The system of Democracy is not meant for non-market people

Democracy as a system is not meant for two class of people - the farmers and the soldiers
(Actually the soldiers are just an extended job of the farmers of the olden era of mankind.)
The system of Democracy is simply not designed for the agriculturalists class -- this includes all such people who do NOT engage in the Market activities for earning their means of suvival. It is not that the agricultural produce is not required by the society , but then the method of transacting the produce by socialist means is just what the Democracy despises.

These are the people who have failed to create a space for themselves in markets. Anyone who fails to create the market-space is surely going to be a loser in the Democractic system of Governance.

आरक्षण नीति के प्रति आकर्षण पर लाभर्ती वर्ग की आलोचना

पिछड़ों और दलितों की आलोचना भी जम कर करनी होगी। इसलिए क्योंकि यह लोग और इनके "बुद्धिजीवी" अपना सारा दम आरक्षण नीति के इर्दगिर्द लगा रहे हैं, न कि खुद को - अपने समुदाये को- एक व्यापारिक शक्ति में तब्दील करने में।
यह युग व्यापार का ही युग है। और आरक्षण नीति एक साम्यवाद मानसिकता से प्रवाहित होती है। आरक्षण नीति को समर्थन देने का मतलब है कि आप निजी उद्यम को अभी भी प्रजातन्त्र का मुख्य आर्थिक इंजिन समझने में अल्पबुद्धि हैं। आप अभी भी "लोकसेवा " के जंजाल में फंसे हैं, जो कि हमारे देश मे अथाह भ्रष्टाचार , सामाजिक त्रासदियों, और व्यवसायी कौशल की कमी के असल अभियन्ता वर्ग है।
दलित और पिछड़ा वर्ग वह वर्ग है जिसके पास व्यवसायी कौशल होता है। यह वर्ग हाथों के काम मे धनी है, बनस्पत ब्राह्मणों के जो कि कलम और बुद्धि कार्यों में तेज़ होते है। या की बनिया माड़वाड़ी वर्ग, जो कि हेंकड़ी गिरी से श्रमिक शोषण और कमीशन-खोरी से ही खाता आया है।
विदेशों में उनके देश को उद्योगिक प्रधानता उनके व्यसायिक वर्ग ने दी है। हमारे यहां पहले तो कौशल-कार्य करने वाला वर्ग सामाजिक शोषण का शिकार हुआ। और अब आज़ादी के बाद आरक्षण नीति के माध्यम से खुद को खुद की कुबुद्धी का शिकार बना रहा है, अपनी संतानों को "लोकसेवा" की "पढ़ाई-लिखाई" के लिए प्रेरित करके, बजाए की कौशल विकसित करके वह उद्यम करे और अपने समुदाये की राजनीतिक शक्ति के माध्यम से व्यापार में अपनी पकड़ बनाये। 

वास्तव में "पढ़ाई लिखाई" के विकास का इतिहास भी यह है की "पढ़ाई-लिखाई" खुद कार्य-कौशल यानी professional skills को सुधार करने और तीव्र करने के दौरान सामाज में जन्म ले सकी थी। आज भी "पढ़ाई-लिखाई' में समाज और इंसान की तुरन्त आवश्यकता को पूरा करने वाले पाठ्यक्रमों को professional courses केह कर पुकारते हैं।

पिछड़ा और दलित वर्ग आज भी कौशल जानते हुए भी व्यापार का स्वामित्व नही जमा सका है, न अपने कार्य-कौशल को जटिल बना सका है, बल्कि एक श्रमिक बन कर रह जाता है। और इस तरह वह वर्तमान में वापस शोषण का शिकार वाला वर्ग तब्दील होता जा रहा है- इस बार श्रमिक शोषण का शिकार। व्यापारिक वर्ग तो पहले से ही व्यापार में था, और अब अपनी राजनैतिक शक्ति के माध्यम से पब्लिक कॉन्ट्रैक्ट में अपने वर्ग को जमाते हुए वापस अधिकाधिक अमीर होता जा रहा है, जहां और भी बे-रोक-टोक श्रमिक शोषण कर रहा है। 
पिछड़ा और दलित वर्ग में निजी उद्यम संबंधित एकाग्रता अभी तक पनप नहीं सकी है। क्योंकि इनका "बुद्धिजीवी" हमेशा इनको जिस राजनैतिक एकता के लिए आह्वाहन करता है, उसका केंद्र होता है आरक्षण नीति, बजाए आर्थिक शक्ति में तब्दील होने के लिए निजी उद्यम। 
आरक्षण नीति इसकी विशाल जनसंख्या को श्रमिक शोषण से नहीं बचा सकती है, और न ही हमारे देश और समाज को विज्ञान और तकनीक में अव्वल बना सकती है।
कई सारे भारतीय समझते हैं कि विज्ञान और तकनीक में हमारे देश को अग्रिम बनाने के लिये वैज्ञानिक अनुसंधान और शोध के संस्थान बनवाने होंगे। जबकि विकसित देशों के आर्थिक इतिहास के ज्ञान से यह समझ आता है कि व्यावसायिक कौशल के बाजार आवश्यकताओं में से वैज्ञानिक और उद्योगिक अनुसंधान और शोध खुद प्रवाहित हुआ था, तब जा कर वह देश विज्ञान में अग्रिम हो सके।
यानी हमारे देश मे हमने इतिहास को उल्टा पकड़ रखा है। हम पहले वैज्ञानिक शोध करवाना चाहते हैं, और फिर व्यावसायिक कौशल को अनदेखा करते हुए, सीधे व्यापारिक लाभ प्राप्त करना चाहते है।
जबकि दूसरे देशों में पहले व्यावसायिक कौशल आया, फिर वैज्ञानिक अनुसंधान, अन्वेषण ; और फिर व्यापारिक लाभ।
 *हमारे दलित और पिछड़ा वर्ग के चिन्तको को अपनी दृष्टि विश्व आर्थिक इतिहास के प्रति दीर्घ करने की ज़रूरत है।*

