज्ञान के आधार पर जब उसके तर्कों को परखता हूँ तो अपर्याप्त पाने लगता हूँ।  मुझे लगने लगता है की कन्हैया को शायद पता भी नहीं होगा की वह किन तर्कों के दृष्टिकोण से समाज में जागृति  लाने की बजाये समाज को अबोधता में ले जाने का नेतृत्व कर रहा है। 

कह्नैया में मुझे वापस एक "समाजवादी" मानसिकता की गड़बड़ दिखती है।  यह भारत वर्ष के इतिहास में शायद अधिकांश नेताओं की कमी रही है की यहाँ के बौद्धिक प्रवीणों ने आजतक यह गुत्थी सुलझायी ही नहीं है की प्रजातंत्र और समाजवाद वास्तव में एक दूसरे के विरोधी विचार है, जो की तेल और पानी की तरह कभी भी घोल नहीं बनाये  जा सकते है। चाहे राम मनोहर लोहिया का समाजवाद रहा हो, चाहे किसी और का -- भारत के नेतृत्व ने  न जाने यह महसूस नहीं किया है की "समाजवाद" कुछ  और नहीं, बल्कि पुराने सामंतवाद का ही आरम्भिक primitive स्वरुप का ही उपनाम है।  आप अपनी कल्पनाओं में  भी इसको महसूस कर सकते है, बशर्ते की आपने जीवन में  कभी किसी दबे-कुचले, दास प्रथा से अभिशप्त व्यक्ति की पीढ़ा को अपने हृदय से महसूस किया हो, और सोचा हो की कहाँ से आयी होगी मानव सभ्यता में यह कटुता की इंसान के कुल में जन्मे प्राणी को ही दूसरे इंसान ने इंसान का दर्ज़ा नहीं दिया होगा । ज़ाहिर हो जाना चाहिए कि इतिहास में जो कुछ भी बर्बरता घटी है- वह हमेशा किसी न किसी तथाकथित "भले से "  तर्कों से ही हुई होगी। पुराने हड़पा और मोहनजोदड़ों में बसे लोग भी समाजवाद जैसे व्यवस्था में ही बसते रहे होंगे जो की भारत के गावों में आज भी पायी जाती है , और  फिर हमारे समाज ने न जाने कैसे यात्रा करि होगी १८वी शताब्दी के अंधकार युगी दास प्रथा और सति  प्रथा तक ?

मेरा अनुमान है की दुनिया का कोई भी इंसान अपनी साधारण बुद्धि से  जिस प्रकार की   व्यवस्था से अपने समाज को चलना चाहेगा- वह  घूम फिर  कर "समाजवाद" का ही रूप होंगी।  ऐसा इसलिए क्योंकि इंसान साधारण बुद्धि में रहते हुए भविष्य की जटिल मुश्किलों और सत्य की कल्पना नहीं कर सकते है।  इंसान की कल्पना किसी   बालक की तरह होती है , जिसमे सभी  बच्चे सदैव बचपन में रहतें है , और माता-पिता कभी बूढ़े नहीं होते है।  कन्हैया कुमार की भी दिक्कत वही है।  वह छोटे बच्चे की तरह कल्पना कर रहा है।  बस , वह  आज़ाद भारत के ७०  सालों  के प्रशासनिक  व्यस्वस्था के इतिहास को अनदेखा करते हुए बच्चा  बन जा रहा है।  वह शायद किसी भक्त ( भाजपा समर्थक वर्ग)  की तरह भ्रष्टाचार को कांग्रेस पार्टी की देन  समझता है।  (या शायद मोदी, या किसी फिर और की ). वह भ्रष्टाचार को "समाजवाद" में से ही निकलता विषदन्त नहीं मानता  है।  ज़ाहिर  भी है , कन्हैया ने Phd  समाज शास्त्र के विषयों से करि है तो फिर वह प्रशासनिक व्यवस्था और विधि-विधान विषयों को इतना गहराइयों से टटोलता नहीं होगा। 
शायद यही कारण है की क्यों भारत के बुद्धिजीवी प्रजातंत्र के आगे वापस "समाजवाद" में घुस जाते है --  मानो जैसे की उनकी बुद्धि  प्रजातंत्र में "सभी से पूछ कर सारे काम करों" के कोहरे में फँस कर के किसी deadend  पर आ जाती है। और फिर वापस " समाजवाद" में लौट  पड़ती है ,  हैरान परेशान  जान बचा कर भागते हुए की "कहाँ तक सभी काम पूछ कर करोगे, जनता से पूछ-पूछ कर ? यह तो पागल बना देगा"। (मेरा मानना है कि इस मुश्किल का smart solution  समाधान है, यह कोई dead end मुश्किल नही है क्या सभी काम जनता से पूछ कर करने होंगे।)

  मेरे लिए यह अचरज है की क्यों मेरे अलावा शायद किसी  एक भी इंसान ने यह महसूस नहीं किया किया की "सार्वजनिक संपत्ति" वास्तव में " नगर वधु" के समान  है ,  जिसकी  कोई भी सरकारी नौकर या नेता आ कर आबरू लूट  लेता है , बिना  भय और संकोच के।  और "समाजवाद" तो सभी  कुछ को "सार्वजनिक संपत्ति "   बना  देने  हिमायती पद्धति होती है।
यहाँ इस भाषण में कन्हैया कुमार कुल मिला कर घुमावदार  बातों में बैंक व्यवस्था में वापस समाजवाद लाने की ही बोल रहा।

आर्थिक मंदी का क्या अर्थ और अभिप्राय होता है ?

कल बात चल रही थी कि आर्थिक मंदी का क्या मतलब हुआ? और यह कैसे आती है? कैसे पता चलता है की मंदी आ गयी है? इसके आने से समाज पर क्या असर होता है?
अपने संक्षिप्त ज्ञान के आधार पर सभी कोई अपना अपना मत प्रस्तुत कर रहा था, जो की शायद किसी विस्तृत ज्ञान या प्रत्यय को समझने की सबसे उचित पद्धति होती है -- वार्तालाप एवं चर्चा।
एक मत के अनुसार सवाल उठ रहा था कि आखिर सारा पैसा (/धन) कहां गायब हो जाता है? क्या लोग धन को अपने घरों में छिपा लेते हैं, तिजोरियां भर ली जाती हैं, जिससे की बाज़ार में घन की कमी आ जाती है? आखिर क्यों लोगों ने घर, मोटर कार और यहाँ तक की biscuit भी खरीदने बन्द कर दिये हैं ?
एक दूसरे मत के अनुसार हमारे देश का सच ही यह हुआ करता था की यहां एक parallel economy चक्र था, जिसमे की कारोबार cash अवस्था वाले घन में ही चलता था (जिसे की काला धन भी बुलाया जाता है ), और जहां की सरकार को टैक्स देने की कोई फिक्र नही हुआ करती थी व्यापारियों को। यह वाली economy में हमारे देश का कुल धन का करीबन 80% अंश प्रयोग में था। इसमे सामान के फैक्टरी उत्पादन से लेकर विक्री तक , छोटे उद्योग पूरी तरह युग्न हुआ करते थे। और जब से यह यकायक वाला DeMonetisation हुआ, फिर आधार कार्ड, और फिर GST आया, उस वाले धन स्रोत पर सूखा-आकाल आ गया है। इनकी वजहों से यह उत्पादन प्रणाली ठप्प पड़ने लगी क्योंकि फैक्टरी के कार्मिकों को भुगतान के तरीके पर GST और आधार कार्ड/ बैंक account/ pan कार्ड का पेहरा बैठ गया। "व्यापारी" यानी लघु उद्योगों के स्वामी हक्केबक्के रह गये और टैक्स के बचाने के कोई मार्ग नही मिलने से चुपचाप ,कुंठा के संग धीमे-धीमे नए रास्ते तलाश कर रहे हैं, और जो प्रक्रिया शायद अभी चालू ही है। इधर सरकार में GST , आधार कार्ड, टैक्स नियम इत्यादि भी इतने अस्थिरता और त्रुटियों से बनाये गए है, स्पष्ट सिद्धांतों की कमी है कि गलतियां पकड़ी जा रही हैं, और व्यापारियों को समझना मुश्किल पड़ने लगा है। वह बेचारे एक पहले ही बदहाल हो गये है कि अभी तक अपने फैक्टरी के तकनीकी ज्ञान और कौशल में मुश्किल जीवन जी रहे थे , मगर टैक्स व्यवस्था के चक्र के बाहर रहते है। मगर अभी gst से लेकर bank account और आधार कार्ड, pan कार्ड ने जीवन दो गुना मुश्किल कर दिया है। उनके अनुसार सरकारी बाबू का क्या है -- वह तो रिश्वत की खा कर आसानी से सो जाता है, उसको थोड़े ही न उद्योगिक कौशल और क्ष्रम का बोध है कि कैसे अभी दोगुनी और दो-राही ज्ञान टटोलना पड़ रहा है व्यापारियों को।
एक तीसरे मत के अनुसार सरकार के misplaced priorities यानी गलतफहमी से भरी "आवश्यता सूची की प्राथमिकता" आर्थिक मंदी का कारण है। सरकार हिन्दू-मुस्लिम विवाद वाले विषय, या भारत-पाकिस्तान विवाद वाले विषयों के आधार पर ही वोट कमाते हुए सत्ता में टिकी है। इसके चलते वह अरबों रुपयों से हथियार खरीदना, या विज्ञापन , प्रचार इत्यादि में अधिक प्राथमिकता दे रखी है। मीडिया को खरीद कर उसका मुंह बन्द करने के लिए, झूठे और उकसाऊ कार्यक्रम प्रायोजित करवाने के लिए टैक्स का पैसा ही प्रयोग किया जा रहा है।

