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यूपी के राजनैतिक नेतृत्व में 15वीं शताब्दी राजसी युग का "समाजवादी" अर्थतंत्र है

अखिलेश के संग कमियां है। अखिलेश "राजनीति करने" को एक पेशा समझते हैं, इंसान के समाज की ज़रूरत कम। अखिलेश के अनुसार "राजनीति करने" में कुछ ख़ास कौशल और ज्ञान लगता है जो हर एक व्यक्ति के पास नही होता है, सिर्फ ख़ास लोगों में ही होता है,  जो की फ़िर राजनीति के माहिर खिलाड़ी होते हैं ।

!!

ऐसा लगता है अखिलेश का world view अभी तक पूरी तरह विकसित नही हुआ है। वह पार्टी को किसी corporate की तरह देखते समझते है। समाज में से उभर रहे leaders को पहचान कर सकने में कमज़ोर हैं। बल्कि समाज को अपने सुझाये हुए व्यक्ति को leader बना कर देते हैं। अखिलेश समाज को आवश्यक राह पर दिशा संचालन कर सकने में कमज़ोर हैं। न ही उनके चुने हुए लीडर। सब के सब आत्म भोगी है। आजमखान शायद थोड़ा बहोत अपने समाज के business interest का प्रतिनिधत्वि करते थे। अखिलेश को अपने समाज की टोह नही है, कि इनकी क्या ज़रूरत है, जिसको पूर्ण करना चाहिए। 

अखिलेश और यूपी के तमाम अन्य नेताओं के अनुसार यूपी की ज़रूरत है कि लोगों के पास नौकरी नही है। तो इसके लिए बारबार यूपी में आने वाले नेतागण सरकार बना लेने पर कोई न कोई सरकारी नौकरी में भर्ती का धंधा खोलते है। और इसके बाद फ़िर शुरू होता है "भर्ती घोटाला'। 

आप कितनों ही सालों की यूपी के घोटालों को उठा कर देख लें। आपको "भर्ती घोटाला" ही दिखाई पड़ेंगे। कभी पुलिस में भर्ती घोटाला, कभी शिक्षा मित्र में, कभी टीचर, कभी कुछ । ये भर्ती घोटाले - यूपी और बिहार के special है। जैसे गुजरात में ventilator घोटाले सिर्फ गुजरात के ख़ास हैं।

क्या वजह है इनके ख़ास होने के?
यदि आप हमारे देश के घोटाले से भारत के लोगों को आर्थिक सामाजिक राजनैतिक सोच पर टिप्पणी करना चाहे, तो आपको इन घोटाले को अध्ययन करने से लोगों के बारे मव पर्याप्त जानकारी मिल सकती है। "भर्ती घोटाला" उन राज्यों के विशेष है, यानी उन राज्यों में होते है जहां के लोग में enterpreneur ship नही है। वही आज देश के बीमारू राज्य रही भी हैं। वहां जब लोग अर्थ शास्त्र की बुनियादी जानकारी में बेहद कच्चे हैं। वह सरकारी सेवा को ही सर्वोपरि समझते हैं और अपने बच्चों को सरकारी सेवा करने के उद्देश्य से ही पढ़ाते-लिखाते है। कहने का अभिप्राय है कि लोगों की मानसिकता के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए व्यक्तिगत लाभ कामना नही है। इन्ही राज्यो में लोग कौशल कार्य - professions , और सरकारी राजसी सेवा - service - में भेद कर सकने में बौद्धिक सक्षम नही है। सभी का सपना होता है अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर बड़ा-बड़ा IAS /Pcs/IPS अधिकारी बनाने का ! यानी लोगों के अनुसार समाज की सबसे बड़ी ज़रूरत होती है अच्छा अधिकारी चाहिए। 

इसके मुकाबले गुजरात में लोग आरम्भ से ही buisness वाले रहे है। वहां पर लोगों को शुरू से ही दुकान खोलने का शौक है। वह परचूनी और stationery की दुकान लगाने में आरम्भ से ही तेज़ है, और उनकी चाहत ही होती है कोई बड़ी कीमत का ठेका मिल जावे उनकी दुकान को। लोग में फैक्टरी के निर्माण करने में भी कौशल सीखने का जस्बा है। वहां के लोग फर्ज़ी ही सही, समाज को तुरन्त ज़रूरत को पहचान करके उसे जल्द से जल्द पूर्त करते हुए व्यक्तिगत लाभ कमाने के मार्ग को देखते है। ventilator घोटाला लोगों की इसी सोच को प्रतिबिम्बित करता है। लोगों ने भांप लिया कि corona काल में समाज की ज़रूरत ventilator उपकरण है। व्यापार और सामाजिक ज़रूरत पूर्ण करना का तुरन्त अवसर यही पर है। उन्होंने लाख प्रयत्न करके कुछ तो बनाया- और कैसे भी दम लगा कर उसे बेच दिया ! जल्दबाज़ी में परीक्षण और गुणवत्ता परीक्षण नही करवाये ! हो गया ventilator घोटाला।

यूपी और बिहार में सबसे आदर्श occupation होता है Ias/Pcs/ips की नौकरी। इसके बाद होती है doctor और  सरकारी विभाग में engineer की नौकरी !  तो लोगों की मानसिकता में समाज की परम आवस्यकता यही है। !!

जब मैं छोटा था, तो कभी स्कूल में चर्चा हुई थी कि स्कूल के लिए आवश्यक क्या होता है? कई सारे लोगों ने जवाब दिया अच्छे छात्र, बाकियों ने कहा अच्छे टीचर , और कुछ बेअक्ल बौड़म थे जिनके अनुसार जवाब था अच्छे class monitors !! यूपी में लोगों को लगता है कि अपने देश को अच्छा और प्रगतिशील बनाने में  अच्छे class monitors ही उनके देश की कमी है! और इसलिये वह अपने समाज की यही आवश्यकता को पूर्ण करने में लगे रहते हैं, अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर IAS/pcs बनाने की क़वायद करते हैं। !! 
मगर यदि आप देखे तो यूपी के लोगों की सोच कुछ वजहों से ग़लत नही है। यहां सबसे ज़्यादा बोलबाला तो इन्ही नौकरी वालो का ही होता है- IAS/PCS/IPS !
क्यों?
क्योंकि नेता खुद अपने आप को समाज सेवी नही , बल्कि पेशेवर मानते हैं ! अखिलेश और उनके जैसे तमाम नेता - बहनजी ("बुआ जी") included, अपने शासन के दौरान बारबार bureaucracy पर अत्यधिक निर्भर करती हैं। योगी जी भी वैसे इसी परिपाटी पर ही चलते दिखाई पड़ रहे हैं।

यूपी के लोग आधुनिक काल के वाणिज्य चरित्र से अनभिज्ञ है। दरअसल पुराने युग में - करीबन 15वी-16वी शताब्दी के काल में- राजा ही प्रत्येक चीज़ का स्वामी माना जाता था। लोग सिर्फ उसकी सेवा में ही तो सब कार्यकर रहे होते थे। यानी यदि कोई लौहार कुछ लोहा ढालता था, तो वह राजा की ज़रूरत के लिए हतियार था; यदि बढ़ई कुछ लकड़ी का सामान बनाता था तो वह भी राज्य सेवा में था। कहने का अर्थ है कि पुराने समय में लोग व्यक्तिगत मुनाफ़े के लिए काम नही करते थे, उनका प्रत्येक कौशल कार्य राज्य सेवा के उद्देश्य से हुआ करता था। बाज़ार नही हुआ करते थे, न ही इतने पैसे वाले लोग जहां कोई लौहार , कोई बढ़ई अपने बेहतरीन उत्पाद को बेच कर मुद्रा कमाई सके ! बेहतरीन मुद्रा कमाई का एकमात्र तरीका था, कि सामान को राजा की खिदमत में पेश करो, वही अपने गले का हार उतार कर ईनाम देंगे, या कुछ अशर्फियाँ देंगे! राजा महाराजाओं के उस काल में सब अर्थनीति "समाजवादी" हुआ करती था।

आधुनिक प्रजातंत्र इस सोच के विपरीत होते है। यहां बाज़ारवाद होता है। राजा को सामान नही, टैक्स चाहिए होता है। तो अच्छा लौहार या बढ़ई अपने सामान को बाज़ार में बेच कर अच्छी कमाई करे, लाभ कामये बस  मगर टैक्स ज़मा कर दे। 

मगर यूपी के लोग और अखिलेश जैसे नेता अभी प्रजातंत्र की इस सोच पर जागृत नही हैं। वह हर बार मुख्यमंत्री बनने पर जाने-अनजाने में "Law and order समस्या" के व्यूह में फंस जाते है, जहां से उनकी निर्भरता IAS/IPS/PCS बन आ टिकती है। फिर इसी नौकरी के लोग ही राज्य के सबसे लाभकारी occupation वाले बन जाते है। जनता पर उनकी शान-ओ-शौकत और विलासपूर्ण जीवन का अच्छा प्रभाव जमता है। लोग प्रेरित होते हैं कि उनके बच्चे भी बड़े हो कर , पढ़ाई-लिखाई करके बस यही नौकरी करें! 

आप देखेंगे कि आज यूपी के लोग ही निजीकरण के विरोधी लोग भी है। ! ज़ाहिर है, यह सब ही समाजवादी मानसिकता का नतीज़ा है। समाजवादी मानसिकता - यानी 
वही 15वी-16वी शताब्दी का काल जब राजा महाराजा होते थे, और तमाम पेशेवर मुद्रा कमाने के लिए राजा को अपने बेहतरीन उत्पाद उपहार दे दिया करते थे !

मगर प्रजातंत्र व्यवस्था का सत्य विपरीत बैठा हुआ है। इसमे बाज़ारवाद और private profit महत्वपूर्ण अंश होता है, इसके सफ़ल होने के लिए।
तो यदि आप आज भी IAS/IPS को सबसे अच्छी, आदर्श occupation देखते है, तब आपका देश ग़रीबी और बीमारू व्यवस्था को अपनी क़िस्मत अपने हाथों से लिख रहा होता है।

अखिलेश उसी समाजवादी मानसिकता का नेतृत्व आज भी करते हैं। वह , योगी जी, मायावती - सब के सब इस व्यूह में फंसे हुए है- बारबार उसी ग़लती को दोहरा रहे हैं। "Law And Order समस्या" के व्यूह में फंसने की ग़लती। bureaucracy को अधिक तवज़्ज़ो देने की ग़लती। वास्तविक कौशल जो कि समाज की ज़रूरत होते हैं- उन्हें मुनाफ़े नही देने की ग़लती।  निजीकरण के संग नही बहते रहने की ग़लती। समाज को काबिल, प्रेरणा कारी नेतृत्व नही देने की ग़लती जो कि समाज को निजीकरण के लिए तैयार कर सके, और private profits की दुनिया में अपना हिस्सा सुनिश्चित कर सके।

वैचारिक मतभेद से अपने ही देश बंधुओं को देशद्रोही और गद्दार केह देना उचित नही है

संघ कि शिक्षा यही रही है कि इतिहास में यह देश हमेशा इसलिये पराजित हुआ है क्योंकि इसमे गद्दार बहोत हुए हैं।

संघ मूर्खीयत का मुख्यालय है इस देश में !

गद्दारी को नापने वाला thermometer नही होता है। किसी को बेवजह गद्दार घोषित करके आप अपने ही बंधु से अपनी सहयोगी सम्बद्ध विच्छेद कर देते हैं। और फिर कमज़ोर, अलग थलग हुए , अपनी पराजय को सुनिश्चित कर देते है। 

समाज में सत्य और न्याय की आवश्यकता इन्हीं दिनों के मद्देनज़र आवश्यक मानी गयी थी। अब जब आपने न्यायिक संस्थाओं के संग छेड़छाड़ करि है, ज़ाहिर है आपने नासमझी करि है, तो समय है अपने मन में गलतियों से रूबरू होने का।
दूसरे बंधु को गद्दार घोषित करके अंदरूनी चुनाव तो जीत सकते हो,
मगर दुश्मन से युध्द नही जीत सकते हो।

अहंकार और सत्यवाचकों को अनसुना करने का आचरण

चुनाव जीतने के लिए सामाजिक चितंन तक को खोखला कर देने से परहेज़ नही किया था।।
तो अब आत्ममुग्धता के पीड़ित आदमी से बौद्धिकता की अपेक्षा कैसे करि जा सकती है? तब भी सत्यवाचकों ने चेतवानी दी थी की संस्थओं के संग छेड़खानी राष्ट्र निर्माण के कार्य में महंगी कीमत पड़ेगी, तुम चुनाव जीतने की छोटी उपलब्धि तो प्राप्त कर लो गे, मगर दीर्घकाल में समाज में से एकता को नष्ट कर दोगे।

मगर आत्ममुग्धता से ग्रस्त इंसान सत्यवाचकों की ध्वनि को सुनता ही कहां है ?!

