Why people should practise the intellectual yoga of participating in debates

There is one definite advantage of keeping yourself experienced with methods of debate - that, in order to outwit the opponent , you learn to foresee his likely onslaught on your arguments. This ability helps you improve on your own critical thinking . And then , you acquire ability to reason in a more balanced and robust manner - the kind which may save your decisions from failures as well as embarrassment due to  insufficiency. 


This is one single explanation why IT IS IMPORTANT TO PARTICIPATE IN DEBATES , as that helps in fostering intellectual abilities on oneself.


क्या लाभ मिलता है किसी इंसान को किसी वाद प्रक्रिया जैसे बौद्धिक योग में भाग लेना का ?


वाद प्रकिया में शमल्लित होना का अनुभव अर्जित करने एक सबसे प्रथम लाभ यह होता है कि - इंसान अपने प्रतिद्वन्दी को "खंडन-मंडन युक्ति" करते करते अपने स्वयं की बौद्धिक क्षमता का ऐसा विकास कर लेता है जो बौद्धिक कौशल जीवन पर्यान्त उसके संग रहते हुए उसके निर्णयों को विफलता से बचाने में सहयोग देते हैं, और जो कि उसको पूर्वज्ञान देते रहते हैं कि कैसे उसके निर्णयों का कोई विरोधी व्यक्ति खंडन-मंडन कर सकता होगा। इस प्रकार की बौद्धिक कौशल की विकसित कर लेने से इंसान का स्वयं का स्वमलोचनात्मक चिंतन प्रबल होता है। और इसके पर्यान्त आप स्वयं मंथन करने की ऐसी क्षमता अपने भीतर विकसित करने लगते हैं जो की आपके तर्कों को संतुलन और शक्तिशाली बनाते हैं - इस प्रकार वाले तर्क जो की आपके निर्णयों को विफलता से तो बचा ही सकें, संग में आपको किसी संभव मानहानि का पूर्वाभास दे दे की कौन से वाले तर्क कमज़ोर व अपर्याप्त हैं।


उपर्लिखित स्वयं में प्रयाप्त एवं पर्याप्त कारण है कि क्यों किसी व्यक्ति को वाद प्रक्रियाओं में भागीदारी देती रहनी चाहिए - क्योंकि, ऐसा करते रहने से उसके खुद की बौद्धिक क्षमता का विकास होता है।

Conform, Comply और Obedience में अंतर

Conform और Comply अंग्रेज़ी भाषा में दो शब्द हैं जिनका हिंदी भाषी अनुवाद बस एक ही होता है , "पालन करना"। मगर मूल भाषा अंग्रेज़ी में दोनों के अभिप्राय, connotation ,  बहोत भिन्न होते हैं।
Conform शब्द के अभिप्राय में एक स्व-चेतना भी होती है, जब इंसान स्वयं से ही समाज के मानकों को पालन करने की ईच्छा (या कहें तो मजबूरी) में किसी कार्य को करना चाहता है। जैसे कि, आम ग्रामीण भारतीय की अक्सर करके ईच्छा रहती है कि जीते-जी वह अपनी बेटी का ब्याह करवा दे। यह एक उदाहरण है comforming आचरण का, जिससे conform शब्द का अभिप्राय और comply शब्द के अभिप्राय में भेद ज़्यादा बेहतरी से समझा जा सकता है।

आगे, बेटी के ब्याह करवाने की तथाकथित अच्छी-भली ईच्छा में conforming आचरण में क्या बिंदु है, उसे समझने के लिए हमे थोड़ा आत्म-मंथन करना होगा -- ऐसा क्या है बेटी के ब्याह करवा देने में जो कि कोई इंसान जीते-जी करने की महत्त्वपूर्ण ईच्छा रखता है। इसके तमाम "कारण" बातये जा सकते हैं , जैसे कि
1) बेटी से अत्याधिक प्रेम, जिससे कि वह आगे सुखमयी जीवन जी सके।

2) किसी धार्मिक /सामाजिक उत्तरदायित्व को पूर्ण करने का सुखद बोध।

3) कोई पुराना वादा, कसम, वचन , इत्यादि।

अब अगर किसी दार्शनिक की भांति इन तमाम कारणों पर विश्लेषण करेंगे, तो आप पाएंगे कि सबसे उपयुक्त कारण , संख्या 2 ही है -- किसी धार्मिक/(अथवा सामाजिक) "उत्तरदायित्व" को पूर्ण करने का बोध।