मार्क टुली और भारत की मिलावट संस्कृति

भारतीय संस्करण में मिलावट का मामला प्रचुर होता है। उल्हासनगर करके एक  मुम्बई शहर का एक क्षेत्र अकसर लघुउपहासों में आता है जहां हर चीज़ का डुप्लीकेट तैयार कर दिया जाता है। डुप्लीकेट , जैसे दूध में पानी मिलाना। बल्कि आजकल तो बिल्कुल synthetic दूध ही बना डालते, कपड़े धोने वाले पाउडर से। क्या करें कलयुग चल रहा है। और यह डुप्लीकेट उत्पाद हमारे स्वास्थ्य के लिए परम हानिकारक होते है।

तो मार्क टुली , पूर्व बीबीसी संपादक, जो काफी समय भारत में तैनाती पर थे, और अच्छी खासी हिन्दी भी बोलते है, वह कहते है कि भारत में पंथ निरपेक्षता यानी secularism के नाम पर असल में तुष्टिकरण ही हुआ है।
असल में यह मामला एक भारतीय संस्करण की मिलावट का था, जो secularism वाले "उत्पाद" में दिखाई पड़ा और जनचेतना में आया। अभी राजनैतिक विज्ञान के ऐसे और भी "डुप्लीकेट उत्पाद" पकड़े जाने बाकी हैं।

भारत की Democracy भी मिलावट वाली ही है। अफसरशाही यानी Bureaucratism को ही यहां बोतल पर लेबल बदल कर democracy समझा जाता है। इस मामले में तो मिलावट खुद संविधान ही कर देता है। (जी हाँ, संविधान अपनी मंशा में तो नही, मगर दिये गये प्रशासनिक ढांचे में दोषी है।)

हिदू धर्म का जो हिंदुत्व संस्करण है, वह भी made in ullhasnagar ही समझें। बिल्कुल नकली। इससे तबाही ही आयेगी, घृणा बनेगी समाज में।

भारत में पनपता समाजवाद भी मिलावट या synthetic दूध ही समझा जा सकते हैं। "वामपंथ" तो "गरीबी, अशिक्षा, कुप्रशासन बुलाओ" का दूसरा नाम है।

एक कारण की क्यों भारत में डुप्लीकेट प्रचुर है ,वास्तविक उतपाद से, वह यह है कि हमारे समाज मे मूल विचारकों की कमी है। हम लोग खुद ही मूल विचारों का अपमान , उपहास और त्रुटियां गिनाते रहते हैं, बजाए की उन्हें पहचान करके सम्मानित करें, और उनपर सुधार करके बेहतर बनाये। हमारी मूल सोच "आयात" प्रक्रिया से ही आती है।

मद्यअध्यात्म, यौन सक्रियता और समाज में बढ़ता आपराधिक आचरण

सेक्स और धर्म के बीच का संबंध बहोत गेहरा है। हालांकि यह संबंध मात्र आपराधिक घटनाओं तक का नही है, वरण मनोवैज्ञनिक स्तर का भी है। सिर्फ चिन्मयानंद , आसाराम इत्यादि तक बात सीमित नही है, याद करें की जब मुल्लाह ओमर और ओसामा-बिन-लादेन को भी पकड़ा गया था तब उनके ज़ब्त किये सामान में अश्लील साहित्य और चलचित्र भी खूब बड़ी मात्रा में पकड़े गये थे। इसी तरह church व्यवस्था में भी आजतक बाल-यौन शोषण के inquisition चल रहे हैं और समय-समय पर उच्च स्तर के चर्च अधिकारियों को सज़ा दी जाती रही है ताकि जनता का चर्च व्यवस्था में विश्वास क़ायम रहे।

ओशो रजनीश ने कभी, किसी ज़माने में "संभोग से समाधि तक" करके पुस्तक रची थी जिसमे की संभोग (सेक्स क्रिया) के माध्यम से ईश्वरीयता को प्राप्त करने के मार्ग को तलाश किया था।

"प्राणिक उपचार" जैसे कुछ एक गैर-वैज्ञानिक, मगर परंपरागत , विषयों में भी सेक्स क्रिया, सेक्स सक्रियता और ईश्वरीयता(spiritual awakening) के बीच के रिश्ते की चर्चा स्पष्ट शब्दावली में करि जाती है। 'प्राणिक उपचार' विधि में यह माना जाता है की जैसे-जैसे इंसान में ईश्वरीयता का विकास होता है, उसकी "यौन कुंडलियां" भी सक्रिय होने लग जाती है। हालांकि आगे यह विधि यौन सक्रियता को काबू करने पर ही ज़ोर देती है, ओशो रजनीश यहां पर ही बाकी सभी परंपरागत विचारकों से भिन्न हो गये थे। ओशो के अनुसार यौन सक्रियता को सिमटने और रोकने के स्थान पर उनकी पूर्ण तृप्ति के आगे ही सम्पूर्ण ईश्वरीयता को प्राप्त कर लेने का मार्ग ही उचित था। तो ओशो के कहने का अभिप्राय था कि स्वच्छंद यौन आचरण के आगे ही इंसान को ईश्वर की प्राप्ति मिलती थी।

ओशो के विचारों को आज वैज्ञानिक विचारों में इतना अटपटा और गलत नही माना जाता है। जहां अधिकतर पंथों ने यौन आचरण को दमन और सिमटने में ही सदमार्ग की तलाश करि थी, वह सब के सब बहोत ही विकृत किस्म के यौन कर्मकांडों में लिप्त पाये गये थे। यही वह पंथ है जिन्होंने समाज में इंसान को उनके दुःखों से मुक्ति देने की बजाये समाज में मनोविकृति को बढ़ावा अधिक दिया है। छोटे बच्चों से लेकर, बुजुर्ग और यहां तक की पशुओं के संग में अनुचित यौन आचरणों में इसके शीर्ष नेतृत्व और अनुयायी लिप्त पाये जाते रहे हैं समय-समय पर।

प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति में जब शायद सभ्यता और सामाजिकता इतनी विकसित नही हुई थी, तब स्वच्छंद यौन आचरण में ईश्वरीयता को तलाशना एक आम और सहज विधि थी, जिससे की फिर 'परमानंद' जैसी अवस्था मिलती थी, और जिसमे की "सभी शारीरिक और मानसिक दुखों से निजात' मिल जाता था। खुजराहो और कोणार्क के जैसे कामोत्तेजक शिल्पकला वाले मंदिरों का निर्माण शायद उसी पंथ विचारधारा का नतीज़ा है। जब शिव पंथ ने 'लिंग' की परम भूमिका न सिर्फ जीवन को सृजन और आरम्भ करने में देखी थी, बल्कि आजीवन दुखों - शारीरिक और मानसिक- से निराकरण में भी देखा था।  ऐसा माना जाने लगा था कि जो भी मानव अधिक आयु तक यौन सक्रियता को प्राप्त कर सकेगा,वह ही अच्छा , गुणवत्ता पूर्ण जीवन व्याप्त कर सकेगा - यानी "परमानंद" अवस्था वाला जीवन- और वही शारीरिक और मानसिक दुखों से निजात प्राप्त कर सकेगा।