अहंकारी विधियों से आप भीतरी चुनाव तो जीत सकते है, बाहरी आक्रमणकारी से राष्ट्र की रक्षा नही कर सकते हैं

अहंकारी की पहचान क्या है?
वह आज के हालात में भी अपने ही देशवासियों को एकजुट हो जाने का आह्वाहन नही कर सकता है, क्योंकि बीते कल में इसी मुँह से उसने देशवासियों को अपने-पराये की दीवार से खुद ही तो बांटा था।
अहंकारी आदमी team नही बना सकते है। दुनिया की सबसे mighty पार्टी हो कर भी छोटी से, नयी नवेली दो दिन पार्टी से मिली पराजय , वो भी 63/70 के साथ - ऐसा परिणाम वही राम-रावण युद्ध वाली स्थति का सूचक है- की पार्टी भले ही mighty बनाई हो, मगर वो भीतर से खोखली है -क्योंकि वह अहंकारी प्रक्रियाओं और विधियों से प्राप्त करि गयी थी। ऐसी उपलब्धि समाज में अपने-पराये की दीवार बना कर प्राप्त हुई है,  ये उपलब्धि राष्ट्रीय एकता की आहुति दे कर बनाई गयी है।

रावण को अभिमान की कीमत अपने ही परिवार, अपने समाज और अपने देश का विध्वंस करके देना पड़ा था।

रावण ने राम-भक्त विभीषण से अपने मतभेद को देशद्रोह और राज द्रोह करके पुकारा था

रावण भी शायद यूँ ही युद्ध भूमि की वास्तविक स्तिथि से मुंह फेरे हुए था, 43 की संख्या पकड़ कर के, जबकि इनकी पुष्टि का कोई संसाधन नही था।

विश्वास क्या होता है,-इस सवाल के प्रति आस्तिकता और नास्तिकता का स्वभाव आड़े आ ही जाता है। भक्तगण विश्वास को भावना समझते हैं,
Liberals को प्रमाण चाहिए ही होता है, सत्य को जानने की चेष्टा रहती है ताकि उचित निर्णय लिया जा सके, आज़ादी चाहिए होती है सवाल पूछने की और खुद से जाकर जांच कर सकने की।

राम और रावण के युद्ध से यही सबक मिला था। रावण सोने की अमीर लंका का राजा हो कर भी बानरों से बनी सेना से परास्त हुआ था, क्योंकि राम में बानरों का "विश्वास" था । वह इसलिये की राम असत्य नही बोलते थे, संवाद और प्रश्न उत्तर के लिए प्रस्तुत रहते थे, सब को संग ले कर चलते थे , team बनाना जानते थे। 

अहंकार ही इंसान को भीतर से ही परास्त कर देता है। अहंकारी team नही बना सकते, धर्म और मर्यादा का पालम नही कर सकते हैं, असत्य बोलते हैं, तथ्यों को अपने ही लोगों से छिपाते हैं, अपने ही लोगों को गुमराह करते हैं , सर्वसम्मति के निर्णय नही ले सकते हैं।

अहंकारी व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गद्दार , देशद्रोही घोषित करते हैं

अहंकार से ग्रस्त इंसान, अब देशवासियों को एकजुट हो जाने के आह्वाहन से डर रहा है, कि सवाल उठेंगे की यह कैसे तय होगा की देशवासी कौन-कौन है? - आधार कार्ड से, या CAA प्रमाणपत्र से, NPR प्रमाणपत्र से, PAN कार्ड से, पासपोर्ट से, - कैसे?

अहंकारी के पास और कोई चारा नही है, सिवाए की लोगों को गद्दार होने का अपमान करके उन्हें उकसाये ताकी वह संग आ सकें।

अहंकारी की सभी विधियां तिरस्कार और अपमान से ही तो जाती है। जब विजयी थे -तब अपमान किया, और अब जब पराजय का संकट है - तब भी अपमान कर रहे हैं।

समझ में आ जाना चाहिए क्यों हर एक आक्रमणकारी ने देश को रौंदा था।

भक्तों को सत्य के स्थापना का सामाजिक , राष्ट्रीय महत्व नही मालूम है

सत्य प्रमाण से ही साबित होता है, यह अलग बात है सत्य के अन्वेषण की प्रक्रिया dialecticals के सिद्धान्त के अनुसार thesis और anti thesis के अनगिनत चक्र पर चलती है।

आपसी विश्वास प्राप्त करने में सत्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, इसलिये समझदार इंसान सत्य से छेड़छाड़ नही करते है। बल्कि सत्य की स्थापना में सहयोग देते हैं।

भक्ति में सत्य का कोई महत्व नही होता है।  भक्ति तो केवल मन के भावना में से निकल आती है। इसमे प्रक्ष उत्तर नही किये जाते हैं। वैज्ञानिक चिंतन नही होता है, विश्लेषण नही होता है - और फिर स्वाभाविक तौर पर - शोध और अविष्कार भी नही होता है।

भक्ति केवल मन की शांति देती है, बाकी दुनियादारी में समाज और देश को रौंदे जाने की भूमि सिंचाई करती है।

भक्त न तो सत्य का महत्व जानते है, न ही समझदारी रखते है की सत्य के साथ क्यों छेड़छाड़ नही करनी चाहिए। वह संस्थाओं को विध्वंस कर देते है, और दूसरो पर आरोप लगा देते है बर्बादी का।

क्या योग और ध्यान से मनोरोग समस्यायों की सामाजिक चेतना नष्ट होती है?

ध्यान और योग को आजकल stress से जोड़ कर के भी प्रसारित किया जाता है, कि इन्हें करने से stress से मुक्ति मिलती है। आधुनिक जीवन में stress बहोत अधिक मात्रा में होने के तथ्य को बारबार उछाला जाता है, क्योंकि जब ये बात जनमानस में पकड़ में आयेगी, तब ही तो लोग ईलाज़ के लिए ध्यान और योग की ओर खींचेंगे।

मगर इन सब सोच में भी सांस्कृतिक मोह की छाप है। आवश्यक नही है कि सभी सभ्यताएं , धर्म और संस्कृतियां stress यानी तनाव के प्रति यही समझ रखते हों! कल ही योग और ध्यान विषय से संबंधित internet पर कुछ खोजते समय Dialectical Behavioural Therapy (DBT) पर कुछ दिखाई पड़ने लगा। कुछ वक्त लगा सोचने में की योग/ध्यान का DBT से क्या संबंध है। अगली ही search में DBT से बात सीधे Boderline Personality Disorder (BPD) की ओर चली गयी। 
BPD से पीड़ित व्यक्ति छोटे छोटे तनावों के दौरान mood की लहरों पर सवारी करता है, और चंद minute के भीतर अपने mood बदलते रहता है !  BPD के संभावित ईलाज़ में DBT आता है।

तो शायद कुछ अन्य संस्कृतियों में stress का निराकरण आवश्यक नहीं की योग और ध्यान में ही ढूंढा जाता है। व्यक्ति अक्सर करके अन्य समस्याओं से पीड़ित होते हैं और उनके ईलाज़ में हम मात्र योग/ध्यान को प्रस्तावित करके छोड़ देते हैं। जबकि वास्तविक विषय मनोरोग का हो सकता है, या किसी अन्य रोग का- जिसके बारे में न तो कोई शोध होता है, न ही कोई पहचान होती है रोग की ! लोग मनोरोगी के बद-व्यवहार की निंदा और आलोचना करते हुए आगे निकल जाते हैं। बजाये कि उनको सहायता पहुँचाएँ । भारतीय संस्कृति में यह जो जनमानस में धिक्कार कर देंने की प्रवृत्ति है, इसका आगमन शायद ऐसे ही है - योग और ध्यान समाज को अबोध बनाते है। कैसे? लोग रोगों को समझने, पहचानने और ज्ञान संग्रहित करने में मार्ग से दूर चले जाते है। फिर यदि कोई भीषण ग्रस्त रोगी बद-आचरण करता हुआ प्रस्तुत हो जाता है, तब हम उसको धिक्कार कर के, निंदा करके उसे असहाय अवस्था में छोड़ कर दूर हट जाते हैं, कि यह व्यक्ति योग और ध्यान नही करने की वजह से ऐसा हो गया है !!!

वर्चस्व-वादी की शरारत से हुआ था, और हो रहा है भारतीय संस्कृति का पतन

मार्च के महीने को समरण करें , जब कोरोना मर्ज़ के आरम्भ के दिनों में social distance नया नया चलन में आया था। अगर उन अग्रिम दिनों के मोदी जी के सरकार के सरकारी आदेशों और circular के आज अध्ययन करेंगे तो आप देखेंगे की कैसे corona रोग के आगमन से अंध श्रद्धा से पीड़ित आत्ममुग्ध सामाजिक "वर्चस्व-वादी" वर्ग ने मौका ढूंढ लिया था social distance निवारण में से मध्य युग की छुआछूत की प्रथा को उचित क्रिया प्रमाणित कर देने का । आप याद करें की कैसे corona संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिये जब अंग्रेज़ी संस्कृति वाले handshake को त्याग करने के बात आयी थी तब आत्ममुग्ध हिंदुत्व वादियों ने तुरंत भारतीय संस्कृति के "नमस्ते" को सर्वश्रेष्ठ क्रिया बता करके हिन्दू धर्म को दीर्घदर्शी, उच्च और पवित्र आचरण वाला दुनिया का सर्वश्रेष्ठ विज्ञान संगत धर्म होने का दावा ठोक दिया था।

योग और ध्यान ख़राब नही है। मगर सच यह है की भारत में यह सब एक आत्ममुग्धता से ग्रस्त वर्ग के कब्ज़े में है, जो की आत्ममुग्धता के चलते बारबार समाज को अपने कब्ज़े में लेने को क्रियाशील हो जाता है, वर्चस्व-वाद के आचरण दिखा बैठता है। यही वो वर्ग था जो की अतीत में भेदभाव और छुआछूत को भारतीय समाज में लाने का दोषी था, और स्वाभाविक तौर पर - आज भी आरक्षण -नीति का विरोधी है, तमाम कानूनों के बावज़ूद आरक्षण को चुपके से समाप्त कर रहा है।।

यही वह वर्ग है - हिंदुत्व वादी वर्ग - जो की राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम के नाम पर , या की "हम सब सिर्फ हिन्दू है, हम कोई जातिवाद नही मानते है" के भ्रम में समाज पर वर्चस्व ढालना चाहता है और इसने देश के प्रजातांत्रिक संस्थाओं को नष्ट कर दिया है।

आप देख सकते हैं की कैसे इन्हें corona संकट के समय ayush वैकल्पिक ईलाज़ पद्धति के माध्यम से जनता में शोध-प्रेरक विचार की ज्योति को ही बुझा दे रही है। ये वो वर्ग है जो समय से अनावश्यक जाते हुए,  समाज को योग तथा ध्यान में corona के ईलाज़ (बल्कि दुनिया के सभी मर्ज़ का ईलाज़) होने का दावा करके समाज के बौद्धिक मानव संसाधन को witch hunt मार्ग पर भेज कर उन्हें व्यर्थ कर दे रहा है !

यही वर्ग दोषी है भारतीय संस्कृति के पतन का।

बाबा लोग कैसे ध्यान और योग के माध्यम से भारतीय समाज के विकास मार्ग को नष्ट करते हैं

"Immunity बढ़ाओ" के ऊपर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देने के पीछे व्यावसायिक षड्यंत्र दिखाई पड़ता है भारत के साधु-बाबा industry का।
Immunity कोई नीचे लगा लाल बटन नही है, जिसको दबा दिया तो तुरंत- खट से- आप superman बन जाएंगे। ज़ाहिर है, वाणिज्य साज़िश है कि immunity बढ़ाने के नाम पर सामना बेचा जाये - काढ़ा, हल्दी, वग़ैरह वग़ैरह।

यह बाबा लोग ही भारत की संस्कृति का सदियों से सत्यानाश करते आएं हैं, और आज corona काल में आप और हम अपनी आँखों से इन्हें रंगे हाथों देश को बर्बाद करते पकड़ सकते हैं - यदि हम जागृत हो तो।

Corona से जंग में महत्वपूर्ण अंश - "immunity बढ़ाओ" - से कही ज़्यादा ज़रूरी है - virus की पकड़ से बचना। यानी face mask का प्रयोग, sanitizer का प्रयोग, उचित विधि से face mask को हस्त-नियंत्रित करना, खांसी - छींक को रोकना, जूते के तलवे तक को corona virus का संक्रमण मित्र समझ कर अपने जूतों को उतारने, पहनने, साफ़ करने का संचालन करना। आम आदमी को अपनी तमाम छोटी छोटी आदतों में सुधार करके virus के संक्रमण को प्रसारित होने से रोकने का सामाजिक योगदान देना।

इसके अलावा, आवश्यक है कि शोध प्रेरक चेतना समाज में प्रज्वलित करना- ताकि अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त हो corona virus के प्रति, आम आदमियों में। आखिर कार आयुर्वेद इसीलिये पिछड़ गया modern medicine के आगे, क्योंकि यहां पर ज़ोर corona virus को खोजने पर नही दिया जाता है, बल्कि कोई भी बीमारी आये, दम लगा कर ईलाज़ यही होता है की - "योग का आलोम-विलोम राम बाण है", "गिलोय खाने में दवा का राम बाण है" वग़ैरह ! फिर सच को आंच नही । एक न एक दिन आयुर्वेद के "रामबाण" की पोल दुनिया के आगे खुल ही जाती है, जब corona virus को microscope के नीचे इंसानी आंखें खुद से देखने लगती है ! दुनिया में लोग contemplative हो कर virus को समझने-बूझने में आपने दिमाग़ चलाते हैं, जबकि भारत के लोग अपने साधु-बाबाओं के चक्कर में पड़ कर दिमाग़ को "शांत" और "चिंतन शून्य" करने में अपना दिमाग़ लगाते हैं !!