कारण संख्या 1, मिथक कारण ही होगा, क्योंकि सवाल उठाता है कि फिर बेटे की शादी के ऐसा वजन क्यो नही लेता कोई इंसान ? सवाल, कि क्या गारंटी है कि शादी के उपरांत प्राणप्यारी बेटी को सुखमयी जीवन ही मिलेगा ? क्या दूसरी संस्कृति के लोग भी, वहां भी पिता अपनी पुत्री के ब्याह के लिए ऐसे ही संवेदनशील होते है? यदि नही ,तो फिर क्यों?

इन तमाम सवालों के पीछे जो अनन्तं अन्य सवाल दिखेंगे, वह यह एहसास करवा देंगे कि यह वाला कारण संख्या 1 अपने आप मे मिथक "कारण" ही है कि क्योंकि कोई इंसान अपने जीतेजी बेटी के ब्याह का इतना वजन लेता है।

ले-दे कर जो कारण स्थिर होगा, वह यही की प्रत्येक संस्कृति में इंसान कुछ न कुछ ऐसे सांस्कृतिक ईच्छा रखता है, जिसको वह पालन कर देने अपनी "स्व-चेतना" से करना चाहता अपने मित्र-सम्बन्धीयों की दिखना चाहता है। इसे ही conformity behavior शब्द से दर्शाया जाता है।

अब बात करते हैं comply शब्द की। comply शब्द में स्व-चेतना का तत्व विलुप्त होता है। comply करने में इंसान महज़ औपचारिकता को पूर्ण करता हुआ दिखना चाहता है, ताकि वह किसी संभावित राजदंड या राजा की दी गयी सज़ा से बच सके। जाहिर है कि comply शब्द सरकारी या कानूनी अनिवार्यता को पूर्ण करने संबंधित है, या की पालन करने संबंधित है।

तो एक साधारण शब्दकोष जी की अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद प्रदान करवाता है, वह सिर्फ detonation ही बताता है, यानी शाब्दिक अर्थ । मगर वास्तव में शब्द के बोध में connotation भी तत्व होता है, जो कि सांकृतिक ज्ञान के प्रकाश में ही समझा जा सकता है, शब्दकोश में उसे पकड़ना मुश्किल होता है।

इसी तरह एक और शब्द है, obedience, जो कि पुनः शब्दकोश में यही अर्थ देता है ,"आज्ञा पालन करना"।
मगर अपने connotation में इसके अभिप्राय में यह बोध है कि राजा या किसी पुजारी के आदेश का पालन करना, बिना स्वचेतना के प्रयोग के !

निजीकरण बनाम निगमीकरण विषय पर मेरी अर्थशास्त्र समझ

निज़ीकरण मुद्दे पर मेरे और आपके विचार पूरी तरह जुदा  हैं !! मैं घनघोर निज़ीकरण  के पक्ष में सोच रखने वाला व्यक्ति हूँ ! शायद इसीलिए क्योंइकि मेरी अर्थशास्त्र की बुनियादी जानकरी में service  और professional  के मध्य एक अंतर् माना गया है, और जो की समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकने की क्षमता के बाच दोनों ही वर्ग के अंतर को गहरा करता है । समाज की ज़रूरते प्रोफेशनल वर्ग पूर्ण करते हैं, सर्विसेज नहीं ।  और इसलिए संसाधनों पर स्वामित्व और नियंत्रण professionals का ही होना चाहिए, services  का नहीं । अतीत से लेकर आ तक, सभी तकनीकी कार्य, अविष्कार, अन्वेषण --professionals वर्ग से ही हुए हैं , services  से नहीं हुए है ।
तो यह मुद्दा सिर्फ नैतिकता का ही नहीं, बल्कि ज़मीनी जरूरत भी है की यदि समाज को तरक्की करनी है तो professional वर्ग को उसका अधिकार -- स्वामित्व का अवसर मिलना चाहिए । 