लोक सेवा आयोग का भारतीय मूर्खतन्त्र में योगदान

बड़ा सवाल है कि जो व्यक्ति दिन-रात एक करके मेहनत से पढ़ाई करता है और IAS/IPS बनता है, तो क्या वह इतनी मेहनत समाज सेवा में योगदान देने के लिए कर रहा होता है?
ज्यादा बड़ी गड़बड़ है। यह कि देश मे आर्थिकी ज्ञान और सम्बद्ध चेतना कमज़ोर है। लोग *सेवा* (services) और *व्यवसाय* (profession) को एक ही विचार के पर्यायवाची शब्द समझते हैं। यह दिक्कत सिर्फ आम आदमी की नहीं है, बल्कि सेना और लोक सेवा में बैठे बड़े-ऊंचे पद के अफसरों की भी है।
  नतीज़ों में इन लोगों ने तंत्र को मरोड़ दिया है, शायद अपने निजी स्वार्थ हितों में । यहाँ *सेवादारी* ज्यादा आर्थिकी लाभ का कार्य हो गया है *व्यवसायों* से । क्योंकि सेवादारों की आमदनी टैक्स दाताओं (कर दाताओं) से आती है, इसलिए यह लोग एक सुनिश्चित आय का भोग करते हैं। दूसरा, की निजी कंपनियों में जहां आय में वृद्धि कपंनी के मुनाफे से जुड़ती है, और इसलिए market force पर निर्भर करती है, वही सरकारी सेवादारों की आय में वृद्धि भी सुनिश्चित है --प्रतिवर्ष वार्षिक वृद्धि, एक निश्चित क्रम में पदुन्नति पर  वृद्धि, हर पांच वर्ष पर pay आयोग से महंगाई आने पर वृद्धि, हर तीन या छह महीनों में महंगाई भत्ते से वृद्धि।
और बड़ी बात, यह सब सुनिश्चित है, इसमे market force की अनिश्चितता का कोई स्थान नहीं है।
तो फिर क्यों न एक चपरासी के पद पर 7 हज़ार आवेदन मिले, और वह भी पीएचडी से लेकर इंजीनियर, एमबीए डिग्री वाले !
वास्तव में आर्थिक तंत्र और लोक सेवा में भिन्नता होती है, और इनके बीच जोड़ने के पुल होते है। मगर भारत के लोक सेवा में बैठे मुरखनंद "बुद्धिजीवियों" ने या तो अज्ञानता वश या फिर अपने स्वार्थ में सब आर्थिक शास्त्र की नागरिक चेतना गोलमाल कर दी है। हर जगह आईएएस और आईपीएस ज्यादा उच्च आय और लाभदायक पदों पर बैठे है, जबकि इसका आर्थिक उत्पादन से एक पैसे का संबंध नही होता है। और प्रोडक्शन के मूल जनक , व्यवसायी (professional) का प्रशासन तंत्र में कोई मूल्य नहीं है।

शायद आपको विश्वास न हो, मगर सच शायद यूँ है कि यह गड़बड़ झाला उल्टापुल्टा भी संविधान निर्माताओं की अज्ञानता का  नतीज़ा है।
कैसे?