बरहाल, यह सब उस काल की बातें और विचार थे जब आधुनिक विज्ञान अभी शायद जन्म ही ले रहा था और इतना सुदृण और विकसित नही था जितना की आज है। तब न ही आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां हुआ करती थी, न ही आधुनिक विधि व्यववस्था, और न ही psychopathy , psychotherapy जैसे विषय जिसको विद्यालय शिक्षा या अकादमी शिक्षा के माध्यम से प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति पेशेवारिय तौर पर समाज में इंसानों को उनके शारीरिक और मानसिक दुखों से निजात दे सके, पूर्ण वैधानिक जिम्मेदारी के संग, कि यदि कुछ ग़लत ईलाज़ किया तो फिर कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ जाएंगे, सज़ा भी मिल सकती है।

आधुनिक विज्ञान ने बहोत सारे परमपरागत यौन आचरणों को "विकृति" के रूप में पहचान करि है , और कुछ एक यौन आचरणों को "विकृति" के बोद्ध से मुक्त किया है। वर्तमान विधि व्यवस्था आधुनिक विज्ञान के दिये तर्क को ही अपराध संबंधित व्यवहारों को समझने का आधार मानती है। उदाहरण के लिए, आधुनिक मनोविज्ञान ने पशु , छोटे बच्चों और बुजुर्ग लोगों के संग किये यौन संबंधों को "विकृति" माना है, और समलैंगिकता को हाल फिलहाल के दशकों में "विकृति" के बोध से मुक्त कर दिया है। आधुनिक विज्ञान, यानी psychology में यह ज्ञान कुछ अध्ययन और आपसी सहमति के आधार पर तय किये गये "मानकों " के अनुसार किया गया है। "मानक" जैसे कि, किसी भी आचरण को "विकृति" की शिनाख़्त देने के लिए उसको जनसंख्या में सहजता से उपलब्ध नहीं होना चाहिए; उसे अच्छे सामाजिक आचरण में बाधा पहुंचाने का दोषी माना जाना चाहिए - जैसे कि, हिंसा या ज़ोर-जबर्दस्ती करने का प्रेरक स्रोत- ; वह अस्थायी हो, और उसके ईलाज़ की संभावना इत्यादि हो, यानी यह सम्भव हो सके कि किसी दूसरी परवरिश के माध्यम से उस प्रकार के आचरण को टाला जा सकता है। तो यानी, जो भी आचरण इन "मानकों" पर खरे उतरते है, वही "मनोविकृति" के रूप में शिनाख़्त किये जाते हैं। और फिर विधि व्यवस्था उन्ही को अपराध मानती है।

हालफिलहाल के शोध में मद्य-आध्यामिकता, यौन सक्रियता और उसको तृप्त करने के लिए हिंसा का प्रयोग, जबर्दस्ती , छल, नशीली दवाएं या मादक पदार्थ, इत्यादि के बीच संबंध को देखा गया है। जैसा की ओशो पंथ और प्राणिक उपचार , दोनों में ही, माना गया है कि आध्यामिकता में प्रवेश करने पर इंसान में यौन सक्रियता भी आ जाती है। और अक्सर करके यह सक्रियता मद्य-आध्यामिकता में तब्दील हो जाती है। आधुनिक मनोविज्ञान और विधि-विधान में इस मद्य-आध्यात्मिकता से उतपन्न यौन सक्रियता को यौन हिंसा, बलात्कार, मादक पदार्थों का दुरुपयोग , समाज में व्यापक मनोविकृत आचरण का दोषी पाया गया है। यहां तक की आतंकवाद और अतिवाद भी इसी प्रकार के संकीर्ण यौन आचरण से प्रेरित होते देखे गये है, और संकीर्ण यौन आचरण को मद्य-आध्यात्मिकता से प्रेरित होता। मद्य-आध्यामिकता ने जनता की अंतरात्मा को दूषित किया है, असामाजिक अमानवीय आचरणों और कृत्यों की चेतना को क्षीर्ण कर दिया है, और आपराधिक कृत्यों को सहज चलन में ला दिया है। जनता की अंतरात्मा में धर्म और अधर्म के बीच भेद कर सकने की स्वचेतना मूर्छित होती रही है जिससे की समाज में अपराध का प्रसार बढ़ा है।

The failure and lessons to learn from Vikram lander

Just to update about the story of the perils during moon landing, how many of you know that there is, right now, a Rover on the surface of moon, moving and sending the images back ! Yes, if may google it through , you will find about the *Chang-4* from China .

The story of *Chang 3*, the one Rover which the Chinese had sent just before this one, met the nearly the  same fate as ours. Infact they were better off than what we have achieved in our mission . The central line of the reason of failure was same - " *Communication lost* ".

However , the Chinese , in their first attempt, had managed to atleast land successfully. Do you know that ?

Chang-3 , also called as *Jade Rabit* mission, or the *Yutu* , had landed successfully and the rover vehicle , *Yutu* , emerged out from the lander unit. It even transmitted back the images which the Chinese put up on the Twitter handle . However, being a communist country, their space programs do not reveal much neither to the own public, forget about addressing the new findings in a trustable manner to the world community.

The Yutu did a short travel, after which it lost contact and the mission , from that point on became a failure. It happened in the January of 2018.

Suspectedly, the radiations and the fine dust over the lunar surface , is where the estimations go wrong as the scientist fail to imagine how a communication black-out will occur as the man-made object will get closer to the lunar surface . Since the moon has no atmosphere, it is comparably easier to land on mars in terms of the technological challenges that the two heavenly bodies project before the communication engineering team. The absence of atmosphere over the moon surface cause the radiation levels to be unusually higher that what maybe there on the surface of , let's say, the Mars.
It is this issue where most of the failures happen. The onboard circuitry , which runs on semi conductor technology, if it is not housed well protected to prevent the ingress of the radiations, will suffer a bad fate and , and this in turn, causes the computer programs to start malfunction . The overall out come is the failure..

That is one thing, we have to understand first.

( Writer is an amateur enthusiast, who likes to follow the space expeditions around the globe , and likes to learn from them.)

The failure of *Vikram* lander can be described in a simplistic analogy of a mariner as the failure to carry the _intrinsically safe_ torch on an oil tanker ship .!

The Unscientifically decided penalties under the Motor Vehicle Act

There are a few questions regarding Dinesh Madan episode, the man who has trended on the social media since 03rd Sep after getting a driving ticket amounting to ₹23000,  thereby becoming the first of the famous culprit under the new Motor Vehicle Act
Many people are justifying the amendment arguing the righteousness of the police action, judging from the number of offences and the nature of offences he had committed.
However, here are the questions :-
Q1) What made him getting caught for so many of the offences , which apparently he must have been doing since ages, only after the Fine amount has increased ? Is the commissioning of offense new, or the catching of the culprit the new-found incident which could happen only as the apathetic police has found a new zing since the fine amount has zoomed up ?
Q2) Now , what will guarantee that "the most unavoidable, most honored" *the police discretion* will not come in way of catching all such offenders , and not letting anyone slip away by paying up a handsome bribe ? In short, what is the guarantee against non-occurence of the police apathy a second time ?
Q3) how to ascertain that it is rather not the police enthusiasm which has caught Mr Dinesh Madam, but purely his faults ? Maybe, after some time, the police will become easy and slack as the way they were earlier . And then, the grand objective of achieving road safety will fall flat , once more .
Q4) Can anyone list What fines and penalties were there against the errant police cops for letting slip away offenders as Mr Dinesh Madan, if the fine amount were kept low ?
Q5) What fines and penalties are there against errant police men now, for abusively applying their police discretion to slip away any offenders today ?
Q6) What fines and penalties, *if any* , against the trainers and instructors of the driving-license authority and for giving improper or insufficient training/lessoning on traffic handling situations and rules ? Mind it, the biggest cause of accident is *indisciplined driving* .
Q7) What fines and penalties exist, *if any* , against the Road designers and the maintenance authorities for keeping the roads in improper and unworthy conditions ?
Q8) What measures exist against driver's fatigue , state of mind and body, factors which are contributing towards prevention of accidents on the highways, and those  which are occurring peculiarly in the wee hours of the day ?
Q9) What measures exist against the bad upkeep/maintenance of the driver's cockpit in the heavy vehicles , such as trucks and passenger buses, which conditions and the lack of amenities and the gadgetry makes them more liable to doing accidents?
Q10) Is the new fine and penalty amount *Scientifically Rationaled* ?
There is a thing about the Scientific Management techniques and the above set of questions because those questions show up, in a governmental action , whether the government actions have been *scientifically reasoned* or have been *arbitrarily decided*, merely to catch the news headlines and fill the coffers with public money ?
The arbitrarily decided actions eventually fail to achieve their objectives. And what else would be the measure of the achievement than the huge tally of the road accident that India suffers annually on its roads .