साधु-बाबा industry सिर्फ और सिर्फ "immunity बढ़ाओ" बिंदु पर ही ज़ोर दिये बैठी है - क्योंकि उनको लाभ देने वाला भोगवाद का मार्ग वही से खुलता है - और जहां से वाणिज्य प्रवेश करता है !
बाबा लोग तो - उल्टा - योग और ध्यान पर तक इतना अधिक ज़ोर दिये जा रहे हैं की जन चेतना में से शोध-प्रेरक ज्योति ही बुझती जा रही है !! घंटा वह समाज दुनिया से मुकाबला करेगा जहां "योग" और "ध्यान" को लोग एक उपयुक्त "ईलाज़" साबित करने में अधिक बौद्धिक बल और संसाधन खपाते है, बजाये की प्रवाह (flow) में बहते हुए आसान दर्शन में समस्या को चिन्हित करें तथा समाधान को शोध करें !
बाबा लोगों ने भारतीय संस्कृति में से flow को समाप्त करने में बहोत विनाशकारी भूमिका निभाई है - जो बात शायद यह समझाये कि क्यों हम हज़ार साल रौंदे गये थे - और आज भी दुनिया के आर्थिक पिट्ठू बने हुए हैं - software coolie ! ! हमारा समाज शोध- प्रेरक नही है -हम सब जानते हैं - मगर हम लोग यह नही समझ सक रहे हैं कि "योग" और "ध्यान" की कमान उल्लू-ठुल्लू लोगों के हाथों में है जो की समाज की चेतना में से जागृति की ज्योंति ही बुझा दे रहे हैं , जनमानस को ग़लत मार्ग से इन विद्याओं की ओर आकर्षित करके ! लोग corona virus का ईलाज़ योग और ध्यान में तलाशते है जो की witch hunt से कम व्यर्थ नही है !

"Immunity बढ़ाओ" भी करीब करीब उसी श्रेणी में आता है - witch hunt । immunty के पीछे mind , body, spirit  सब लगता है- जो की संभवतः एक दिन के काढ़ा और हल्दी और बाकी सब नुस्खों से boost नही होने वाला है । शरीर , मन और आत्म की समस्याएं तो आती ही है इंसान के भोगवादी बन जाने से ! और बाबा लोग ईलाज़ भी भोगवाद में ही ढूंढते हैं ! आंवला juice पियो, नीम की tablet खाओ, हमारा बनाया च्यवनप्राश और काढ़ा powder प्रयोग करो, वगैरह ! 

भोगवाद ही जड़ भी, भोगवाद ही ईलाज़ भी ! 

जय हो !

रहे ने हम लोग उल्लू के उल्लू !

क्या योग और ध्यान भारत में वैज्ञानिक चितंन को नष्ट करने में भूमिका रखते हैं?


https://youtu.be/V83rpsn8ob8

यहां इस वीडियो में सदगुरु थोड़ा दुःसाहसी हो गये हैं, और रुद्राक्ष तथा कागज़ की सहायता से परम मूर्खता का प्रयोग कर बैठे हैं। वैज्ञानिक साहित्य में इस प्रकार की "negative energy' का वर्णन आज तक नही हुआ है। Gold leaf Electroscope की सहायता से Cosmic Rays को ढूंढा गया था, मगर रुद्राक्ष की सहायता से Negative Energy को ढूंढे जाने की कोई reporting आज तक नही हुई है।

आधुनिक भारत की त्रासदी यही है। कि भारतीय संस्कृति के नाम पर भारत के "सद्गुरु" वापस दुनिया में अंधकार को प्रसारित करने लगे हैं। आज दुनिया में वापस Pesudo Science पैर पसारने लगी है, और वास्तविक Science को ठोकर मार कर सामाजिक चितंन से बाहर निकाल दिया गया है ! लोग सत्य की बात तो करते सुनाई पड़ते हैं, मगर सत्य को सिर्फ संभावना के दायरे में ही रख छोड़ते हैं, उसे प्रमाण और measureability के दायरे में लाने के प्रयत्न तनिक भी नही किया जाता है। ज़्यादा दुखकारी दर्शन तो यह है कि सब के सब तथाकथित साधु और महात्मा समाज में शोध-प्रेरक सवालों को पूछने वाली अग्नि को ही बुझा दे रहे हैं मानव मस्तिष्क के भीतर में से ! यह सब साधु-महात्मा क्योंकि ध्यान, योग और आयुर्वेद पर अधिक बल देते हैं, इसका अनजाना दुष्परिणाम यह है - (जो कहीं कोई भी व्यक्ति देख-सुन नही रहा है) - कि , लोग सत्य को प्रमाणित करने के प्रति झुकाव को खोने लगे हैं। वह मात्र संभावना और approximation के आधार पर किसी भी "सांस्कृतिक" , "धार्मिक" दावे को सत्य होने को पारित कर देते हैं क्योंकि ऐसा करने से ही उनके मन को शांति और सुख प्राप्त होता है - ध्यान और योग के "दिव्य ज्ञान" के व्याख्यान के अनुसार, सुख और शांति ऐसा करने से ही मिलती है।
तो यह सब साधुजन का योगदान यह है कि श्रद्धा और अंधश्रद्धा को समाज के चलन में वापस प्रवेश देने लगे हैं , जबकि पिछले कई सालों से प्रयास यही हुआ करते थे कि लोग सत्य के तलाश में प्रमाण और परिमेयकरण के प्रति झुकाव बढ़ाएंगे। समाज में प्रकाश और जागृति तब ही आती है जब सत्य को सर्व स्वीकृति मिलती है समाज के सभी सदस्यों से। और सर्वसम्मति का मार्ग प्रमाण और परिमेयकरण (measurability) से आता है।

क्या योगदान था भारतीयों का गणित विषय शून्य के प्रति?

साधारण तौर पर यह तो हर भारतीय बढ़ चढ़ कर जानता है और बखान करता फिरता है कि "मालूम है..." , शून्य का अविष्कार हम भारतीयों ने किया है, मगर हम वाकई में एक बहोत ही आत्ममुग्ध संस्कृति हैं ! इसलिये हम यह जानकारी - जो की संभवतः अस्पष्ट और त्रुटिपूर्ण है - सिर्फ इसलिये सहेज कर दिमाग़ में रखते हैं की हमारी आत्ममुग्धता को गर्व करने का नशा मिल सके। गर्व या गौरव करना ,जो की आत्ममुग्ध दिमाग़ का नशे दार भोजन स्रोत होता है - वह क्योंकि सिर्फ  इतने भर से मिल जाता है, इसलिये हम गहरई में शोध नही करते हैं सत्य को तलाशने की। बस उतना ही ज्ञान जमा करते है जहां से नाशेदार भोजन मिल जाये। भारतीय चिंतकों ने आज़ादी के दौर के आसपास यह बात टोह ली थी हमारे भारतीय लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है, इसलिये हम विजयी संस्कृति नही बन सकते हैं। तो फ़िर मर्ज़ के ईलाज़ में उन्होंने भारत की संस्कृति का गर्व (गौरवशाली) ज्ञान बांटना शुरू किया जिससे भारतीय में आत्मविश्वास जगे। 

मगर नतीज़े थोड़ा उल्टे मिल गये । आत्मविश्वास से ज्यादा तो आत्ममुग्धता आ गयी लोगों में ! अब लोग सत्य को गहराई में टटोलना आवश्यक नही समझते हैं। दूसरी सभ्यताओं के योगदान और उपलब्धियों के प्रति प्रशंसा और सम्मान नही रखते हैं। देसी भाषा में आत्ममुग्धता को "घमंड" नाम के बुरे आचरण से पुकारा जाता है। आत्ममुग्धता शायद मनोचिकितसिय नाम है , विकृत आचरण का।

तो BBC के अनुसार शून्य तो पहले से ही अस्तित्व में था। इसे चीनी और अरबी सभ्यताओं में पहले भी प्रयोग किया जा रहा था। मगर जो योगदान भारतीयों ने किया - आर्यभट्ट और रामानुजन - जैसे गणितज्ञों ने - वह था की उन्होंने शून्य को संख्या क्रम में सबसे प्रथम स्थान से दिया - जो की एक क्रांतिकारी conceptual अविष्कार साबित हो गया तत्कालीन समाज में रोजमर्रा के वाणिज्य में ! 
कैसे ?
वास्तव में संख्याओं का ज्ञान तो इंसानी समाज में आरम्भ से ही आ गया था - संभवतः नैसर्गिक तौर पर। बल्कि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कुछ तो पशु पक्षी भी 6 या 7 तक की गिनती करना जानते हैं । संभवतः कौए और कुत्ते 7 तक की गिनती करना जानते हैं। यदि उनको 7 रोटियां दिखा कर छिपा दो, ताकि वह ढूंढ कर ला सके, तो वह तब तक छिपी हुई रोटियां खोजते हैं जब तक उनकी गणना की सात तक की रोटियां नही मिल जाती है। 
मगर इंसानो में जो नैसर्गिक बोध था संख्याओं का-वह उनको हाथों की उंगुलियों के जितना भर ही था। यानी एक से लेकर दस तक।

लोगों को यह अहसास भी था कि यदि कुछ नही होता है -यानी जब सारी ही उँगलियाँ मुट्ठी में बंद हो- तब उसको भी गिनने और दर्शाने के जरूरत होती थी दैनिक वाणिज्य - लेनदेन और बाज़ार में। मगर यदि 0 को अतिरिक्त गिनती करते थे तब कुल गिनती 11 की हो जाती था , जो की फ़िर अन्य लेन देन के लेखे जोखे में मुश्किल खड़ी कर देती थी ।
1 से लेकर 10 तक 10 संख्याएं, और एक 0, -- कुल मिला कर ग्यारह !! साधारण तर्क वाले वाले जोड़ और घाट करने के नियम 11 की संख्या तंत्र पर लागू नही होते थे ,-जाहिर है -वह नियम 10 के आधार वाले संख्या तंत्र के लिए ही थे

मगर भारतीयों ने दुनिया की यह समस्या सुलझा दी । उन्होंने संख्याओं का वर्णन बदल कर 0 से लेकर 9 तक कर दिया - जिससे वो वापस 10 हो गयीं !
आज के जमाने में यह बात सुनने में आसान और बेकूफी लगे - मगर उस समय यह बहोत क्रांतिकारी बदलाव साबित हुआ ! कुल संख्या 10 हो जाने से वापस लेखे जोखे की किताब की समस्या सुलझ गयी और "कुछ नही" का हिसाब जमा करने का रास्ता भी खुल गया ! 0 के प्रयोग के नियम जानना ज़रूरी हो गया, बस। 

ऐसा कैसे हुआ?
दुनिया भर में संख्याओं का नैसर्गिक अविष्कार मनुष्य के हाथों में दी गयी 10 उंगलियों के होने की वजहों से था। बंद मुट्ठी में से पहली उंगली बाहर निकालो तो संख्या बनती है एक - 1। तो फिर सब लोग संख्या का आरम्भ 1 से करते थे और इस तरह 10 तक जाते थे ।
भारतीय तरीके ने उंगलियों से सीखे गये नैसर्गिक तरीकों की कमियों को पहचान करके, इसका प्रयोग बन्द कर दिया। अब रेत में उपलब्ध कंकडों की सहायता से  संखयों को समझनाआरम्भ कर दिया। कंकड़ प्रतिनिधित्व करते थे व्यापार की वस्तु का ! यानी व्यापार के दौरान ऐसी परिस्थति जब ख़रीदे गये कुल सामान और वापस लौटाये गये सामान बराबर हो जाएं तो कुल लेन देन को शून्य दिखाने का बोध नैसर्गिक संख्या-ज्ञान को विस्थापित करके नये मानवीय तरीके से संख्याओं को समझने की विधि। इस नये मानवीय तरीके में संख्या का आरम्भ 1 से न हो कर शून्य से हो, तब जा कर यह सम्भव हो सका।

स्वाभाविक तौर पर --भारतीयों ने शून्य के संग में दुनिया को negative numbers का भी ज्ञान दे दिया। यानी वाणिज्य के दौरान वह स्थिति जब कुल ख़रीदे गये सामान से कही अधिक वापस लौटा दिया जाये तो इस लेनदेन को किताबो में प्रदर्शित करने का तरीका !

