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Narcissism and our Intellectual growth deficiency

Narcissism is the basic source of obstruction in our brains, which is causing the failure to understand the laws and the political sciences in a correct and balanced way.

What the Narcissism is causing is to create prejudiced thoughts within us, which, in turn, is causing a pre-meditative mindset. The pre-meditative mind is refusing to agree and to accept the simplest of rational and common sense argument which maybe arising from the opposite party.

That is how the smack of Narcissism is detected out basically. The Narcissism is a "software fault" of Human brain, where the AUSTIM is the HADWARE FAULT. These both refer to SELF-CENTREDNESS , the Narcissism being described in the milder terms as SELF-LOVE

AUSTIM is a neuropathic problem, whereas Narcissism is psychopathic.

In Austism, you visit a neurologist . It is an early child development problem.

Narcissism generally travels into adulthood as well as old age , as the personality disorder is not yet a fully developed MEDICAL SCIENCE within the Field of PSYCHIATRY.

The Narcissism tampers with the Quality of EMPATHY.
Do you remember how EMPATHY related with the Psychopathy?
In MunnaBhai MBBS , MunnaBhai tells how to judge a person to be a worthy of making a life-partner by seeing his manners to handle the waiter in a restaurant.
That is EMPATHY.

A person who lacks EMPATHY is sure to be Psychopathic.

Isn't it interesting that the EMPATHY, which has got such a critical function to do in the human development, BUT IT is taught , propagated and inculcated BUT only as a religious virtue by one religion - the BUDDHISM - in the form of KARUNA.

EMPATHY has got so much functions to perform in the field of PSYCHIATRY, the Legal knowledge and even the Political Sciences! However, there is no concerted efforts made neither by the School Educationists, nor the various religious preachers to develop the EMPATHY-borne conduct among the students and the followers.

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Didn't you enjoy the convergence of the various streams of knowledge into one , which until now you  were trained through faulty education system of our country , to see as different "subject"
What's more - this convergence story is being brought to you by a person who is neither a FULLY trained PSYCHOLOGISTS, nor a LEGAL PRACTIONER , Nor a POLITICAL SCIENTIST, A Civil Servant or so.

He is a Navigator !  A man who owns a small country of his own away from the land  in some parts of the year.

He is a Master - best defined as a Jack of all Trades (now that's mine small dose of Narcissism)

कोई क्यों बने विज्ञान-संगत? आख़िर क्या आत्म-सम्मानजनक दिया है विज्ञान ने , लोगों को?

भारतीय समाज शुरू से ही मूर्ख और बौड़म रहा है।

इसके कई कारण है। जिनमें कि एक बड़ा कारण यह है कि यहां का अध्यात्म , यानी भारतीय समाज का आध्यात्मिक परिवेश ही ऐसे लोगों की कब्ज़े में है जो कि इच्छित नही है कि भारतीयों की बुद्धि का विकास हो सके। 

दरअसल, भारतीय समाज वैसे तो ब्राह्मण विरोधी होने के लक्षण दिखाता है, मगर वास्तव में यह सब झगड़ो और विवाद के बाद शाम को घर लौट कर ब्राह्मणवाद के दरवाज़े पर ही सुस्ता कर सो जाता है।

ऐसा क्यों? 
क्योंकि ब्राह्मण वाद के मुखर विरोधियों ने कुछ अन्य विकल्प नही दिया है भारत की जनसंख्या को किसी और के दरवाज़े जा कर अपना ग़म , अपने भावुक हालातों को सामना कर सकने के लिए। जब इंसान बीमार पड़ता है, तब आधुनिक विज्ञान से उपलब्ध चिकित्सा इतनी अधिक महंगी पड़ती है कि आम आदमी उसके व्यय को झेल ही नहीं सकता है। फिर वह मज़बूरन आयुर्वेद, योग, आत्म नियंत्रण, भोजन परहेज़, यूनानी, वैध जी, हाक़िम जी, के दरवाज़े जाने को आ पड़ता है।

खुद ही सोचिये, कोई इंसान किस मुंह से विज्ञान समर्थक बनेगा, जागरूक होने में आत्मसम्मान देखेगा, जब की शाम को उसे इन्हीं मूर्खों के दरवाज़ों से ही सहायता मिलनी होगी।

यह वो त्रासदी है जो कि कोई भी सामाजिक जागृति की संस्थान भारतीय समाज को निराकरण नही दे रही है।

आलम यूँ है कि आज विज्ञान भी यदि भारतीयों तक पहुंच रहा है तो वह भी तब जब वह वैध जी या हाक़िम जी के झोलों में से निकाल कर जनता में बेचा जाता है। कहने का अर्थ है कि आम आदमी आज विज्ञान और उसके उत्पाद को वैसे ही समझता-बूझता है जैसा की उसे वह लोग परिचय करवाते है जो की खुद विज्ञान के सबसे बड़े शत्रु होते हैं !!

भारतीय जनता विज्ञान और रीत रिवाज़ के रूड़ी वादी धर्म की शत्रुता के इतिहास से तनिक भी परिचित नही है। जाहिर है, क्योंकि विज्ञान ने खुद से- first hand- भारतीय समाज में कोई सेवा, योगदान नही किया है। आश्चर्यजनक तौर पर विज्ञान की सेवा आम भारतीय के दरवाज़े पहुंची भी है तो धर्म कर्मकांडियों की दुकानों से होते हुए। जाहिर तौर पर उन्होंने अपनी इस परिस्थिति का लाभ कमाते हुए विज्ञान के उत्पाद पर label को बदल कर धर्म, वेद -पुराण, उपनिषदों का फ़ल दिखाया है, और पूरा मौका लिया है जनता पर अपनी पकड़ को मज़बूत बनाये रखने का।

यह है भीतरी , अनकही त्रासदी की क्यों औसत भारतीय आज भी महा बौड़म होता है, वह तर्क संगत , विज्ञान विचार शैली में क्यों नही सोच-समझ सकता है। 

हम लाख कोशिश कर ले मगर लोग गौमूत्र तथा गोबर में ही ईलाज़ को इसी लिए तलाश कर रहे हैं। क्योंकि कोई अन्य सम्मानदायक विकल्प नही है, उनकी आर्थिक क्षमता के भीतर में रहते हुए। वह आर्थिक दबाव में मज़बूर है, अपने विश्वास के भरोसे अपना जीवन चलाने को, जहां की रोगों का ईलाज़ करवाने का विकल्प सिर्फ गौमूत्र और गोबर में ही मिलता है।

विज्ञान वादियों ने गलतियां करि है। 
प्रथम तो यह की वह भारत के समाज को जागृति एक किताबी ज्ञान के रूप में बांटना चाहती है। यह तरीका एक window shopping करने जैसा है। जब तक की लोग दुकान के भीतर घुसने का साहस नही कर सके, और विज्ञान के उत्पाद को उसकी असली दुकान से खुद उठा कर भोग नही कर सके, तब तक वह भले ही window shopping इधर करे, अन्त में वह प्रयोग का समान ख़रीदने रूढ़िवाद के दुकान पर ही जाने वाले हैं। हमारे प्रशासन और समाज ने विज्ञान के सीधा उपयोग करने का सरल मार्ग बनाया ही नही है। बल्कि विज्ञान की किताबे लिख कर बेचने का धंधा खुद ही जमा लिया है। 

आज सरकारी अस्पतालों की हालात किसी से भी छिपी नही है। तो आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि लोग विज्ञान के दरवाज़े आएंगे, जहां उनको सम्मान मिलेगा?