प्रजातंत्र में तानाशाही के क़ाबिज़ होने के गुप्त रास्ते - न्यायपालिका में सेंध

तानाशाही की यही पहचान होती है। प्रजातन्त्र में तानाशाही ऐसे ही क़ाबिज़ होती है। कि, पहले तो न्यायपालिका में अपने आदमियों को पदुन्नति दे कर जज और शीर्ष पदों तक पहुंचाती है। फिर उनके माध्यम से न्याय को ही पक्षपाती बना देती है। जिन अपराधों के मुक्कदमों में अपने आदमियों को रिहा कर दिया जाता है - कभी सबूतों की कमी का बहाना लगा कर, कभी निर्दोष दिखा कर, कभी जांच की कमियां दिखा कर-- वहीं पर अपने राजनैतिक विरोधोयों के हल्के हल्के मुक़द्दमों को भी "गंभीर" बता कर जेल भेज दिया जाता है। इससे विरोधी जनता के बीच नेता प्रतिपक्ष की कमी हो जाती है, और विरोधी जनता का मनोबल भी टूटने लगता है। फिर तानाशाही पार्टी को और ज्यादा छूट मिल जाती है अपनी मनमर्ज़ी करने की।

द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व जर्मनी में एडोल्फ हिटलर ने में ऐसे ही सत्ता में अपने विरोधयों को साफ़ किया था। इटली में मुससोलिनी और जापान में भी इसी तरह राजनैतिक विरोधियों को रास्ते से हटा कर तानाशाही आयी थी और फिर देश को महाविनाशकारी विश्वयुद्ध में झोंक दिया था।

तानाशाही प्रवृत्ति और जनसंख्या नियंत्रण के सीधे तरीकों का चयन

ज़्यादातर विचारकों के अनुसार देश की तम्माम समस्याओं का मूल यहां की विशाल , अनियंत्रित आबादी को समझा जाता है। कुछ भी हो -- सड़कों पर यातायात क्यों बेकाबू है?, स्कूलों में शिक्षक क्यों नहीं आते? अच्छी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा क्यों नही दी जाती?, अस्पतालों में बेड की कमी क्यों है?, गुणवत्तापूर्ण ईलाज़ क्यों नही दिया जाता?, न्यायपालिका में सुनवाई में देर क्यों लगती है? , घूस क्यों देनी पड़ती है जल्दी सुनवाई के लिए?, पुलिस क्यों नही fir प्राथिमिकी दर्ज करती है?, समय पर जांच और बचाव कार्यवाही क्यों नही करती है?-
---- लाखों सवालों का एक जवाब आसानी से दे दिया जाता है -- *बड़ी, विशाल आबादी* ।

और फिर विशाल आबादी को नियंत्रित नही कर सकने के लिये देश की प्रजातंत्र व्यवस्था को दोष दे दिया जाता है क्योंकि यह जनसंख्या को सीमित करने वाले सीधे तरीकों को लागू करने में सभी के हाथ बांध देती है - सीधे तरीके क्या हैं-- जैसे, जबरदस्ती नसबंदी, दो से अधिक संतानों पर दंड, जुर्माना; या कि बच्चों के जन्म से पूर्व सरकार की अनुमति लेना, इत्यादि।

तो, कहने का मतलब है कि प्रशासनिक विफलता किसी अयोग्यता का नतीजा नही है, बल्कि तंत्रीय बाधाओं की वजहों से हैं।

मगर गहराई में जा कर मंथन करें तो आप पाएंगे कि जनसंख्या को नियंत्रण नही सकना तो खुद ही प्रशासनिक अयोग्यता का नतीज़ा है।

operations management और प्रयोद्योगिकी का विषय ज्ञान रखने वाले शायद इस बिंदु को बेहतर समझ सकें। आज के युग मे जिस प्रकार की प्रौद्योगिकी उपलब्ध है - कंपूटर तंत्र जहां एक एक इंसान का मिनट दर मिनट ब्यौरा रिकॉर्ड करा जा सकता है, map के सुविधा जहां ज़मीन के एक एक इंच का हिसाब रखा जा सकता है, मोबाइल और कैमरा, पैन कार्ड और आधार कार्ड जैसी व्यवस्था, जन सूचना के माध्यम, फिल्में, समाचार चैनल, टीवी, जनसंख्या नियंत्रण के यंत्र , कंडोम, इत्यादि-- वहां अब किसी भी तानाशाही पूर्ण "सीधे" तरीकों की बात करना बेईमानी ही है,अपनी व्यक्तिगत अयोग्यता को छिपाने की।

जनसँख्या बढ़त को प्रजातांत्रिक दायरों में रह कर नियंत्रित किया जा सकता है। यानी विलंबित और प्रेरणा कारी मार्ग पर चलते हुए भी इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकना असम्भव नही था, बशर्ते कि मानसिक अयोग्यता न हो प्रशासनिक अधिकारियों के मध्य - जो कि किसी निजी बौद्धिक विफलताओं के चलते बारबार तानाशाही वाले "सीधे" रास्तों की और ही मुंह करते रहते है।

आज की दुनिया मे जनचेतना को अपने अनुसार मोड़ सकना ज्यादा मुश्किल काम नही है। फिल्मों के माध्यम से यह आसान हो गया है। इसी प्रकार, आज के युग मे तमाम विकल्प मौजूद रहते हैं यदि इंसान प्रेरित है जनसंख्या नियंत्रण के प्रति, तो फिर pregnancy को रोक सकने में।

*तो फिर क्यों प्रशासन हमेशा तानाशाही वाले "सीधे" तरीकों पर मुहं टिकाये रहता है?*
होता क्या है कि प्रशासन की एक सच्चाई यह है कि हर युग मे, हर सभ्यता और देश मे, प्रशासन में अधिकतर लोग अयोग्यता से ग्रस्त रहते हैं। यह अयोग्यता उनके मध्य आराम से टैक्स के पैसे पर मिलती तनख्वाह की वजहों से पैदा हो जाती है। तो वह बैठे बैठे ऐसे बहानों को तलाश करते रहते हैं जहां वह अपनी अयोग्यता को छिपा लें, और सामने पड़ी विफलता की लाश का क़ातिल किसी ऐसे चीज़ पर आरोप लगा दे कि मानो यह तो तंत्रीय विफ़लता है, उनकी व्यक्तिगत नाकाबिलियत नही।

Why people should practise the intellectual yoga of participating in debates

There is one definite advantage of keeping yourself experienced with methods of debate - that, in order to outwit the opponent , you learn to foresee his likely onslaught on your arguments. This ability helps you improve on your own critical thinking . And then , you acquire ability to reason in a more balanced and robust manner - the kind which may save your decisions from failures as well as embarrassment due to  insufficiency. 


This is one single explanation why IT IS IMPORTANT TO PARTICIPATE IN DEBATES , as that helps in fostering intellectual abilities on oneself.


क्या लाभ मिलता है किसी इंसान को किसी वाद प्रक्रिया जैसे बौद्धिक योग में भाग लेना का ?


वाद प्रकिया में शमल्लित होना का अनुभव अर्जित करने एक सबसे प्रथम लाभ यह होता है कि - इंसान अपने प्रतिद्वन्दी को "खंडन-मंडन युक्ति" करते करते अपने स्वयं की बौद्धिक क्षमता का ऐसा विकास कर लेता है जो बौद्धिक कौशल जीवन पर्यान्त उसके संग रहते हुए उसके निर्णयों को विफलता से बचाने में सहयोग देते हैं, और जो कि उसको पूर्वज्ञान देते रहते हैं कि कैसे उसके निर्णयों का कोई विरोधी व्यक्ति खंडन-मंडन कर सकता होगा। इस प्रकार की बौद्धिक कौशल की विकसित कर लेने से इंसान का स्वयं का स्वमलोचनात्मक चिंतन प्रबल होता है। और इसके पर्यान्त आप स्वयं मंथन करने की ऐसी क्षमता अपने भीतर विकसित करने लगते हैं जो की आपके तर्कों को संतुलन और शक्तिशाली बनाते हैं - इस प्रकार वाले तर्क जो की आपके निर्णयों को विफलता से तो बचा ही सकें, संग में आपको किसी संभव मानहानि का पूर्वाभास दे दे की कौन से वाले तर्क कमज़ोर व अपर्याप्त हैं।


उपर्लिखित स्वयं में प्रयाप्त एवं पर्याप्त कारण है कि क्यों किसी व्यक्ति को वाद प्रक्रियाओं में भागीदारी देती रहनी चाहिए - क्योंकि, ऐसा करते रहने से उसके खुद की बौद्धिक क्षमता का विकास होता है।

