On Economic system, its link with the political and the Legal system

I have a feeling,

that, the economic systems are designed such as to give their best only when working with the associated political and the legal systems that are genuinely democratic by nature.

It may not be possible to eradicate poverty,  to cure epidemic diseases , to provide gainful employment , the social security , the happiness , etc to the people unless the public governance systems are genuinely democratic by their nature .

Coercion, whether by state authorities , or by any other means , is sure to bring failures in the economy.

जातियॉं (अथवा समुदायों) के बीच अंतर है क्या? और कहां से आया?

*जातियॉं (अथवा समुदायों) के बीच अंतर है क्या? और कहां से आया?*

अगर 16वीं शताब्दी के पर्यान्त समुदायों (जो की 'जाति' से संबंधित एक अन्य पर्यायवाची नाम ही होता है) के बीच आर्थिक संसाधनों के बटवारे को समझे तब सबसे प्रथम हमे दो वर्गों को चिन्हित करके काम को आगे बढ़ाना होगा। दो प्रमुख वर्ग थे - उद्योगिक श्रम (Industrious) वाले समुदाये , और कृषक श्रम(Pastoral) वाले समुदाये।

16वीं शताब्दी के बाद में अग्रिम समुदाये वह हैं जो की 'उद्योगिक श्रम' करते थे।इससे पहले 'कृषक श्रम' वाले समुदाये अधिक समृद्ध और राजनैतिक बलवान हुआ करते थे। 16वी शताब्दी मानक इसलिये बनी क्योंकि यहां से ही steam engine बना, जो की निरंतर, अथक श्रम का प्रथम संसाधन था मानव इतिहास में, और जहां से professionals ने बढ़त बना ली युद्धक और कृषक लोगों से। यहां से ही factorइया बनी, और फिर उद्योग बने।

जमीन का प्रयोग वह विषय था जहां से बदलाव ने असर दिखाया था। उद्योग आ जाने से जमीन का छोटा अंश, यदि वह उद्योग में है तो फिर अधिक उत्पादन शील हो गया, किसानी और पशु पालन के मुकाबले।

दूसरा की उद्योगी आदमी को किसी एक स्थान पर बंधना मुश्किल था, क्योंकि जहां बाज़ार में saturation आ जाता है वहां उसके लिए मुश्किल बन जाती है। तो फिर वह अचल नही रह गया, निरंतर चलत , गतिशील और अन्वेषक बन गया। किसान की ज़रूरतों के विपरीत विचार था यह। किसान जमीन से बंधा था, और स्थिर और गतिहीन था। वह पत्थर की तरह पड़ा रह गया और ज्ञान से भी दूर चला गया। नतीज़तन कृषक समुदाये पिछड़े होते चले गये।

उद्योगी व्यक्ति अन्वेषक बन गया, साथ में नित नये कौशल ईज़ाद करते हुए नयी नयी बाज़ार जरूरतों को जन्म देने लगा। हां, वह भोगवादी भी बना और साथ में पर्यावरण का विनाशक भी। मगर फिर सफलता उसकी ही थी। पैसे का अर्थ तंत्र तो उसके ही संग में आ बैठा, उसकी मुठ्ठी में।

कृषक को जब तक एहसास हुआ बहोत लेट हो चुका था। वह हल्के-फुल्के , पुराने और सरल कौशलों से गुज़ारा करने को बाध्य हो गया। जैसे की मोटर कार चलाना, मोटर कार की मरम्मत, सैनिक बन जाना, वगैरह। अधिक जटिल कौशल उसके लिए सीखना मुश्किल थे, साथ में यह था की सीखने की कीमत भी बहोत ज्यादा थी।