आज isro के शीर्ष वैज्ञानिक भी मंदिर में शीश नमन करके ही अंतरिक्ष यान को प्रक्षेपित करते हैं। आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि आम आदमी रूढ़िवाद में ग्लानि देखेगा और विज्ञान में विश्वास करेगा की यह धर्म से जुदा मार्ग होता है जीवन जीने का।

गलतियां हमारी ही है कि हम विज्ञान को बेचने की कोशिश कर रहे हैं, विज्ञान को समाज सेवा हेतु जनता तक सीधे पहुँचने का मार्ग निर्मित नही कर रहे हैं।

Post-truth and the governments

Post-truth and the governments
The politically a-neutral police can act strict with the opposition and lenient with the ruling party supporters.

And there is no logical way to crack this predicament.
Discrimination can NEVER be -controlled - neither by strictest of legislation, nor by the best of the technology. And Discrimination shares this trait of itself in common with Corruption.
Only the awakened human Conscience is the  treatment for Discrimination and Corruption, as the Conscience works through It's "self-control", and the self-realization mechanics .

Incidentally, Religion is the biggest influential envelop for the Conscience to become awakened.
But what irony ! The religion is itself controlled by those who are raveling with Discrimination and Corruption !!

The trap is circular , 'completely rounded in shape" and therefore inescapable unless we start a new SPIRITUAL THOUGHT
~ the Varanasi level Brahmngyan


The post-truth way of handling the events by our government

We are in a Post-truth era, (the truthism) where the Government do - indulge in-  the scheming and the conspiracy.  They do drama of annoying, "annihilating the enemy", the video-game "surgical strikes" just to irritate the rival group and to massage and stroke the ego of their supporter base, --just for the Brownie Points.
the trump-visit is in the same direction.
The CAA , they are doing truth-ism, by suggesting that they would not trouble domestic population , while the law they have framed is "potentially" loaded to cause harm.
we needed to liberate the Power of the Public Administration from "truth'ism".  These are the days of shameless dr-jekyll-and-mr-hyde government institutions. No one cares for the public trust.

The Post-truth era is built on an assumption that the epoch of the mankind when the nations would indulge in highly destructive battles and wars , is over. Since the people have stopped caring for big-events , where the world could potentially avalanche-breakdown into the wars in the past, the foreign policy makers have "built" new conscientiousness to play the diplomacy . The policy to mix the truth and the false at "literary freedom" to run the governments and the world at their own convenience .

Post-truth and the genuine conscience-keepers of the society
In the post-truth it is very difficult to judge which side should you take a stand. Until now , the enemy wanted to destroy the social fabric of your society , but now our own people are bent to destroy it, whereas the enemy is advising to us how to keep peace and imploring us to keep harmony.
That is the miraculous effect of the post -truth.

Now whatever stand you take , you will have difficulty in settling the morality of your decision with your peers . If you support a post-truth political action, you become a self-destroyer, and if you oppose it, you seem like the enemy country !

The post-truth has brought on a new, hitherto unknown phenomenon -when the state itself would become the enemy of its own society .

Socialism-critic से Socialism-bashing भिन्न करना सीखें

इस तथ्य पर जितना ज़ोर दिया जाये उतना कम पड़ता है कि 'वामपंथ' (leftist) एक विशेषण संज्ञा(adjective-noun) होती है, यह कोई विचाधारा का व्यक्तिवाचक संज्ञा(proper noun) नाम नही है।
वामपंथ नाम से किसी भी विचारधारा का नाम नही है। जो है वह साम्यवाद है, और समाजवाद है।
साम्यवाद (Communism) , यानी वर्गहीन समुदाय के लिए सामाजिक व्यवस्था का सिद्धांत।
और समाजवाद(Socialism) में वर्गहीन होने पर ज़ोर नही दिया जाता है, बाकी सामाजिक व्यवस्था के सिद्धांत का पालन करने के प्रयास होते हैं।
अन्तर सूक्ष्म है मगर फिर भी प्रधान है। society और community के बीच आप को अपने बौद्धिक ज्ञान से जितने अंतर समझ आएंगे, उतना बेहतर आप साम्यवाद और समाजवाद की भिन्न कर सकेंगे। और फ़िर शायद यह भी समझ जाएं की कुल मिला कर दोनों करीब करीब बस species से भिन्न है, वरना तो एक ही genus के विचार है।
और इस genus के विपरीत होता है प्रजातंत्र यानी democracy।
अब एक और महत्वपूर्व ज्ञान। कि हमारे देश में चल रहे संवाद में बहोत बड़ा भ्रम और कुतर्क छिपा हुआ है समाजवाद(/या साम्यवाद) विषय को वामपंथ नाम से संबोधित करते हुए , वामपंथ के विरोध के प्रति। वह यह है की वामपंथ-विरोध के दौरान हमारे देशवासी socialism-criticism के अलावा socialism-bashing के काम पर भी चालू है, क्योंकि बहोत सारे लोगों के पास लिखने के लिये कलम है, मगर चिंतन के लिए आवश्यक बुद्धि नही है। लोग socialism के critic होने के भ्रम में एक आवश्यक जनकल्याण (public welfare) को भी धिक्कार दे रहे है। और तब वह लोग अनजाने में socialism-bashing करते हुए न सिर्फ democracy को विफल करने की हिमायत कर रहे हैं, बल्कि खुद अपने पैरों पर भी कुल्हाड़ी मार रहे हैं - capitalism और fedualistic शोषण का स्वागत करने की हद्दों पर पहुंच जा रहे हैं।
Socialism-Critic होना अलग है Socialism-bashing करने से। आप दिल्ली की मुफ़्त जीवन आवश्यक सुविधाओं की आलोचना करने में socialism bashing कर रहे हैं, criticism नही। आखिर यह तो democracy के welfare state की सफलता के लिए भी जरूरी है की इंसान एक निश्चित आय सीमा के नीचे नही गिरने पाएं जहां उन्हें जीवन आवश्यक भोजन, चिकित्सा, निवास, और स्वच्छ पेयजल/वायु न मिल सके । तो फिर मात्र socialism की आलोचना की आड़ में दिल्ली सरकार की सफलता को धिक्कार दे कर वास्तव में socialism bashing कर रहे है।



भक्तों का राष्ट्र

नीति से न्याय मिलता है, न्याय से समाज। और समाज से राष्ट्र
सीधे राष्ट्र की बात करते हैं, और संविधान का पालन नही करते हैं,
पुलिस आपकी सीधा सीधा पक्षपात करती दिखाई पड़ रही है - jnu के हमलावर ढूंढे नही मिल रहे हैं, और कपिल की आआपा की सदस्यता तुरन्त मिल जाती है पुलिस को...
यही है न आपका "राष्ट्र"... पक्षपात, भेदभाव, अपने-पराये करने वाली पुलिस और पक्षपाती न्याय होता है जहां !

The role of the Professional Standards in the measurement of Fairplay, and thence in the Justice

This matter should lead us to think about the Professional Standards.
The difference in the two types of reporting, it is NOT ESSENTIAL, is due to the BIAS  and therefore it should be leading  us to call it UNJUSTIFIABLE.
To understand the case , CONSIDER how do we measure out the deaths happening from mob-lynching TO deaths happening from , say, rogue bill hitting by his horns ?
And so, would you think it would be justifiable to describe the deaths of mob-lynching in a as much low tone as the bull-striking .
Or that you would want that the "26/11" kind of terror attack to be spoken in the same tone as Mob-lynching deaths , or the bull-striking?
And so, how , by a mere comparison of the two instances of reporting by a single person, can we determine if the person is being biased ?
Indeed the determination of bias will demand that a statistical analysis, using proper Statistical tools, be adopted to measure as to how many of the reporter from his FRATERNITY see the two reporting in question as 'fairness AT BOTH THE INSTANCES' , versus "UNFAIRNESS at any single instance or both".
And further , the PROFESSIONAL BODY of the Journalist should come out with a measuring technique to INSTANTLY red-flag any reportage which maybe falling off their Determination of the STANDARDS, RATHER THAN letting the READERS to judge the CASE by some vague comparison and calling out on their own.
Though you may find it hard to accept , but it would be a BIAS AND PREJUDICED behaviour of our own IF WE PASS ANY JUDGEMENT by a technique of comparison as suggested in the post above !!!!