और सिर्फ यही नही, भारतीयों ने यह भी बता दिया की यदि किसी अन्य संख्या को शून्य से विभाजित किया जाये तो उसका उत्तर "असंख्य" माना जाना चाहिये।

यह सब सम्भव हो सका सिर्फ इस बिनाह पर कि संख्याओं का बोध नैसर्गिक मार्ग से प्राप्त करने के स्थान पर कंकडों से किया जाने लगा !!!! नैसर्गिक तरीका - यानी हाथों की उँगलियाँ- हमे 1 से 10 तक गिनने में बांधती थी- शून्य 11वी संख्या बनने लगता था - जिससे सब हिसाब किताब बहोत मुश्किल हो जाता था। 

क्या ध्यान और योग ही भारतीय संस्कृति के विकास और वैज्ञानिक दर्शन के प्रगतिपथ का अवरोध है?

पिछले 4 -5 दिनों से योग और ध्यान (meditation) के कार्यों में लिप्त हूँ और भारत के तमाम साधुओं के विचारों को सुन रहा हूँ। संदीप माहेश्वरी, सद्गुरु जग्गी वासुदेव, श्री श्री, रामदेव - और youtube पर उपलब्ध कुछ अन्य चैनल भी - जैसे GVG Motivation ।

कुछ बातें मेरे मन में भी प्रकट हुईं और सोचा की कही न कहीं उनका भी लेखा दर्ज़ हो जाना चाहिए।

संदीप माहेश्वरी जी ध्यान की विधि में मन-मस्तिष्क को चिंतन शून्य होने के मार्ग को तलाशते हैं। जब की सदगुरु और श्रीश्री मन को शिथिल छोड़ देने की विधि को ध्यान का मार्ग बताते हैं। यानी जो भी विचार मन में आ रहे हैं, उन्हें आने दो, और उन्हें सुनो, सोचे, समझो।  संदीप चाहते हैं की विचारो से मुक्ति लेने के प्रयास करो और इसके लिए आँखे बंद करो, कानो में 3M का ear plug लगाओ-  जो बाज़ार में 15/- का मिलता है- और शांत हो कर अपनी सांसों की आवाज़ सुनो, अपने ही दिल की धड़कन को सुनो।

तो दो अलग-अलग मार्ग हैं ध्यान के। ठीक विपरीत , एक दूसरे के।

ध्यान का उद्देश्य है सुख प्राप्त करना। साथ में, ध्यान करने से मस्तिष्क को बौद्धिक शक्तियों का विकास होता है, आत्म-परिचय होता है, और इससे मस्तिष्क की क्षमताओं का भरपूर प्रयोग करना मालूम पड़ता है। 

रामदेव शारीरिक व्यायाम की विधि बताते हैं। तरह तरह की शरीर को तोड़मोड़ देने वाली वर्जिश हालांकि जो की एक स्थान पर रहते हुए करि जाती है -या तो बैठे कर, या लेट कर, या खड़े हो कर। aerobic या बाकी अन्य व्यायाम स्थान बदल कर किये जाते हैं। भारतीय विधि का योग व्यायाम कोई भी उम्र का व्यक्ति इसीलिये आसानी से कर सकता है।

श्रीश्री , सदगुरु और संदीप जी कुर्सी पर या जमीन पर आलती-पालती मार कर झपकी लेने वाला ध्यान क्रिया बताते हैं, जिनमे सांसे के संग कुछ-कुछ करते रहना होता है। कुल मिला कर मज़ेदार नींद वाला, कुर्सी तोड़। रामदेव वाला कमर-तोड़ ध्यान मार्ग है, और ये वाला कुर्सीतोड़ निंद्रा वाला मार्ग।

बीच बीच में बातों में कुछ बुनियादी बातें प्रस्तुत करि जाती हैं, और प्राचीन भारत की बढ़ाई हो जाती है। रामदेव थोड़ा ज़्यादा ही बहक कर के evidence-based ज्ञान के विरुद्ध तेवर ले बैठते हैं। जिसमे गाय का मूत्र और तमाम तरह के juice का उपयोग शामिल है।

सुख का उद्देश्य में शरीर के कष्टों से मुक्ति का अभिप्राय होता है।

शरीर के कष्टों में जो ख़ास बात मुझे इन सभी के श्रोताओं में दिखती है वह है - auto immune disorders से उतपन्न तकलीफें। यह "कष्ट" (auto immune disorders) हमारी भारतीय नस्ल में बड़ी आबादी में होते हैं। लोगों को कष्टों का पश्चिमी वैज्ञानिक नज़रिया अधिकांशतः मालूम नही है कि उन्हें auto immune मर्ज़ करके जाना जाता है, लोग उन्हें साधारण तौर पर "कष्ट" समझते हैं , और योग और ध्यान से जिस "सुख" का धेय्य किया जाता है, वह शायद ईलाज़ है। 

तो कुल मिला कर हम evidence based ईलाज़ को तलाशने से बच रहे होते हैं। भारत के करीब करीब सभी बाबा और प्रोत्साहन अभिवाचक , सब के सब वैज्ञानिक तर्क, सवाल, और उत्तर ढूंढने के मार्ग के रोहड़ा बन कर खड़े हैं। ध्यान और योग शायद हमारे समाज की तरक्की का अवरोध बन गया है, क्योंकि लोग "कष्टों" का ईलाज़ "witch hunt" विधि यानी ध्यान और योग में ढूंढने लगते है, बजाये की शोध-प्रेरक सवाल करें, और उत्त्तर ढूंढे।

यह सब लोग कुछ न कुछ "आयुर्वेदिक दवा" भी उपयोग करने का प्रचार भी करते हैं, जिन पर सवाल कोई भी नही करता है। सब लोग संभावना के तौर पर आयुर्वेद को स्वीकार करते हैं, प्रमाण को तालश करने में कोई भी व्यक्ति रूचि या मार्ग नही रखता है।

सोचता हूँ की क्या कभी किसी ने हल्दी की उपयोगिता को प्रमाणित करने वाले प्रयोग पर कोई बातचीत करि ?  क्या कभी किसी ने भी "कष्टों" को गहराई से पहचान कर लेखाजोखा तैयार किया है? क्या कोई भी बाबा , साधु , motivation speaker ने प्रमाण और उनकी प्रकृति पर चर्चा करि है? क्या कोई भी पूछता है की आखिर coronavirus क्या है, क्या किसी ने देखा है, कैसे पता चला की रोग इस virus से होता है, या virus साबुन या alcohol युक्त hand sanitizer से आसानी से नष्ट होता है, इसका प्रमाण क्या है? या कि face mask धारण करने से उसे रोक जा सकता है , इसका प्रमाण क्या है? 

सब के सब इन दिनों दम लागए हैं कि अपना inmune system मजबूत करो, और फिर इसके लिए कुछ काढ़ा , गर्म पानी का प्रयोग, हल्दी- दूध का प्रयोग, और भाँप लेना इत्यादि पर ज़ोर दे रहे हैं। 
सब बातें ठीक है, मगर कोई इन सब तरीकों से immume system का "मज़बूत होने" या कि virus को नष्ट कर सकने की क्षमता पर शोध-प्रेरक सवाल क्यों नही करता है?

सब के सब लोग श्रद्धा के प्रचारक हैं, तर्क के नही! कोई भी शोध प्रेरक विचार प्रस्तुत नही करता है, बल्कि "ध्यान" के नाम पर सवालों को नष्ट कर देने की दिशा में कार्य कर रहा होता है। हम आज भी तैयार नही है वह सभ्यता बनने के लिए जो कि की सूक्ष्मदर्शी यंत्र ईज़ाद करके virus को या bacteria को देखें अपनी आँखों की इंद्रियों से। यह सब कार्य तो हमने सोच लिया है कि यह तो हमारी औकात के बाहर का कार्य है, और सिर्फ पश्चिमी संस्कृति में ही ऐसे "भोगवादी" मार्ग से मानव जाती के "कष्ट" को समझ करके "सुख" देने वाला ईलाज़ किया जाता है। हम तो ध्यान और योग और हल्दी-युक्त आयुर्वेद में ही ईलाज़ साधते हैं, alcohol युक्त hand santizer और face mask के प्रयोग के साथ ! !!

खोट संस्कृति में है या नही, आप खुद से सोचें। हम शायद कर्महीनता को ध्यान(Meditation) के नाम से सीखते और अपनाते है, तथा अल्पबुद्धि में कर्महीनता को ही "कर्मठता" मानते हैं।

जापान ने कोरोना संक्रमण को कैसे परास्त किया-- जापानियों का अनुशासन या फिर बौद्ध धर्म की शिक्षा

जापान के बारे में बताया जा रहा है कि उन्होंने corona संक्रमण को करीब क़रीब हरा दिया हैं।
और जापानियों ने  कर दिखाया है बिना कोई test kit की सहायता से, न ही कोई दवा ईज़ाद करके !
तो फ़िर उन्होंने यह कैसे कर दिया? मात्र mask और gloves(दस्तानों) की सहायता से!

जापानी लोगों का "अनुशासन" बहोत चर्चित चीज़ है, दुनिया भर में। अगर कोई ऐसा कार्य हो जो कि विस्तृत सामाजिक स्तर पर समन्वय प्राप्त करने पर ही सफ़लता दे सकता है, तब जापान ही ऐसा एकमात्र देश होगा जो कि ऐसा समन्वय वास्तव में प्राप्त कर सकता है! ऐसे समन्वय को ही हम भारतीयों की छोटी बुद्धि के अनुसार "अनुशासन" बुलाया जाता है। क्योंकि हम सैनिकिया टुकड़ियों में एकसाथ क़दम ताल करते समय ही एकमात्र पल है जब आबादी के छोटे टुकड़े का आपसी परमसहयोग का अनुभव करते हैं। सैनिकों में यह आपसी सहयोग बाहर से पिटाई/हिंसा इत्यादि "बाहरी ज़बरदस्ती" के मार्ग से लाया जाता है, जिस प्रशिक्षण के दौरान इसे निरंतर "अनुशासन" बुलाया जाता है।

मगर जापानियों में यह "अनुशासन" 'बाहरी' नही है। अभी दक्षिण कोरिया ने जब ऐसा ही कुछ corona संक्रमण के प्रति प्राप्त किया था , तब बहोत सारे लोगों ने इसका श्रेय दक्षिण कोरिया के राष्ट्रनीति conscription को दिया था, जिसके तहत वहां देश के प्रत्येक युवा को कम से कम तीन वर्ष की सैनिकिय सेवा देना आवश्यक कानून होता है। भारत के बड़े उद्योगपति श्री आनंद महेन्द्रा जी ने भी हालफिलहाल में भारत में conscription को अनिवार्य करने का सुझाव दिया है। बताते हैं की भारत का औसत युवा किसी भी क्षेत्र में सेवा देने योग्य बौद्धिक तौर पर विकसित नही होता है।

बरहाल, जापान में conscription अनिवार्य नही है, मगर तब भी जापानियों में यह सामाजिक स्वतः क्रिया करने की क्षमता अपार होती है। जो काम एक व्यक्ति करता है, उसे स्वतः ही पूरा देश अपना लेता है और पालन करता है बिना की "आदेश" , police के दबाव इत्यादि के ही।

ऐसा क्यों ? क्या यह "अनुशासन" की देन है?
ध्यान दें, तो जापान और दक्षिण कोरिया, यहाँ तक की उतरी कोरिया और चीन - यह सब देश बौद्ध धर्म की सामाजिक संरचना नीति वाले देश हैं। 

बौद्ध धर्म का क्या योगदान हो सकता है समाज में तथाकथित "अनुशासन" को प्राप्त करने में?