उद्योगिक समुदायों के  परिवारों में नयी किस्म की नैतिकता ने जन्म लिया और धर्म को नये तरीके से उच्चरित कर लिया। यहां 'प्रबंधन' वाले ज्ञान ने जन्म ले लिया है, जो की झटपट ज़रूरत के अनुसार u turn देने के तर्क देती रहती है, कभी भी कुछ मर्यादा-बंधित नही करती है, और दोस्ती-दुश्मनी का अर्थ पैसे से जोड़ देती है। कृषक क्योंकि स्थिर मानसिकता के लोग होते हैं, उनकी नैतिकता और धर्म का उच्चारण अलग होता है। वह मर्यादा से बंधते है।
मर्यादा = Conscience tied.
उद्योगिक मर्यादा अलग ही है। इसमें कुछ भी करना अथवा नही करना में स्वेच्छा का प्रसंग पैसे के लाभ-और-हानि से बदलता रहता है।  दुनिया में कुछ भी स्थिर नही है। तुरन्त लाभ और हानि के अनुसार वह निर्णय लेते हैं।

कृषक समुदायों में समाज क्या कहेगा, वगैरह को आगे रखा जाता है। "सम्मान" अधिक महत्वपूर्ण है, और "सम्मान" का यही अभिप्राय होता है की "दुनिया क्या कहेगी', "वो चार लोग सुनेंगे , तो क्या कहेंगे"। वह दोष-भाव यानी guilt से भी खूब प्रभावित रहने वाले समुदाये हैं। और इसलिये दुखों से घिरे रहते हैं, आपसी क्लेश या पारिवारिक क्लेश रोज़मर्रा की बात होती है। आपसी सहयोग न तो इनकी ज़रूरत होती है, और न ही वह इसे प्राप्त करने पर महत्व देते हैं। वह आसानी से एकाकी परिवार में जीवन यापन कर लेते हैं। जबकि उद्योगिक श्रम में बड़ा करने पर बल दिया जाता है, और बड़ा करने के लिए आपसी सहयोग आवश्यक होता है तमाम बाधाओं को लांघने के लिये, व्यापार के फैलते अंग को स्थान स्थान पर संभालने के लिए।

अब शायद ज्यादा सरल हो जाये अग्रिम और पिछड़ी जातियों (अथवा समुदायों) का वर्गीकरण करना उनकी चारित्रिक विशेषता के आधार पर।

आरक्षण नीति, समाजवाद, सरकारीकरण, UPSC और भारत की प्रशासनिक नाकामियों के विषय में

भारत की समस्याओं का जड़ अच्छी अर्थनीति की कमी नही है, बल्कि तमाम नीतियों की implementability में खामियां है। इस जड़ को पैदा करने वाली और संरक्षण देने वाली जननी माता है -- भारत की नौकरशाही; जो की अपना स्थान, और शक्ति प्राप्त करती है खुद भारत के संविधान से, UPSC नामक संवैधानिक संस्थान से।

बात को दोहराते हुए एक बार फ़िर मुआयना करते हैं कि कहां क्या गलतियां हुईं आज़ादी के बाद हमारे देश के प्रशासन तंत्र में।
सर्वप्रथम यह कि प्रजातंत्र, और तमाम अन्य किस्म की राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को हमारे तत्कालीन "बुद्धिजीवियों" ने सही से समझा ही नही। इसमें ग़लत हुआ है, हालांकि उनकी ग़लती नही कही जा सकती है। कारण- की सब ही प्रत्यय हमारे यहां पर आयात करके लाये गए हैं, यहां भारत के अपने सामाजिक और आर्थिक इतिहास की धरोहर कम ही हैं आधुनिक भारत के प्रशासन को चलाने में सहायक किसी भी पाठ को रचने के लिए; और न ही हमारे इतिहास ने हमारे पास विकल्प दिया कि हम कुछ अन्य को प्रयोग करके तसल्ली कर सकें। (अब यह कटुसत्य वचन पढ़ कर हो सकता है कि आप में से बहुतों को खराब लगेगा, मगर सत्य को नतमस्तक हो कर स्वीकार करना ही सर्वप्रथम आराधना होती है। या तो आपके मन को सत्य स्वीकार करने से शांति मिल जायेगी, अन्यथा सुधार करने का उपाय खोज कर डालेगा। )

तो, सच यह था कि *प्रजातंत्र का सारांश* होता ही था *निजी सम्प्पति के अधिकार* में । प्रजातंत्र भले ही एक राजनैतिक विचार है, मगर इसका अर्थनीति क्षेत्र में अभिप्राय यही होता है - निजीकरण।