मैं यह समझता हूँ की क्योंकि आधुनिक भारत का जन्म उल्टे  तरीकों से हुआ हैं , जहाँ अँगरेज़ professional  वर्ग ने अपनी सेवा के लिए बाबू - clerks  बिठाये थे , आज़ादी की "दुर्घटना" के बाद वही upsc  के माध्यम से देश की नौकरशाही बन कर स्वामी बन गए , इसलिए सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया , और आज सत्तर सालों  में कई पीढ़ियां यही उलटी विधि को देखती हुयी इसी को "सही " समझने लगी है, इसलिए वह "निजीकरण" की विरोधी बानी हुई है ।  अन्यथा प्रजातंत्र का अभिप्राय तो अर्थशास्त्र विषय की दृष्टि से निजीकरण ही है, "निगमीकरण" तो साम्यवादी सोच है-- जिसमे  की उत्पादन  सरकारी बाबू के अधीन  कर के उन्हें "तनख्वा" दी जाती है, वह "इनाम" नहीं जमा कर सकते हैं अपने "स्व-प्रोत्साहित" (self motivated ) कार्य के लिए ।  प्रजातंत्र और "निगमीकरण " तो इतना ही बेमेल(immiscible)  है जितना की तेल और पानी !!

मेरी सोच के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को स्वतंत्रता चाहिए, अपने अधिकारों को हनन होने से बचाना है, तब फिर उसे अपने अधिकार अपनी ही पास रखने होंगे, सरकरी बाबू की मनमर्ज़ी और सेवा पर न्योछावर *नहीं* करने होंगे । तो फिर उसके समाज और प्रशासन को प्रजातंत्र व्यवस्था की और क़दम  बढ़ाने  चाहिए। और यदि प्रजातंत्र चाहिए , तब फिर निजीकरण करके अपने काम , सामाजिक आवश्यकताएं खुद अपने जिम्मे लेकर चलाना  सीखना ही होगा ।

भारत में चूंकि english  professional  class  (जो की ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग थे) उन्होंने सब तंत्र अपनी सुविधा और निजी हित  में बसाये थे, इसलिए professional  वर्ग प्रफुलती हो ही नहीं सका ! उल्टा, जो कुछ professional  वर्ग भारतीय सभ्यता में उपजा था, वह जातिवाद के भेंट  चढ़ कर "शूद्र" बन कर नष्ट होता चला गया है ।

services  और professional  की यह अर्थशास्त्र की कहानी अचरज भरी है, और लम्बी है ...

बरहाल , मैं  यह कतई  नहीं चाहूंगा , और न ही सुझवाव दूंगा की अब कोई भी स्वतंत्रवादी और प्रजातंत्र व्यवस्था का हिमायती व्यक्ति  "निजीकरण" का विरोध करे।

कठोर व्यवहार प्रबंधन पद्धति और भेदभाव का होना

एक कारण की भारत के कार्यालयों में श्रमिक या कर्मचारी आज भी जातपात या किसी भी अन्य कारणों से उत्पन्न भेदभाव , उत्पीड़न, इत्यदि का आरोप लगाते रहते हैं ,वह यह है की भारत में प्रबंधन के स्वाभाविक तरीके आज भी तानाशाही, क्रूरता और *कठोर नियंत्रण* व्यावहारिक क्रियाओं पर चलते हैं। ऐसे में, जहां *प्रजातांत्रिक प्रबंधन व्यवहार* नही होते हैं, वहां किसी न किसी के ख़िलाफ़ अन्याय होता ही है, जिसको बलि का बकरा बनाना आततायी प्रबंधन अधिकारी की आवश्यकता होती है ताकि वह अपने "श्रेष्ठ प्रबंधन नीति" के उदाहरण प्रस्तुत करके अपनी "श्रेष्ठता" सिद्ध कर सके।

द्वितीय, की " *कठोर* " प्रबंधन व्यवहार नीति में न्याय के बुनियादी सिद्धांत - कार्यकारणी शक्ति और न्यायायिक शक्ति का विभाजन- इसका पालन नही किया जाता है। *No Separation of Executive function and judicial function* .

" *भारतीय कठोर व्यवहार प्रबंधन पद्धति*" क्या है ?