Why do the Indian students and the workers always nurture some doubts within them after receiving any learning discourse ?

Why do the Indian students and the workers always nurture some doubts within them after receiving any learning discourse?


Many of us, and also people from other nationalities, might have noticed this peculiar behaviour about students those from India, that the latter is replete with scepticism that they refer to as "doubts", just as they are imparted any training, any lecture or any other discourse.

 So, have you ever wondered what these "doubts" are about, that the mind of an Indian carries within it in plenty? What is the true source of origin of these "doubts"?

To understand the answer one will have to understand the Indian culture and their social conduct with each other. The doubts that the Indian mind carries is just a reflection of the mutual distrust and the outcome of the self-consciousness of our  insincerity that is so common within Indian faith, and thereof the culture of the land.

An average Indian mind dwelling in the urban areas suffer a great deal from the personality trouble of having distrust against every other person regarding the statements made, the commitment, the declaration and such. Indian culture doesn't truly promote the virtue of SINCERITY. It actually likes to promote "smartness" which is more a euphemism for the insincere conduct, being granted a free pass, both by the religious morals and the judicial practices. The "doubts" are our reflexive outcome from our sub-consciousness to examine and detect any smack of the insincerity in the lessons that have been taught to us. The 'doubts' enquiry is also a way to figure out the scope of conducting our business with a slight insincerity, --because- that is how it is.! The most common ways where our habitual insincerity hides are in the form of play on the words- the pun, and the habitual longing for the misinterpretation of the text and the speeches, the twisting or the contortion --of thoughts --mostly in a perverse way

Insincerity may be understood as conduct where the Conscious mind and the sub-conscious mind harbour two different, (maybe even be the opposites), the idea about a single subject matter.
It is very common for an Indian to be speaking one thing and, then, practising another, which he may justify away as "magar dil ke saaf hain ". The words and the actions can, with great casualness, have different motivations - One may be emanating from some farcical need; and other from the private prejudices sourcing out from the personality disorders of the person.

Indians remain jocular by nature and the "jokes" are the most frequent ways to disguise the insincerity within us, by putting a veil of the self-ridicule- a socially approved legitimacy to his actions. The religious and mythological cults preach and practice to us to become  "buddhiman"(intelligent) , (a euphemism for insincere conduct), like the gods/demi-gods, without even raising questions about the absence of Sincere conduct.

Insincerity gets passed for "smartness"; and jocular conduct gives a veil of social approval to the insincerity if  the insincere words or the actions gets caught.

In India, it is common to treat a person like a dumb if he bears a singular  thought, both  in his conscious mind and the subconscious mind. Such a person is often seen as a gullible, rustic man, fit to be made fun of.

 Indians suffer from the problem of "politics" as a cultural syndrome. Wherever in the world, you will see an Indian, you might notice lots of inter-personal troubles of extreme level.

This conduct is part of the insincerity which is commonly ingrained in every Indian right from his birth. An Indian has to contest hard against the insincerity of every other fellow Indian, right from his birth. The list will include all the relationships, which means the parents and the children relations too. Perhaps this is the real motivation for why there is so much hard emphasis given on the status of the mother, - so that the child may not become punishing to his mother in her later years of life, and the old age.

दिल्ली विधानसभा चुनाव और booth manage करने की युक्तियाँ

दिल्ली की विधानसभा चुनावों के नतीज़े  अभी कल यानि ११ फ़रवरी को आने बाकि हैं।  मगर फिलहाल राजनीती इस बात पर गरम है की क्या भाजपा ने दिल्ली चुनावों में सफलपूर्वक bogus  वोटिंग करवा ले है।  मनोज तिवारी के confidence  को देख कर लोगों को शक होने लगा है की लगता है इस बार भाजपा ने सफलता पूर्वक bogus  vote  डलवा दिए है।  भाजपा पक्ष का लगातार दावा यह आ रहा है की दोपहर क़रीब साढ़े तीन बजे (03 30 pm ) के बाद से उनके पक्ष में धड़ल्ले से वोट पड़े हैं।  

संदेह की बात यह रही है की चुनाव आयोग ने चुनावों के ख़त्म  हो जाने के बहोत बाद में तक मतदाता प्रतिशत (turn  out ) के अंतिम आकंड़े जारी नहीं किये थे, जो की पुराने चुनावों से असामान्य व्यवहार था।  अरविन्द केजरीवाल जी ने इस विषय पर tweet  करके टिपण्णी भी करि थी।  

जबकि चुनाव वाले दिन पूरे दिन की ताज़ा खबरों में यह ही कहा जा रहा था की इस बार दिल्ली वालों ने उत्साह नहीं दिखाया है , और लगता है की पिछली बार से कम मतदान हुआ है,  मगर अंत में जब चुनाव आयोग ने विलम्ब करने के पश्चात आकंड़े दिए है तो आश्चर्यजनक तौर पर कुल मतदान पिछले चुनावो से ज्यादा हो गया था !!!

सवाल और संदेह यह हो रहा है की क्या भाजपा वालों ने सुबह से लेकर 0330 pm बजे तक मतदान में अडंगा  लगवाते हुए धीरे मतदान करवाया ताकि आआपा या किसी अन्य के पक्ष वाले वोट कम पड़ें।  और फिर पहले से तैयार अपने लोगों के काफ़िलो  को भेज कर यकायक अपने पक्ष में अधिक मतदान करवा लिया है। 

भक्तों की जनता को ग़ुमराह करने की नीति

भक्त लोग कपिल सिब्बल के एक पुराने इंटरव्यू की क्लिप को आजकल viral कर रहे हैं, जिसमे वह पाकिस्तान और बांग्लादेश के "minorities" को भारत की नागरिकता दिए जाने की हिमायत करते हैं।

यह क्लिप सं 2003 के आसपास की है।

और फिर एक हालफिलहाल की क्लिप से जोड़ते हुए भक्त लोग दावा कर रहे हैं कि कपिल सिब्बल बदल गए हैं, UTurn कर रहे हैं, क्योंकि दूसरी वाली क्लिप में कपिल सिब्बल  मोदी सरकार की नागरिकता संशोधन कानून को धर्म आधारित भेदभाव बताते हुए इसको खारिज़ करने की मांग रखते दिख रहे हैं।

गौर करें कि सं 2004 से लेकर 2014 तक 10 साल कपिल सिब्बल की पार्टी की ही सरकार थी, मगर वह लोग कोई नागरिकता कानून खुद नही लेकर आये थे। 

दूसरा , की कपिल सिब्बल ने minorities शब्द का प्रयोग करते हुए उनको नागरिकता देने की बात करि थी, मगर किसी भी धर्म आधारित भेदभाव नही किया था। 

शयाद इसी मुश्किल लक्ष्य के चलते उनकी सरकार ने अभी तक खुद कोई कानून नही दिया था। बिना किसी भेदभाव वाले संकट के सिर्फ minorities को ही नागरिकता देना - यह मुश्किल ही था। क्योंकि संवैधानिक मर्यादा टूटती थी। 

और फिर राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण अभियान से तो गाज़ दोहरी गिर सकती थी। जो ग़लती कहीं भी कांग्रेस सरकार ने नही करि है।

तो कपिल सिब्बल ने u turn नही किया है। 

बल्कि भक्त फिर से जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं कि कपिल सिब्बल u turn करे हैं ! नागरीकता पंजीकरण को नए कानून से जोड़ देने के बाद होने वाले प्रभावों की तो भक्त कहीं भी बात ही नही कर रहे हैं।