कम से कम इतना तो जान लीजिये कि वर्तमान काल के सभी अर्थनीति ज्ञानकोष के बुनियाद सिद्धांत जिन हालातों के मद्देनज़र बनाये गये हैं, वह प्रजातंत्र की स्वेच्छा-सिद्ध प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था पर ही कायम हैं।

और यह एक सच हमारे तत्कालीन बुद्धिजीव या तो समझ ही नही सके, या अनदेखा कर गए। या हो सकता है कि कुछ-एक मौजूदा ज़रूरतों को देखते हुए टाल रख छोड़ा था कि भविष्य की पीढ़ियां कभी दुबारा इन विषयों पर चर्चा करके सुधार कर देंगे।

बरहाल, सच को अनदेखा करने से हमने प्रजातंत्र को समाजवाद में मिलावट करके चलाने की कोशिशें करि और गर्व इस बात का किया कि यह "भारतीय संस्करण" है व्यवस्था का, जो कि भारत के गाँव-गांव में पाई जाती है।

समाजवाद के आवेश में हमनें सरकारीकरण की राह पकड़ ली।

 फिर क्या हुआ? - नौकरशाही की मनमानी। हर एक क्षेत्र में क्लर्क छाप कौशल वाले लोगों को शीर्ष नेतृत्व दे दिया गया।
क्लर्क यानी लिपिक कौशल की अपनी कमियां होती है। वह हाथ कैशल का सम्मान कम करते हैं, अच्छे वाचन से प्रभावित जल्दी होते हैं। वह चापलूसी से चलते है। न की तकनीकी विषयों पर बहस करते हुए, ज्ञान को उधेड़-बुन करके "उद्योगिक और कौशल मानक" - professional and industrial standards- का निर्माण करते हुए।

नौकरशाही ने देश को क्या दिया?
थोड़ी सी सांठगांठ मंत्रियों के संग में, और फिर सत्ता पूरी की पूरी एक मिलिभगति कि खीरपूड़ि बन गयी नौकरशाहों के हाथ मे। खूब दम कर के  भ्रष्टाचार किया और कुछ एक ईमानदारी की "मूर्ख" नमूनों को रख छोड़ा देशवासियों को सच से बहकाने के लिए।
आरक्षण की खीर ने खुद अम्बेडकर जी के समुदाय वर्ग को भी नौकरशाही का कायल बना दिया, बजाए सच के दर्शन देने के। वह कौशल काम छोड़ छोड़ कर "पढ़ाई लिखाई" की ओर प्रेरित हुए - मसलन आरक्षण के माध्यम से आईएएस और आईपीएस बनने को लालायित हूए। आरक्षण में उन्हें नौकरशाही के माध्यम से सशक्तिकरण की रोशनी दिखाई पड़ी, न कि नौकरशाही नाम वाली दीमक जो की समाज के आर्थिक और श्रमिक संसाधनों को खोखला करती थी।

अब क्या था। नौकरशाही में नीचे पदों में आरक्षित वर्गों को जगह दे कर खुश रखा गया। ऊपर के पदों से नियंत्रण अभी भी उन्हीं वर्गो ने कब्ज़े में जकड़ लिया। न्यायपालिका में उन्ही वर्गों ने अपने नुमांइदे बिठाये। tokenism को सदैव कायम रखा , कि सच की पोल न खुलने पाए।

हमारा देश "समाजवादी प्रजातंत्र" में जीने लगा, यह एहसास आया ही नही की यह जो भ्रष्टाचार है, जो vvip culture है, वह सब सामंतवाद ही है, जिसका प्रतिरोध करने से ही तो प्रजातंत्र ढांचे की नींव पड़ी थी। हम रोग को और इलाज एक साथ मिलावट करके अब रोग के लाइलाज़ होने के कारक ढूढ़ते थे कभी तो काबिल नेता की कमी, और कभी जनता की कमी समझे बैठे थे। संविधान में ही रोग की जड़ बसी हुई है, यह सच इतना कटु था कि सबको झखजोर देने वाला था । उनके अनुसार संविधान ने तो उन्हें उपहार-रूपी आरक्षण दिया था ,जिससे कि उनका हक उनको मिल रहा था !!