-- जिसके पास किसी कार्य करने की शक्ति दी जाती है, उसी को आदेश के उलंघन होने पर दंड की शक्ति स्वतः दे दी जाती है। दुनिया के न्यायायिक मानकों में इस परिस्थिति में अब तो अन्याय होना स्वतःस्फूर्त मान लिया गया है।

" *कठोर व्यवहार* " प्रबंधन नीति में " *क्रमिक न्याय* "( _hierarchical justice_ )  का ही पालन होता है, अन्यथा कोई भी प्रबंधन अधिकारी कठोर होने की हिमाकत भी नही करेगा। तो फिर ज़ाहिर है की boss (वरिष्ठ अधिकारी) को हमेशा सही होना है, और अवर अधिकारी को ही ग़लत होना है। इसमे *प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों* (principles of Natural Justice) का पालन नही किया जा सकता है।

तो फिर अब भेदभाव होता है , वरिष्ठ प्रबंधन अधिकारी के व्यवहार प्रियवर और अप्रियवर सूची के अनुसार बदलते रहते हैं ,  दोस्ती -दुश्मनी , "ego" समस्याएं स्वतः जन्म ले ही लेती हैं -- मूल कारण # *कठोर_व्यवहार* प्रबंधन पद्धति है।

https://thewire.in/caste/intelligence-bureau-discrimination-harassment

स्वतंत्रता नष्ट कैसे होती है

*आज हम स्वतंत्रता दिवस तो मना रहे हैं, मगर क्या हम यह समझते हैं कि स्वतंत्रता ख़त्म किन तरीकों से होती है ?*

स्वतंत्रता ख़त्म होती है जब प्रजातंत्र पद्धति नष्ट होने लगतीं हैं।
प्रजातंत्र नष्ट होते है जब सैन्यवाद (militarism) को बढ़ावा मिलने लगता है।
सैन्यवाद बढ़ता है जब राष्ट्रवाद बड़ी सामाजिक शक्ति बनने लगता है।

स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद के बीच विपरीत संबंध होता है। और इन दोनों के मध्य की कड़ी प्रजातंत्र पद्धति और सैन्यवाद है।

जीवन मे अन्वेषण का महत्व ....भाग 2

हालांकि कई सारे खोजकर्ता ऐसे भी रहे हैं जिनकी thoery को उनके जीवनकाल में दुनिया ने कभी भी स्वीकार नही किया, अपितु उनके गुज़र जाने के सेकड़ो सालों बाद दुनिया को उनकी महान खोज में सत्य के दर्शन हुए। ऐसे खोजकर्ता अपने जीवन में तो ट्रासाडियों से मुक्त नही हो सके, बस इतिहास के पन्नो में ही उन्हें स्मरण किया गया है। वैज्ञानिक क्षेत्र में बिजली (विद्युत) पर अन्वेषण करने वाले निकोलस टेस्ला का वाक्या इसका उदाहरण है। उस काल मे विद्युत के इतने सर्वभु उपयोग का आंकलन किसी ने नही किया था, और इसलिए उनके अन्वेषण पर इतना ध्यान नही दिया गया। edison के बल्ब बना देने के बाद ही दुनिया को टेस्ला के विद्युत के अपर उपयोग दिखाई पड़े थे। एडिसन के बल्ब ने आरम्भ में दुनिया मे धूम मचाई थी। टेस्ला के खोज को दुनिया बहोत बाद में आकर्षित हुई और उपयोग समझ सकी।

जीवन मे अन्वेषण का महत्व, रहस्यों को सुलझाने के प्रयासों के जीवनदायी लाभ

बहरूपिया अक्सर करके पकड़े जाने पर तिकड़म यह लगाते हैं कि वह असल पर ही नक़ली होने का आरोप गढ़ देते हैं।

यह दुनिया मिथिकों से भरी हुई है। सभी कुछ किसी षड्यंत्र की वजहों से नही है। बल्कि इसलिए भी है कि सत्य हर एक के लिए अलग अलग विधमान होता रहता है। तो हर इंसान सत्य का अवलोकन अपने अनुसार करता है, और उसे दुनिया मे प्रसारित करता रहता है। नतीजे में यह  दुनिया तमाम किस्म की कथाओं (narratives) से भर गई है। 