बौद्ध धर्म का जो प्रकार इन देशों की सामाजिक संरचना में कितनों ही युगों से वास करता है, उसमे आत्मसंयम, आत्म ज्ञान, इत्यादि पर बल दिया जाता है। इंसान का उसी आयु के अनुसार विकास में एक पायदान बौद्धिक विकास का भी होता है जब इंसान आपसी सहयोग को स्व:प्रेरणा से प्राप्त करना सीख जाता है। बौद्ध धर्म का योगदान यही है कि उसकी शिक्षा में ही समाज की बड़ी आबादी में इस के उच्च बौद्धिक विकास को प्राप्त कर सकने का मार्ग जुड़ा हुआ है। जहां हमारे यहाँ देश में योग का नाम पर yoga pants निकल पड़ी हैं, और योग का अर्थ किसी किस्म की शारीरिक exercise मान लिया गया है, जापानी,कोरिया और चीन से लेकर विएतनाम , थाईलैंड और बर्मा तक के बौद्ध धर्म में योग का अभिप्राय आत्म-संयम, आत्म-साक्षात्कार, इत्यादि से है।  इसलिये यह लोग बिना की बाहरी "आदेश" या अनुशासन के ही "स्व:प्रेरणा" से यह सब प्राप्त कर लेते हैं।

बौद्ध धर्म का जापानी वर्णन उनके देश की बड़ी आबादी को आत्म-मुग्धता से निवृत करता है। भारत की बड़ी आबादी आत्म-मुग्धता से ग्रस्त है। आत्म-मुग्धता इंसान में सत्य के दर्शन करने की सबसे बड़ी बाधा होती है। जिसे कहावत में कहते हैं कि "खुद को आईना दिखाना" ,  आत्ममुग्धता ही वह बाधा है, जो इंसान को खुद को मन के आईना में देखने से रोकती है, यानी सत्य को पहचान कर उसे स्वीकार करने से रोकती है। 

बड़े ही आश्चर्य की बात है की आत्ममुग्धता के प्रति यह ज्ञान रामायण और महाभारत जैसे काव्यों से ही निकला है मगर आज इस ज्ञान का निवास भारत की संस्कृति में नही मिलता है ! रामायण में जहां रावण के चरित्र में आत्ममुग्धता अगाध है, वहीं महाभारत के गीतासंदेश में भी निर्मोह की शिक्षा है, कर्तव्यों के पालन के प्रति । आत्ममुग्धता से मुक्ति का साधन निर्मोह ही होता है। क्योंकि मोह ही तो मुग्धता को उतपन्न करता है। 

मोह आवश्यक नही है कि वह प्रेम के प्रकार में ही हो ! घृणा भी एक प्रकार का मोह होता है। जब इंसान किसी से घृणा करता है, तब वह निरंतर उसी घृणा पात्र के विषय व्यसन करता है, और तब वह अनजाने में उस पात्र से मोह कर रहा होता है। वह किसी नये, अच्छे ज्ञान को स्वीकार कर सकने के प्रति सचेत नही हो पाता है। मोह से मुक्ति को निर्मोह कहा जाता है। निर्मोही इंसान ही नये ज्ञान , नये मार्ग के प्रति सचेत होते हैं। और फ़िर अन्य बौद्धिक निर्णयों में भी ऐसे इंसान प्रवीण बनते हैं।

जापान के लोग आयु में भी दुनिया के सबसे वृद्ध आबादी के लोग है। कहा जा रहा है कि corona संक्रमण वृद्ध आबादी पर ज़्यादा घातक साबित हो रहा है। मगर जब भी जापानियों ने अपने स्वतःस्फूर्त समन्वय से काबू में कर दिखाया है। 

Theoretical संभावना का प्रमाण पर्याप्त माना जाना चाहिए था, Emperical प्रमाण से तो मिली-भगत होने की गंध आती है

EVM के विषय मे केस तो तब ही ख़त्म हो जाना चाहिए था जब court में मामला theoretical प्रमाणों से आगे निकल कर emperical सबूतों पर आ गया था।

जब निर्वाचन आयोग ने evm की fixing की theoretical संभावनाओं को खंडन करके न्यायालय के समक्ष अपनी दलील दी कि कोई emperical प्रमाण आज तक नही मिला है कि evm मे छेड़छाड़ हुई है, तब ही वास्तव में चैतन्य जनमानस को समझ लेना चाहिए था कि केस अब बेवजह घसीटा जा रहा है। और असल बात यह है कि निर्वाचन आयोग और न्यायालय में मिली-भगत हो चुकी है।

मान लीजिए कि किसी परीक्षा के दौरान कक्षा में कोई छात्र cheating कर रहा है। 

सवाल आपके चैतन्य से यह है कि आप invigilator (निरक्षक) द्वारा कब , किस प्रमाण के आने पर यह मान लेंगे की वो छात्र cheating कर रहा था?

अगर निरक्षक उस छात्र के पास से ज़ब्त करि गयी किसी chit , या किताब को दिखा दे तो क्या यह पर्याप्त सबूत नही होगा कि cheating करि गई है?

दुनिया भर के न्यायायिक मानक में इतना सबूत पर्याप्त माना जाता है कि chit अथवा कुछ अन्य पदार्थ /दस्तावेज़ की प्राप्ति करि गयी है।

मगर यदि फिर भी कोई प्रधानाध्यापक किसी निरक्षक के इतने सबूत को स्वीकार नही करे, बल्कि उस दुराचारी छात्र के दावे को स्वीकार करे कि मात्र दस्तावेज़ को ज़ब्त करना पर्याप्त नही है , यह भी सबूत दीजिये की आरोपी छात्र उसमें किस विशेष पेज संख्या पर किस विशेष सवाल का ज़वाब cheating कर रहा था, 

तब समझदारी यही कहती है कि आप समझ जाएं कि प्रधानाध्यापक और उस आरोपी छात्र में मिली-भगत हो गया है।

क्योंकि प्रधानाध्यक theoretical सबूतों के आगे emperical सबूतों की मांग को पारित कर रहा है !

EVM प्रकरण में इस देश की न्यायपालिका में वही दुष्ट कारनामा चालू हो चुका है सन 2018 के बाद से।

अक़्सर जो सभी उच्च गुणों और मूल्यों के पालन करने का दावा करते हैं, वो कुछ भी पालन नही कर रहे होते हैं

भक्त कहते हैं कि हिंदुत्व में सब ही कुछ है - सहिष्णुता है, सहनशीलता है, पंथ निरपेक्षता भी है, प्रजातंत्र भी है, समानता भी है !!

अक्सर करके जब कोई सभी अच्छे विचारों को अपनाने की कोशिश करता है तब वह अनजाने में Mix-up कर बैठता है। विचारों को उनके उचित क्रम में रखना एक परम आवश्यक ज़रूरत होती है, अन्यथा एक horrible mix तैयार हो जाता है, जो की ज़हर की तरह घातक हो सकता है।

विचारों के Mix up और उसके घातक परिणामों को समझने के लिए  एक उदाहरण लेते हैं। कल्पना करिये कि किसी व्यक्ति के पास में Kent-RO की पानी स्वच्छ बनाने वाली मशीने है। kent की मशीन पानी को reverse osmosis विधि से filtre करने के दौरान काफ़ी सारा दूषित जल , जो की देखने में स्वच्छ ही लगता है, उसे एक pipe से निष्काषित करती रहती है।

वो लोग जो की "सभी " अच्छे, उच्च आदर्शों के पालम करने का दावा करते हैं,  अक़्सर वह बौड़मता से ग्रस्त हो जाते है, और वो उस दूषित निकास जल को वापस अपने पानी के ग्लॉस में मिला देते हैं, "जल संरक्षण' के अच्छे उच्च आदर्श के पालन करने के नाम पर। ! 

कल्पना करिये की आप बौड़म लोगों से कैसे तर्क करके उनके समझाएंगे कि ऐसा करना ग़लत होगा।

कैसे आप उन्हें बताएंगे कि मौजूदा हालात में जल संरक्षण का उच्च विचार का पालन करना गलत होगा?

आप कैसे किसी बौड़म व्यक्ति को बताएंगे कि अब ग्लॉस वाला जल वापस दूषित हो चुका है ! 
आप क्या करेंगे जब वो आपके मुंह पर जल के स्वच्छ किये जाने का प्रमाण उछाल कर फेंकेगे कि क्या इतनी बड़ी RO मशीन दिखाई नही पड़ रही है, जल को filtre किया गया है?

और अब यदि आप उसे मशीन के निकलते स्वच्छ जल और दूषित निष्कासित जल के मिलन की शिकायत करेंगे , तब वो बात घुमा कर वापस "जल संरक्षण प्रयास" में ले जायेगा, जहां से यह सारा debate /argument आरम्भ हुआ था !

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बौड़मता का अभिश्राप आसानी से परास्त नही किया जा सकता है। 
 Never argue with the stupids; first they bring you down to their standards and then they bear you down with their experience.

भारतीय समाज में कुछ गैर-संवैधानिक आरक्षण कारणों के चलते विज्ञान और छदमविज्ञान को मिश्रित कर देने वाले वाले मिश्रण वर्ग ने देश के अध्यात्म को कब्ज़ा किया हुआ है और छेका हुआ है।

10/05/2020
शायद अंग्रेज़ी भाष्य लोग इस लेख को कभी भी न पढ़े। 

मगर जो आवश्यक चितंन यहां प्रस्तुत करने की ज़रूरत है वह यह कि भारतीय समाज में कुछ गैर-संवैधानिक आरक्षण  कारणों के चलते विज्ञान और छदमविज्ञान को मिश्रित कर देने वाले वाले मिश्रण वर्ग ने देश के अध्यात्म को कब्ज़ा किया हुआ है और छेका हुआ है।

भारत की ज्ञान गंगा में पिछले चंद सालों से सामाजिक चिंतन में शुद्धता और पवित्रता लाने वाली संस्थाएं कमज़ोर पड़ती चली गयी हैं क्यों कि राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रवाद के मार्ग से सही और ग़लत का मिश्रण कर देने वाले वर्ग ने देश पर राजनैतिक कब्ज़ा जमा लिया है !

यह वर्ग विज्ञान को उनके प्रक्रियाओं से पहचान कर सकने में असक्षम में, बस विज्ञान को उनके उत्पाद से ही पहचान पाता है। और क्योंकि अभी राजनैतिक वर्चस्व में है, तो फिर तमाम तिकड़म प्रयासों से उत्पाद पर label बदल कर धर्म का लगा देता हैं, जिससे समाज में धर्मान्ध व्यापक होने लगी है।

क्यों करता है वो ऐसा?

क्योंकि वह खुद नाक़ाबिल लोग का मिश्रण वर्ग है - जो विज्ञान चिंतन शैली से नावाक़िफ़ है। वो नही समझ सकता है कब क्या , क्यों किसी विचार को वैज्ञानिक मानते है, और कब नही। तो वह भ्रामक विचारों से लबालब , राजनैतिक वर्चस्व के माध्यम से स्वयं को समाज में सिद्ध करने पर उतर आ रहा है।

व्यंग अक्सर करके तुकों को उल्टा कर देते हैं।

व्यंग अक्सर करके तुकों को उल्टा कर देते हैं।
व्यंग सुनाई पड़ने में हास्य रस से भरपूर होते हैं, और इसलिये चिंतनशील मस्तिष्क को बंधित कर देते हैं समालोचनात्मक विचारों को शोध करने में।
इसलिये व्यंग हास्य में ही अक्सर उल्टी-बुद्धि , या अंधेर नगरी आदर्शों को प्रचारित किया जाता है। अगर लोग गंभीर अवस्था में होंगे तो ग़लत बात को तुरंत अस्वीकार कर देंगे। तो फ़िर उनको उल्टी बुद्धि का ज़हर कैसे बचा जा सकता है ?
 उत्तर है - व्यंग हास्य की चाशनी में डुबो कर !

हम लोग lockdown यानी देशबन्दी में समाधान को ढूंढ कर ग़लत कर रहे हैं।

10/05/2020
कभी कभी सोचता हूँ कि हम लोग lockdown यानी देशबन्दी में समाधान को ढूंढ कर ग़लत कर रहे हैं।

देशबन्दी से हम शायद शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह छिपा कर खुद को यह समझा रहे है कि ख़तरा टल गया है।
घरों में कौन कौन रहने की क्षमता रखता है? जवाब सचाई से सोचिये गा। बहकावे में मत आइये की घरों में रहने से देश को महामारी से बचा लेंगे। हर कोई इतना सामर्थ्य का नही है - आर्थिक, शारीरिक तौर पर - की घरों में दुबक कर बैठ ले, और अन्य समस्याओं से निपट ले।

घर की चार दीवारें सभी को वैसी सुरक्षा नही देती है जो आप समझें हुए हैं जब आप मंद बुद्धि हो कर जरूरत से ज़्यादा ज़ोर देकर जनता से अपील करते है कि घरों में रहिये, सुरक्षित रहिये।

सचाई यह है कि अब हमें दूसरी रणनीतियां भी टटोलनी पड़ेंगी। मिसाल के तौर पर, test करने पर ज़ोर देने की रणनीति, जिससे हम industry भी चला सकें। चाइना की सरकार ने जब wuhan में देशबन्दी करि थी, तब सिर्फ lockdown करके वह महामारी से जीत नही गए थे। उनकी सम्पूर्ण रणनीति का दूसरा हिस्सा यही था - घर घर जा कर test करना । बिना इन कदम को उठाये आखिर कितने दिनों हम देशबन्दी करके बैठे रहेंगे ? क्या सिर्फ देशबन्दी के भरोसे हम रोगियों को स्वयं से पकड़े जाने का इंतेज़ार करके काम चला लेंगे? जबकि हमे मालूम है कि wuhan में तमाम देशबन्दी के बाद, और इतनी असीम सफलता के बाद भी आज भी कुछ न कुछ कोरोना संक्रमित रोग मिल रहे हैं।

हमें रणनीतियां बदलनी होंगी । देशबन्दी तक सीमित रहने से हम लोग भुखमरी और अकाल को बढ़ावा दे रहे हैं।  हमे सरकार के भरोसे बैठना बन्द करना होगा। हम पुलिस के डंडे के ज़ोर पर सामाजिक दूरी अपनाने के तरीकों बदलना होगा। हमे कम साथियों की उपस्थिति में श्रम करने पड़ेंगे, जिससे की social distance भी कायम रहे, और उत्पादन भी नही रुके।

हमे अपने रोगियों की देखभाल खुद से करनी होगी। हमे लक्षणों को खुद से पहचान करके सहायता और चिकित्सा लेने को निकलना पड़ेगा। हमे डॉक्टरी और nursing के कामों में सहयोग कर्मी बल स्वेच्छा से निर्मित करने होंगे।
टेस्ट kit को ईज़ाद करना सबसे परम आवश्यक कदम होगा, हालांकि वह नियत कार्यवाही नही हो सकता है।
तब तक दूसरे मार्ग सोचने पड़ेंगे।

ऐसा क्यों हुआ यूपी बिहार के समाजों में? क्यों यहां के लोग आर्थिक शक्ति बनने में कमज़ोर पड़ते चले गए?