यह कैसा षड्यंत्र  है जनता को गुमराह करने का ? Bicycle और tricycle में समानताएं बहोत होती हैं, हालांकि दोनों में अंतर भी बहोत बुनियादी होता है। tricycle एक रिक्शा होता है, जिसका उद्देश्य ही दूसरा हो जाता है एक bicycle के मुक़ाबले। 

वही खेल खेला है भक्तों ने। बात में समानता इस हद तक है कि कपिल सिब्बल भी पाकिस्तनी अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के हिमायती थे। जो कि हमे भी स्वीकृत है। मगर बड़ा अंतर यह है कि यह कार्य उन्होंने धर्म आधारित भेदभाव नीति का सहारा लेकर नही होने दिया था। बल्कि शायद इसी मुश्किल के चलते 10 साल अपनी सरकार के दौरान भी खुद यह काम नही किया ।

छल करना भक्तों की पुरानी नीति रही है। ग़लत काम खुद करेंगे, और बदनाम दूसरे को करने की साज़िश साथ मे कर देंगे।

जासूसी पेशेवरों का व्यावसायिक मानसिक स्वास्थ

ये सिर्फ डोवाल बाबू की दिक्कत नही है, मुझे ऐसा लगता है की सारे ही जासूसी agent के दिमागों में यह विकृतियां आ जाती है की वह समाज को बेकूफ़, फ़ालतू लोगों का जमावड़ा समझने लगते है, और ख़ुद को ज़रूरत से ज्यादा विद्धवान, जिसका काम ही है दुनिया को बचाना।

जासूसी का पेशा करने वालों में ऐसा क्यों होता होगा? क्यों यह अहम भरी और अंतर्मन को नष्ट करने वाली psychiatric दिक्कतें आती है इनमें? क्या लागत है- क्या इन्हें खुद बोध होता होगा की इनके पेशे के चलते इनमें कुछ occupational mental health समस्या आ जाती हैं?

नही।

जासूसी पेशों में रहते रहते इंसान तरह तरह के पाखंडों को रोज़ रोज़ होते देखता होगा, जिसमे उनका subject(शायद इनकी शब्दावली में 'target') दुनिया में कहता कुछ है, मगर भीतर ही भीतर करता कुछ और है, जिसको की यह जासूस लोग चुपके से देख ले रहे हैं।

तो सालों तक ऐसे ही माहौल में रहने में क्यों नही इन जासूसी पेशेवरों में खुद की ही mental health दिक्कत हो जाती होगी जिसमे यह लोग इंसान में conscience के अस्तित्व और महत्व के बोध को ही अपने खुद के भीतर समाप्त कर देते होंगे। इन्हें सभी इंसान पाखण्डी दिखते होंगे, क्योंकि यह लोग तो अपनी सरकारी सुविधाओं से लैस हर इंसान को उसके एकांति, अंतर्मयी पलों में देखते होंगे। 

हाल ही में अमेरिका के prism program के खुलासा करने वाले व्यक्ति edward snowden के जीवन पर बनी biopic , snowden, में जासूस लोगों पर पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य के असर को  चित्रित किया गया है। वह शक संदेह की मानसिक बीमारी से ग्रस्त है, सभी को पाखण्डी समझता है, अपने रिश्तों को क़ायम रखने की सहज़ योग्यता उसके भीतर नष्ट हो गयी है, और शायद खुद को किसी भगवान की तरह समझने लग गया है, क्योंकि बचपन से बताया जाता है की भगवान हर जगह होता है और इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्मों को देख रहा होता है ताकि एक दिन उसका हिसाब मांग सके। क्योंकि ऐसी "भगवान"-कारी काबलियत तो आज के ज़माने में इन सरकारी जासूस लोगों में होती ही है। ज़ाहिर है की यह लोग -- , इनमें से कई, -- खुद को  भगवान ही समझने लगते होंगे। 

जासूसी कामों में लिप्त मेरे एक uncle जो की retirement के उपरान्त मेरे घर आना जाना हुआ करता था, जब मैं छोटा था, उनको देखा-सुना करता था, और उनके जीवन और चरित्र पर सोचता भी था। क्योंकि तब हम छोटे थे, तो उनकी न समझ आने वाली बातों को मंत्रमुग्ध हो कर ऐसे सुनते थे जैसे कोई बड़ा जासूसी कारनामा हो, और शायद हम ही नादान है जो की इस तरह के उच्च बुद्धि intelligence बातों को पकड़ नही पा रहे हैं। अंग्रेजी साहित्य में तब ताज़ा ताज़ा चरित्र चित्रण करने के सवालों का सामना किया था, तो फ़िर उनके भी चरित्र पर दिमाग़ सोचता था। कुल मिला कर कोई अच्छी छवि नही थी, और देशभक्ति वगैरह को तो उस समय के पूर्व ही हमने पैमाना मानना बंद कर दिया था, इंसान के चरित्र का आंकलन करने के लिए।  

न ही हम उनमें वह मानवीय समझ को देखते थे, जिससे की हमें तस्सली हो जाये कि यदि ऐसे इंसान के पास हमसे कुछ अधिक ताथयिक जानकारी है तो भी वह कोई बेहतर निर्णय ले सकेंगे, सामाजिक और राष्ट्रीय हित में।
जासूस लोग कल्याणकारी प्रशासन देने के क़ाबिल तो रह ही नही जाते है। बल्कि समाज को police state में ही तब्दील कर देते हैं, अपनी "चालबाज़ी" tricks से विपक्ष को छकाने के चक्कर में।

रूस में पुतिन बाबू के जीवन को देख कर मेरा ऐसा विश्वास और सुदृढ़ ही होता है की जासूस लोग को शासन की डोर से जितने दूर रखे जा सकते है, रखें जाये तो ही बेहतर होता है। हालांकि आम लोगों की नज़र में इन्हों जान की बाज़ी लगा कर दुश्मन देश में जा कर "देश सेवा' करि होती है, इसलिये लोग इन्हें ही "सच्चा देशप्रेमी, काबिल नेता" मानते है, मगर वास्तव में यह लोग देश के प्रशासन में से लोक कल्याणकारी शक्तियों तथा व्यवस्था को ख़त्म कर देते है, और उसे police state में ला देते है। putin भी पूर्व KGB जासूस रहे है।उनके देश में प्रजातंत्र ख़स्ता हाल हो चुका है। चुनाव प्रक्रिया में ही सेंध मारी कर दी है खुद अपने ही देश की। मातृ सेवा करते करते कब "मातृ %x x%" कर दिया इनको समझ भी नही होगी। हां, मगर दिल से खुद को एक सच्चा मातृ प्रेमी ही मानते होंगे।

यह  जासूस लोग आदर्शों की अहमियत नही जानते समझते है - लोक प्रशासन के कार्य में, नीति निर्माण में।।इनको लगता है की सभी कुछ manipulate किया जा सकता है। हर आदर्शवादी इंसान को उसके सार्वजनिक और अंतार्मयी पलों में एक संग देखने से यह उसे भी manipulative आदमी समझते होंगे। क्योंकि आजीवन यह लोग आना दिमाग शत्रु देश की प्रशासन नीति को manipulate करने में ही लगाते है, तो फिर अपने retirement के बाद जब यह अपने देश की ओर पलटते है तब अपने भी देश की व्यवस्था के साथ वही कुछ manipulation कर देते हैं और फिर अबोध विकृति में मातृ %%xx% बन बैठते हैं।

सभ्य समाज के लिए समझदारी इसी में होती है की जासूसी पेशे वालों को उनके retirement के बाद राजनीति से कोसों दूर रखा जाये। मानसिक स्वास्थ्य की बहोत बड़ी विकृतियां होती होंगी इनके भीतर, यह तय मान कर चलिये।

उत्तर भारत की क्षेत्रीय पार्टियों पर बौड़मता का अभिशाप

उत्तर भारत की आरक्षणवादी पार्टियों वास्तव में बौड़म लोगों की पार्टियां है, जिनकी राजनीति का एकमात्र उद्देश्य होता है कि जो कुछ भी इस देश को दोनों बड़ी ब्राह्मणवादी पार्टियां - कांग्रेस और भाजपा - समाज को चलाने  के लिए नीति  निर्माण करें , उसमे इन्हें आरक्षण नीति द्वारा संरक्षित अंश जरूर मिले।

बस।

तो आरक्षणवादी पार्टियां है क्या ? क्या आदर्श हैं इन पार्टियों के? क्या दृष्टिकोण होता है इनका, इस देश और इसके समाज को चलाने के ?

