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क्यों भारत का प्रजातंत्र बारबार समाजवाद की ओर मोड़ ले लेता है ?

ऐसा क्यों हो रहा है कि हमारा प्रजातंत्र बारबार समाजवाद की ओर मोड़ ले ले रहा है, जो कि मार्ग किसी भी प्रशासन को निश्चित तौर पर सामन्तवाद और नौकरशाही की ओर ही ले जाता है ?

आज जब बैंकों का निजीकरण भी शुरू होने लगा है और खाताधारकों के जमाधन पर बाज़ार का जोख़िम मंडराने लगा है, तब ऐसे हालात में एक सवाल यह भी है की आखिर सरकार की मंशा क्या है? और वह मंशा आ कहां से रही है?

भले ही यह दोनों सवाल अलग विषय बिंदु में से उभरते हुए दिखते हों, मगर इन दोनों सवालों का जवाब शायद एक ही है और जो की भारत के समाज को समझना या चिंतन करना ज़रूरी हो गया है।

दोनों सवाल के मूल में से एक अन्य सवाल निकलता है जो की दर्शनशास्त्र से अधिक वास्ता रखता है। सवाल है की आखिर प्रजातंत्र होता क्या है?
(बस , यह समरण रहे की जब आप प्रजातंत्र विषयवस्तु पर दार्शनिक हदों तक चिंतन करें तब यह भी सोचते रहें की दर्शन का अर्थ आध्यात्मिक चिंतन नही होता है, बल्कि किसी भी विषय पर मूल तत्व तक जा कर चिंतन करना होता है। दर्शन हदों तक चिंतन करने के लिए आवश्यक हो जाता है तुलनात्मक अध्ययन करें, जिसमे संग्रह का निर्माण करना पड़ता है की किन-किन अन्य तरीकों से उस एक विषय को परख किया जा चुका है। )

मुझे यह घनघोर शंका है कि हमारी भारत सरकार के पास यह सब अनूठे-अनूठे हरकतें करने की युक्ति पश्चिमी संस्कृति से आये सलाहकारों से आ रही है।
और मुझे यह शक इसलिये हो रहा है क्योंकि पश्चिमी संस्कृति में ही प्रजातंत्र का अभिप्राय "बाज़ारवाद" की दृष्टि से देखा और समझा गया है, न की पूर्वी संस्कृति में। पूर्वी संस्कृति में प्रजातंत्र का अभिप्राय जिस तरीके से बारबार समाजवाद की ओर मुड़ रहा है, उसी से यह पता चलता है की पूर्वी संस्कृति में प्रजातंत्र को जो कुछ भी समझते हों, मगर वह कम-से-कम यह तो निश्चित है की "बाज़ारवाद" नही है।

एक सवाल यह बाद में टटोलेंगे की क्या हमे प्रजातंत्र को बाज़ारवाद की  नज़रो से समझना चाहिए? क्या यही सही तरीका है? या, क्या कुछ और भी विकल्प है प्रजातंत्र को बूझने का?

पहले हम यह टटोल लेते हैं की आखिर हम प्रजातंत्र को किस अन्य तरीके से बूझ रहें है, पश्चिमी संस्कृति वाले "बाज़ारवाद" के अन्य विकल्प में।
दरअसल हम भारतीय लोगों के संग हो क्या रहा है कि जब भी दार्शनिक धरातल पर यह सवाल हमारे सामने आ रहा है की प्रजातंत्र की असीम स्वतंत्रता और स्वेच्छा-सर्वशक्तिमान  के प्रभाव में यदि हर एक को आज़ादी मिल जायेगी तब जो हर एक कोई अपनी-अपनी मनमर्ज़ी से हरकतें करेगा और फिर आपसी झगड़े होंगे, तब उसका समाधान कैसे किया जायेगा? यहाँ हमारा जवाब स्वतः हमारे सांस्कृतिक दर्शन में से प्रभावित होकर निकल रहा है कि हमें "सरकार" नामक एक सामाजिक संस्थान बीच में बैठानी पड़ेगी जो की दो लोगों के बीच हर-एक की मनमर्ज़ी के प्रभाव क्षेत्र को कम करेगी , छटनी करेगी और समाज में शांति-व्यवस्था, law and order स्थापित करेगी।

तो , हम भारतीय नस्ल के लोग प्रजातंत्र के core सवाल पर आ कर जो अपने सांस्कृतिक दार्शन में से उत्तर निकालते है, वही से हम "सरकार" को मूलतः समझते हैं ,और जाने-अनजाने में हमारा प्रजातंत्र बारबार "सरकारी समाजवाद" की राह पर निकल पड़ता है। हम भारतीय लोग 'सरकार' को अपने गांव की पंचायत की तरह बूझते हैं।