तो यह मानने को, सुनने को वह वर्ग तैयार ही नही रह गए कि आरक्षण की खीर के नीच ही समाज को जहर दिया जा रहा है, समाजवाद नाम से, जो रोग कि आरक्षण कभी मिटा नही सकेगा। !!

यह क्या हुआ ??!!!

यह क्या बोल दिया ??!!!

बाबा साहेब की काबलियत पर सीधा सवाल था यह तो !!!

मगर बात यूँ है कि सवाल सिर्फ बाबा साहेब का नही है। वह तो मात्र एक अध्यक्ष थे, निर्माण समिति के। और समाजवाद तो उनके लिखे मूल संविधान में था भी नहीं। वह 1976 के संसोधन से लाया गया था।

और बात यूँ भी है कि क्या हम भी भक्तों की तरह प्राचीन ऋषि-मुनियों को आज के वैज्ञानिकों से अधिक बुद्धिमान मानेंगे? क्या हम भी भक्तों की तरह तब की संविधान निर्माण समिति को आज की सच्चाइयों को देख परख के निकलते सबक से अधिक बुद्धिमान और श्रेष्ठ मानेंगे ?!!

बरहाल, वो निर्माण समिति के सदस्य सही थे या फिर ग़लत, जो भी हो, उन्होंने कुछ रास्ते इसीलिए ही खुले छोड़े थे, कि हम भी कभी इतने काबिल शायद बन जाएं कि अपना भला-बुरा खुद से समझ सके। तब हम शायद कुछ बदलाव करना चाहेंगे।

 इसलिए सवाल अब उनकी ग़लती का नही है, हमारी सोच का है कि क्या हम सच को स्वीकार करने को तैयार हैं या नही ? यदि हैं, तो फिर निजीकरण को हमें प्रजातंत्र का सारांश मान लेना होगा, और समाजवादी सरकारीकरण और upsc के चंगुल से आज़ादी के लिए तैयार होना पड़ेगा।

Technical datasheet on the Psychopaths and The Good Conscience

Regarding Psychopaths, the understanding given in the wikipedia and also various Literature from the professional association of the practising Psychologists is that Psychopaths are people who RUN AFTER THE SUCCESS such that they don't take any self-adopted stopover in their deeds , and decisions. This , the psychologists , explain is due to the absence/developmental troubles of the basic 'organ'  available in the human being which helps every man judge the Right and the wrong by himself. This is what the Sceince and the laws yet don't know much about , although they admit the existence of it , and call it by a name 'Conscience', a name which have been awarded to the organ by various religious systems.

So, a Psychopath is basically a Conscience less person.

This discussion leads the Psychologists to describe as to what the Conscience is like. Basically, the study is somewhat similar to how in the Mathematics, the scholar study about the Complex Number theory. The exact value of the underroot of -1 is not known, but it is yet nicely known and understood the properties and the nature of that unknown answer. It is in the same sense that the science does not know what organ exactly is the Conscience, but it knows few things about the nature of it.
For example, one of the most common function of the Conscience is it's ability to give every owner of it a self-adopted limits of the deeds and the decisions that it may undertake in order to meet it's survival necessities (or "the Success'). A Conscience -borne person is very often a SELF-DEFEATING person. The extreme example of a Self-defeating , truthful and honest man is Raja Harishchandra of the Hindu mythology fame. (Remember the first Bollywood cinema was made on this person). Most of the Hindu Gods will show signs of self-defeat in their character and stories . Lord Rama undertook "vanwas" and adopted by himself to fulfil the promises of his father . That is the Good Conscience. Similarly, Lord Krishna himself lived between the Gwals and dispossessed of his kingdom rights. His friends , the pandavs also practsied extreme self-defeating self-control through the incidents of Lakshyagrih, the Chausar play, the Vanwas and the Agyatwas.

Anyways , that is nature of the Good Conscience- if there is Conscience in a person - it acts to put some VOLUNTARY limitations on the person which very often lead to his self-defeat
 Many of you may, therefore, find it foolish and may curse the organ of Conscience because of this particular nature of it. But believe you me, if you don't accept the reality of it, you are most likely a Psychopath, and you need to visit a psychiatrist to help you !.

