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मूर्ख देश मे शैतान बौनों की मचाई तबाही

यदि किसी देश मे आपको दो-दूनी-चार भी साबित करने में लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं, तो फिर आप मूर्ख देश मे खड़े हैं।
मूर्ख देश की सबसे बड़ी पहचान यही है। कि यहां का न्याय उल्टा होता। इसलिये यहां उल्टे तर्कों का ही सिक्का चलता है। और इसलिए मूर्ख देश मे सबसे बड़ी जानलेवा ग़लती मानी जाती है समझदार बनने की कोशिश करना।  आप जितना ज़्यादा कोशिश करेंगे सच समझाने की, उतना ज्यादा आप बेवकूफी के दलदल में धंसते जाएंगे।

बेवकूफियां करते रहना ही मूर्ख देश मे एक सांस्कृतिक आचरण होता हैं। यहां छोटे शैतान बौनों का राज चलता है। असल मे जनता का नियुक्त किया गया राजा कोई और होता है, मगर सच मायनों में उसकी कही बातों का कोई मतलब नहीं होता है। शैतान बौने (little devils) ही आपस मे मिल कर जो कुछ तय करते हैं, वही घटता है देश मे। ऐसा नहीं कि देश मे पढ़े लिखे computer engineers, scientist उन सब की कोई कमी है। मगर शैतान बौनों ने मिल कर अगर ठान ली कि उनकी करिश्माई electronic machine में कोई गड़बड़ नही है, वह सब कुछ दुरुस्त तरीके से वोट दर्ज करती है, तो फिर अब यही मूर्ख देश का सच है। अब अगर ज्यादा कोशिश करेंगे साबित करने की की मशीन में गड़बड़ है, तो याद रहे कि मूर्ख देश का न्याय भी उल्टापुल्टा चलता है- यहाँ आप ही पर जिम्मेदारी आ जायेगी की साबित करो को मशीन में गड़बड़ है!  शैतान बौने अकड़ कर जम जाएंगे कि नहीं, उनकी मशीन में emperically आज तक साबित ही नही हुआ है कि कोई गड़बड़ करि है!
मूर्ख देश मे नाकाबिल , अशिक्षित फर्ज़ी शिक्षा उपाधि वाले लोग ही परवान चढ़ते हैं। पढ़े लिखे शिक्षित लोगों से जनता को, असल मे इन शैतान बौनों को सख्त नफ़रत है। पढ़े लिखे लोगों को तानों और उल्हानों से व्यवहार किया जाता है - "पता नही अपने को कौन सा बुद्धिजीवी समझता है"।

शैतान बौनों को हर प्रतिकूल तर्क को मरोड़ कर अपने पक्ष में करने की चतुराई खूब आती है। वह जनता में कभी भी हारे, ग़लती करते, मूर्खता करते हुए छवि में नही आना चाहते हैं। इसके लिए वह लोग तर्कों को spin करके हमेशा अपने पक्ष में ही प्रस्तुत करते हैं।

शैतान बौनों की और भी कारगुजारियां है। देश मे एक बड़े दार्शनिक ने संविधान लिख कर नागरिकों में आपसी संकल्प बनाया की वह सब मिल कर प्रजातन्त्र व्यवस्था से देश को संचालित किया करेंगे। शैतान बौने नीचे खड़े मंद मंद मुस्करा रहे हैं। उनको मालूम था कि प्रजातन्त्र व्यवस्था के नाम पर ही उनको खुद सत्ता में आने का इससे बेहतर मौका फिर नहीं मिलेगा। फिर अंजाने में बड़े दार्शनिक ने लोक सेवा आयोग नाम से इन छोटे बौनों की नियुक्ति की संस्थान बना दी! अब तो छोटे बौनों के और भी वाहरे-न्यारे हो गए। लोक सेवा आयोग से इनकी नौकरियों को संरक्षण भी आजीवन मिल गया कि यह कुछ भी ग़लती करलें मगर कभी भी जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे। ज्यादा से ज्यादा कुछ समय के लिए ससपेंड होंगे, मगर फिर एक लंबे सेवा कार्यकाल के बाद सुरक्षित रिटायर हो कर पेंशन का भोग करेंगे !
शैतान बौनों को मालूम था कि वह चिर परिचित बंदर बांट के खेल से हमेशा फायदे में रहेंगे। तो सबसे पहले तो उन्होंने ही भ्रस्टाचार का खेल शुरू किया और नेताओं को इसकी लत लगवा दी। और फ़िर यह लोग खेल यूँ खेलते हैं कि असल मलाई तो सदाबहार हर मौसम में यह लोग खुद खाते हैं, मगर इल्ज़ाम पकड़वा देते हैं कभी पार्टी a के नेताओं को , तो कभी पार्टी b के नेताओं को। जनता बेचारी बेकूफ़ बनी party a से पार्टी b के बीच ही अपने वोट इधर उधर करके भ्रस्टाचार की मार से बचने की कोशिश करती रह जाती है।

