समाजवादी प्रजातंत्र और गैर-समाजवादी प्रजातंत्र

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाने वाली प्रजातंत्र के प्रति समझ बहोत भिन्न है वास्तविक प्रजातंत्र से।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह समझा जाता है कि सभी infrastructure project करवाना पंचायत सभा की जिम्मेदारी होती है, जो कि वह सरकारी विभग, PWD के बदौलत करवाती है। और इन सब के बीच प्रजातंत्र यह होता है कि पंचायत सभा में सदस्य आते कैसे हैं - पंचायत चुनाव से, गाँव वालों के वोट से।

तो ग्रामीण सोच के अनुसार जब तक सदस्यों की नियुक्ति किसी चुनावी प्रक्रिया से हो रही है, वह प्रजातंत्र ही है।
इसमें मौलिक अधिकार, अधिकारों का हनन , निजी व्यापार और उद्योग के अवसर , इत्यादि विषयों पर चिंतन नही है।

छोटे, ग्रामीण स्तर पर यह सब मुद्दे  प्रभावकारी होते भी नही है। भारत मे जहां भी आदर्श ग्राम को निर्माण करवाया गया है, वहां व्यवस्था ऐसे ही चलती आयी है, और उसको ही प्रजातंत्र नाम से पुकारा गया है।

तो औसत भारतीय जनता स्वाभाविक तौर पर उद्योगों और बड़े infrastructure projects को सरकार के हाथों से चलते , पूरा होते देखती आयी है। वह यही देखना चाहेगी सदैव के लिए भारत मे। और इस तरह की व्यवस्था को ही *प्रजातंत्र* कह कर पुकारती रहेगी।

जबकि इस मॉडल को अकादमी भाषा मे वास्तव में *समाजवाद* कहा गया है, *प्रजातंत्र* नही। भारत मे इसे मिश्रित कर के *समाजवादी प्रजातंत्र* कह दिया गया है -socialists democracy।

जबकि अन्य मॉडल में जो *प्रजातंत्र* कहलाता है, उसमे पंचायत सभा गाँव के आवश्यक infrastructure projects (जैसे कि सड़क बनवाना, जल संचय के लिए तालाब बनवाना, कुआं बनवाना, सिंचाई के लिए नेहर बनवाना, पानी निकालने के लिए हवा के कोलुहु (wind mill) बनाना ) को सरकार के नियुक्त आदमी किसी निजी कौशल कामगारों की company को दे देते हैं जो कि यह सब निर्माण काम करना जानते हों । उनको इस कार्य की लागत दे दी जाती है और वही इसे पूरा करते हैं।

*समाजवादी प्रजातंत्र* और *गैर-समाजवादी प्रजातंत्र* में अन्तर आता है *कौशल कामगारों* (skilled workers) के हितों का। *समाजवादी प्रजातंत्र* में *कौशल कामगार* किसी सरकारी विभाग के कर्मचारी होते हैं, और उनको *तनख्वाह* दी जाती है अपनी duty करने की।

जबकि *गैर-समाजवादी प्रजातंत्र* में *कौशल कामगार*(skilled workers) अपनी company के स्वामी होते हैं, और तनख्वाह नही लेते हैं, बल्कि fees लेते हैं काम पूरा करने का।

Skilled workers के ऊपर अपनी जिम्मेदारी खुद से होती है कि आवश्यक मानक निर्धारित करें, तकनीक को विकसित करें, तकनीक के ज्ञान को नए apprentice को अर्पण करने के शिक्षा व्यवस्था को विकसित करें।

समाजवादी तंत्र में कौशल कामगारों से संबंधित यह सब जिम्मेदारी भी सरकार की ही होती है। तो फिर आपसी कटाक्ष और सरकारी हस्तक्षेप के चलते वास्तव में कौशल कामगार कभी पूर्ण विकसित स्वयं से हो ही नही सकते हैं। सरकार तकनीकी कौशल के क्षेत्रों में जो कुछ भी कर रही होती है, वह असल मे होता ऐसे है कि विदेश से नक़ल करके यहां भारत में लागू कर देती है। तो फिर उच्च शिक्षा का अर्थ हमेशा ही "विदेश जाना" होता है। यहां भारत मे खुद से तो कुछ भी कौशल कोई भी कौशल कामगारों की company विकसित नहीं कर रही होती हैं।

समाजवादी व्यवस्था बनी ही होता है पिछलगू बन कर विदेश की नक़ल करने के लिए। इस व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा इसी बात की होती है कि कौन कितनी जल्दी विदेश में विकसित हुए कौशल की नक़ल कर लेगा। अगर कोई विकसित देश चाँद पर पहुंच गए हैं , तब आप किसी जल्दी उनके पीछे-पीछे चंद्रमा पर पहुंच जाएंगे, यही competition होता है। यही एक समाजवाद की लय होती है। वह खुद से कोई नया कौशल विकसित विकसित करने के किये श्रेष्ठ और उत्तम नही बन सकता है, क्योंकि उसमें *रचनात्मक स्वतंत्रता* के लिए आवश्यक *आर्थिक स्वाधीनता* के माहौल उपलब्ध ही नही होता है। *कौशल कामगार* तो महज़ एक *सरकारी नौकर* बन जाता है, duty पूरी करने की तनख्वाह लेने वाला। वह कोई रचनात्मक कार्यकौशल करके ईनाम prize लेने वाला व्यक्ति नही रह जाता है। रचनात्मक होने के जोख़िम लेना सरकारी संपत्ति पर आसान नही होता है। तमाम लोगों की तनख्वाह उसी समपत्ति से जुड़ी हुई होती है। इसलिए वह जोख़िम लेने से कतराते हुए *सरकारी जवाबदारी के बंधक* बन जाते हैं। इसे red tapism या *लाल फीताशाही* भी बुलाया जाता है।

गैर-समाजवादी प्रजातंत्र, जो कि वास्तविक प्रजातंत्र होते हैं, वहां निजीकरण के चलते कौशल कामगार सरकारी नौकर नहीं होते हैं। उनमें आपसी सहयोग और प्रतिस्पर्धा का माहौल होता है कि किसी तकनीकी बांधा के समाधान निकाल लेने पर लाभ का "ईनाम" कौन कमायेगा। वह तनख्वाह (salary/wage) नही लेते हैं, बल्कि fees लेते है, जो कि ईनाम का स्वरूप है। बांधा को पूरा करवाने की अधिक fees लगती है। जितनी मुश्किल बाधा उतनी अधिक fees। अधिक fees पाने के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा होती है। बाधा जब मुश्किलों से बढ़ने लगती है तब उसे समाधान करने के लिए कौशलों को संग्रह करना पड़ता है। तो परस्पर सहयोग और प्रतिस्पर्धा के माहौल संग में बने रहते हैं। salary या wage लेकर duty करते रहने वाला आलस्य और शिथिल माहौल यहाँ पर नुकसान दयाक बन जाता है।

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