इसको भी समझने के लिए आपको सामाजिक और इतिहास का ज्ञान उधेड़ना होगा। मगर फिर वही, कि भारत की आज़ादी की लड़ाई और मुग़लों, पुराणों का नहीं। बल्कि पश्चिमी देशों का। दरअसल भारत का संविधान और कानूनों को समझने के लिए आपको ब्रिटेन का सामाजिक इतिहास अधिकः पढ़ना चाहिए, भारत का नहीं।

बरहाल,
लंदन शहर का इतिहास इस विषय में रोचक बातों पर प्रकाश डालता है। वहां आरंभ Thames थेम्स नदी के किनारे में व्यवसायी बिरादरियां थीं (professional communities)। यह बिरादरी कहाँ से आई? दरअसल इनका उत्थान हर एक समाज मे स्वतः हुआ है। भारत मे भी हुआ, हालांकि वह सब जाति और फिर जातिवाद के परवान चढ़ गईं। जैसे कि ब्रिटेन में चमड़े के कार्य करने वाली बिरादरियां hidesmen कहलाये, भारत में बेचारे "चमार" कहला कर समाज से बहिष्कृत होते चले गए।
मगर ब्रिटेन में क्या हुआ?
इस तरह की बिरदारियों के काम और टैक्स योगदान से राजा प्रभावित हुआ और राजा और बिरादरी , दोनों के मध्य करार(royal charter) हुए। राजा से इन्हें शाही अनुबंध किये और अपने बसने के लिए थेम्स नदी के तट पर जमीन ले ली। वहां जो शहर खास अपने लिये बसाया , वही आरंभिक londinium शहर कहलाया। तमाम बिरादरियां आसपास में सह निवास करती थी। कारण था कि किसी भी सम्पूर्ण उपभोग-योग्य उत्पाद के निर्माण में कौशल कई किस्म का लगता है। और हर एक बिरादरी के अपने अपने कौशल थे, जिसमे की वह माहिर होते थे। तो आपसी सहयोग और कौशल का आदानप्रदान आये दिन की आवश्यकता होती है। नज़दीक में निवास करने से यह ज़रूरत की पूर्ति होती है।
जान कर शयाद आप अचंभित हों, मगर इन बिरदारयों और राजा के बीच जो royal charter, उसके तहत राजा की इनके शहर में स्वतंत्र आने पर प्रतिबंध की शर्त भी थी। और जो कि आज तक वहां का सम्राट निभाता है! यानी खुद ब्रिटेन के शीर्ष , उनके सम्राट , को ही अपने ही देश की राजधानी , लंदन के केंद्र में बसे प्राचीन london, (पूर्वकाल londinium) में प्रवेश करने से पूर्व अनुमति लेनी होती है!
है न लाजवाब जानकारी!
Londinium में बसे इन प्राचीन व्यवसायी बिरादरियों की सफलता से शहर के इर्दगिर्द वहां वणिज्यकी (commerce/trade) में बढ़त हुई। इससे शहर की आबादी बढ़ती चली गयी, और शहर का भू क्षेत्र भी फैलता चला गया। प्राचीन शहर के आसपास में नया शहर बस गया greater london नाम से, जिसे की संक्षेप में london पुकारते हैं।
आज यह नया शहर लंदन की स्थानीय municipal सरकार अलग होती है, जिसका अध्यक्ष mayor कहलाता है, और पुराने शहर की स्थानीय सरकार city of london corporation कहलाती है, जिसका अध्यक्ष इन्हीं बसी हुई तमाम बिरादरियों के शीर्ष में से कोई एक बारी-बारी से बनता है।
प्रसिद्द पर्यटन स्थल Tower Bridge असल मे प्राचीन london में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है, और उसका नियंत्रण यही स्थानीय सरकार करती है। स्थापित protocol के अनुसार ब्रिटेन के सम्राट को इस पुल को पार करने से पूर्व सूचना देनी होती है नगर अध्यक्ष को। आज भी इस  परंपरा का पालन होता है।
अब बात करते हैं कि ब्रिटेन की इन व्यवसायी बिरादरियों की अपार सफलता के बावजूद भारत मे संविधान निर्माताओं ने क्या उल्टी खोपड़ी बीज बोए थे जो कि भारत की आर्थिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने की बजाए बाधाओं की झाड़ खड़ी कर रहे हैं।
ब्रिटेन में आरम्भ काल मे इन्ही बिरादरियों में से 12 ने मिल कर joint stock company बनाई थी, जिसने east india कंपनी बनाई थी। इसकी उप्लब्धियों का इतिहास हम भारतीयों से बेहतर भला कौन जानेगा!
तो, होता क्या था, (और जो कि आज भी चलन है) कि royal charter वाली संस्थाओं पर राजा या उसके मुलाज़िमों को हस्तक्षेप करने की अनुमति नही है। यह संस्थाएं अपने नियम और व्यापारिक प्रसार खुद से नियंत्रित करते हैं।
याद रहे कि royal charter से कई और संस्थाएं भी बनी है, जिसमे की royal societies, royal education institution, जन सूचना तंत्र में bbc, national geographic इत्यादि शामिल हैं। और royal charter की यह परंपरा अभी भी चालू है, खत्म नही हुई है।
भारत मे संविधान निर्माताओं ने upsc बना करके उनको इतना अधिकः सासन सशक्त बना दिया है की तमाम मंत्रालयों के माध्यम से यही सेवादार आईएएस /आईपीएस ही पेशेवर व्यवसायियों पर भी शिकंजा कस्ते हैं। व्यवसायी बेचारे श्रमिक शोषण का शिकार बने, market forces के मध्य में सस्ते दामों पर श्रम और कौशल दे कर जीविका गुजारते है। जबकि ब्रिटेन में यही royal charter से सुसज्जित बिरादरियां ही आरंभिक trade union की पूर्वज थी, जहां से वह यह सुनिश्चित करती थीं कि मार्किट में उनके कौशल और श्रम का मूल्य उचित मिलता रहे। साथ ही वह खुद से दो और बातें सुनिश्चित करती थी, और आज भी करती है। प्रथम, की प्रत्येक बिरादरी अपने विशेष कौशल के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के लिए भी खुद से ही बीड़ा उठाती है, इसके लिए राजा जिम्मेदार नहीं होता, और न ही उसका कोई मिलाज़िम। दूसरा, की बाजार में उपभोताओं को उचित मानक की सेवा और उत्पाद प्राप्त हो, कोई छल-कपट नहीं हो, इसका प्रबंध भी वह खुद ही करती है, राजा या उसका मुलाज़िम जिम्मेदार नहीं होता है।