यूपी बिहार के लोगो की आर्थिक हालात देश मे सबसे ख़स्ता हाल है। यहां के गरीब इंसान के परिवार के बच्चे सिर्फ राजनीति की बिसात पर पइदा बनने के लिए ही जन्म लेते हैं। कुछ बच्चे तो बड़े हो कर कौशल हीन मज़दूर बन कर दूसरे सम्पन्न राज्यों में प्रवास करके, झुग्गी झोपड़ियों में रहते हुए मज़दूरी करते हैं, उन राज्यों के मालिक के शोषण, मार और गालियां, उनके घमंडी हीन भावना का शिकार बनते है,

और बाकी बच्चे देश की सेनाओं और पैरामिलिट्री में भर्ती को कर बॉर्डर पर भेज दिए जाते हैं, गोली खाने।

ऐसा क्यों हुआ यूपी बिहार के समाजों में? क्यों यहां के लोग आर्थिक शक्ति बनने में कमज़ोर पड़ते चले गए? गौर करें तो यह सिलसिला आज से नही , बल्कि पिछले कई शताब्दियों से है क्या गलतियां है? क्यों ऐसा हुआ?

मेरा अपना मत है कि इसका कारण छिपा हुआ है यूपी बिहार में प्रायः पायी जाने वाली धार्मिकता में। प्रत्येक समाज को सशक्त और विकास के पथ पर अग्रसर करने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होती है - आपसी विश्वास। और आपसी विश्वास का जन्म और स्थापना होती है उस समाज के प्रचुर धार्मिक मूल्यों से।

दिक्कत यूँ है कि यूपी बिहार के समाजों में प्रायः पाए जाने वाले धार्मिक मूल्य बहोत अधिक दूषित हो चुके हैं। यहां कुतर्क और आत्ममोह का बोलबाला है। 

यूपी बिहार ने पिछले कई दशकों से कोई भी बड़े धार्मिक नेतृत्व देने लायक जनप्रिय नेता भी नही दिया है। गौर करें कि जो भी दिग्गज नेता यूपी से आये है जो राष्ट्रीय राजनीति पर राज कर सके , वो ब्राह्मण कुल से थे। ब्राह्मण कुल में स्वार्थ , आत्म मुग्धता बहोत अधिक मिलती है। वही हश्र हुआ है इन क्षेत्रों की धार्मिकता का भी। अटल बिहारी बाजपेयी भी कोई इतने अधिक जनप्रिय नही बन सके कि खुद अपनी पार्टी की सरकार को दुबारा कायम कर सके थे।

वो व्यक्तिगत तौर पर बड़े नेता हुए, मगर जनप्रियता में इतने सक्षम नही थे कि सामाजिक कायापलट कर दें।
धार्मिक नेता का उत्थान समाज को विकास की राह पर मोड़ने के लिए आवश्यक कदम होता है। महाराष्ट्र में शिरडी के साईं बाबा से लेकर बाल गंगाधर तिलक और खुद वीर सावरकर ने भी बहोत कुछ योगदान दिया अपने समाज के धार्मिक मूल्यों को उच्च और निश्छल बनाये रखने के लिए।

धार्मिक मूल्यों की निश्छलता को कायम रखना और जनमानस में उनके प्रति आस्था को बनाये रखना आपसी विश्वास की सबसे प्रथम कड़ी होती है।

मगर यूपी में यह कमी पिछले कई शताब्दियों से उभर कर सामने आई है। लोग आस्थावान तो हैं, बिखरे हुए हैं अलग अलग धार्मिक नेतृत्व की छत्रछाया में। लोग अंध श्रद्धा वान बनते चले गए हैं

और बड़ी दिक्कत है कि धार्मिकता ने स्वयं की शुद्धता , पवित्रता और आधुनिकता को बनाने के प्रयास समाप्त कर दिए हैं। जबकि इधर महाराष्ट्र , गुजरात मे आधुनिक धार्मिक शिविर जैसे iskcon और स्वामीनारायण ने जन्म लिए और धर्म को नव युग की आवश्यकता के अनुसार संचालित करने कार्य निरंतर पूर्ण किया है।

क्या आप जानते हैं कि बहिन मायावती क्यों उत्तर प्रदेश से आये प्रवासी मज़दूरों को कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रदान मदद के विरुद्ध मोर्चा खोल कर खड़ी हो रहीं है ?

क्या आप जानते हैं कि बहिन मायावती क्यों उत्तर प्रदेश से आये प्रवासी मज़दूरों को कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रदान मदद के विरुद्ध मोर्चा खोल कर खड़ी  हो रहीं है ?

बहन मायावती न तो प्रवासी मज़दूरों को खुद कोई मदद करने के लिए आगे बढ़ीं हैं, और न ही वह चाहती हैं की कोई और पार्टी आगे आये। 

क्यों? क्या प्रवासी मज़दूरों में दलित -पिछड़ा वर्ग नहीं है ? क्या यह सब सवर्ण लोग है ? 

नहीं।  

सन २०११ में जब मायावती जी की उत्तर प्रदेश में सरकार  थी और विधान सभा चुनाव आने वाले थे, तब कांग्रेस पार्टी की चुनावी भाषण में राहुल गाँधी ने उत्तर प्रदेश के गरीब जनसँख्या के भयावह सत्य से परिचय खुल्ले मंच से करवा दिया था।  की उत्तर प्रदेश की आत्मदाह करती राजनीति ने पार्क  और अम्बेडकर के मूर्तियों, हाथियों  की मूर्तियों के निर्माण में यूँ  जन धन व्यर्थ किया है की यहाँ की शिक्षा व्यवस्था , चिकित्सा व्यवस्था जब स्वाहा हो चुके हैं। राहुल गाँधी ने खुले शब्दों में कह दिया था कि यूपी के लोग आज महाराष्ट्र और पंजाब में जा कर गरीब मज़दूरी करते हैं , भीख मांगते हैं, झुग्गी झोपड़ियों और चौल में रहा कर , कैसे भी दरिद्रता में गुज़ारा करते हुए , शोषण हैं, पिटाई खाते हैं , हिंसा झेलते हैं।   राहुल गाँधी में विद्वानता तब भी इतनी थी की इस सच को देख लिया था कि  यूपी की राजनीती इंसानी मस्तिष्क में आत्ममुघ्ता के वैसे वाले नशे दे रही है जिसमे इंसान अपने ही देश और समाज का दहन कर देते हैं।  

ज़ाहिर है कि  क्योंकि मायवती ही मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने राहुल गाँधी के इस सत्य कथन का जम कर विरोध किया था क्योंकि इसको स्वीकार करने का अर्थ था की मायावती ही वो आत्ममुग्ध राजनेता थीं जो राजनीति के नशे में चूर अपने समाज का दहन करे जा रही थीं जन धन को बेमतलब की जगहों पर खर्च करके ! तो मायावती जी और भाजपा के नेताओं ने तुरंत  राहुल गाँधी पर आरोप लगाया की राहुल ने यूपी  के लोगों का अपमान किया है। 
आप यह सब रिपोर्ट गूगल सर्च करके आज भी पढ़ सकते हैं। 

 मायावती ने कहा की यूपी के लोग  बहोत स्वाभिमानी होते है ,  वो मेहनत और श्रम करके कमाते हैं और जीवन यापन करते हैं।  मायावती ने और भाजपा ने यूपी के लोगों की दरिद्रता  के सत्य को कभी स्वीकार ही नहीं किया।  जब मर्ज़ की पहचान गलत होती हैं ,तब इलाज़ भी गलत होता है।  आत्ममुघ्ध लोग दरिद्रता के सत्य को पूर्ण खंडन  कर देते हैं।  क्योंकि ऐसे सच उनको गर्व करने का नशा नहीं होने देते हैं।

Secularism-विरोधी तंत्र मूर्ख तंत्र होते हैं

मूर्खों के देश में विज्ञान अस्तित्व नही करता है। वैज्ञानिक सत्य कुछ नही होता है, कोई भी वस्तुनिष्ठ मापन पैमाना नही होता है। मूर्खों को लगता है कि सब वैज्ञानिक सत्य भी तो कहीं न कहीं इंसानी हस्तक्षेप से प्रभावित किये जा सकते हैं। यानी सब किस्म के सत्य राजनैतिक वर्चस्व के द्वारा संचालित होते हैं। जो राजनैतिक वर्चस्व बनायेगा, वही तय करेगा की वैज्ञानिक सत्य क्या है।

विज्ञान दो प्रकार के होते हैं। perfect science और imperfect science । imperfect science के अस्तित्व को मूर्ख देश में कला-बोधक विषय के समान मानते हैं। यानी इस विषय के सवाल को मूर्ख नागरिक पूर्णतः व्यक्तिनिष्ठ मानते है - यानी, जिसका राजनैतिक वर्चस्व होगा, सत्य वही होगा।

कुल मिला कर मूर्ख देश के लोग राजनैतिक वर्चस्व को ही सत्य का अंतिम पायदान समझते हैं। वह सत्य की तलाश नही करते है, अनुसंधान या शोध धीरे-धीरे उनके देश में खुद ही घुटन से दम तोड़ देते हैं, क्योंकि कोई इंसान इतनी मानसिक बुद्धि का बचता ही नही है जो सत्य की तलाश में यह सब मार्ग पर चल कर साधना करे। मूर्ख देश के सभी नागरिक राजनैतिक वर्चस्व की आपसी लड़ाई में तल्लीन होते हैं।

इसलिये मूर्ख देश में महामारी फैल जाना लाज़मी होता है। 

क्यों? 

क्योंकि कोई भी योग्य डॉक्टर बचता ही नही है। आखिर डॉक्टर की योग्यता की नाप का कोई तो पैमाना होना ही चाहिए, जिससे की पदार्थ
वादी ईलाज़ दे सकने योग्य आदमी चिकित्सा तंत्र पर पहुंचे। मगर जब वस्तुनिष्ठ पैमाना नही है, तो डॉक्टर की योग्यता खुद भी राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई बन कर रह जाती है। ऐसे लोग डॉक्टर और इंजीनयर की उपाधि ले कर तंत्र में उच्च पदस्थानों में विराजमान हो जाते है, जो कुछ भी पदर्थिय समाधान दे सकने में नाक़ाबिल होते हैं। सिर्फ placebo पद्धति के ईलाज़ से काम।चलाते हैं। फिर जब जनता की पीड़ा बढ़ती है, जनता सहायता की गुहार करती हैं तब अमानवीयता से उनकी आवाज़ को दमन करने का मार्ग ही उनका एकमात्र युक्ति रह जाती है।

तो मूरखतंत्र में संस्थाओं का नेतृत्व अयोग्य डॉक्टर और इंजिनीयर करते है, जिनका सबसे प्रचुर नेतृत्व तरीका होता है दमनकारी अनुशासन, तथा पाबंदी। अमानवीयता।

मूर्ख तंत्र नाकबिलों से निर्मित होते है। ऐसे नाक़ाबिल जो कि एक से एक महारत उपाधि से सुसज्जित होते हैं, मगर व्यवहारिकता में कोई भी समाधान नही दे सकते हैं।

Secularism जीवन शैली के शिखर उदाहरण

Secularism एक सांस्कृतिक आचरण होता है।

चार महिलाओं की जीवनी को टटोलें। 

Bill gates, microsoft computer उत्पाद , और दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में शुमार , इनकी पुत्री जेनिफर कैथरीन गेट्स ने इसी साल जनवरी माह में engagement करि है egypt(मिस्र) देश के मूल वाले अमेरिकी मुस्लिम नयाल नासर के संग।
पूरी दुनिया को जो केहना है, करती रहे, कहती रहे, मगर मैडम को तनिक फ़र्क नही है अपने जीवन निर्णय लेने में।  यही secularism सांस्कृतिक आचरण की निशानी है।