सोचा जाए तो कुछ भी नहीं।

यह पार्टियां इतनी बौद्धिक क़ाबलियत न तो जमा करना पसंद करती है कि कोई सोच, कोई ideology को जन्म दे , उनको विकसित करें, उन पर अमल करें और समाज को उसके माध्यम से व्यवस्थित करें। यह पार्टियां मौकापरस्ती उद्देश्य से ही चलती हैं, और  प्रत्येक  समाजिक महत्त्व के सवाल पर अपना मत अपनी विचारधारा प्रस्तुत करने से कतराती हैं। मौक़ापरस्ती की रणनीति के अनुसार यह पार्टियां  तनिक विलम्ब करके किसी विजयी दिखते हुए विचार को तलाशती हैं , फिर उस ओर थाली के बैंगन की तरह किसी भी तरफ लुढ़क जाती हैं।

वास्तव में यह पिछड़े दल और इनके समाज मे लोग पिछड़े होते ही इसलिए है कि यह बैद्धिक नही होते हैं, बौड़म होते हैं।

बौड़म  इंसान कौन है ?

बौड़म लोग किसी भी सामाजिक व्यवस्था को जन्म नही दे सकते हैं, बस हर एक प्रस्तुत करि गयी विचारधारा को आलोचना करके उनमे खोट निकाल सकते हैं। यहां आलोचना , विश्लेषण की एक बौद्धिक सीमा रेखा होती है, जो कि बौड़म लोग पहचान नही सकते हैं।  और वह सीमा का मर्यादा उलंघन कर देते हैं। सीमा रेखा यह होती है कि बड़ा  सत्य यह होता है कि -- अंतः समाज को व्यवस्थित करने के लिए कुछ न कुछ तो नीति, आदर्श, विचारधारा चाहिए ही होती है - आपके सामने प्रस्तुत तमाम विकल्पों में से। और यदि आप सभी की आलोचना करते करते उनके खोट निकाल निकाल कर सभी को खारिज़ कर देंगे, तब आप खाली हाथ रह जाएंगे समाज को व्यवस्थित करने की आवश्यकता को पूर्त करने हेतु। यही बौड़म पना होता है।

तो फिर जब आप पिछड़ जाते हैं समाज मे अपनी विचारधारा को मुख्य मार्गदर्शक बनाने में, तब आप मजबूरन आरक्षणवाद की राजनीति करने के लिए बाध्य हो ही जाते हैं। यानी समाज की मुख्य कमान किसी अन्य के हाथों में सौंप कर उससे झगड़ा करते हैं कि हमे हमारा आरक्षित हिस्सा दे दो !

यही पिछड़ा पन होता है।

और इसका कारण होता है कि आपके समाज की बौद्धिक क़ाबलियत निम्न होती है। वह बौड़म लोगो का समाज होता है ,-- जो कि तर्क शोध नही कर सकता है, न्याय और निर्णय नही कर सकता है।  बौड़म , वह जिसमे अन्तर्मन प्रबल नही होता है, जिसमे स्वचेतना कमज़ोर होती है।

आखिर बौड़म इंसान की और क्या पहचान होती है? सबसे प्रथम तो यही की वह तर्कों की विचित्र मकड़जाल में आसानी से उलझ जाते हैं, बजाए उसको सुलझा कर स्वयं की चेतना को विकसित करने के। बौड़म इंसान तर्क करने से घृणा करते हैं, और अनजाने में किसी दूसरे के दिये तर्क पर चलते हैं। वह ही "संस्कृति" के नाम पर दिए गए कर्म को करके जीवन जीते है। वही रूडी निभाते हैं, रूढ़िवादी बनते हैं, और समय के अनुसार स्वयं को बदलने की क़ाबलियत को अपने भीतर नष्ट कर चुके होते हैं।

बौड़म इंसान पिता-पुत्र की जंग से पहचाने जाते हैं। बौड़म लोगों के समाज आपसी द्वंद, ईर्ष्या , क्लेश , द्वंद से पहचाने जाते हैं। वह आपसी सहयोग के काबिल नही होते हैं, क्योंकि मिल-जुल कर निर्णय लेने की क़ाबलियत नही रखते हैं। वह आलोचना करते करते सीमा रेखा को तोड़ कर ही तो बौड़म बनते हैं, जब वह भूल जाते हैं कि अन्त में कुछ न कुछ निर्णय कर सकना क्यों परम आवश्यक भी होता हैं, किसी भी प्रश्न को अधर में नही छोड़ा जा सकता है।

बौड़मता ही सबसे बड़ा अभिशाप होता है पिछड़े लोगो का। और बौड़मता की पहचान होती है - अनिर्णय , सामाजिक सहयोग का विनाश, कमज़ोर सामाजिक  क़ाबलियतें।

बौड़म  लोग मौकापरस्ती से जीवन जीते हैं, और  सासंकृतिक आचरण में  वह समाज को चिन्तन से नहीं, बल्कि चलन से निभाते हैं। 

तर्क और संघठन निर्माण दोनो एक-दूसरे के विरुद्ध स्वभाव के होते हैं

तर्क और संघठन निर्माण दोनो एक-दूसरे के विरुद्ध स्वभाव के होते हैं

तर्क करने में सबसे अधिक नुक़सान यह होता है कि इंसान संघठन बनाने में कमज़ोर हो जाते हैं।

तर्कशास्त्र की यह विचित्र महिमा है। कि , तर्कों के शोध से समाज नामक जीव में तो सुधार प्राप्त होता है, मगर संघठन नामक जीव को रचने की शक्ति क्षीर्ण हो जाती है।

समाज और संघठन में भेद है। समाज जाने और अनजाने सदस्यों से बना हुआ होता है। आपके पास विकल्प नही होता है किसे लेना है, किसे अस्वीकार कर देना है। मगर संघठन में विकल्प होता है। यह सिर्फ जानपहचान के सदस्यों से ही निर्मित होता है। नज़दीकी, व्यक्तिगत स्तर की जान-पहचान से। इसका कोई विशेष उद्देश्य भी होता है ।

तर्क करने से , या की अधिक तर्क करने वाले व्यक्ति , अक्सर करके संघठन के सदस्य होने पर बहोत मुश्किल खड़ी कर देते हैं संघठन के लिए ही

 ऐसा क्यों?

क्योंकि संघठित होने के लिए सदस्यों को एक दूसरे से चरित्र से उसकी पहचान करनी होती है, न सिर्फ नाम से ,या उनके मौखिक वाक्यों से।

Personality को पहचाने की विद्या का बहोत उपयोग होता है संघठन बनाने के लिये। और इस विद्या के माध्यम से ही सही और ग़लत को संचालित किया जाता है। सदस्य यदि मौखिक तौर पर ग़लत भी हो तो उसको सुधारने के लिए उपदेश देने या प्रवचन करके, उसके संग तर्क करके काम नही चलाया जा सकता है। यहां ही तर्क करने वाले इंसान अपनी संगठनात्मक कौशल में कमज़ोर पड़ जाते हैं। वह तर्क करने बैठ जाते हैं, बजाये कि कोई दूसरा मार्ग तलाश करें। बल्कि शायद आवश्यक यह हो जाता है कि उस ग़लत को संघठन के अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए होने ही दिया जाये। !!!!!!!!

