The 'indiscipline-blaming psychopath'

An indiscipline-blaming psychopath is generally found in offices and work place.

His persistent desires is that every subordinate must follow his orders without any questions, without exercising personal choices , thoughts and ideas, lest he accuse that subordinate of "indiscipline". 

The summary of the conduct  of an indiscipline psychopath may be spoken of like this:
Follow my order blindly, or else I accuse of you indiscipline .


The indiscipline-blaming psychopath like to promotes the idea that this country is not progressing, it is such a shabby and chaotic place because people are not in discipline. He has absolute belief in the concept of nationalism, (as the way it is understood from the external enemy threat theory), as such a belief hinges on promotion of Militarism, and which in turn promotes the obedience of orders as virtue of 'discipline', which of course approves in his whimsical understanding and the interpretation that hierarchical justice is what Discipline is. 

The indiscipline-blaming psychopath thinks that he is just doing his duties responsibly while the others are not doing it. And therefore he as a self-imposed burden, a "duty" to make sure that the rest of them also follow their duty by obeying his orders.  

अयोध्या फैसला -- तर्कों के चीथड़ों से तैयार कोट

"न्याय क्या होता है?", इस सवाल को अक्सर juridprudence विषय मे टटोला जाता है।  तमाम तरह के विचारों के संग्रह में एक जगह सूची में यह विचार भी है कि न्याय कुछ और नहीं, बल्कि जज की मनमर्ज़ी होती है। कोई भी जज अपनी सोच के प्रभाव में रह कर ही किसी निष्कर्ष या न्याय पर पहुंचता है। तो, न्याय वास्तव में किसी भी जज के इर्दगिर्द में उसके जीवन के प्रभाव क्षेत्र में पाए जानने वाले  मूल्यों , संस्कारों , से निर्मित होता है। और फिर , किसी भी जज के मूल्यों , संस्कारों को जान कर हम उसके हाथों लिखे जाने वाले न्याय का पूर्वानुमान लगा सकते है।

कहने का अर्थ है कि न्याय आवश्यक नही की सत्य ही हो, हालांकि इच्छित , आदर्श न्याय की परिभाषा यह है उसे सत्य को ढूंढ चुका होना चाहिए ।

मगर यह परिभाषा एक आदर्श परिभाषा होती है, मात्र एक wishful सोच। व्यवहार में न्याय जज की मनमर्ज़ी बन कर रह जाता है। हमसे-आपसे अपेक्षा करि जाती है कि हम मूढ़ों की तरह सब "स्वीकार" करना सीख लें, और वह चाहे जो भी लिखते रहे।

अयोध्या फ़ैसले में भी कुछ यूँ ही हरकरतें हुई है। रंजन "मिश्र" गोगोई ने अपनी मनमर्ज़ी से कुछ भी तर्कों को जोड़-घाट , जोड़ जुगत करके एक assembled computer की भांति एक फ़ैसले रच दिया है। और मीडिया और अखबारों के माध्यम से उसे lap-up करके चिकना और सुंदर दिखाने की कोशिश करि जा रही है, ताकि वह हमारे और आपके गले के नीच आसानी से उतर जाए।

यह तो सभी हिंदुओं की इच्छा थी कि राम भूमि पर एक मंदिर निर्माण हो। अगर सेकड़ो सालो से यह दावा रहा है कि वहां, उस विवादित भूमि पर एक मंदिर था, तो फिर चाहता तो हमारी यही रहने वाली है।

सवाल यही था कि आधुनिक भारत के संविधान की मर्यादाओं का सम्मान करते हुए यह लक्ष्य कैसे साधा जाएगा। आखिर यह विवाद इतने वर्षों इसी लिए खींच गया था, की आधुनिक भारत के सँविधान की मर्यादा भी सरंक्षित करनी थी।

रामचंद्रजी मर्यादा पुरुष थे। मुस्लिम बताते हैं कि उनकी मस्जिदों के निर्माण के लिए एक आवश्यक कसौटी होती है कि जमीन का पाक होना जरूरी होता है। पाक होने की कसौटी में यह भी बात है कि जमीन को किसी और से छीन कर वहां मस्जिदें नही बनाई जाती हैं।


हालांकि इस मामले में evidence का burden बड़ी चालाकी के तर्कों से मुस्लिम पक्ष पर ही आन पड़ा कि वही साबित करें कि उनकी मस्जिद की जमीन पाक थी,
मगर अब यही सवाल हिंदुओं की अन्तरात्मा पर भी खड़ा है, कि क्या यह फैसला मर्यादाओं के भीतर में रह कर किया गया है? क्या वह राम मंदिर की भूमि को पवित्र मानेंगे , या छलकपट से प्राप्त करि गयी "अशुद्ध" भूमि मानेंगे?