Conform, Comply और Obedience में अंतर

Conform और Comply अंग्रेज़ी भाषा में दो शब्द हैं जिनका हिंदी भाषी अनुवाद बस एक ही होता है , "पालन करना"। मगर मूल भाषा अंग्रेज़ी में दोनों के अभिप्राय, connotation ,  बहोत भिन्न होते हैं।
Conform शब्द के अभिप्राय में एक स्व-चेतना भी होती है, जब इंसान स्वयं से ही समाज के मानकों को पालन करने की ईच्छा (या कहें तो मजबूरी) में किसी कार्य को करना चाहता है। जैसे कि, आम ग्रामीण भारतीय की अक्सर करके ईच्छा रहती है कि जीते-जी वह अपनी बेटी का ब्याह करवा दे। यह एक उदाहरण है comforming आचरण का, जिससे conform शब्द का अभिप्राय और comply शब्द के अभिप्राय में भेद ज़्यादा बेहतरी से समझा जा सकता है।

आगे, बेटी के ब्याह करवाने की तथाकथित अच्छी-भली ईच्छा में conforming आचरण में क्या बिंदु है, उसे समझने के लिए हमे थोड़ा आत्म-मंथन करना होगा -- ऐसा क्या है बेटी के ब्याह करवा देने में जो कि कोई इंसान जीते-जी करने की महत्त्वपूर्ण ईच्छा रखता है। इसके तमाम "कारण" बातये जा सकते हैं , जैसे कि
1) बेटी से अत्याधिक प्रेम, जिससे कि वह आगे सुखमयी जीवन जी सके।

2) किसी धार्मिक /सामाजिक उत्तरदायित्व को पूर्ण करने का सुखद बोध।

3) कोई पुराना वादा, कसम, वचन , इत्यादि।

अब अगर किसी दार्शनिक की भांति इन तमाम कारणों पर विश्लेषण करेंगे, तो आप पाएंगे कि सबसे उपयुक्त कारण , संख्या 2 ही है -- किसी धार्मिक/(अथवा सामाजिक) "उत्तरदायित्व" को पूर्ण करने का बोध।

कारण संख्या 1, मिथक कारण ही होगा, क्योंकि सवाल उठाता है कि फिर बेटे की शादी के ऐसा वजन क्यो नही लेता कोई इंसान ? सवाल, कि क्या गारंटी है कि शादी के उपरांत प्राणप्यारी बेटी को सुखमयी जीवन ही मिलेगा ? क्या दूसरी संस्कृति के लोग भी, वहां भी पिता अपनी पुत्री के ब्याह के लिए ऐसे ही संवेदनशील होते है? यदि नही ,तो फिर क्यों?

इन तमाम सवालों के पीछे जो अनन्तं अन्य सवाल दिखेंगे, वह यह एहसास करवा देंगे कि यह वाला कारण संख्या 1 अपने आप मे मिथक "कारण" ही है कि क्योंकि कोई इंसान अपने जीतेजी बेटी के ब्याह का इतना वजन लेता है।

ले-दे कर जो कारण स्थिर होगा, वह यही की प्रत्येक संस्कृति में इंसान कुछ न कुछ ऐसे सांस्कृतिक ईच्छा रखता है, जिसको वह पालन कर देने अपनी "स्व-चेतना" से करना चाहता अपने मित्र-सम्बन्धीयों की दिखना चाहता है। इसे ही conformity behavior शब्द से दर्शाया जाता है।

अब बात करते हैं comply शब्द की। comply शब्द में स्व-चेतना का तत्व विलुप्त होता है। comply करने में इंसान महज़ औपचारिकता को पूर्ण करता हुआ दिखना चाहता है, ताकि वह किसी संभावित राजदंड या राजा की दी गयी सज़ा से बच सके। जाहिर है कि comply शब्द सरकारी या कानूनी अनिवार्यता को पूर्ण करने संबंधित है, या की पालन करने संबंधित है।

तो एक साधारण शब्दकोष जी की अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद प्रदान करवाता है, वह सिर्फ detonation ही बताता है, यानी शाब्दिक अर्थ । मगर वास्तव में शब्द के बोध में connotation भी तत्व होता है, जो कि सांकृतिक ज्ञान के प्रकाश में ही समझा जा सकता है, शब्दकोश में उसे पकड़ना मुश्किल होता है।

इसी तरह एक और शब्द है, obedience, जो कि पुनः शब्दकोश में यही अर्थ देता है ,"आज्ञा पालन करना"।
मगर अपने connotation में इसके अभिप्राय में यह बोध है कि राजा या किसी पुजारी के आदेश का पालन करना, बिना स्वचेतना के प्रयोग के !

निजीकरण बनाम निगमीकरण विषय पर मेरी अर्थशास्त्र समझ

निज़ीकरण मुद्दे पर मेरे और आपके विचार पूरी तरह जुदा  हैं !! मैं घनघोर निज़ीकरण  के पक्ष में सोच रखने वाला व्यक्ति हूँ ! शायद इसीलिए क्योंइकि मेरी अर्थशास्त्र की बुनियादी जानकरी में service  और professional  के मध्य एक अंतर् माना गया है, और जो की समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकने की क्षमता के बाच दोनों ही वर्ग के अंतर को गहरा करता है । समाज की ज़रूरते प्रोफेशनल वर्ग पूर्ण करते हैं, सर्विसेज नहीं ।  और इसलिए संसाधनों पर स्वामित्व और नियंत्रण professionals का ही होना चाहिए, services  का नहीं । अतीत से लेकर आ तक, सभी तकनीकी कार्य, अविष्कार, अन्वेषण --professionals वर्ग से ही हुए हैं , services  से नहीं हुए है ।
तो यह मुद्दा सिर्फ नैतिकता का ही नहीं, बल्कि ज़मीनी जरूरत भी है की यदि समाज को तरक्की करनी है तो professional वर्ग को उसका अधिकार -- स्वामित्व का अवसर मिलना चाहिए । 

मैं यह समझता हूँ की क्योंकि आधुनिक भारत का जन्म उल्टे  तरीकों से हुआ हैं , जहाँ अँगरेज़ professional  वर्ग ने अपनी सेवा के लिए बाबू - clerks  बिठाये थे , आज़ादी की "दुर्घटना" के बाद वही upsc  के माध्यम से देश की नौकरशाही बन कर स्वामी बन गए , इसलिए सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया , और आज सत्तर सालों  में कई पीढ़ियां यही उलटी विधि को देखती हुयी इसी को "सही " समझने लगी है, इसलिए वह "निजीकरण" की विरोधी बानी हुई है ।  अन्यथा प्रजातंत्र का अभिप्राय तो अर्थशास्त्र विषय की दृष्टि से निजीकरण ही है, "निगमीकरण" तो साम्यवादी सोच है-- जिसमे  की उत्पादन  सरकारी बाबू के अधीन  कर के उन्हें "तनख्वा" दी जाती है, वह "इनाम" नहीं जमा कर सकते हैं अपने "स्व-प्रोत्साहित" (self motivated ) कार्य के लिए ।  प्रजातंत्र और "निगमीकरण " तो इतना ही बेमेल(immiscible)  है जितना की तेल और पानी !!

मेरी सोच के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को स्वतंत्रता चाहिए, अपने अधिकारों को हनन होने से बचाना है, तब फिर उसे अपने अधिकार अपनी ही पास रखने होंगे, सरकरी बाबू की मनमर्ज़ी और सेवा पर न्योछावर *नहीं* करने होंगे । तो फिर उसके समाज और प्रशासन को प्रजातंत्र व्यवस्था की और क़दम  बढ़ाने  चाहिए। और यदि प्रजातंत्र चाहिए , तब फिर निजीकरण करके अपने काम , सामाजिक आवश्यकताएं खुद अपने जिम्मे लेकर चलाना  सीखना ही होगा ।

भारत में चूंकि english  professional  class  (जो की ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग थे) उन्होंने सब तंत्र अपनी सुविधा और निजी हित  में बसाये थे, इसलिए professional  वर्ग प्रफुलती हो ही नहीं सका ! उल्टा, जो कुछ professional  वर्ग भारतीय सभ्यता में उपजा था, वह जातिवाद के भेंट  चढ़ कर "शूद्र" बन कर नष्ट होता चला गया है ।

services  और professional  की यह अर्थशास्त्र की कहानी अचरज भरी है, और लम्बी है ...