भारत मे संविधान निर्माताओं ने लोकसेवा आयोग तंत्र में लोकसेवकों अधिकः सशक्त कर दिया है, साथ ही आय में सुनिश्चित, नौकरी में सुनिश्चित कर दिया है कि आज भारत मे गरीब बच्चा कुछ उत्पादन शील कार्य कौशल सीख कर अपनी दरिद्रता का निवारण करने के स्थान पर "पढ़ाई लिखाई " करके ias बनता, यानी समाज को सेवा देने  वाला राजा का मुलाज़िम ! तर्कों और सच्चाई से सोचिए, क्या यह उचित है? कहीं मंशा में ही तो खोट नहीं आ गया है? अब अपने आसपास झांकिए- क्यों इस देश मे इतना अधिकः भ्रष्टाचार है, कौन असल लाभार्थी वर्ग है इस भ्रष्टाचार का? और क्यों महंगाई बढ़ रही है, टैक्स बढ़ते जा रहे हैं, पेट्रोल डीजल गैस पर तो कुछ गुप्त, अघोषित टैक्स लगे हुए है?
और , क्यों कौशल की कमी है, युवा पेशेवर कौशल कम सीखते हैं, सरकारी नौकरी अधिकः तलाशते हैं, निज़ी नौकरियों में आज भी श्रमिक शोषण होता है, आमदनी कम है, मेहनत कहीं अधिकः?
जवाब साफ है।
गलतियों का खांका भारत के संविधान की नींव में ही खिंचा हुआ है। लोकसेवा आयोग भी उन्ही तमाम गलतियों में से एक है।

अगर Lord Dicey भारत में पैदा हुए होते तो...

Lord Dicey ने जो न्याय के सिद्धांत दिए थे वह मात्र संभावना की बुनियाद पर टिके थे कि 'कोई भी इंसान खुद अपने विरुद्ध फैसले नही सुनाता है। '
Lord Dicey के सिद्धांत दुनिया भर के rational समाज मे स्वीकृत किये गए।
मगर कल्पना करिए यदि यही कोई Dicey जैसा व्यक्ति भारत के ब्राह्मणवादी समाज मे ऐसी कुछ बात कहता तो उसको कैसे-कैसे उत्पीड़न से उसके सिद्धान्तों को स्वीकार नही किया जाता
-- यह dicey तो हर इंसान को झूठा और मक्कार समझता है
-- dicey को लगता है कि बस वही सच बोलता है।
- dicey दूध का धुला है, बाकी सब चोर हैं
-- भारत की संस्कृति को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है dicey। यहां राजा हरिश्चंद्र से लेकर सचिन तेंदुलकर तक ईमानदार लोग रहे हैं जो कि आउट हो जाने पर खुद ही पवेलियन लौट जाते है अंपायर के इशारे का इंतज़ार किये बिना।
- dicey जजों को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है कि सब जज झूठे होते हैं।
- dicey न्यायपालिका पर उंगली उठ्ठा रहा है,
-- dicey ने सारे जजों को चोर कहा
-- निर्वाचन आयोग का कहना है कि dicey ने कोई भी empirical सबूत नहीं दिया है कि जज झूठ बोल सकते हैं अपने खिलाफ मुक़दम्मे की सुनवाई के दौरान

Labour Exploitation reports by the CAG in the Indian Railways

Via Whatsapp unknown

So the tragedy-comic story goes something like this:-
The Railways does not keep any "gold standards" about the labour conditions for their contractors to follow. The contractors pick the half-baked railways contracts and make profit by exploiting the labour under sub-standard work conditions. As a result , when dis-hygiene comes around, the bureaucracy, instead of auditing on the labour conditions, employs the tactics of marketing through the powerful ministers and influential celebrities that the people should do the brooming by themselves.!