कोर्ट बार बार बोलता भी रहा है कि वह यह फैसला संविधान के secular मूल्यों के माध्यम से ही देगा, न कि धार्मिक आस्था के मद्देनजर, मगर सवाल यही है हमारे अन्तर्मन में, की क्या court ने जिन संवैधानिक मर्यादा को बार-बार सर्वप्रधान बताया है, क्या आखिर में उसे निभा सका है?

बहोत उभरती हुई आलोचना यही आ रही है। कि, कोर्ट ने secular मूल्यों को निभाने की बात सिर्फ शब्दों में रखी है, वास्तव में निभाई नही है। आखिर एक वैज्ञानिक रिपोर्ट , scientific investigation report , पुरातत्व सर्वेसक्षण विभाग के द्वारा, जो कि स्वयं भी असिद्ध निष्कर्ष देती है, उसके भरोसे कोर्ट ने इतना बड़ा निष्कर्ष निकाला ही कैसे कि आज का तथ्य (यह की उस भूमि पर एक मस्जिद का निवास है) कमज़ोर पड़ गया अतीत के असिद्ध दावे के सामने ?

असिद्ध निष्कर्ष वाली वैज्ञानिक रिपोर्ट ने ऐसे कैसे अतीतकाल के दावे को प्रमाणित कर दिया और ज्यादा भारी तथ्य बना दिया वर्तमान कार्ल के सर्वदृष्य, सर्वविदित तथ्य के सामने ??

यह एक पहेली है, जिस पर उंगलियां उठाई जा रही हैं।
यह जजों की शरारत का मामला लगता है। कि तर्कों के चीथड़ों से कैसे भी जुगाड़ से एक वस्त्रनुमान फैसला तैयार कर दिया है चालाक दर्ज़ी के द्वारा, जो जज के पद पर बैठा हुआ है।

फैसला तर्कों के चीथड़ों से बना है, खोट और खामियों से भरा हुआ है। साबुत, गट्टे के प्रवाह में बहने वाले कपड़े से निर्मित नही हुआ है, यह पता चलता है तब जब हम फैसले के आधारभूत तर्कों की जांच करते है।

अख़बार और टीवी क्यों कभी भी Whole Truth नहीं बताते हैं ?

अखबारों और टीवी के समाचारों का क्या है ..?

वो तो शायद चाहते ही नही हैं कि इंसानों में स्वचेतना आये की उचित अनुचित खुद से तय कर सकें। इसलिये अखबार या कोई भी समाचार सिक्के के दोनों पहलुओं से एक साथ परिचय नही करवाते हैं। वह आधी जनता को एक तरफ का पहलू दिखाते हैं, और बाकी आधे लोगो को दूसरे तरफ का। और फिर जब लोग आपस मे ही भिड़ते है, मतविभाजन करते हैं, "राजनीति करते है" , तब ही इन अखबारों की दुकान चलती है।

अखबारों या किसी भी समाचार कंपनी के बारे में यह कमी जानी जाती है - कोई भी whole truth नही बताता है।
Whole truth जानने की कसौटी आसान नही है। उसमें घटनाओं का अध्ययन करना पड़ता है लंबे अरसे तक। अध्ययन से अभिप्राय है आसपास में रह कर चिंतन करना, विश्लेषण करना, सहयोगियों और विरोधियों के संग तर्क करना, दूसरों के चिंतन लेख पढ़ना

कहाँ , किसके पास टाइम ही होता है कि कोई किसी भी विषय पर इतना सब अध्ययन कर सके। सस्ते में काम चलाने के लिए अखबार कंपनी सिर्फ उसी की बात छापती हैं जो उनको पैसे देता है।

मगर इस तरह के अखबारों को पढ़ कर आप आत्मविकास ,आत्मसुधार की अपेक्षा नही करिये। आप को स्वयं से ही कार्यवाही करनी होती है अपने खुद के भले को प्राप्त करने के लिये।

Words to ponder : Consciousness and Conscientiousness


Ego never accepts the truth


(copyrights neither owned, nor claimed)

भारत की संस्कृति में स्वेच्छा का अभाव , और मालिक नौकर संबंध में गड़बड़ का मूल

जब मै sci में था, और उसके बाद private foreign companies में काम किया,

एक बड़ा अंतर यही महसूस किया है, कि free will यानि *स्वेच्छा* को conserve कर सकने की क्षमता भारत के सरकारी तंत्र में बहोत निम्म और कमज़ोर है। *स्वेच्छा* की कमज़ोरी के  चलते employee और employer में एक game आरम्भ हो जाता है। employer काम को वसूलने की चालें चलता है, और employee(या worker) गाला मारी की कोशिश करते हुए काम से बचने की।