The good conscience also motivates - in extreme cases- FORCES or COMPELS the owner of the organ to protest any slightest act of INJUSTICE and the UNFAIRNESS that it may have accidentally witness of even if on someone else. This makes the CONSCIENCE-borne person a NATURAL BORN LEADER. 

Wikipedia has a detail list of people and incidents in the history where acts of GOOD CONSCIENCE have saved the mankind and humanity from catastrophe even at the cost of SELF SACRIFICE .
The famous historical episode of "The man who saved the world" (from a Nuclear halaucast) is one example listed over there.

Simple , basic lessons on Criticism of Socialism

Socialism क्या है ?

Socialism कुछ नही बस सामंतवाद का ही एक आदि रूप है।

संविधान की मूल प्रति में socialism नही था। यह 1976 के 42nd संसोधन करके लाया गया है।

प्रजातंत्र और समाजवाद उतने ही बेमेल (immiscible) होते हैं जितना कि तेल और पानी।
 समाजवाद का ही by product होता है bureacratism और crony capitalism।

Simple , basic lessons on Criticism of Socialism

Conscience, the Spiritual Education are intermediate stops on the path of development of the civilised and progressed society

There is one thing I have made observation of, from my background of receiving "divine education" 🤪😃 from CMS, and then later have interactions with people from other parts of our country as well as people from many other countries  of the world ,

That, there is a spiritual sense and an existential need of the being, which is at the heart of formation of a civilized and progressed society .

In laws , in psychology and perhaps somewhere in the neurology too, there is existence of thing called as the  *Conscience* . Spirituality is the method to feed and nuture in a positive , productive way, the *Conscience*

Remember , reading about the Conscience in Class V by Neeta Zaidi madam ?

The conscience is necessary so to apply the principles of fairness and justice .  The correct application of these principles is necessary so that we may build a civilised society.

So, if we end up corrupting the spiritual environment of our society, for example , by way of the Sainthood and Priesthood going away into the hands of bad people - the fraudsters and imposters , we are destined to make or society a living hell.

Once the spiritual environment is tampered in a society, We will have in abundance the psychopaths , the lunatics ,

कैन्हैया कुमार को एक खुला पत्र - समाजवाद और प्रजातंत्र के विषय मे

https://www.youtube.com/watch?v=0fYaSIY5yxQ

कन्हैया कुमार की बैंक कर्मियों के सम्मलेन में दिये गए भाषण को सुना रहा था।  बेहद लज़्ज़तदार बिहारी लहज़े में दिए गए संवाद ,और किसी रमणीक पर्वत स्थल की घुमावदार सड़क की तरह गोलगोल तर्कों से भरा कन्हैया का भाषण देश के काफी सारे लोगों की तरह मुझे भी अक्सर बहोत पसंद आता है।  दिक्कत बस एक है--कि , क्योंकि मैंने कोई PhD  नहीं करि है, इसलिए मैं कभी कभार अपने  अनुभव और ज्ञान के आधार पर जब उसके तर्कों को परखता हूँ तो अपर्याप्त पाने लगता हूँ।  मुझे लगने लगता है की कन्हैया को शायद पता भी नहीं होगा की वह किन तर्कों के दृष्टिकोण से समाज में जागृति  लाने की बजाये समाज को अबोधता में ले जाने का नेतृत्व कर रहा है। 