मगर मैंने बताया ने, कि दर्शनशास्त्र का मूल गुण यह नही है कि विषयवस्तु पर आध्यात्मिक चिंतन करना, बल्कि संग्रह करना होता है, ताकि तुलनात्मक अध्ययन हो सके।

तो बड़ी जानकारी वाला ज्ञान यह है कि पश्चिमी संस्कृति में इस एक सवाल पर दूसरा जवाब बनता है।

यानी, यदि दो व्यक्तियों का स्वतंत्रता क्षेत्र(अपनी अपनी मनमर्जी का प्रभाव क्षेत्र) आपस में टकरायेगा तब उसको कैसे शंतिव्यवस्था क़ायम किया जाये, इस सवाल पर पश्चिमी सभ्यता "सरकार" नाम की सामाजिक संस्था का अविष्कार नही होने देती है। पश्चिमी संस्कृति के अनुसार तब दोनों ही व्यक्तियों को आपस में मिल करके शांति व्यवस्था के मद्देनज़र सुलह करनी होगी, बीच में कोई अन्य "पंचायत बैठने वाली भूमिका"  में कोई भी अन्य नही आने वाला है- यानी की "सरकार" नामक संस्था का अविष्कार नही कर दिया जायेगा !!!!!!!!

!!!

तो फिर पश्चिमी संस्कृति में "सरकार" नामक सामाजिक संस्थान का अविष्कार कहां और किस स्थान पर किया गया है?
पश्चिमी संस्कृति के अनुसार "सरकार" नामक सामाजिक संस्था की भूमिका यह नही है की वह दो व्यक्तियों के अपने-अपने मनमर्ज़ी के प्रभाव क्षेत्र को कम करे, छटनी-कटनी करे, बल्कि यह है कि "दो व्यक्ति खुद से ही आपसी समझौते में  अपने मनमर्ज़ी प्रभाव क्षेत्र को जो कुछ सीमाबद्ध करें , उसके पालन का स्मरण करवाये"।

तो उनके अनुसार "सरकार " के पास अपनी कोई शक्ति नही है, यानी कोई न्यायायिक शक्ति नही होती है। वह महज़ एक क्लर्क है, जिसका काम स्मरण करवाना ही है, बाकी तय करने का कार्य तो जनता का ही है, न्याय की मूल शक्ति जन शक्ति और जन चैतन्य (public conscience) के पास में है।

पश्चिमी संस्कृति में ऐसा करने से दोनों ही व्यक्ति शक्तिविहीन किसी भी पल नही किये जाते हैं, बल्कि आपसी संघर्ष के तानेबाने में सदैव ही उलझते रहते है, नित नये विषयों पर, बल्कि पुराने विषयों पर भी, और नये नये कोंण से !!!! और सरकार का उत्तरदायित्व होता है उनको उनके आपसी समझौतों के अनुसार शंतिव्यवस्था के मद्देनज़र आपसी संघर्ष से अलग करना।

पश्चिमी संस्कृति के मूल दर्शन में 'सरकार' के पास न्याय शक्ति नही है, महज़ "executive" शक्ति है, यानी स्मरण करने का कार्य पूर्ण करने भर। न्याय शक्ति को जनता में , हर एक इंसान तक में रख छोड़ा है। (हालांकि अभी यह सब दार्शनिक धरातल पर है)

भारतीय संस्कृति के दर्शन के अनुसार 'सरकार' ही पंचायती शक्ति यानी न्याय शक्ति की भी पीठ होती है।
तो हम अपने मूल चिंतन में ही executive और judiciary को अलग करते नही है। और व्यवहारिकता में भी भारत में न्यायपालिका की संरचना में वह सरकार का एक extended अंग ही है।

मेरे अनुसार बैंकों में निजीकरण करने की पीछे सरकार के सलाहकारों की मंशा जो भी हो, मगर दिशा यह है कि वह बैंकिंग क्षेत्र से समाजवाद को खत्म करने बाज़ारवाद को लाना चाहते है। बाज़ारवाद और प्रजातंत्र का मेल पश्चिमी संस्कृति की देन है, न कि भारतीय संस्कृति की।

हालांकि प्रजातंत्र को वास्तविक सफलता में लाने का उचित तरीका बाज़ारवाद ही है, न की समाजवाद ! मगर यह किसी दूसरे लेख में चर्चा करेंगे, कभी और।

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