Employer पैसे कम देना चाहता, या इतने पैसे में कहीं अधिक काम वसूलना चाहता है। employee कम तनख्वा की शिकायत सदैव पालते हुए कम काम करना चाहता है, या अक्सर तो optimal से भी कम करते हुए कामचोरी कर देता है।

मामले की जड़ भारत के तंत्र में "स्वेच्छा" की गड़बड़ से है। भारत की संस्कृति में "साम, दाम, दंड , भेद" का चलन है। यानी "स्वेच्छा" का सम्मान तो संस्कृति के अनुसार ही संभव नही है। यह दशा पश्चिमी संस्कृति के ठीक विपरीत है।

भारतीय संस्कृति में मालिक-नौकर सम्बन्ध का अस्तित्व नही होता है। यहां भगवान राम और भक्त हनुमान वाला सम्बंध है। जिसमे स्वेच्छा ही स्वेच्छा है।
जबकि बाइबिल और कुरान तो बने ही है मालिक नौकर संबंध का एक commandment देते हुए। sunday यानी इतवार की छुट्टी का चलन इस बात की गवाही है। sunday शब्द का मूल ही यहूदी धर्म मे sabbatical शब्द से निकलता हुआ आता है। जी की बाइबिल के old testament में दिया गया है कि हर मालिक को अपने ग़ुलाम को हफ्ते एक दिन छुट्टी देना आवश्यक होगा मालिक को अपने अल्लाह की खिदमत करते हुए ! इस्लाम मे यह दिन जुम्मा मुकर्रर हुआ है, यहूदियों में sunday और ईसाइयों में भी sunday का चलन है !!

जबकि हिंदुओं में राम और हनुमान के संबंध में इतना प्रेम है कि छुट्टी की बात ही नही हुई है 😆😃😃।

हनुमान का दिन मंगलवार है, मगर सिर्फ भोग लगाने के लिए।छुट्टी के लिए नही है।😆😃😃

तो कुल मिला कर हिन्दू धर्म स्वेच्छा को न तो अलग से पहचान करता है, न उसे इंसानी रिश्तों की बुनियाद में कही ढूंढता है। जबकि पश्चिम में स्वेच्छा में ईश्वर का निवास माना गया है।

पश्चिम में *स्वेच्छा* जो बदलने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन - inspiration और motivation - ही जायज़ तरीके माने गए है। यहां भारत तो है ही ' *साम, दाम, दंड भेद* ' वाला।

😆😃

अंग्रेज़ी कानून का आधार ही स्वेच्छा है। यहां स्वेच्छा का स्थानीय संस्कृति में ही अतापता नही है ।

ब्राह्मणी शास्त्रार्थ कला में sophistry का प्रयोग

भक्त लोग मोदी जी और भाजपा की जीत को मोदी जी के क़ाबिल नेतृत्व साबित करने में लगे रहते है।।भक्त ज़ाहिर है कि evm को नही मानते हैं, और साजिशन विपक्ष को evm के प्रति शिथिल करने के लिए भाजपा की प्रचंड जीत को मोदी के काबिल नेतृत्व, विपक्ष की नाक़ाबिल नेताओं के सहारे justify करते हैं।
यह एक चिरपरिचित तरीका है। आप खुद से देखेंगे कि कश्मीर से धारा 370 को हटाने के संग ही  भक्त वर्ग और उनके टीवी चैनल यही साबित करने लगे हैं कि कश्मीर लोग खुश हैं, बल्कि वह लोग मोदी जी का धन्यवाद कर रहे हैं।
अब ट्रीपल तलाक़ में भी देखिए। भक्त लगातर यही साबित करने के दावे दे रहे हैं कि मुस्लिम महिलाएं खुश हैं।
Demonetisation को याद करें। भक्त लगातार दावे कर रहे हैं थे कि आतंकवाद की रीढ़ टूट गयी है, काला धन खत्म हो गया है।
पिछले युग मे जब ब्राह्मणों ने तंत्र पर काबिज़ हो कर बढ़त बनाई थी, तब भी यही दावा किया था कि पिछड़े और दलित वह वर्ग है जिनके यहाँ पढ़ाई-लिखाई कर सकने के दिमाग़ ही नही होता है। और बाद में जब आरक्षण नीति के माध्यम से दलित -पिछड़ा तन्त्र में आ बैठे और अपने को काबिल साबित करने लगे, तब ब्राह्मणों ने बात की लय बदल दी और कहने लगे कि आर्थिक आधार पर हमे भी आरक्षण दो !
सबक यह है कि ब्राह्मणों के संग किसी भी विमर्श या वादविवाद के दौरान न सिर्फ शब्दों को सुनों, बल्कि उनकी बात की लय को भी पकड़े रहें, क्योंकि वह लय को बड़े चुपके से बदल कर तर्कों के संग छल कर देते हैं और आपको अपने तर्कों से गुमराह कर देते हैं।
ब्राह्मणों की तर्कशक्ति की सबसे बड़ी खूबी यही है-- कि, वह अपने विरोधी पक्ष - दलित और पिछड़ा- को पता भी नही लगने देती है कि कब उन्होंने तर्क प्रवाह की लय को बदल दिया है शब्दों को करीब करीब पहले जैसा ही रखते हुए, और फिर उनके विरुद्ध यह कह दावा ठोक दिया  "आप को बात नही समझ आ रही है, क्योंकि आप अल्प-बुद्धि हैं "। यह सारा तरीका ब्राह्मणी शास्त्रार्थ कला का चिर-परिचित क्षय-मात है। इसे अंग्रेज़ी में sophistry बुलाया जाता है, जो कि देखने-सुनने में एकदम debate के जैसा ही होता है।