जी हाँ।  संघठनों को क़ायम रखने के लिए सबसे बड़े गुण शायद यही होते हैं की ग़लत को होने दिया जाये और एकदूसरे को सहयोग दे कर बचने में सहायता दी जाये !

अब आप पुनः चिंतन करें, तर्क और संघठन के बीच संबंधों पर। आप देखेंगे कि दोनों में परस्पर विपरीत संबंध होते हैं। तर्क वादविवाद को जन्म देते हैं, और उसमे से सत्य असत्य, उचित-अनुचित को फल स्वरूप सबके सम्मुख प्रस्तुत कर देते हैं।  मगर संघठन की आवश्यकता ठीक विपरीत होती है। अलग-अलग इंसान अलग अलग चाहतों के प्रभाव में अलग अलग विचारों को सत्य-असत्य होने का विश्वास अपने हृदय में समाहित रखते हैं। उनकी दिलचस्पी वास्तविक सत्य-असत्य को जानने की नही होती है। यह उनकी निज़ी "सत्य" होते हैं, जो की उनको संघठन की सदस्यता की कुंजी प्रदान करवाते है। लोग अक्सर "संघठन" को "समाज" का पर्यावाची मान कर उसमे शामिल रहते हैं।।

और इन तथाकथित विश्वासों के माध्यम से ही कुंजी बनती है आपको उस संघठन के सही सदस्य होने की।
संघठन के चुकी कुछ स्वार्थी उद्देश्य भी होते हैं, इसलिये वह इन "असत्य तर्कों"  को सुधार करने के स्थान पर उनका रक्षण करने के लिए बाध्य होते हैं। संघठनों की आवश्यता अक्सर कोई आर्थिक उन्नति प्राप्त करने की होती है।  संघठन सदस्यों को सस्ते और प्रोत्साहित श्रमिक उपलब्ध करवाने में भूमिका निभाते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब आप इंसानो को "पालें" किसी विशिष्ट विचारधारा के आधीन, brain wash करके, ताकि वह कुछ विशेष किस्म के आदेश दिये जाने पर कुछ किस्म के तथाकथित "अमर्यादित" , अमान्य, अनैतिक और अवैध कार्यों को कर गुज़रे। यह तभी सम्भव हो सकता है जब कुछ ख़ास brain wash "तर्क" बचपन से ही डाले जाएं इंसानों में। इसलिये ही सफ़ल संघठन अक्सर करके किसी न किसी धार्मिक पंथ विचारधारा के इर्द-गिर्द निर्मित हो पाते हैं। शायद यही सम्बद्ध होता है धार्मिक विचारधारा के बीच, सफ़ल संगठनों के निर्माण और फिर धन शक्ति से सुसज्जिय उद्योगिक घरानों के उत्थान के बीच। धर्म ही सबसे सबसे प्रथम भूमि उपलब्ध करवाते हैं समाज से संगठन बनाने के लिए। और संघठनों में से ही घराने निकलते है जो की अर्थ शक्ति से परिपूर्ण बनते है - उद्योग करके अर्जित किये गये धन से या किसी अन्य तरीके से प्राप्त अर्थ शक्ति से।

पिछड़े और दलित समाज यहां ही बहोत कमज़ोर पड़ जाया करते हैं अक्सर। वह तर्क करने में और पढ़ाई-लिखाई करने में बहोत युग्न करते हैं। इससे या तो उनमे तर्क निर्मित होते हैं, जो की उन्हें संगठन की सदस्यता लायक मानसिक अवस्था से दूर ले जाते हैं। ऐसे लोग संगठन सदस्य लायक नही रह जाते हैं।

अन्यथा , पिछड़े और दलित समाज पूर्णतः अशिक्षित रह जाते हैं और फिर वह किसी अन्य अधिक श्रेष्ठ और शक्तिशाली संघठन द्वारा बचपन से ही "उठा" लिए जाते हैं, यानी अपनी किस्म की "brain wash" करके उस संगठन के बड़े कद के मालिक सदस्यों के लिए श्रमिक शक्ति उपलध करवाने के लिए।

यह जितने भी शक्ति शाली संघठन है आज हमारे देश में, उनकी वास्तविक श्रमिक शक्ति इन्हीं दलित और पिछड़े वर्गों से आये अपूर्ण शिक्षित सदस्यों से ही निर्मित हुई है। यह लोग liberal arts वाले तर्कों से कोसों दूर करने एकांत जा कर brain wash किये गये हैं। तभी इतने कुतर्क और भ्रमों से परिपूर्ण है। मगर फ़िर संघटन को लाभ भी तो  सदस्यों की इसी "अशिक्षा" से ही प्राप्त होता है। यह श्रमिक सदस्य अपने motivation (या प्रोत्साहन) में ऐसे होते हैं कि इनसे किसी भी किस्म के अवैध, अमान्य कार्य पूर्ण करवाये जा सकते है आवश्यकत और पूर्वग्रहीत उद्देश्य अनुसार।

यह बड़ा ही विचित्र सम्बद्ध है तर्क और संघठन शक्ति के मध्य में।

Sharjeel Islam should NOT be stopped from presenting his views, it is his fundamentally guaranteed freedom -

Sharjeel Islam is B Tech and M Tech from IIT Bombay

Actually he should always be allowed to speak , no matter he talks of breaking India into pieces.

Back in 2009, during my Ship Master course , there was a topic on Piracy and Terrorism which we had to study in our curriculum

Our curriculum is made from, largely,  the study of laws  - LAWS AT SEA.
And Sea area is generally covered by UNITED NATIONS through internationally agreed laws, for the formation of any applicable law.

To deal with acts of terrorism  a sea , there is one law known as the SUA Convention
(Suppression of Unlawful Activity )

In the SUA , we have a question , *what is the internationally agreed definition of Terrorism?*

And the answer we get to read is that THERE IS NONE.
After this, there is long note , we read , as to why there could be no definition.

The long note says that because One MAN'S TERRORIST is ANOTHER MAN'S FREEDOM FIGHTER .

Now , 

There is the trouble .

The topic further says that only the Violence related acts are crime during promulgation of an ideology, holding and opinion or any other political ideology is itself NOT an internationally agreed wrong
THAT includes ANY IDEOLOGY TO BREAK ANY EXISTING COUNTRY today, tomorrow or any day in future ..

People , as the global social contracts allow, have right to REDRAW the borders , that means , BORDERS are not GOD-created; human mind have created them, human mind should have infinite liberties to recreate them,

Many new countries have been formed throughout the century , INCLUDING India --alongside Pakistan and the Bangladesh.
The USSR broke down into 13 pieces of Russian states,

Africa is still fighting for new nations ,

There is even A NO MAN'S LAND in Africa ! Which no one claims

Gibralter and Falkland Island had volunrily chosen to be part of the UK, while bejng geographically close with Spain and Argentina.

Hongkong was part of UK, until it changed hands voluntarily.

What these cases tell us is that , IDEOLOGIES MUST NOT forced on a society - neither by violence , nor by abusively enforcing the Powers of the state related with suppression of seditious conduct.

Use of force MUST be withheld by all the parties -- the state as well as the ideology groups.

Ideologies can have their success only by winning the heart of the people - by convincing the people of bringing properity to them , of fulfilling their dreams.

 We must fight Sharjeel's ideology by competitively presenting our ideology and trying to win hearts of the people through convincing them of our ideology to be SUPERIOR to his .