Labour exploitation -->buisness profits--> marketing --> vote politics

....An unimaginable poisonous cocktail where all the wrong is happening, and yet no one is responsible.

Labour Welfare, too ,is a component of the Market Forces, which must be freed for achieving the genuinly world-class goods and services.

Labour Welfare, too ,is a component of the Market Forces, which must be freed, so for achieving the genuinely world-class goods and services.

Via Whatsapp unknown
Regarding hi-skill professionals, there are some observation and thoughts which i have learnt after some experiences.
The foremost is that, contrary to how many of us think, the hi-skill develops NOT in the laboratories, but in the market.
The core reason why democracy became successful in alleviating the problems , such as the unemployment and mass indigence which plague most of the societies, is that democracies managed to bring about technological advance with it. But the question is how do the Democractic systems manage to bring about the scientific and technological development?
Here is where most of our Desi thinkers go amiss.
Most of our thinkers like to talk about Democratic system only from the social justice , and human (political) equality perspective only, whereas there is also an economics offshoot to the system of Democracy - it is called the Free Markets .
What happens when there is a political and judicial equality - of the REAL kind- is that the inter-play of the *market forces* itself put the pressure on the market to continually search for new paths, to explore , to invent, to discover , to innovate . In the REAL Balanced system , the labour welfare /public welfare is also treated as one of the genuine forces which have a role to play in the free market . It is now that the true game of the market forces comes around .
In the fake versions of Democractic system, the failure are abound. In our Indian set-up the causes of failure are seeded in the issues of Bureaucratic Feudalism, the social-cultural attitude of the Judiciary - to act bias (perhaps to preserve the interest of certain class/caste of people) , to act as an extended arm of the Ruling party (an agent of the executive machinery) , and other social attitudes such as our habit to look down , condescendingly, upon the demand for labour welfare (public welfare) as a "socialist" rudimentary behaviour!.this is possibly because the bureaucracy is itself highly indulgent in arrogant behaviour, rightly to be called as feudalistic behavior , and so it does not want to support labour welfare issues genuinely as that will ruin their own private gains.
So , truely speaking , the Indian standards of Democracy are misleading , as what is truely being practised in the public governance is not what it is being labeled on. The market forces are NOT undergoing a genuine inter-play which may force the society to go for exploration, invention, innovation . Instead , on most occasions manipulation , exploitation , ignorance are able to help sustain the profits of the market .
And that is how the market forces in the FAKE Democracies work.

Its a process, not an event

Post dated 01stFeb2017
Democracy is a process, not an event.
Republicanism is a process, not an event or a day.
Freedom is a way of life, not an outcome of a revolt.

The social impact of the violence sences in the B-grade movies

Post from 03rd Feb 2016

The ugly aspect of the B-grade movies, southern India made,or even those rural language movies is that those movies "spread the awareness" in the patrons of their class about the entire machinery that the police, the investigation and the judiciary can, and perhaps very regularly, collude to sustain the wrong. The wrong has become a social norm in these societies, possibly due to the social awareness tendered by such products of arts,which make a wide public reach and impacts.
    Therefore, we see in the Karnataka IAS, #DKRavi murder issue the entire crowd of the possible suspects walk into the crime scene and tamper the evidence such as fingerprint even before they could be collected. This was a typical scene from a B-grade movie. True to it spirit, the police never followed-up the matter of tampered evidence , much to affirm the chapters of b Grade violence action movie, where all the state institutions are so regularly shown to be in collusion. Indeed, so much of ground co-operation could be achieved because there was perhaps a "social awareness" drive among the masses, even if in the twisted form, brought about by the B-grade movies.
   The hero , as per the B Grade movies, is often a superhero, whose flick of wrist can raise storms and make men fly away into air. This leaves behind a social impact that the right and the just can win a battle against the wrong only through a divine, or a superhero powers. Infact this narrow, fatalism worldview has been a problem of the entire film industry of India -the Bollywood, the Tollywood, the Mollywood, or the BhojpuriWood whatever you may call it- that ordinary person winning against the wrong of entire world, in it true and unadulterated form as never been brought to public awareness.
    The problem of the newly liberated society, which India also qualifies post the 1947 liberation, is that we are lacking the social conscientious about the right and the wrong. But what has become more cruel with our kind of societies through the work of these B grade work of cinema is that they have made more pervert our sense of the right and the wrong, that is, our conscience, by instilling in us the fear of life due to colluding institutions of public administration despite a purposeful separation of power as envisaged by our Constitution. These movies depict the victory of the wrong so easily possible and in rather horrifying, ghastly manner. The scenes of violence, the human blood flowing in stream, the violence against women are so intense and brutal in these movies. These movies are perhaps the first stations to damage the psychology of little childern which constitute a generation of future. It is perhaps through this chain that we now actually have a perverted class of citizens treading on face of planet.