Rule of law बनाम Good Conscience प्रशासन और न्याय व्यवस्था

*Rule of law बनाम Good Conscience प्रशासन और न्याय व्यवस्था*

Rule of law व्यवस्था के आने से पूर्व जो न्याय व्यवस्था थी , उसे हम good conscience व्यवस्था बुला सकते हैं। इसमे न्याय का आधार हुआ करता था "अंतरात्मा की आवाज़", स्वचेतना।
आपको अभी तक इस पुरानी व्यवस्था के प्रति सुनने में कहीं कुछ ग़लत नही लगेगा।
मगर इसकी खामियां आप बन्द आंखों से सोचिये।
पुरानी व्यवस्था में प्रत्येक न्याय विवादों से घिरा रहता था। क्योंकि अंतरात्मा की आवाज़ हर इंसान की अलग अलग होती है !! तो हर एक न्याय , हर एक फैसला आरोप में घिरा हुआ था कि यह भेदभाव किया गया है, वह पक्षपात हुआ है !

असल मे समाज में भेदभाव और पक्षपात का जन्म ऐसे ही न्यायों में से हुआ है। कुछ न्यायिक फैसले असली में भेदभाव को जन्म देते है, कुछ आभासीय जन्म देते है जहां आरोप और विवाद हुआ होता है।

Christian secularist यहां ही सभी समाज से आगे की सोच सके, और दुनिया से सबसे सशक्त समाज और राष्ट्र को जन्म दे सके। उन्होंने good conscience न्याय व्यवस्था की जगह rule of law की ओर रुख किया। असल न्याय का स्रोत तो आज भी good conscience ही है, मगर बीच मे rule of law का अतिरिक्त प्रबंध कर दिया, जो भेदभाव और पक्षपात को रोक सके। rule of law में लिखित, पूर्व घोषित (यानी नीतिगत ) , स्पष्ट रचित (द्विउचारण से मुक्त), कानूनों को रचने का चलन आया । यह codification कहलाता है। प्रत्येक code का प्रेरणा स्रोत भी लिखित है, जो कि constitution या संविधान कहलाता है।

Standardisation brings to end the Politics in the collective decision making work

At one point Devdutt says "swadanusar"..
And scoffs at it that the word explains our culture in shortest, simplest idea ..
I apply the word _Khichadi_ to mean the same.
The different meanings of _Dharma_ is what is the ado over here.
And the comic relief is that the root of different meaning and interpretation of Dharma is a result of that single idea alone - " _*Swadanusar*_ " or the _Khichadi_
Truth is that we as a culture have made almost no efforts to bring about *standardisation*. We have lived with _*Mixing up*_ A _khichadi_ is a terrible mix-up of lots of ingredients. A _swad anusar_ describes lack of *standardisation* , suggesting that each person is free to work as his own choice and can make endless argument to assert the supremacy of his interpretation over the other, instead of finding the _*conversion factor*_ between two different *standards* , which is often a positive result of the efforts of *standardisation*
A mix-up and a lack of standardisation suggest impurity . And ironically the _impurity_ also connotes with the concept of *Syncretism* , that is the bottom line description of our culture .

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