It is the love of people for some  ideology which  makes a Nation. Ideology has to win the heart of the people, eventually. Hatred don't succeed. 

To deny him his right to speech is IMMORAL way to enforce your ideology over the people. It is bound to give hatred as a result , and a nation of the "rapists" -  a country of people who cannot make the fine intellectual level difference between love-making and sexually assaulting the other person against his will.

Such forceful way is sure to give country of exploitative labour- master relationship, too. Coercive way to succeed one's ideology - whether by the state , or by any other group - will yield a society will be a terrible failure - incompetent to understand the basic permise of the laws - the one power that makes all the man-made laws to work successfully alongside the forces of the laws of Nature  - the FREE CONSENT .

उत्तर भारत की छात्र राजनीति के विषय में

छात्र राजनीति पर एक और गंभीर बात है, जो की हमें "sir" या फ़िर "हाँसिल" जैसी फिल्मों से देखने को मिलती है।
वह ये कि बहोत बड़ी आबादी राजनीति में असल में दिलचस्पी के नाम पर नशा कर रही होती है !
राजनीति में दिलचस्पी एक प्रकार का नशा होता है, यह जानकारी बहोत कम लोगों को है।
राजनीति करने में इस किस्म की kick यानी नशे का आनंद का प्रभाव मिलता है मस्तिष्क को, और जो की युवाओं में बहोत पसंद किया जाता है -पुरुष और महिलाएं, दोनों ही।
अपने प्रतिद्वंदी को तमाम तिकड़मों में हराने की कोशिश करते रहने में कुछ वैसा ही नशा मिलता है जैसा की सत्यजीत रे की फ़िल्म "शतरंज के खिलाड़ी" में दोनों नवाबों को शतरंज खेलने से मिलता था।
यह वो आवश्यक आत्मज्ञान है, जो की लोगों के चिंतन से विलुप्त है। ये वो लोग हैं, बहोत बड़ी संख्या में, जो राजनीति को समाज और प्रशासन के साधन की तौर पर नही देखते-बूझते हैं , आर्थिक विकास को प्राप्त करने के लिए, या फिर की समाज के आसपास उचित नैतिकता और अध्यात्म का प्रभाव क्षेत्र निर्मित करने के लिए, उचित उदाहरण प्रस्तुत करके।
यह आबादी विश्वविद्यालयों के युवाओं के भीतर बड़ी संख्या में पायी जाती है, जहां वह पढ़ाई-लिखाई की साधना करने के स्थान पर वास्तव में "राजनीति का नशा" भोग कर रहे होते हैं।

To advocate Insulation is a devious way to ask people not to change their opinion.

Opinionated are the people who believe that by insulating away themselves from the left and the right, they can form an opinion which would serve best, either themselves or society.

The most competitive and progressive Opinions are not truly FORMED, rather they are DISCOVERED. And the best place where one can make their discovery is the stream of conversation emerging from the conflict of ideologies.

Therefore to form the most progressive and competitive opinion, people should stay in the stream of running conversation.

To advocate insulation to form your own best opinion is a clever way to ask people to become either the leftist or the rightist.
And the rest, as it rightly goes, the greatest damage to peace and the progress have been done by those who have chosen to remain insulated and ignorant, thereby letting themselves to fall for "the leftist" or "the rightist".
To advocate insulation is a devious way to ask people not to be overcome by another competitive ideology, and thus not to change their opinion.

दिल्ली विधानसभा चुनाव : पहचानिए , कौन है असली देश के गद्दार

आधुनिक प्रजातंत्र व्यवस्थाएं बहोत आगे निकल चुकी है राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के दौरान आने वाले राजनैतिक सत्ता प्राप्ति के संघर्षों के प्रति। प्रजातंत्र व्यवस्थाओं की हमेशा से यह आलोचना होती आयी है कि जब राष्ट्र पर संकट आया है तब इन्ही प्रजातंत्रों से जन्म लिए नेता - Politicians - देश की सीमाओं से बहोत भीतर अपने सुरक्षित घरों में बैठे हुए सत्ता प्राप्ति की सौदेबाज़ी में व्यस्त रहते हैं, सैनिकों को आवश्यक संसाधनों पर सांप की कुंडली बनाये खुद के लिए सत्ता पाने की जुगत लगाते रहते हैं।

यह आलोचना आम्रपाली जैसे प्रकरणों से सामने आती है जब अजातशत्रु आसानी से मगध राज्य को परास्त कर देते हैं। पश्चमी में 300 spartans नामक फ़िल्म में उनके इतिहास में घटी ऐसी त्रासदी को दर्शाया गया है।
हालांकि आलोचना अमान्य नही है,  और इसलिये प्रजातंत्र व्यवस्थाओं ने politicians की इन मैली हरकतों से जन्म ले रही समस्याओं के निवारण के लिए बहोत प्रबंध करे हुए हैं। ब्रिटेन में पश्चमी विचारकों द्वारा यह जो द्विस्तरीय संसद (BiCameral Legislator) का निर्माण व्यवस्था थी,  वैसे यह भी इसी समस्या के निवारण के लिए ही करि गयी थी। संसद के भीतर एक सदन प्रतिनिधत्वि करता था मनमोहक जनभावना का, और एक सदन प्रतिनिधत्वि करता था उचित, विवेकपूर्ण ज्ञान का। Popular Choice और Right Choice के बीच अन्तर के ज्ञान को जाना जाता रहा है, और इस अन्तर से उत्पन्न संकट को पहचान लिया गया था। आरम्भ में इसीलिये ही ऊपरी संसद में देश के गणमान्य , प्रसिद्ध , उच्च शिक्षित लोगों को निर्वाचित किया जाता रहा है। हालांकि वर्तमान में politicians ने दोनों ही संसद भवनों को प्रदूषित कर दिया है और हर जगह politicians ही बैठा दिये है, नियामो में tweak कर-कर के।

अमेरिका में दो सदनों को निर्माण का उद्देश्य ब्रिटेन की इस व्यवस्था से अलग तर्कों पर आधारित रही है।
तो संघ शायद यह कहता है कि वह प्रजातंत्र के प्रशासनिक संकल्प को अपने "राष्ट्र" में निभाये गया तो, मगर सिर्फ "देशभक्त" लोगों से ही पूछा जाया करेगा। संघ का "जनमानस" केवल "राष्ट्र भक्त" लोगों से बनता है, और राष्ट्रभक्त की शिनाख़्त देने का कार्य संघ खुद से खुद को ही दे देता है !!

अब यह हमे और आपको सोचना है कि राष्ट्र भक्त की पहचान कैसे करवानी है? क्या यह बात संघ निर्धारित करेगा, या कि यह प्रश्न भी प्रजातंत्र के जीव "जनमानस" के हवाले छोड़ी जा सकती है, यह समझते हुए की प्रजातंत्र व्यवस्था में प्रावधान हैं कि "जनमानस" को अवसर मिल सके राष्ट्रभक्त से राष्ट्रद्रोही को अलग कर देने के?