इस बीच में कुछ वाकई के आपराधिक मनोअवस्था वाले लोग भी हैं। जो कि दुनिया मे सत्य की इस मुश्किल परिस्थिति का फ़ायदा उठा कर जनता को बेवकूफ बनाते है , सिर्फ मुद्रा लाभ के लिए। तो यह लोग और दिलचप्सी रखते हैं कि सत्य थोड़ा और रहस्यमयी, और ओझल बना रहे।

लेकिन अंत मे सत्य की तलाश वही कर सकता है जो तमाम किस्म की बौद्धिक कबलियतों को अपने अंदर विकसित कर सके। और फिर जो सत्य को प्राप्त करता है, सत्य के जितने नज़दीक जा पाता है, वही जीवन की त्रासदियों से मुक्ति प्राप्त करता है, वही ईश्वर को तलाश कर पाता है, वह सुखी और समृद्ध बनता है, मोक्ष को भी पाता है।

सत्य की तलाश के लिए बौद्धिक कौशल भी चाहिए ही होता है। इसके बिना तो आप जीवन मे उचित निर्णय ,सही समय पर , सही दिशा में ले ही नही सकते है। 

तो सत्य की तलाश कर सकने वाला बौद्धिक कौशल कैसे विकसित किया जाता है  ?

रहस्यों को सुलझाने से। अबूझ, अंधकार, अज्ञात, अंतरिक्ष मे शोध करने से। अपने इर्दगिर्द घूम रही तमाम षड्यंत्रकारी theories के ऊपर सत्य के प्रकाश को डालने से।

जी है। जो कौशल रहस्यों को सुलझाने में विकसित होता है, वह बुद्धि में यह काबलियत भी देता है कि सत्य को तलाश कर सके। 

बचपन मे जो पहेली सुलझाने के खेल हुआ करते थे, रहस्य को सुलझाना उसी खेल का वयस्क रूप है।

रहस्यों को सुलझाना किसी स्कूली किताब को हल करने से बहोत अलग होता है। क्योंकि स्कूली किताब में तो आपको यह जानना बहोत आसान होता कि आपका निकाला हुआ समाधान सही है या नही। आप झट से किताब के पीछे के अंश में उत्तर तालिका  से यह मेल करके पता लगा लेते है।

मगर रहस्यों को सुलझाने में कोई उत्तर तालिका  नही होती है। तो फिर आपको अपने ही दिए समाधान के सत्य होने के प्रमाण भी खुद ही विकसित करने पड़ते हैं। और उन प्रमाणों के संतुष्ट होने की पद्धति भी आपको खुद से ही विकसित करनी पड़ती है।

यह सब ही शोध कहलाता है। आप कोई हाइपोथिसिस बनाते है। उस hypothesis की जांच के लिए कुछ प्रयोग (experiments) विकसित करते है। उन experiments से निष्कर्ष निकालते हैं। निष्कर्षों के मेल अपने hypothesis से करवाते हैं। कुछ हद तक मेल होते हैं, कुछ कमियां अभी भी रह जाती हैं। यह निर्णय भी आपको अपनी संतुष्टि से ही करना होता है कि आप खुद को कितना सफ़ल मानते हैं अपने experiments से। फिर आप ही उस hypothesis से कोई theory बना देते हैं । और यदि पूर्ण संतुष्टि महसूस होती है, तब आप एक law (नियम) की ही खोज करके नींव डाल देते है। फिर आप अपनी इस समुचित खोज को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करते है, अपने एक दावे (claims) के रूप में । दुनिया को आमंत्रित करते हैं कि वह भी आ कर जांच करे, आपको आपकी कमियां बताए, आलोचना करे, समीक्षा करे, और अपने खुद के मत के अनुसार स्वीकृत या अस्वीकृत करे।
यह सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही इंसान को महसूस होता है कि अब वह सत्य को शायद कुछ हद तक चिन्हित कर सके। तभी उंसमे दुनिया की आखों में आंख डाल कर बात करने का आत्मविश्वास आता है।
और यदि उसकी theory वाकई में सत्य के नज़दीक पहुंचती है, तब उसका सबसे बड़ा प्रमाण तो उसके खुद से जीवनमुक्ति में से मिलता है। वह त्रासदियों से मुक्त होने लगता है।

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