बरहाल , मैं  यह कतई  नहीं चाहूंगा , और न ही सुझवाव दूंगा की अब कोई भी स्वतंत्रवादी और प्रजातंत्र व्यवस्था का हिमायती व्यक्ति  "निजीकरण" का विरोध करे।

कठोर व्यवहार प्रबंधन पद्धति और भेदभाव का होना

एक कारण की भारत के कार्यालयों में श्रमिक या कर्मचारी आज भी जातपात या किसी भी अन्य कारणों से उत्पन्न भेदभाव , उत्पीड़न, इत्यदि का आरोप लगाते रहते हैं ,वह यह है की भारत में प्रबंधन के स्वाभाविक तरीके आज भी तानाशाही, क्रूरता और *कठोर नियंत्रण* व्यावहारिक क्रियाओं पर चलते हैं। ऐसे में, जहां *प्रजातांत्रिक प्रबंधन व्यवहार* नही होते हैं, वहां किसी न किसी के ख़िलाफ़ अन्याय होता ही है, जिसको बलि का बकरा बनाना आततायी प्रबंधन अधिकारी की आवश्यकता होती है ताकि वह अपने "श्रेष्ठ प्रबंधन नीति" के उदाहरण प्रस्तुत करके अपनी "श्रेष्ठता" सिद्ध कर सके।

द्वितीय, की " *कठोर* " प्रबंधन व्यवहार नीति में न्याय के बुनियादी सिद्धांत - कार्यकारणी शक्ति और न्यायायिक शक्ति का विभाजन- इसका पालन नही किया जाता है। *No Separation of Executive function and judicial function* .

" *भारतीय कठोर व्यवहार प्रबंधन पद्धति*" क्या है ?

-- जिसके पास किसी कार्य करने की शक्ति दी जाती है, उसी को आदेश के उलंघन होने पर दंड की शक्ति स्वतः दे दी जाती है। दुनिया के न्यायायिक मानकों में इस परिस्थिति में अब तो अन्याय होना स्वतःस्फूर्त मान लिया गया है।

" *कठोर व्यवहार* " प्रबंधन नीति में " *क्रमिक न्याय* "( _hierarchical justice_ )  का ही पालन होता है, अन्यथा कोई भी प्रबंधन अधिकारी कठोर होने की हिमाकत भी नही करेगा। तो फिर ज़ाहिर है की boss (वरिष्ठ अधिकारी) को हमेशा सही होना है, और अवर अधिकारी को ही ग़लत होना है। इसमे *प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों* (principles of Natural Justice) का पालन नही किया जा सकता है।

तो फिर अब भेदभाव होता है , वरिष्ठ प्रबंधन अधिकारी के व्यवहार प्रियवर और अप्रियवर सूची के अनुसार बदलते रहते हैं ,  दोस्ती -दुश्मनी , "ego" समस्याएं स्वतः जन्म ले ही लेती हैं -- मूल कारण # *कठोर_व्यवहार* प्रबंधन पद्धति है।

https://thewire.in/caste/intelligence-bureau-discrimination-harassment

स्वतंत्रता नष्ट कैसे होती है

*आज हम स्वतंत्रता दिवस तो मना रहे हैं, मगर क्या हम यह समझते हैं कि स्वतंत्रता ख़त्म किन तरीकों से होती है ?*

स्वतंत्रता ख़त्म होती है जब प्रजातंत्र पद्धति नष्ट होने लगतीं हैं।
प्रजातंत्र नष्ट होते है जब सैन्यवाद (militarism) को बढ़ावा मिलने लगता है।
सैन्यवाद बढ़ता है जब राष्ट्रवाद बड़ी सामाजिक शक्ति बनने लगता है।

स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद के बीच विपरीत संबंध होता है। और इन दोनों के मध्य की कड़ी प्रजातंत्र पद्धति और सैन्यवाद है।

जीवन मे अन्वेषण का महत्व ....भाग 2

हालांकि कई सारे खोजकर्ता ऐसे भी रहे हैं जिनकी thoery को उनके जीवनकाल में दुनिया ने कभी भी स्वीकार नही किया, अपितु उनके गुज़र जाने के सेकड़ो सालों बाद दुनिया को उनकी महान खोज में सत्य के दर्शन हुए। ऐसे खोजकर्ता अपने जीवन में तो ट्रासाडियों से मुक्त नही हो सके, बस इतिहास के पन्नो में ही उन्हें स्मरण किया गया है। वैज्ञानिक क्षेत्र में बिजली (विद्युत) पर अन्वेषण करने वाले निकोलस टेस्ला का वाक्या इसका उदाहरण है। उस काल मे विद्युत के इतने सर्वभु उपयोग का आंकलन किसी ने नही किया था, और इसलिए उनके अन्वेषण पर इतना ध्यान नही दिया गया। edison के बल्ब बना देने के बाद ही दुनिया को टेस्ला के विद्युत के अपर उपयोग दिखाई पड़े थे। एडिसन के बल्ब ने आरम्भ में दुनिया मे धूम मचाई थी। टेस्ला के खोज को दुनिया बहोत बाद में आकर्षित हुई और उपयोग समझ सकी।

जीवन मे अन्वेषण का महत्व, रहस्यों को सुलझाने के प्रयासों के जीवनदायी लाभ

बहरूपिया अक्सर करके पकड़े जाने पर तिकड़म यह लगाते हैं कि वह असल पर ही नक़ली होने का आरोप गढ़ देते हैं।

यह दुनिया मिथिकों से भरी हुई है। सभी कुछ किसी षड्यंत्र की वजहों से नही है। बल्कि इसलिए भी है कि सत्य हर एक के लिए अलग अलग विधमान होता रहता है। तो हर इंसान सत्य का अवलोकन अपने अनुसार करता है, और उसे दुनिया मे प्रसारित करता रहता है। नतीजे में यह  दुनिया तमाम किस्म की कथाओं (narratives) से भर गई है। 

इस बीच में कुछ वाकई के आपराधिक मनोअवस्था वाले लोग भी हैं। जो कि दुनिया मे सत्य की इस मुश्किल परिस्थिति का फ़ायदा उठा कर जनता को बेवकूफ बनाते है , सिर्फ मुद्रा लाभ के लिए। तो यह लोग और दिलचप्सी रखते हैं कि सत्य थोड़ा और रहस्यमयी, और ओझल बना रहे।

लेकिन अंत मे सत्य की तलाश वही कर सकता है जो तमाम किस्म की बौद्धिक कबलियतों को अपने अंदर विकसित कर सके। और फिर जो सत्य को प्राप्त करता है, सत्य के जितने नज़दीक जा पाता है, वही जीवन की त्रासदियों से मुक्ति प्राप्त करता है, वही ईश्वर को तलाश कर पाता है, वह सुखी और समृद्ध बनता है, मोक्ष को भी पाता है।

सत्य की तलाश के लिए बौद्धिक कौशल भी चाहिए ही होता है। इसके बिना तो आप जीवन मे उचित निर्णय ,सही समय पर , सही दिशा में ले ही नही सकते है। 

तो सत्य की तलाश कर सकने वाला बौद्धिक कौशल कैसे विकसित किया जाता है  ?

रहस्यों को सुलझाने से। अबूझ, अंधकार, अज्ञात, अंतरिक्ष मे शोध करने से। अपने इर्दगिर्द घूम रही तमाम षड्यंत्रकारी theories के ऊपर सत्य के प्रकाश को डालने से।

जी है। जो कौशल रहस्यों को सुलझाने में विकसित होता है, वह बुद्धि में यह काबलियत भी देता है कि सत्य को तलाश कर सके। 

बचपन मे जो पहेली सुलझाने के खेल हुआ करते थे, रहस्य को सुलझाना उसी खेल का वयस्क रूप है।

रहस्यों को सुलझाना किसी स्कूली किताब को हल करने से बहोत अलग होता है। क्योंकि स्कूली किताब में तो आपको यह जानना बहोत आसान होता कि आपका निकाला हुआ समाधान सही है या नही। आप झट से किताब के पीछे के अंश में उत्तर तालिका  से यह मेल करके पता लगा लेते है।

मगर रहस्यों को सुलझाने में कोई उत्तर तालिका  नही होती है। तो फिर आपको अपने ही दिए समाधान के सत्य होने के प्रमाण भी खुद ही विकसित करने पड़ते हैं। और उन प्रमाणों के संतुष्ट होने की पद्धति भी आपको खुद से ही विकसित करनी पड़ती है।