कह्नैया में मुझे वापस एक "समाजवादी" मानसिकता की गड़बड़ दिखती है।  यह भारत वर्ष के इतिहास में शायद अधिकांश नेताओं की कमी रही है की यहाँ के बौद्धिक प्रवीणों ने आजतक यह गुत्थी सुलझायी ही नहीं है की प्रजातंत्र और समाजवाद वास्तव में एक दूसरे के विरोधी विचार है, जो की तेल और पानी की तरह कभी भी घोल नहीं बनाये  जा सकते है। चाहे राम मनोहर लोहिया का समाजवाद रहा हो, चाहे किसी और का -- भारत के नेतृत्व ने  न जाने यह महसूस नहीं किया है की "समाजवाद" कुछ  और नहीं, बल्कि पुराने सामंतवाद का ही आरम्भिक primitive स्वरुप का ही उपनाम है।  आप अपनी कल्पनाओं में  भी इसको महसूस कर सकते है, बशर्ते की आपने जीवन में  कभी किसी दबे-कुचले, दास प्रथा से अभिशप्त व्यक्ति की पीढ़ा को अपने हृदय से महसूस किया हो, और सोचा हो की कहाँ से आयी होगी मानव सभ्यता में यह कटुता की इंसान के कुल में जन्मे प्राणी को ही दूसरे इंसान ने इंसान का दर्ज़ा नहीं दिया होगा । ज़ाहिर हो जाना चाहिए कि इतिहास में जो कुछ भी बर्बरता घटी है- वह हमेशा किसी न किसी तथाकथित "भले से "  तर्कों से ही हुई होगी। पुराने हड़पा और मोहनजोदड़ों में बसे लोग भी समाजवाद जैसे व्यवस्था में ही बसते रहे होंगे जो की भारत के गावों में आज भी पायी जाती है , और  फिर हमारे समाज ने न जाने कैसे यात्रा करि होगी १८वी शताब्दी के अंधकार युगी दास प्रथा और सति  प्रथा तक ?

मेरा अनुमान है की दुनिया का कोई भी इंसान अपनी साधारण बुद्धि से  जिस प्रकार की   व्यवस्था से अपने समाज को चलना चाहेगा- वह  घूम फिर  कर "समाजवाद" का ही रूप होंगी।  ऐसा इसलिए क्योंकि इंसान साधारण बुद्धि में रहते हुए भविष्य की जटिल मुश्किलों और सत्य की कल्पना नहीं कर सकते है।  इंसान की कल्पना किसी   बालक की तरह होती है , जिसमे सभी  बच्चे सदैव बचपन में रहतें है , और माता-पिता कभी बूढ़े नहीं होते है।  कन्हैया कुमार की भी दिक्कत वही है।  वह छोटे बच्चे की तरह कल्पना कर रहा है।  बस , वह  आज़ाद भारत के ७०  सालों  के प्रशासनिक  व्यस्वस्था के इतिहास को अनदेखा करते हुए बच्चा  बन जा रहा है।  वह शायद किसी भक्त ( भाजपा समर्थक वर्ग)  की तरह भ्रष्टाचार को कांग्रेस पार्टी की देन  समझता है।  (या शायद मोदी, या किसी फिर और की ). वह भ्रष्टाचार को "समाजवाद" में से ही निकलता विषदन्त नहीं मानता  है।  ज़ाहिर  भी है , कन्हैया ने Phd  समाज शास्त्र के विषयों से करि है तो फिर वह प्रशासनिक व्यवस्था और विधि-विधान विषयों को इतना गहराइयों से टटोलता नहीं होगा। 
शायद यही कारण है की क्यों भारत के बुद्धिजीवी प्रजातंत्र के आगे वापस "समाजवाद" में घुस जाते है --  मानो जैसे की उनकी बुद्धि  प्रजातंत्र में "सभी से पूछ कर सारे काम करों" के कोहरे में फँस कर के किसी deadend  पर आ जाती है। और फिर वापस " समाजवाद" में लौट  पड़ती है ,  हैरान परेशान  जान बचा कर भागते हुए की "कहाँ तक सभी काम पूछ कर करोगे, जनता से पूछ-पूछ कर ? यह तो पागल बना देगा"। (मेरा मानना है कि इस मुश्किल का smart solution  समाधान है, यह कोई dead end मुश्किल नही है क्या सभी काम जनता से पूछ कर करने होंगे।)

  मेरे लिए यह अचरज है की क्यों मेरे अलावा शायद किसी  एक भी इंसान ने यह महसूस नहीं किया किया की "सार्वजनिक संपत्ति" वास्तव में " नगर वधु" के समान  है ,  जिसकी  कोई भी सरकारी नौकर या नेता आ कर आबरू लूट  लेता है , बिना  भय और संकोच के।  और "समाजवाद" तो सभी  कुछ को "सार्वजनिक संपत्ति "   बना  देने  हिमायती पद्धति होती है।
यहाँ इस भाषण में कन्हैया कुमार कुल मिला कर घुमावदार  बातों में बैंक व्यवस्था में वापस समाजवाद लाने की ही बोल रहा।

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