For the cause of success of Indian Democracy and Indian Constitution, we the people of India need to STOP living in awe of the UPSC Services !!!

For the cause of success of Indian Democracy and Indian Constitution, we the people of India need to STOP living in awe of the UPSC Services !!!

भारत के प्रजातंत्र और भारत के संविधान को विफल होने का एक सांस्कृतिक कारण भी है।

वह यह है कि हमारे देश में नौकरशाही को विशेष सम्मान से देखने का चलन है, बजाये शंका के। हम नौकरशाही को कटघरे में खड़े ही नही करते हैं, बल्कि सिर पर बैठा कर इज़्ज़त से नवाज़ते है की देश की सबसे प्रतिष्ठित career यही है।

भारत में बहोत सारे माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से ही 'लोक सेवा'(राजा के सेवक वाली सेवा का परिवर्तित नाम) में जाने की इच्छा से शिक्षा प्रदान करवाते हैं। लोकसेवा आयोग से चयन हुई नौकरी हमारे देश में सबसे कमाऊ और सुरक्षित पेशा है।  हालांकि प्रतिवर्ष चयन थोड़ी ही संख्या में होता है, मगर असफल हुए अभ्यार्थी आजीवन लोकसेवा के मोह में लिपटे हुए जीवन गुज़ारते हैं, और उस सेवा से सम्मान और प्रतिष्ठा को जोड़े रेहते हैं।

तो स्वाभाविक तौर पर ही हम "राजा के सेवक"(King's servant ) को मंदबुद्धि बन कर लोकसेवक (Public Servant) मान लेते हैं। हम उसे सवालों के कटघरे में देखना खुद ही स्वीकार नही करते हैं। हम उन्हें यूँ ही देश का सबसे बुद्धिजीवी वर्ग मान कर उंसके तर्कों का विश्लेषण नही करते, कटाक्ष (debunk) भी नही करते हैं।

प्रजातंत्र की उत्पत्ति विद्रोह और क्रांति में से हुई थी। कुछ तो था जिसके विरुद्ध विद्रोह किया गया था, जो की जनता को नापसंद था।
तो जो कुछ भी नापसंद था उसको नही होने देने के लिये शासन पर काफी सारे किस्म के कृत्यों और निर्णय लेने के प्रतिबंध लगे हुए थे।

मगर वह विद्रोह का सार भारत में सांस्कृतिक तौर पर संरक्षित हुआ ही नही है, क्योंकि वह विद्रोह भारत में जनक्रांति बन कर इतिहास में घटा भी नही है।
इसलिए भारतीय प्रजातंत्र के हालात यूँ है कि यहां लोकसेवा के अधिकारी को लगता है की सभी किस्म के कृत्य और निर्णय संभव है। यहां लोकसेवा को पता ही नही है की प्रजातंत्र व्यवस्था को कायम रखने के लिए कौन-कौन से, किस किस्म के कृत्यों और निर्णयों पर प्रतिबंध है उसी के ऊपर।

क्योंकि हम उन्हें सम्मान से देखने के आदि शुरू से ही हैं, इसलिए सवाल ही नही करते हैं। we live in their awe. हम उन्हें अयोग्य , नालायक मानने को तैयार ही नही है किसी भी सूरत में। हम यह कभी भी तय ही नही करते है की उन्हें काम नही आता है। हमें अगर कुछ भी ग़लत लगता है तो उसके लिए हम राजनैतिक पार्टी के शीर्ष को जिम्मेदार मान कर नौकरशाही को आसानी से जिम्मेदारी से बच निकल जाने देते हैं।

जबकि नौकरशाही की कार्यकाल उम्र सबसे दीर्घ है भारत की व्यवस्था में,और इसलिए यह लोग आसानी से राजनैतिक पार्टी से भ्रष्टाचार के मामलों में अपनी जांच/अन्वेषण शक्ति के माध्यम से मिलीभगत करे हुए रहते हैं। टैक्स के पैसे पर खाते और ऐश करके जीवन जीते हैं। और साथ में हमारे "सम्मान" को भी प्राप्त करते रहते हैं।

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