यह सब ही शोध कहलाता है। आप कोई हाइपोथिसिस बनाते है। उस hypothesis की जांच के लिए कुछ प्रयोग (experiments) विकसित करते है। उन experiments से निष्कर्ष निकालते हैं। निष्कर्षों के मेल अपने hypothesis से करवाते हैं। कुछ हद तक मेल होते हैं, कुछ कमियां अभी भी रह जाती हैं। यह निर्णय भी आपको अपनी संतुष्टि से ही करना होता है कि आप खुद को कितना सफ़ल मानते हैं अपने experiments से। फिर आप ही उस hypothesis से कोई theory बना देते हैं । और यदि पूर्ण संतुष्टि महसूस होती है, तब आप एक law (नियम) की ही खोज करके नींव डाल देते है। फिर आप अपनी इस समुचित खोज को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करते है, अपने एक दावे (claims) के रूप में । दुनिया को आमंत्रित करते हैं कि वह भी आ कर जांच करे, आपको आपकी कमियां बताए, आलोचना करे, समीक्षा करे, और अपने खुद के मत के अनुसार स्वीकृत या अस्वीकृत करे।
यह सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही इंसान को महसूस होता है कि अब वह सत्य को शायद कुछ हद तक चिन्हित कर सके। तभी उंसमे दुनिया की आखों में आंख डाल कर बात करने का आत्मविश्वास आता है।
और यदि उसकी theory वाकई में सत्य के नज़दीक पहुंचती है, तब उसका सबसे बड़ा प्रमाण तो उसके खुद से जीवनमुक्ति में से मिलता है। वह त्रासदियों से मुक्त होने लगता है।

The Sea Stabilization debate around Marine Radars

The problem of human mind is its tendency to become fixated with any IDEA that it receives with overwhelming emotions.

Even as the young seafarers started to understand the importance of the STW (Speed through Water) feed to the ARPA for the purpose of Collision Avoidance , the debates around HOW and WHY such action is important , it seems to be leading TO A FIXATION among many young seafarers so much that they seem to be becoming oblivious of the importance of the SOG (speed over ground) Feed to the ARPA !!

Debating often tends to create the Fixated Advocacy of some idea, so much that people begin to judge the purpose and utility of an idea exclusively with respect to what FIXATION they bear in their minds.

The STW Data Feed on the ARPA seems to generate one such incidence. The advocacy of the 'STW Vs SOG' Debate leads, at one point, to discuss the TCPA and CPA. Theoretically, the TCPA and the CPA will not be affected whether a RADAR is fed with STW or the SOG. This condition leads many of the young seafarers into thinking that SOG is a wasted information, and it bears no connection with the calculation of the TCPA and the CPA.

But this is farther from the truth. This is because, there is an INVISIBLE underlying ASSUMPTION  whenever one says that the TCPA and the CPA Data is not affected by the use of STW or SOG, no matter what. The assumption is that Speed and Course of all the ships, Ownship and the Target Vessel, both are constant !!

Once you understand this deceitful assumption, you might be drawn to understand how the SOG feed to the ARPA is essential in order to "judge" the TCPA and CPA .

Notice that quotation marks around the word JUDGE . The word, "Calculate" has been deliberately avoided.

It seems that focus will have to be shifted towards discussing the importance of feeding the SOG to the ARPA in 'judging' the TCPA and the CPA, and also its use in the APRA technology which is handling multiple targets at any single instance.

The single most important reason for why  you would need your ARPA to receive the SOG (Speed over ground) feed from another Equipment, (let us say the GPS) is that you first "judge" whether the target is Stationery or Moving .
Well, Why do you want such a judgement?
Because you would not like to look foolish applying your ROR against a "target" which may later turn out to be a Light house, or a Buoy, or a isolated Rock !

The STW feed to ARPA will not help you realise which object is Stationery and which is moving.
But, Once you have this basic sense , it is now that you begin to judge what ROR you will apply.

Of course you may switch the feed further at your convenience to do the rest.

SOG Feed is needed in the ARPA for Navigation purpose , although not for Collision Avoidance.


______

I wish to highlight the issue that even SOG Feed has a utility in the determination of risk of Collision.


Let's say, how the SOG helps make distinction between which targets are moving and which are Stationery .


SOG Feed has utility in Trial manoeuvres,


For Determination of Risk of Collision -------> Speed over Ground 


For Action to avoid Collision ---------> Speed Through Water .


Distinction is being made in the two stages

Stage 1 : Determination of Risk of Collision 


Stage 2 : Determination of the Action to avoid Collision.


Ok?

भारत की हज़ारों वर्षों की ग़ुलामी के अलग अलग root cause analysis

ऐसा क्यों हुआ की भारत भूमि ने विभीषण पैदा किये, जय चाँद पैदा किया , मीर जफ़र पैदा किये , मगर कमांडर नेल्सन नहीं ?

भारत के पश्चिमी राज्यों में यह समझा जाता है की भारत देश को हज़ारों वर्षों की ग़ुलामी, हर एक आक्रमणकारी के हाथों शिकस्त और उत्पीड़न इस लिए देखना पड़ा क्योंकि यहाँ गद्दार पैदा हुए थे, जबकि भारत हर जगह श्रेष्ठ था ।

root-cause-analysis  अपने आप में एक पूर्ण साधना होती है, वैज्ञानिक चिंतन शैली में । cause and  effect  के बारे में तो सभी ने पढ़ा-सुना हुआ होगा । मगर  क्या आपने कभी यह एहसास किया है कि आपके आसपास में मौजूद व्यक्ति समूह हर कोई एक ही तःथ्यों से लबाबोर घटना में अलग-अलग cause का निष्कर्ष निकालता है ।

और फिर जब हर एक के cause  अलग-अलग  होते हैं , तब फिर उसके 'गुन्हेगार',( - Culprit ), भी अलग होते हैं, सज़ाएं भी अलग किस्म की होती हैं, इलाज भी अलग ही होते है ।

बड़ा सवाल है की यह कैसे पहचान करि जाएगी की इतने तमाम causes  की सूची में से सटीक वाला कौन सा है, जिसको यदि सत्य मान कर इलजा किया जायेगा तब effect (या नतीजे ) प्राप्त होंगे वह हितकारी और संतुष्टि देने वाले होंगे?

किसी भी उद्योगिक दुर्घटना और किसी भी अन्वेषिक अपराध के दौरान जांचकर्ताओं को जिस प्रकार की माथापच्ची से गुज़रना पड़ता हैं, और यह माथापच्ची उनके चिंतन में जो कबलियत विक्सित करती है, यह वही है जो की root  cause  analysis  कहलाती है, और जो की तमाम किस्म के causes  की सूची में से सत्यवान cause  की शिनाख्त करने में योगदान देती है ।
आप में से कोई भी व्यक्ति चाहे तो अपने अंदर यह चिंतन विक्सित कर सकता है किसी भी Conspiracy Theory  या किसी भी Mystery को सच्चे दिल से खोज करने से ।

खोज यानि अन्वेषण करने का इंसानी चिंतन पर सबसे बड़ा प्रभाव और योगदान यही होता है -- कि, खोज करने से इंसान को दिमाग की root  cause  analysis  की क्षमता सुदृढ़ करने का अवसर मिलता है । और फिर जो व्यक्ति root  cause  analysis  सही से  सकता है , वही cause  and effect  क्रिया के दौरान सटीक वाले cause  को पहचान करके बताता हैं, और फिर समाधान भी उचित देता है जिसके प्रभाव स्वयं सिद्ध हो जाएं । वरना इंसानो का क्या है कि  झूठे या मिथक causes  को पकड़ लेते हैं और फिर समाज को अनंत सालों  तक के लिए सत्य से दूर भटका करके  उसी एक समस्या से ग्रस्त कर दते  हैं, समस्या को ला-इलाज बना देते हैं ।

इंसान चाहे 'भक्त' दर्शन को हो , या नास्तिक चिंतन शैली का , उसने अपने आसपास की घटनाओं का  analysis  करके cause  and effect  को तैयार सदैव किया है । जब water cycle  नहीं पता थी, तब 'भक्त दर्शन' में बारिश बरसने के cause  यह हुआ करते थे की गणेश भगवान अपनी सूंड़ उठा कर बारिश करते हैं, या की इंद्र देव् बारिश करते हैं । गाय पशु सांस लेते समय oxygen छोड़ती हैं, यह वाली समझ भी अपने किस्म की cause  and effect  सोच का ही नतीजा है , यह दूसरी बात है की इस तरह वाली सोच ने हवा में से oxygen की खोज और पहचान नहीं करि थी । यानि 'भक्त' सोच सही है या ग़लत , इसका असली प्रमाण उस सोच में से निकलते प्रभाव खुद-ब-खुद दे देते हैं ।