भारत में बनने वाली द्वितीय या तृतीय श्रेणी फिल्में, या कोई क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों का एक बदसूरत पहलू यह है कि यह फिल्में किसी विकृत रूप में एक "सामाजिक चेतना" का प्रचार कर देती है कि जब भी कही कुछ गलत होता है तो  वह गलत सभी संवैधानिक संस्थाओं की सांठगांठ और रजामंदी का परिणाम होता है। इस प्रकार की कहानियों पर निरंतर टिकी यह फिल्में वास्तव में अपने दर्शक समाज में प्रशासनिक संस्थाओं के गलत आचरणों को सामाजिक चलन बना देती हैं क्योंकि वह अपने दर्शक समाज के मनोविज्ञान में डाल देती हैं कि गलत हमेशा सरकरी तंत्र की मंशा और रजामंदी से होता है। इसलिए वह गलत अब "सामाजिक चेतना" बन जाता है।
    शायद इसीलिए हम कर्णाटक के आईएस #डीकेरवि के मृत्यु के दौरान वास्तव में देखते हैं कि कैसे पुलिस द्वारा सबूतों को इकट्ठा करने से पहले ही एक भीड़ के रूप में सभी संगिध वहां घटनास्थल पर प्रवेश करके सबूतों को नष्ट कर देते हैं, या भ्रमकारी बना देते हैं। यह व्यवहार किसी द्वितीय श्रेणी की फ़िल्म से एकदम मिलता जुलता सा था। बल्कि शायद इन फिल्मों से मिली "सामाजिक चेतना" से ही वह सारे संगिध इस प्रकार एक-सहयोग से परोक्ष भीड़ निर्मित करके ऐसा कर सके होंगे। और फिर उसके उपरांत वहां की पुलिस ने भी सबूतों के साथ हुई छेड़खानी पर कोई विशेष कार्यवाही नहीं करी क्योंकि वह खुद भी ऐसी ही "सामाजिक चेतना" से ग्रस्त हैं, जो की इन बी ग्रेड फिल्मों में हमेशा दिखाया भी जाता है।
    इन बी ग्रेड फिल्मों के अनुसार हीरो कोई एक सुपरमैन किस्म का इंसान होता है जिसकी की कलाइयों के झटके से तूफ़ान आ जाते है,या आदमी हवा में उड़ कर दूर गिरते हैं। ऐसे हीरो को देख कर यही सामाजिक चेतना प्रसारित होती है कि किसी भी गलत के विरुद्ध लड़ने के लिए आप में भी ऐसी अद्भुत, करिश्माई सुपरमैन ताकत होनी चाहिए। वैसे यह सुपरमैन क्षमता वाली समस्या, जो कि हमारे शुद्र और भाग्य भरोसे जीवनशैली का नतीजा है, भारत में स्थित सभी फ़िल्म निर्माण केंद्रों की समस्या है -  बॉलीवुड , टॉलीवुड, मॉलीवुड, या भोजपुरीवुड -- चाहे जो भी हो। किसी साधारण इंसान को गलत के विरुद्ध लड़ कर विजयी होते इन फिल्मो ने दिखाया ही नहीं है, वास्तविक ज़िन्दगी से हीरो को ढूंढ कर उसके जीवन की कहानी सत्य रूप में, बिना अपनी खुद की कल्पनाओं की मिलावट करे, दिखा सकने में असमर्थ रहे हैं।
     नए नए स्वाधीन हुए समाजों की समस्या, जिनमे की भारत भी एक है अपनी 1947 की स्वाधीनता का बाद, यह है की हमारे यहाँ सही और गलत की सामाजिक चेतना इतने सालों की गुलामी के चलते मूर्क्षित और विकृत हुयी पड़ी है। मगर हमारे समाजो के साथ उससे भी क्रूर यह घट रहा है कि हमारी सामाजिक चेतना को दुरुस्त करने कि बजाये इस प्रकार के द्वितीय श्रेणि कला के उत्पाद हमारी सामाजिक चेतना में भय और विभितस्ता का प्रसार कर रहे हैं। अपने दृश्यों में यह अपने बर्बरता, और अत्यंत उत्तेजित हिंसा , रक्त की धारा के मानव शरीर से प्रवाह, नारी के प्रति हिंसा को इतनी साधारणता से प्रस्तुत करके ऐसी चेतना का प्रसार करते हैं। ऐसी फिल्में ही वह प्रथम स्थान हैं जहाँ से हम अपने बच्चों के मनोविज्ञान पर प्रशासन और आत्म-चेतना पर दुष्प्रभाव डाल रहे हैं, जो की भविष्य की पीढ़ी बन रहे हैं। शायद इसी कड़ी पर चल कर आज हमने ऐसे नागरिकों की पीढ़ी तैयार कर ली है जिसकी चेतना ही विकृत है।

