निजीकरण विषय मे भारत की जनता में मतविभाजन

देश इस समय निजीकरण विषय पर दो वर्गों में विभाजित है।

एक मत के अनुसार निजीकरण नही किया जाना चाहिए (रलवे , इत्यादि का) और उसे यूँ ही सरकारी रेलवे विभाग के हाथों सौंप कर चलते रहने देना चाहिए। यह *समाजवादी* सोच के लोग है। *समाजवाद* में सरकार ही व्यापारिक संपत्ति की स्वामी होनी चाहिए।

और दूसरे मत के अनुसार आम नागरिक को उसका अधिकार मिलना चाहिए, अपनी जरूरत और अपनी जिंदगी खुद से चलाने का। तो व्यापार के अधिकार भी उसे मिलने चाहिए। उसको हर एक क्षेत्र में व्यापार का अवसर मिलना चाहिए , कुछ बुनियादी क्षेत्र छोड़ दें तो - राष्ट्रीय सुरक्षा, बुनियादी रोटी, कपड़ा, मकान और चिकित्सा को। यह *निजीकरण* का वर्ग है , जिसको *समाजवादी* सोच में अक्सर *"पूंजीवादी*" के आरोपी नाम से पुकारा जाता है। (चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए हम यही नाम प्रयोग करेंगे , " *पूंजीवादी* " , हालांकि कोशिश करेंगे कि इस नाम के अभिप्राय में संयुक्त आरोप से खुद के चिंतन को मुक्त रखते हुए दोनों पक्षों को बराबर की सुनवाई दें।)

समाजवादियों के अनुसार व्यापार के ऊपर सरकार का स्वामित्व होना चाहिए। सरकार अभी तक UPSC द्वारा चयन किये गए अपने नुमाइंदों को व्यापार और उद्योगों में सीधे chairman या deputy chairman जैसे पदों पर नियुक्त करती थी, और वही उस *उपक्रम* का संचालन करते थे।

पूँजीवाद वर्ग के आरोप हैं कि यह पद्धति *लाल फीताशाही* थी, इसमे किसी का भी निजी स्वार्थ नही था, जिसके चलते इस तरह उन उपक्रम का कोई माई-बाप नही होता था। सब अपने अपने मनमर्ज़ी से चलाते थे, अपना निजी फ़ायदा ही देखते थे, और बस अपनी तनख्वाह की ही परवाह करते थे कि हमे हमारी तनख्वाह मिल जाये, बाकी फिर व्यापार को सुधारने, नवीनकरण, उद्योगिक स्पर्धा , इत्यादि में कोई दिलचस्पी नही रहती थी किसी की। इससे कुल मिला कर आम आदमी ही त्रस्त होता था, जबकि उवक्रमों में ऊंचे पदों पर बैठे यह upsc वाले नौकरशाह तो टैक्स की तनख्वाह से मज़े में जीते रहते थे, सरकारी खर्चे पर।

प्रजातंत्र के अधिकारों का अंत मे हनन हो होता था। अगर संविधान में चिकित्सा के मौलिक अधिकार दिए भी हैं तो क्या,? सरकारी अस्पताल इस लायक कहाँ थे कि उनके भीतर कोई इलाज़ करवाने जाने की सोचे।
तो यदि वाकई में नागरिक को अपने अधिकारों को बचाना था, तो फिर उसको अपने आप से अस्पताल से लेकर train उद्योग चलाने, हवाईजहाज उद्योग चलाने की आज़ादी मिलनी चाहिए।

विदेशों में जहां भी प्रजातंत्र सफल हैं, वहां निजीकरण ही उसका कारण है। यदि नागरिक को अपने अधिकार चाहिए, तो फिर उसे खुद से यह सब उद्योग चलाने के कौशल भी आने चाहिए। आप सरकारी नौकरशाह को हर जगह बैठा कर , उसको शक्ति देकर अपने अधिकारों को हनन करने के मार्ग प्रशस्त ही क्यों कर रहे हैं?

तो ऐसा समझा गया है कि प्रजातंत्र का निजीकरण से स्वाभाविक जोड़ है। सरकार को मानक निर्धारण या विवाद सुलझाने तक ही कार्य सौंपने चाहिए। बाकी फिर आम नागरिक को खुद से ही यह सब चलाना भी सीखना होगा, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को प्रोत्सहित होने के माहौल बनने देने होंगे, यदि गुणवत्ता भी चाहिए तो।

सरकारी करण का सीधा अर्थ है गुणवत्ता की स्वाहा करना।

तो सरकारीकरण को प्रजातंत्र से मिश्रण करना एक आधारभूत मिथक विचार था, क्योंकि दोनों immiscible हैं, तेल और पानी के समान।

आज़ादी से 1993 तक समाजवाद ही चलता रहा था।

देश की दोनों ही बड़ी पार्टियां इस समय निजीकरण की पक्षधर बन चुकी हैं।

निजीकरण के विरोधी सिर्फ उत्तर भारत की छोटी क्षेत्रीय पार्टियां ही बची हैं, और बंगाल के वामपंथी पार्टियां।

इससे होगा यह कि अंत मे निजीकरण को रोकना मुश्किल हो जाएगा, और निजीकरण के समथर्क वर्ग उसका फायदा लेते हुए तेज़ी से बिकते हुए उद्योगों को खरीद कर उसका स्वामित्व ग्रहण कर लेंगे। जो विरोध कर रहे होंगे, वह विरोध करते करते यूँ ही खड़े रह जाएंगे, सिर्फ नौकरियों को मांग करते हुए।

अंत मे समाजवादी वर्ग नौकरीपेशा के लायक ही रह जाएंगे, और समर्थक वर्ग पैसे वाले, धनवान वर्ग। वही फिर मीडिया और सरकार को भी खरीद लेंगे और चलाएंगे।

समाजवादी लोग के नेता अन्त में एक दलाल में तब्दील हो जाएंगे। वह केंद्र सरकार के निजीकरण को न तो रोक सकेंगे, और न ही गुणवत्ता से अपनी प्रादेशिक सरकार को चला सकेंगे। कुछ अन्य मुद्दों की बदौलत हवा देकर यदि वह सरकार बना भी लेते हैं तब भी लंबा टिकना हर बार मुश्किल ही होगा। जो पैसे वाले वर्ग होंगे, वह कैसे भी कर के जनता को लुभा ही लेंगे।

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