सत्य की अंत में पहचान यही होती है -- कि, वह खुद से जो कुछ प्रभाव उत्पन्न करता है, वही सभी लोगों के मन को संतुष्टि दे कर अपने सत्य होने का एहसास करवा देता है ।
सत्य स्वयंभू होता है, और इसलिए हिन्दू दर्शन में सत्य को शिव भगवन भी माना  गया है

तो यदि मूल कारण - cause,  कि,  क्यों यह देश हज़ारों सालों  की ग़ुलामी में गया , और हर एक आक्रमणकारी के हाथों शिकस्त देखता रहा, यदि यही है की गद्दार पैदा हुए है , तब फिर ग़द्दारी  का ईलाज  से शायद समस्या का इलजा हो जाना चाहिए भविष्य काल में  भी । ग़द्दारी का क्या इलजा होगा ?-- कि गद्दार को कड़ी से कड़ी सज़ा  दो -- सभी के सामने , बीच चौराहे पर --ताकि भविष्य में कोई गद्दार पैदा ही न हो । या की सभी नागरिकों पर aadhaar card जैसा surveillance बैठा दो की गद्दारी करने की सोचे भी, तो पकड़ा जाए।

या फिर आप चाहो तो गद्दारी को root  cause  न मानो, बल्कि सामाजिक अविश्वास को cause मान लो। तब अब सामाजिक अविश्वास का ईलाज  करोगे। इसमें आप न्याय सूत्र और न्यायिक प्रक्रिया के सुधारों पर ज़ोर  दोगे, की आपसी अविश्वास ही परस्पर सहयोग को बंधित करता है।  परस्पर अ-सहयोग , या अविश्वास लिए उत्पन्न होता है क्योंकि समाज यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था नहीं देता है की किसी अमुक व्यक्ति को वैसे हालातों में वही सुविधा या वही ईनाम  दिया जायेगा ।
यह दूसरा वाला जो cause  हैं, यह वही है  क़ि भेदभाव और जातपात , favouritism , nepotism  से भी  जुड़ता है। तो फिर ज़ाहिर है की जो लोग भारत भूमि पर  जातपात के  इतिसाइक तथ्यों को  स्वीकार नहीं करते  हैं, वही लोग देश की हज़ारों वर्षों की ग़ुलामी के causes  को गद्दारी से जोड़ते है, सामाजिक अविष्वास और न्याय सूत्रों की खामियों से नहीं ।

निजीकरण विषय मे भारत की जनता में मतविभाजन

देश इस समय निजीकरण विषय पर दो वर्गों में विभाजित है।

एक मत के अनुसार निजीकरण नही किया जाना चाहिए (रलवे , इत्यादि का) और उसे यूँ ही सरकारी रेलवे विभाग के हाथों सौंप कर चलते रहने देना चाहिए। यह *समाजवादी* सोच के लोग है। *समाजवाद* में सरकार ही व्यापारिक संपत्ति की स्वामी होनी चाहिए।

और दूसरे मत के अनुसार आम नागरिक को उसका अधिकार मिलना चाहिए, अपनी जरूरत और अपनी जिंदगी खुद से चलाने का। तो व्यापार के अधिकार भी उसे मिलने चाहिए। उसको हर एक क्षेत्र में व्यापार का अवसर मिलना चाहिए , कुछ बुनियादी क्षेत्र छोड़ दें तो - राष्ट्रीय सुरक्षा, बुनियादी रोटी, कपड़ा, मकान और चिकित्सा को। यह *निजीकरण* का वर्ग है , जिसको *समाजवादी* सोच में अक्सर *"पूंजीवादी*" के आरोपी नाम से पुकारा जाता है। (चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए हम यही नाम प्रयोग करेंगे , " *पूंजीवादी* " , हालांकि कोशिश करेंगे कि इस नाम के अभिप्राय में संयुक्त आरोप से खुद के चिंतन को मुक्त रखते हुए दोनों पक्षों को बराबर की सुनवाई दें।)

समाजवादियों के अनुसार व्यापार के ऊपर सरकार का स्वामित्व होना चाहिए। सरकार अभी तक UPSC द्वारा चयन किये गए अपने नुमाइंदों को व्यापार और उद्योगों में सीधे chairman या deputy chairman जैसे पदों पर नियुक्त करती थी, और वही उस *उपक्रम* का संचालन करते थे।

पूँजीवाद वर्ग के आरोप हैं कि यह पद्धति *लाल फीताशाही* थी, इसमे किसी का भी निजी स्वार्थ नही था, जिसके चलते इस तरह उन उपक्रम का कोई माई-बाप नही होता था। सब अपने अपने मनमर्ज़ी से चलाते थे, अपना निजी फ़ायदा ही देखते थे, और बस अपनी तनख्वाह की ही परवाह करते थे कि हमे हमारी तनख्वाह मिल जाये, बाकी फिर व्यापार को सुधारने, नवीनकरण, उद्योगिक स्पर्धा , इत्यादि में कोई दिलचस्पी नही रहती थी किसी की। इससे कुल मिला कर आम आदमी ही त्रस्त होता था, जबकि उवक्रमों में ऊंचे पदों पर बैठे यह upsc वाले नौकरशाह तो टैक्स की तनख्वाह से मज़े में जीते रहते थे, सरकारी खर्चे पर।

प्रजातंत्र के अधिकारों का अंत मे हनन हो होता था। अगर संविधान में चिकित्सा के मौलिक अधिकार दिए भी हैं तो क्या,? सरकारी अस्पताल इस लायक कहाँ थे कि उनके भीतर कोई इलाज़ करवाने जाने की सोचे।
तो यदि वाकई में नागरिक को अपने अधिकारों को बचाना था, तो फिर उसको अपने आप से अस्पताल से लेकर train उद्योग चलाने, हवाईजहाज उद्योग चलाने की आज़ादी मिलनी चाहिए।

विदेशों में जहां भी प्रजातंत्र सफल हैं, वहां निजीकरण ही उसका कारण है। यदि नागरिक को अपने अधिकार चाहिए, तो फिर उसे खुद से यह सब उद्योग चलाने के कौशल भी आने चाहिए। आप सरकारी नौकरशाह को हर जगह बैठा कर , उसको शक्ति देकर अपने अधिकारों को हनन करने के मार्ग प्रशस्त ही क्यों कर रहे हैं?

तो ऐसा समझा गया है कि प्रजातंत्र का निजीकरण से स्वाभाविक जोड़ है। सरकार को मानक निर्धारण या विवाद सुलझाने तक ही कार्य सौंपने चाहिए। बाकी फिर आम नागरिक को खुद से ही यह सब चलाना भी सीखना होगा, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को प्रोत्सहित होने के माहौल बनने देने होंगे, यदि गुणवत्ता भी चाहिए तो।

सरकारी करण का सीधा अर्थ है गुणवत्ता की स्वाहा करना।

तो सरकारीकरण को प्रजातंत्र से मिश्रण करना एक आधारभूत मिथक विचार था, क्योंकि दोनों immiscible हैं, तेल और पानी के समान।

आज़ादी से 1993 तक समाजवाद ही चलता रहा था।

देश की दोनों ही बड़ी पार्टियां इस समय निजीकरण की पक्षधर बन चुकी हैं।

निजीकरण के विरोधी सिर्फ उत्तर भारत की छोटी क्षेत्रीय पार्टियां ही बची हैं, और बंगाल के वामपंथी पार्टियां।

इससे होगा यह कि अंत मे निजीकरण को रोकना मुश्किल हो जाएगा, और निजीकरण के समथर्क वर्ग उसका फायदा लेते हुए तेज़ी से बिकते हुए उद्योगों को खरीद कर उसका स्वामित्व ग्रहण कर लेंगे। जो विरोध कर रहे होंगे, वह विरोध करते करते यूँ ही खड़े रह जाएंगे, सिर्फ नौकरियों को मांग करते हुए।

अंत मे समाजवादी वर्ग नौकरीपेशा के लायक ही रह जाएंगे, और समर्थक वर्ग पैसे वाले, धनवान वर्ग। वही फिर मीडिया और सरकार को भी खरीद लेंगे और चलाएंगे।

समाजवादी लोग के नेता अन्त में एक दलाल में तब्दील हो जाएंगे। वह केंद्र सरकार के निजीकरण को न तो रोक सकेंगे, और न ही गुणवत्ता से अपनी प्रादेशिक सरकार को चला सकेंगे। कुछ अन्य मुद्दों की बदौलत हवा देकर यदि वह सरकार बना भी लेते हैं तब भी लंबा टिकना हर बार मुश्किल ही होगा। जो पैसे वाले वर्ग होंगे, वह कैसे भी कर के जनता को लुभा ही लेंगे।

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