मूर्ख देश मे शैतान बौनों की मचाई तबाही

यदि किसी देश मे आपको दो-दूनी-चार भी साबित करने में लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं, तो फिर आप मूर्ख देश मे खड़े हैं।
मूर्ख देश की सबसे बड़ी पहचान यही है। कि यहां का न्याय उल्टा होता। इसलिये यहां उल्टे तर्कों का ही सिक्का चलता है। और इसलिए मूर्ख देश मे सबसे बड़ी जानलेवा ग़लती मानी जाती है समझदार बनने की कोशिश करना।  आप जितना ज़्यादा कोशिश करेंगे सच समझाने की, उतना ज्यादा आप बेवकूफी के दलदल में धंसते जाएंगे।

बेवकूफियां करते रहना ही मूर्ख देश मे एक सांस्कृतिक आचरण होता हैं। यहां छोटे शैतान बौनों का राज चलता है। असल मे जनता का नियुक्त किया गया राजा कोई और होता है, मगर सच मायनों में उसकी कही बातों का कोई मतलब नहीं होता है। शैतान बौने (little devils) ही आपस मे मिल कर जो कुछ तय करते हैं, वही घटता है देश मे। ऐसा नहीं कि देश मे पढ़े लिखे computer engineers, scientist उन सब की कोई कमी है। मगर शैतान बौनों ने मिल कर अगर ठान ली कि उनकी करिश्माई electronic machine में कोई गड़बड़ नही है, वह सब कुछ दुरुस्त तरीके से वोट दर्ज करती है, तो फिर अब यही मूर्ख देश का सच है। अब अगर ज्यादा कोशिश करेंगे साबित करने की की मशीन में गड़बड़ है, तो याद रहे कि मूर्ख देश का न्याय भी उल्टापुल्टा चलता है- यहाँ आप ही पर जिम्मेदारी आ जायेगी की साबित करो को मशीन में गड़बड़ है!  शैतान बौने अकड़ कर जम जाएंगे कि नहीं, उनकी मशीन में emperically आज तक साबित ही नही हुआ है कि कोई गड़बड़ करि है!
मूर्ख देश मे नाकाबिल , अशिक्षित फर्ज़ी शिक्षा उपाधि वाले लोग ही परवान चढ़ते हैं। पढ़े लिखे शिक्षित लोगों से जनता को, असल मे इन शैतान बौनों को सख्त नफ़रत है। पढ़े लिखे लोगों को तानों और उल्हानों से व्यवहार किया जाता है - "पता नही अपने को कौन सा बुद्धिजीवी समझता है"।

शैतान बौनों को हर प्रतिकूल तर्क को मरोड़ कर अपने पक्ष में करने की चतुराई खूब आती है। वह जनता में कभी भी हारे, ग़लती करते, मूर्खता करते हुए छवि में नही आना चाहते हैं। इसके लिए वह लोग तर्कों को spin करके हमेशा अपने पक्ष में ही प्रस्तुत करते हैं।

शैतान बौनों की और भी कारगुजारियां है। देश मे एक बड़े दार्शनिक ने संविधान लिख कर नागरिकों में आपसी संकल्प बनाया की वह सब मिल कर प्रजातन्त्र व्यवस्था से देश को संचालित किया करेंगे। शैतान बौने नीचे खड़े मंद मंद मुस्करा रहे हैं। उनको मालूम था कि प्रजातन्त्र व्यवस्था के नाम पर ही उनको खुद सत्ता में आने का इससे बेहतर मौका फिर नहीं मिलेगा। फिर अंजाने में बड़े दार्शनिक ने लोक सेवा आयोग नाम से इन छोटे बौनों की नियुक्ति की संस्थान बना दी! अब तो छोटे बौनों के और भी वाहरे-न्यारे हो गए। लोक सेवा आयोग से इनकी नौकरियों को संरक्षण भी आजीवन मिल गया कि यह कुछ भी ग़लती करलें मगर कभी भी जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे। ज्यादा से ज्यादा कुछ समय के लिए ससपेंड होंगे, मगर फिर एक लंबे सेवा कार्यकाल के बाद सुरक्षित रिटायर हो कर पेंशन का भोग करेंगे !
शैतान बौनों को मालूम था कि वह चिर परिचित बंदर बांट के खेल से हमेशा फायदे में रहेंगे। तो सबसे पहले तो उन्होंने ही भ्रस्टाचार का खेल शुरू किया और नेताओं को इसकी लत लगवा दी। और फ़िर यह लोग खेल यूँ खेलते हैं कि असल मलाई तो सदाबहार हर मौसम में यह लोग खुद खाते हैं, मगर इल्ज़ाम पकड़वा देते हैं कभी पार्टी a के नेताओं को , तो कभी पार्टी b के नेताओं को। जनता बेचारी बेकूफ़ बनी party a से पार्टी b के बीच ही अपने वोट इधर उधर करके भ्रस्टाचार की मार से बचने की कोशिश करती रह जाती है।