सच मांयनों मे किसी भी utopia (यूटोपिया) देश मे भ्रष्टाचार बिना इन शैतान बौनों की रजामंदी के हो ही नहीं सकता है। यूटोपिया में शैतान बौनों को नियंत्रण में रखने के लिए गणराज्य व्यवस्था नही बल्कि राजशाही थी। हालांकि राजशाही के अपने फायदे-नुकसान होते हैं, मगर वहां शैतान बौनों पर काबू करने ज्यादा बेहतर था। क्योंकि राजा लंबे समय से राजगद्दी पर बैठता है, तो उसको इन बौनों की नस नस से वाकिफ होने का भरपूर मौका मिलता है। जो भी कानून बनते हैं संसद में, उनके पालन के लिए राजा जिम्मेदार है। कानून क्या है? राजा और जनता के बीच आपसी अनुबंध है। जनता को अपने हिस्से को निभाना है, और राजा को अपने हिस्से को। राजा की तरफ से शैतान बौनों ही काम करते हैं। तो उनको बेहतरी से जानने, समझने से उनसे काम करवाया जा सकता है।
मगर गणराज्य में शैतान बौनों को मालूम है कि यहाँ कोई राजा नही है उनके ऊपर, बल्कि पांच साल की नौकरी वाला कोई आम आदमी या यही कोई नेता ही पांच साल का राजा बना दिया जाता है। तो जब तक तो वह पांच-दिन का राजा बेचारा इस व्यवस्था को समझ ही सके, यह शैतान बौने ऐसा नाच नाचते हैं उस बेचारे को की उसकी लगता है कि समझदारी इसी में है कि वह राजपाठ में दिमाग लगाने से बेहतर है कि अपने यह पांच साल सैरसपाटा करके ही निकाल ले। वैसे भी, अगर संसद का बनाया कानून से ही अगर देश को चलाना है,तो फिर ऐसे में राजा का आए-दिन का हस्तक्षेप ठीक नहीं है। तो मूर्ख देश मे इसी समझ से राजा का सिंहासन ही वशवाली से सुनिश्चित करने की बजाए गणराज्य बना कर पांच-साल की नौकरी वाला बना दिया , और जिससे इन शैतान बौनों के और भी मज़े हो गए हैं।

शैतान बौने क्या क्या न कर दे। सरदार मनमोहन जब प्रधानमंत्री बन कर शैतान बौनों की कारगुज़ारी license राज से मुक्ति दिलवाना चाहते थे, तो शैतान बौने खड़े मंद-मंद मुस्करा रहे थे। उन्होंने license तो हटा दिया, उसकी जगह "NOC" ले आये! बात वही की वही आ गयी - कान इस रस्ते नही तो उस रास्ते पकड़ लिया।

शैतान बौनों की व्यवस्था चापलूसी और चमचागिरी से ही चलती है। भ्रस्टाचार तो खैर शैतान बौनों का भोजन ही है, जो कि सभी बौने खाते हैं। तो फिर काबलियत का पैमाना यह नही है कि अपना काम अच्छे से करता है या नही; बल्कि यह कि "अच्छे से सभी से निभाता है या नही"। शैतान बौनों की वैधानिक भाषा मे इसे चापलूसी और चमचागिरी नही बोलते हैं , बल्कि संविधान के अनुच्छेद 310 में दर्ज "at the pleasure of the president" बोलते हैं। तो शैतान बौनों की दुनिया मे नौकरी करने की यही सबसे बड़ी काबलियत है - at the pleasure of।
शैतान बौनों को मालूम है कि यहां कुछ भी स्थायी नही होता है। खैर यह तो दुनिया का भी सच है कि change is the only constant, मगर शैतान बौनों की दुनिया मे इसका प्रासंगिक अर्थ कुछ और भी है ! कहो तो वह फुटबॉल के खेल में change के दर्शन के नाम पर goal post भी आये दिन इधर-उधर कर देते हैं! शैतान बौनों की दुनिया है ही है - इसी बात के तो शैतान कहलाते हैं वह। की तर्कों को ऐसा spin मारते हैं, उल्टपल्ट और तोड़मरोड़ करते हैं कि आम आदमी को चकर्रा कर गिर ही पड़े इनके आगे। छोटे कद के नेता, जो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं होते हैं, उनको लगता है कि समझदारी इसी में है कि शैतान बौनों से सांठगांठ करके ही सरकार चलाई जाए, या की जैसा यह चला रहे हैं, बस वैसा ही चलने दिया जाए, कुछ भी ज्यादा इधर उधर न किया जाए। क्योंकि कोई भरोसा नही जैसा वह चाहते है, पता नही क्या-क्या अड़चन  लगा दें यह शैतान बौने उसे लागू होने में।
तो यथाचलित बने रहना ही देश की व्यवस्था का गुण है, क्योंकि वही इन शैतान बौनों के निजी हित मे है।

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