दूसरा व्यक्ति है, norway के crown pince की पत्नी Mette-Marit. वो पहले एक waitress थीं , शादी शुदा थी, ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है। मगर जब भी  Crown prince श्री हाकों (श्री Haakon) को उनसे ब्याह करना था, इनको दुनिया की लोकलाज का कोई असर नही पड़ा ! यह secularism की निशानी है।

तीसरी व्यक्ति हैं barrack obama जी की पुत्री, Malia Ann Obama. अमेरिक का इतिहास में प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति श्री ओबामा जी की पुत्री बड़े ही बिंदास तरीके से श्वेत boyfriend के संग रहती हैं।

और चौथी महिला हैं ईमरान खान की पत्नी Jemima Goldsmith.इमरान से निकाह किया, कितने ही साल वहां पाकिस्तान में उनके संग मुस्लिम बेग़म बन कर रही, और फ़िर जिस दिन मूड फ़िरक़ा, समान उठा कर घर वापस हो गयी, और किताब लिख कर दुनिया में बदनाम अलग से कर दिया। आसानी से आजीवन बंधन में बंधने वाला चरित्र नही होता है। स्वछन्द दिल से ही जीवन जीते हैं, हर पल हर क्षण । किसी भी लोकलाज के दबाव में नही आने वाले हैं आसानी से। और न ही मर्यादा के दबाव में ! अंतरात्मा इंसान को बांधने के लिए नही है, बल्कि जीवन जीने में सहयोग देने के लिए है।

एक और महिला है, british राजकुमार श्री henry  और उनकी पत्नी meghan markle। राजपाठ त्याग देने में हिचक नही हुई, अपनी मनमर्जी से, अपनी शर्तों से ज़िन्दगी जीने में।

जापान की राजकुमारी ने भी यही किया था।।अपने मन का जीवन साथी चुनने के लिए राजपाठ का त्याग कर दिया।

और सबसे अंत में british राजकुमारी princess diana को स्मरण करें। अंतिम boyfriend  एक मुस्लिम थे, डोडी अल फाएद। 

यह वो लोग हैं जो की मिसाल है, जहां से हम शायद secularism के आचरण को समझ सकें।

Misgovernance, Democracy and Indian soldiers and the police constables

16 April 2020 A stitch in time, saves nine.
A timely speech , speaking clearly about the extension or the completion , as reasonable, about the lockdown
Could have saved the people the miseries of life , and also saved the police from the guilt of having to use their hard acquired military forces against the common citizen whose only longing is to succeed to find his way back to home.
The common man longing to return back home is something similar to the soldier standing at the battlefront , craving to get back home.
The migrant worker is BUT  the economy variant of that classical military version whom we have known through our movies and other literature.
It is such a sorrow that the bad style of governance by the political leadedhsip is exposing the foot soldiers of the Economy, aka the migrant workers, to the violent forces received at the hand of the ever obedient attitude of the  police constable who so have long ago abjured their inner divine power of the CONSCITIOUS OBJECTION.  Ever since the British setup the cultural environment within the barracks of the soldiers and the sepoys, so to avoid the formation of the storm of a second sepoy mutiny on the Indian soil,,  after the first sepoy mutiny of 1857, to act mechanically,  avoiding  any use of  Conscience, and to apply violence measure against their own common people , reminiscent of how General Dyer the lone British man used the contigent of Indian men as his soldiers to shoot at the Indian people at the Jalianwala Bagh.
The common Indian man must hold least expectations of a Conscitious Objection from the force unit of Indian people. The plug that the British succeeded in putting over the Conscititious of the soldiers and sepoys through the cultural conditioning remains in place even to this date , and one should never expect that any India sepoys and constable will ever have the courage to throw off the plug in order act genuinely to protect the life and property of the common man.
The soldiers are designed for over 200 years to act only as per the Obedience protocol , not by the CONSCIOUS OBJECTION . The system and the laws have been put in place , right from the British era days to this date, firmly enough to never let the conscience of the sepoy to act larger than this intense cultural drilling to obey.
The common man, therefore is at the mercy of the bad governance, unable to find his way back to home
And look at who is the one who is stopping him. The very soldier whose pathos and the longing to see his home have been documented so emotionally in the cinema and the literature elsewhere.

Monotheist धर्म और Polytheist धर्म

Monotheist धर्म और Polytheist धर्मों में सांस्कृतिक फांसले ठीक वैसे ही हैं जैसे अशिक्षित मिठाईवाले के बेटा के विदेश से डॉक्टरी की पढ़ाई करके घर लौटने पर दिखते हैं।
Polytheist धर्म फ़िट बैठते हैं अशिक्षित मिठाईवाले की भूमिका में , जबकि monotheist धर्म उसकी विदेश से शिक्षित हो कर लौटी संतान के समान होते है।
Polytheist धर्मों ने दुनिया भर में जहां भी रहे , समाज में भयंकर अंतर द्वन्द को जन्म दिया। monotheist धर्म का जन्म इस द्वन्द की प्रतिक्रिया से प्राप्त समझदारी और चेतना में हुआ है। एक प्रकार से समझें तो monotheist धर्म एक निवारण थे।
शायद यूसु मसीह के बाद से polytheist धर्मो का उत्थान पूरी तरह से समाप्त हो गया। और जितने भी पुराने polytheist धर्म थे, वो सब के सब अपने अनुयायिओं में अप्रिय हो कर बंद होते चले गये।
क्या कारण रहे होंगे इनके लोगों में अप्रिय होने में?
दुनिया भर से polytheist पंथ के अनुयायी तब्दील हो कर नये युग की चेतना में प्रवेश कर गये, और monotheist धर्मो में धर्म परिवर्तित हो गये। शायद ही कुछ एक पिछड़ी, जड़ भूमियों में कुछ polytheist धर्म बाकी रह गये हैं, जैसे भारत में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायी।
Polytheist धर्म पंथ की अपनी बहोत से कमियां थी, जो की वर्तमान के अनुयायी आजभी न तो समझते हैं, न स्वीकार करते हैं। मज़े की बात है कि ऐसा नही की इन कमियों के बाद इनके समाज स्वस्थ है, और शांति और विकास को प्राप्त कर रहे हैं। बल्कि इनके समाज बेहद अस्वस्थ हैं, बेहद हिंसा से ग्रस्त हैं, अशांत हैं, वापस अंतर द्वन्द को भोग रहे हैं, बाहरी आक्रमणकारियों का शिकार बनते रहते हैं, अंतरात्मा से बेहद भ्रष्ट हैं, नैतिकता में कमज़ोर हैं, विधि का पालन कर सकने में असक्षम हैं, नीति निर्माण में भेदभाव और पक्षपात से विनुक्त नही हो सकते हैं, बौद्धित विकास को प्राप्त नही कर सकते है, बौड़म होते हैं, तथा आज भी निरंतर पाखण्ड से जूझ रहे हैं, ठग और धोखाधड़ी, शोषण भोगते है धर्म के नाम पर।
और इन सबके चलते खुद इनके भीतर आज भी नित नये monotheist उपपंथ जन्म ले रहे हैं, अपने अपने स्थानीय समाजों को एकत्र करके संरक्षित करने के लिए। उन्हें सुरक्षा और शांति दे कर विकास पथ पर अग्रसर करने हेतु।
Polytheist धर्मों में क्या कमियां होती है?
Polytheist धर्मों में औघड़ पना होता है। औघड़ पन को आप neanderthalism करके समझें। यह इंसान के क्रमिक विकास की वो अवस्था थी जब आदिमानव इंसान अभी जंगली वनमानुष से थोड़ा विकास करके गुफ़ाओं में आ कर निवास करना आरम्भ ही किया था। ऐसे काल में मनुष्य की ज़रूरत थी अपने भय पर काबू करना। धार्मिकता का उत्थान उसी मनोवैज्ञनिक आवश्यकता में से हुआ है, आदिमानव के भीतर। भय को काबू करने की ज़रूरत।
इसके लिए प्रत्येक आदिमानव ने जब , जहां जो भी शक्तिशाली महसूस किया, जो की उनके भय के पदार्थ /वस्तु को पराजित कर सकता हो, उनकी आराधना आरम्भ कर दी, ताकि उस आराध्य ईष्ट देव की शक्ति के भरोसे खुद को संरक्षित कर सकें।
तो यहाँ से आरम्भ हुआ आदिमानव इंसानी दिमाग में "भगवान" या देवीदेवता नामक ईष्ट के चलन का। और यही से धर्म निकाल पड़ा।
धर्म ने समाज को बसाने में बहोत अहम भूमिका निभाई हुई है, जो कि वह आज भी निभा रहा है। धर्म से ही आरंभिक नैतिकता निकली है, और नैतिकता के नये आधुनिक युग के संस्करणों से ही विधि यानी कानून और संविधान का निर्माण हुआ है। हालांकि नैतिकता सदैव हर युग में स्थायी नही रही है। पुरानी नैतिकताएं कच्ची-पक्की थी, अभी भी बहोत कमज़ोर थी कि जिनसे वो समाज के बढ़ते दायरे में से राष्ट्रों का निर्माण कर सकें। प्राचीन नैतिकताएं खामियों से भरी हुई हुआ करती थी, अन्याय और अमानवीयता के कर्मो और कार्यों से प्रदूषित थी। समय काल में बौद्धिकता के बढ़ते प्रभाव और प्रसार में इंसानो ने इन अशुद्धियों को समाप्त किया, इन पर विजय प्राप्त करे, और तब जा कर वह छोटे छोटे समाज आपस में जुड़ कर आधुनिक राष्ट्र वाले अवस्था को प्राप्त कर सके।
शक्तिशाली राष्ट्र की अवस्था नैतिकता में और अधिक शुद्धता लाने से निर्मित होती है।
Polytheist पंथों की नैतिकताओं में अशुद्धता बहोत अधिक होती थी और है। उदाहरण के तौर पर - यह समाज भ्रष्टाचार से ग्रस्त रहते हैं क्योंकि लेन-देन या ईश्वर की खुशामद करना, "प्रसाद चढ़ना" इनके अंदर मान्य प्रक्रिया होती है। वहां ये चलन बकायदा प्रसारित करि जाती है। इसी प्रकार, polytheist पंथ में शोषण (आर्थिक और श्रमिक) के विचार के लिए स्थान नही ही। वहां इसको झेलने की शक्ति प्राप्त करने की ईश्वर स्तुति करि जाती है, बजाये की ईश्वरीय आदेश से शोषण को नियंत्रित करें या समाप्त करें।
Polytheist पंथ के समाजों में स्वामी और दस के संबंध में आज भी विचरण करते हैं। इनमें स्वाधीनता के विचार का प्रसार नही है। बल्कि कई इंसानो की अन्तरात्मा आज भी बड़ी सहजता से इस प्रकार के संबंध को स्वीकार करे हुई है। वहां शोषण की पहचान नही है, बल्कि दासत्व में ही निर्वाण और मुक्ति देखी जाती है, ईश्वर से समीप सम्बद्ध प्राप्त करने का मार्ग दिखता है। तो फ़िर आवश्यकता के अनुसार तथाकथित शोषण को झेलने की आवश्यक शक्ति दी जाती है, न कि विद्रोह करके मुक्ति पाने की युक्ति !
Polytheist पंथों में तर्क बेहद प्रौढ़ अवस्था में होते है, जिसके चलते इनके अनुयायी मानसिक तौर पर बौड़म होते हैं। बल्कि polytheist पंथ तर्क से कम, विश्वास के सहारे अधिक खड़े हुए हैं। polytheist पंथ उस काल में उत्पत्ति लिए है जब ज्ञान का भंडार बना ही नही था। तब इंसान सिर्फ विश्वास , या श्रद्धा के अनुसार ही जीव की समस्यायों का समाधान करता था। तब तर्क नही के बराबर हुआ करते थे। यह विश्वास ही आधुनिक युग में, तर्कों के प्रसार के उपरान्त "अंधविश्वास" बनते चले गये। दिक्कत यह है की polytheist पंथों के अनुयायी आज भी अंधविश्वास और तर्क में भेद कर सकने में मानसिक तौर पर योग्य नही होते हैं, और इसलिये बौद्धिक विकास में अपरिपक्व , यानी बौड़म होते हैं।

Narcissism and our Intellectual growth deficiency

Narcissism is the basic source of obstruction in our brains, which is causing the failure to understand the laws and the political sciences in a correct and balanced way.

What the Narcissism is causing is to create prejudiced thoughts within us, which, in turn, is causing a pre-meditative mindset. The pre-meditative mind is refusing to agree and to accept the simplest of rational and common sense argument which maybe arising from the opposite party.

That is how the smack of Narcissism is detected out basically. The Narcissism is a "software fault" of Human brain, where the AUSTIM is the HADWARE FAULT. These both refer to SELF-CENTREDNESS , the Narcissism being described in the milder terms as SELF-LOVE

AUSTIM is a neuropathic problem, whereas Narcissism is psychopathic.