सच मांयनों मे किसी भी utopia (यूटोपिया) देश मे भ्रष्टाचार बिना इन शैतान बौनों की रजामंदी के हो ही नहीं सकता है। यूटोपिया में शैतान बौनों को नियंत्रण में रखने के लिए गणराज्य व्यवस्था नही बल्कि राजशाही थी। हालांकि राजशाही के अपने फायदे-नुकसान होते हैं, मगर वहां शैतान बौनों पर काबू करने ज्यादा बेहतर था। क्योंकि राजा लंबे समय से राजगद्दी पर बैठता है, तो उसको इन बौनों की नस नस से वाकिफ होने का भरपूर मौका मिलता है। जो भी कानून बनते हैं संसद में, उनके पालन के लिए राजा जिम्मेदार है। कानून क्या है? राजा और जनता के बीच आपसी अनुबंध है। जनता को अपने हिस्से को निभाना है, और राजा को अपने हिस्से को। राजा की तरफ से शैतान बौनों ही काम करते हैं। तो उनको बेहतरी से जानने, समझने से उनसे काम करवाया जा सकता है।
मगर गणराज्य में शैतान बौनों को मालूम है कि यहाँ कोई राजा नही है उनके ऊपर, बल्कि पांच साल की नौकरी वाला कोई आम आदमी या यही कोई नेता ही पांच साल का राजा बना दिया जाता है। तो जब तक तो वह पांच-दिन का राजा बेचारा इस व्यवस्था को समझ ही सके, यह शैतान बौने ऐसा नाच नाचते हैं उस बेचारे को की उसकी लगता है कि समझदारी इसी में है कि वह राजपाठ में दिमाग लगाने से बेहतर है कि अपने यह पांच साल सैरसपाटा करके ही निकाल ले। वैसे भी, अगर संसद का बनाया कानून से ही अगर देश को चलाना है,तो फिर ऐसे में राजा का आए-दिन का हस्तक्षेप ठीक नहीं है। तो मूर्ख देश मे इसी समझ से राजा का सिंहासन ही वशवाली से सुनिश्चित करने की बजाए गणराज्य बना कर पांच-साल की नौकरी वाला बना दिया , और जिससे इन शैतान बौनों के और भी मज़े हो गए हैं।

शैतान बौने क्या क्या न कर दे। सरदार मनमोहन जब प्रधानमंत्री बन कर शैतान बौनों की कारगुज़ारी license राज से मुक्ति दिलवाना चाहते थे, तो शैतान बौने खड़े मंद-मंद मुस्करा रहे थे। उन्होंने license तो हटा दिया, उसकी जगह "NOC" ले आये! बात वही की वही आ गयी - कान इस रस्ते नही तो उस रास्ते पकड़ लिया।

शैतान बौनों की व्यवस्था चापलूसी और चमचागिरी से ही चलती है। भ्रस्टाचार तो खैर शैतान बौनों का भोजन ही है, जो कि सभी बौने खाते हैं। तो फिर काबलियत का पैमाना यह नही है कि अपना काम अच्छे से करता है या नही; बल्कि यह कि "अच्छे से सभी से निभाता है या नही"। शैतान बौनों की वैधानिक भाषा मे इसे चापलूसी और चमचागिरी नही बोलते हैं , बल्कि संविधान के अनुच्छेद 310 में दर्ज "at the pleasure of the president" बोलते हैं। तो शैतान बौनों की दुनिया मे नौकरी करने की यही सबसे बड़ी काबलियत है - at the pleasure of।
शैतान बौनों को मालूम है कि यहां कुछ भी स्थायी नही होता है। खैर यह तो दुनिया का भी सच है कि change is the only constant, मगर शैतान बौनों की दुनिया मे इसका प्रासंगिक अर्थ कुछ और भी है ! कहो तो वह फुटबॉल के खेल में change के दर्शन के नाम पर goal post भी आये दिन इधर-उधर कर देते हैं! शैतान बौनों की दुनिया है ही है - इसी बात के तो शैतान कहलाते हैं वह। की तर्कों को ऐसा spin मारते हैं, उल्टपल्ट और तोड़मरोड़ करते हैं कि आम आदमी को चकर्रा कर गिर ही पड़े इनके आगे। छोटे कद के नेता, जो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं होते हैं, उनको लगता है कि समझदारी इसी में है कि शैतान बौनों से सांठगांठ करके ही सरकार चलाई जाए, या की जैसा यह चला रहे हैं, बस वैसा ही चलने दिया जाए, कुछ भी ज्यादा इधर उधर न किया जाए। क्योंकि कोई भरोसा नही जैसा वह चाहते है, पता नही क्या-क्या अड़चन  लगा दें यह शैतान बौने उसे लागू होने में।
तो यथाचलित बने रहना ही देश की व्यवस्था का गुण है, क्योंकि वही इन शैतान बौनों के निजी हित मे है।

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