In Austism, you visit a neurologist . It is an early child development problem.

Narcissism generally travels into adulthood as well as old age , as the personality disorder is not yet a fully developed MEDICAL SCIENCE within the Field of PSYCHIATRY.

The Narcissism tampers with the Quality of EMPATHY.
Do you remember how EMPATHY related with the Psychopathy?
In MunnaBhai MBBS , MunnaBhai tells how to judge a person to be a worthy of making a life-partner by seeing his manners to handle the waiter in a restaurant.
That is EMPATHY.

A person who lacks EMPATHY is sure to be Psychopathic.

Isn't it interesting that the EMPATHY, which has got such a critical function to do in the human development, BUT IT is taught , propagated and inculcated BUT only as a religious virtue by one religion - the BUDDHISM - in the form of KARUNA.

EMPATHY has got so much functions to perform in the field of PSYCHIATRY, the Legal knowledge and even the Political Sciences! However, there is no concerted efforts made neither by the School Educationists, nor the various religious preachers to develop the EMPATHY-borne conduct among the students and the followers.

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Didn't you enjoy the convergence of the various streams of knowledge into one , which until now you  were trained through faulty education system of our country , to see as different "subject"
What's more - this convergence story is being brought to you by a person who is neither a FULLY trained PSYCHOLOGISTS, nor a LEGAL PRACTIONER , Nor a POLITICAL SCIENTIST, A Civil Servant or so.

He is a Navigator !  A man who owns a small country of his own away from the land  in some parts of the year.

He is a Master - best defined as a Jack of all Trades (now that's mine small dose of Narcissism)

कोई क्यों बने विज्ञान-संगत? आख़िर क्या आत्म-सम्मानजनक दिया है विज्ञान ने , लोगों को?

भारतीय समाज शुरू से ही मूर्ख और बौड़म रहा है।

इसके कई कारण है। जिनमें कि एक बड़ा कारण यह है कि यहां का अध्यात्म , यानी भारतीय समाज का आध्यात्मिक परिवेश ही ऐसे लोगों की कब्ज़े में है जो कि इच्छित नही है कि भारतीयों की बुद्धि का विकास हो सके। 

दरअसल, भारतीय समाज वैसे तो ब्राह्मण विरोधी होने के लक्षण दिखाता है, मगर वास्तव में यह सब झगड़ो और विवाद के बाद शाम को घर लौट कर ब्राह्मणवाद के दरवाज़े पर ही सुस्ता कर सो जाता है।

ऐसा क्यों? 
क्योंकि ब्राह्मण वाद के मुखर विरोधियों ने कुछ अन्य विकल्प नही दिया है भारत की जनसंख्या को किसी और के दरवाज़े जा कर अपना ग़म , अपने भावुक हालातों को सामना कर सकने के लिए। जब इंसान बीमार पड़ता है, तब आधुनिक विज्ञान से उपलब्ध चिकित्सा इतनी अधिक महंगी पड़ती है कि आम आदमी उसके व्यय को झेल ही नहीं सकता है। फिर वह मज़बूरन आयुर्वेद, योग, आत्म नियंत्रण, भोजन परहेज़, यूनानी, वैध जी, हाक़िम जी, के दरवाज़े जाने को आ पड़ता है।

खुद ही सोचिये, कोई इंसान किस मुंह से विज्ञान समर्थक बनेगा, जागरूक होने में आत्मसम्मान देखेगा, जब की शाम को उसे इन्हीं मूर्खों के दरवाज़ों से ही सहायता मिलनी होगी।

यह वो त्रासदी है जो कि कोई भी सामाजिक जागृति की संस्थान भारतीय समाज को निराकरण नही दे रही है।

आलम यूँ है कि आज विज्ञान भी यदि भारतीयों तक पहुंच रहा है तो वह भी तब जब वह वैध जी या हाक़िम जी के झोलों में से निकाल कर जनता में बेचा जाता है। कहने का अर्थ है कि आम आदमी आज विज्ञान और उसके उत्पाद को वैसे ही समझता-बूझता है जैसा की उसे वह लोग परिचय करवाते है जो की खुद विज्ञान के सबसे बड़े शत्रु होते हैं !!

भारतीय जनता विज्ञान और रीत रिवाज़ के रूड़ी वादी धर्म की शत्रुता के इतिहास से तनिक भी परिचित नही है। जाहिर है, क्योंकि विज्ञान ने खुद से- first hand- भारतीय समाज में कोई सेवा, योगदान नही किया है। आश्चर्यजनक तौर पर विज्ञान की सेवा आम भारतीय के दरवाज़े पहुंची भी है तो धर्म कर्मकांडियों की दुकानों से होते हुए। जाहिर तौर पर उन्होंने अपनी इस परिस्थिति का लाभ कमाते हुए विज्ञान के उत्पाद पर label को बदल कर धर्म, वेद -पुराण, उपनिषदों का फ़ल दिखाया है, और पूरा मौका लिया है जनता पर अपनी पकड़ को मज़बूत बनाये रखने का।

यह है भीतरी , अनकही त्रासदी की क्यों औसत भारतीय आज भी महा बौड़म होता है, वह तर्क संगत , विज्ञान विचार शैली में क्यों नही सोच-समझ सकता है। 

हम लाख कोशिश कर ले मगर लोग गौमूत्र तथा गोबर में ही ईलाज़ को इसी लिए तलाश कर रहे हैं। क्योंकि कोई अन्य सम्मानदायक विकल्प नही है, उनकी आर्थिक क्षमता के भीतर में रहते हुए। वह आर्थिक दबाव में मज़बूर है, अपने विश्वास के भरोसे अपना जीवन चलाने को, जहां की रोगों का ईलाज़ करवाने का विकल्प सिर्फ गौमूत्र और गोबर में ही मिलता है।

विज्ञान वादियों ने गलतियां करि है। 
प्रथम तो यह की वह भारत के समाज को जागृति एक किताबी ज्ञान के रूप में बांटना चाहती है। यह तरीका एक window shopping करने जैसा है। जब तक की लोग दुकान के भीतर घुसने का साहस नही कर सके, और विज्ञान के उत्पाद को उसकी असली दुकान से खुद उठा कर भोग नही कर सके, तब तक वह भले ही window shopping इधर करे, अन्त में वह प्रयोग का समान ख़रीदने रूढ़िवाद के दुकान पर ही जाने वाले हैं। हमारे प्रशासन और समाज ने विज्ञान के सीधा उपयोग करने का सरल मार्ग बनाया ही नही है। बल्कि विज्ञान की किताबे लिख कर बेचने का धंधा खुद ही जमा लिया है। 

आज सरकारी अस्पतालों की हालात किसी से भी छिपी नही है। तो आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि लोग विज्ञान के दरवाज़े आएंगे, जहां उनको सम्मान मिलेगा?

आज isro के शीर्ष वैज्ञानिक भी मंदिर में शीश नमन करके ही अंतरिक्ष यान को प्रक्षेपित करते हैं। आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि आम आदमी रूढ़िवाद में ग्लानि देखेगा और विज्ञान में विश्वास करेगा की यह धर्म से जुदा मार्ग होता है जीवन जीने का।

गलतियां हमारी ही है कि हम विज्ञान को बेचने की कोशिश कर रहे हैं, विज्ञान को समाज सेवा हेतु जनता तक सीधे पहुँचने का मार्ग निर्मित नही कर रहे हैं।

Post-truth and the governments

Post-truth and the governments
The politically a-neutral police can act strict with the opposition and lenient with the ruling party supporters.

And there is no logical way to crack this predicament.
Discrimination can NEVER be -controlled - neither by strictest of legislation, nor by the best of the technology. And Discrimination shares this trait of itself in common with Corruption.
Only the awakened human Conscience is the  treatment for Discrimination and Corruption, as the Conscience works through It's "self-control", and the self-realization mechanics .

Incidentally, Religion is the biggest influential envelop for the Conscience to become awakened.
But what irony ! The religion is itself controlled by those who are raveling with Discrimination and Corruption !!

The trap is circular , 'completely rounded in shape" and therefore inescapable unless we start a new SPIRITUAL THOUGHT
~ the Varanasi level Brahmngyan


The post-truth way of handling the events by our government

We are in a Post-truth era, (the truthism) where the Government do - indulge in-  the scheming and the conspiracy.  They do drama of annoying, "annihilating the enemy", the video-game "surgical strikes" just to irritate the rival group and to massage and stroke the ego of their supporter base, --just for the Brownie Points.
the trump-visit is in the same direction.
The CAA , they are doing truth-ism, by suggesting that they would not trouble domestic population , while the law they have framed is "potentially" loaded to cause harm.
we needed to liberate the Power of the Public Administration from "truth'ism".  These are the days of shameless dr-jekyll-and-mr-hyde government institutions. No one cares for the public trust.

The Post-truth era is built on an assumption that the epoch of the mankind when the nations would indulge in highly destructive battles and wars , is over. Since the people have stopped caring for big-events , where the world could potentially avalanche-breakdown into the wars in the past, the foreign policy makers have "built" new conscientiousness to play the diplomacy . The policy to mix the truth and the false at "literary freedom" to run the governments and the world at their own convenience .

Post-truth and the genuine conscience-keepers of the society
In the post-truth it is very difficult to judge which side should you take a stand. Until now , the enemy wanted to destroy the social fabric of your society , but now our own people are bent to destroy it, whereas the enemy is advising to us how to keep peace and imploring us to keep harmony.
That is the miraculous effect of the post -truth.

Now whatever stand you take , you will have difficulty in settling the morality of your decision with your peers . If you support a post-truth political action, you become a self-destroyer, and if you oppose it, you seem like the enemy country !

The post-truth has brought on a new, hitherto unknown phenomenon -when the state itself would become the enemy of its own society .

Socialism-critic से Socialism-bashing भिन्न करना सीखें

इस तथ्य पर जितना ज़ोर दिया जाये उतना कम पड़ता है कि 'वामपंथ' (leftist) एक विशेषण संज्ञा(adjective-noun) होती है, यह कोई विचाधारा का व्यक्तिवाचक संज्ञा(proper noun) नाम नही है।
वामपंथ नाम से किसी भी विचारधारा का नाम नही है। जो है वह साम्यवाद है, और समाजवाद है।
साम्यवाद (Communism) , यानी वर्गहीन समुदाय के लिए सामाजिक व्यवस्था का सिद्धांत।
और समाजवाद(Socialism) में वर्गहीन होने पर ज़ोर नही दिया जाता है, बाकी सामाजिक व्यवस्था के सिद्धांत का पालन करने के प्रयास होते हैं।
अन्तर सूक्ष्म है मगर फिर भी प्रधान है। society और community के बीच आप को अपने बौद्धिक ज्ञान से जितने अंतर समझ आएंगे, उतना बेहतर आप साम्यवाद और समाजवाद की भिन्न कर सकेंगे। और फ़िर शायद यह भी समझ जाएं की कुल मिला कर दोनों करीब करीब बस species से भिन्न है, वरना तो एक ही genus के विचार है।
और इस genus के विपरीत होता है प्रजातंत्र यानी democracy।
अब एक और महत्वपूर्व ज्ञान। कि हमारे देश में चल रहे संवाद में बहोत बड़ा भ्रम और कुतर्क छिपा हुआ है समाजवाद(/या साम्यवाद) विषय को वामपंथ नाम से संबोधित करते हुए , वामपंथ के विरोध के प्रति। वह यह है की वामपंथ-विरोध के दौरान हमारे देशवासी socialism-criticism के अलावा socialism-bashing के काम पर भी चालू है, क्योंकि बहोत सारे लोगों के पास लिखने के लिये कलम है, मगर चिंतन के लिए आवश्यक बुद्धि नही है। लोग socialism के critic होने के भ्रम में एक आवश्यक जनकल्याण (public welfare) को भी धिक्कार दे रहे है। और तब वह लोग अनजाने में socialism-bashing करते हुए न सिर्फ democracy को विफल करने की हिमायत कर रहे हैं, बल्कि खुद अपने पैरों पर भी कुल्हाड़ी मार रहे हैं - capitalism और fedualistic शोषण का स्वागत करने की हद्दों पर पहुंच जा रहे हैं।
Socialism-Critic होना अलग है Socialism-bashing करने से। आप दिल्ली की मुफ़्त जीवन आवश्यक सुविधाओं की आलोचना करने में socialism bashing कर रहे हैं, criticism नही। आखिर यह तो democracy के welfare state की सफलता के लिए भी जरूरी है की इंसान एक निश्चित आय सीमा के नीचे नही गिरने पाएं जहां उन्हें जीवन आवश्यक भोजन, चिकित्सा, निवास, और स्वच्छ पेयजल/वायु अन-उपलब्ध हो जाये। तो फिर मात्र socialism की आलोचना की आड़ में दिल्ली सरकार की सफलता को धिक्कार दे कर वास्तव में socialism bashing कर रहे है।



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