आधुनिक काल में यह बिल्कुल संभव है कि विदेशी आक्रमणकारी लोग न सिर्फ सैनिकिया तौर पर , बल्कि आर्थिक और वाणिज्य मार्गों से आपके जनमानस को दूषित करके आपको ग़ुलाम बना लें। आज कल के युग में देश एक दूसरे पर सैनिकिया हमलों से कहीं अधिक वाणिज्य आक्रमण करते हैं। और फ़िर multi national coporations तो राष्ट्रवाद के भी परे निकल चुके हैं। वह तो सिर्फ मुनाफों के लिए लड़ते हैं, और इनमें वह लोग सरकारों को खरीद कर उसको जनमानस के ख़िलाफ़ प्रयोग करने लगे हैं।

सवाल है की क्या संघ इस प्रकार के संघर्ष के प्रति जागृत है या नही? सवाल है की मोदी सरकार की नीतियां कही भारत के जनमानस को गरीबी, महंगाई, शोषण से बचाव दे सकने प्रति वचन बद्ध है या नही? जिस तेज़ी से वह निजीकरण कर रहे हैं, वह देश वासियों को तो "विदेशी ताकत" और "पाकिस्तान" में उलझा दे रहे हैं, जबकि खुद भीतर से सब कुछ outsource कर दे रहे हैं। देश के श्रमिक कानून आज की तारीख में इतने सशक्त नही है , न ही देश के न्यायालयों में उद्योगिक अनुभव वाले उचित न्यायधीश विराजमान है जो कि देश की बड़ी आबादी को private sector में होने वाले शोषणों से बचाव दे सके। मोदी सरकार उसी शोषण कारी ताकतों की agent बन गयी है, और बचावकारी ताकतों को "वामपंथी" नामक किसी "बदनाम" शक्ति केह कर दुत्कार रही है। आज railways में होने वाले श्रमिक शोषण के प्रति खुद CAG ने तक माना है। private कंपनियां मुनाफ़ा कमाने के लिये कम लोगों को नौकरी पर रखती है, श्रमिक कानूनों का उलंघन करते हुए, और उनसे श्रमिक मानकों से कहीं अधिक काम वसूलती है। जबकि वह railways से ठेके की कीमत बराबर श्रमिक मानकों के अनुसार वसूलती है।

मोदी सरकार वास्तव में "राष्ट्र" के नाम पर देश वासियों को अभी भी सैनिकिय हमले के प्रति उलझाये हुए है, जबकि खुद private sector की एजेंट बनी हुई देश वासियों को श्रमिक शोषण में झोंकों जा रही है।
यह वह राष्ट्र के प्रति आक्रमण है जिसमे खुद मोदी सरकार ही "देश भक्त" नही है, बल्कि देशद्रोही है। वह नही चाहती है की जनमानस उनके देशद्रोह को देख ले।

दिल्ली विधानसभा के चुनाव :- क्या है वैचारिक मूल मुद्दा इस चुनावो में ?

दिल्ली के विधानसभा चुनावों में ideological स्तर पर देखें तो फिर मुद्दा है संविधान बनाम राष्ट्र । भाजपा बार-बार "राष्ट्र" के इर्द-गिर्द जनमानस के भाव विभोर करने की कोशिश कर रही है , जबकि आआपा , कांग्रेस , और बाकी कई सारे दल बारबार अपील कर रहे हैं की मोदी शासन में संविधान संकट में है, यानी देश को प्रजातांत्रिक मूल्यों से चलाने के संकल्प का पालन नही किया जा रहा है।

तो यह लड़ाई इस समय "राष्ट्र' बनाम "प्रजातंत्र" की मानी जा सकती है।

और दिल्ली चुनाव में जो भी पक्ष विजयी होगा , उसके अनुसार संदेश या जनादेश तय हो जायेगा की देशवासियों( या कहें तो कम से कम दिल्ली वासियों) को क्या चाहिए - "राष्ट्र" या फिर "प्रजातंत्र" ?

संघ घराने की यह वैचारिक धारा रही है कि सबसे प्रधान होता है "राष्ट्र" , न कि उसको चलाने वाला मूल्य- वह आपसी संकल्प। यह एक विचारधारा आचार्य चाणक्य के जमाने से रही है कि जब अलक्षेन्द्र (यानी alexander) ने भारत पर हमला किया था, तब तय यह करना था इस भूमि के निवासियों को की क्या वह एक जुट होंगे इस "राष्ट्र" की रक्षा के लिए। दिक्कत यह थी की तत्कालीन जनमानस "राष्ट्र" के विचार को बूझने लायक बौद्धिक प्रवीण नही था। मगर तब भी चाणक्य वह व्यक्ति थे जिन्होंने तय कर लिया था वह  "राष्ट्र" की रक्षा करेंगे। और अकेले ही उन्होंने मौर्य समाज के एक बालक - चंद्रगुप्त- को संग लेकर उसे तैयार किया था तत्कालीन नंद वंश के नालायक शासकों को परास्त करके उसके स्थान पर मौर्य वंश के शासक को विराजमान करके अलक्षेन्द्र की सेना से लोहा लेने का।

आगे का इतिहास सब जानते है, मगर महत्वपूर्ण बिंदु है कि चाणक्य ने यह सब "राष्ट्र" नामक वैचारिक बौद्ध के आवेश में आ कर प्राप्त किया था, और समाज को चलाने के लिए आवश्यक जनकल्याणकारी अर्थनीति के अविष्कार किया जो की आज तक लोगों की स्मृति पर क़ायम है।

हालांकि चाणक्य के काल में "प्रजातंत्र" नामक विचार इतना प्रबल नही था। जन व्यवस्था चलाने के लिए जो भी नीति होती थी, वह जनता से पूछ कर तय नही होती थी, बल्कि राजभवन के भीतर यूँ ही बना दी जाती थी, वंश व्यवस्था से उत्पन्न राजाओं और उनकी सभा के द्वारा। दावा (या आरोप ) यह था कि जिस जनमानस को "राष्ट्र" का बौद्ध नही था, जो विदेशी आक्रमण पर भी एकजुट नही हुआ है, तब वह इस क़ाबिल है ही नही की कोई भी नीति बनाने के लिए उसकी अनुमति ली जाये, या उससे पूछा जाये।

वर्तमान काल तक संघ घराने में यही विचारधारा चलती आई है की "राष्ट्र" ही प्रधान होता है, तथा नीति निर्माण के लिए जनमानस की अनुमति लेना बेकार का झंझट होता है क्योंकि जनमानस की बौद्धिक क़ाबलियत इस लायक होती ही नही है।

अगर 'JNU बनाम मोदी' सरकार का झगड़ा देखें, या फिर 'liberal बनाम भक्त' का झगड़ा समझें तो इनके केंद्र में यही विवाद दिखाई पड़ेगा - की प्रधान क्या है - "राष्ट्र" या फिर "प्रजातंत्र"।

गौर करें की चाणक्य आज से तीन हज़ार वर्षों पहले की घटना है, जब देशो पर साशन राजा महाराजाओं का हुआ करता था, जो की वंश व्यवस्था से नियुक्ति लेते थे। चुनाव करवा कर गणराज्य व्यवस्था से राजा की नियुक्ति की व्यवस्था नही थी। यह चलन सिर्फ भारत में ही नही, समूची दुनिया में हुआ करता था।

ज़ाहिर है की ऐसे काल में , जब जनता का राज्य की शासन प्रणाली में अधिक ज्ञान नही था, तब फिर उनको अपनी मनमर्ज़ी बताने का भी कोई महत्व नही हुआ करता था। जनता को राज्य की व्यवस्था के प्रति आवश्यक ज्ञान आता भी तो कहां से? तब न तो कोई liberal arts स्कूल व्यवस्था थी,  न ही कोई सार्वजनिक सरकारी office।

प्रजातंत्र का उत्थान, समय काल रेखा पर बहोत बाद में, और बहोत दूर के देश, greece में हुआ जो की alexander की ही मातृभूमि थी। और यह प्रबल हुआ europe में england पहुंच कर। भारत में यह विचार पहुंचा था आज़ादी की लड़ाई के दौरान जब तत्कालीन बंगाली civil servants और बाकी देश से आये barristers ने अपने परीक्षा और पढ़ाई इत्यादि के दौरान इंग्लैंड का दौरा करते समय इसको england में देखा-सुना था।
गांधी जी जैसे लोगों ने अंग्रेज़ो से लड़ाई के दौरान सबसे बड़ी उप्लाधि यही दी थी कि भारत भूमि के जनमानस, जो की आज भी राज व्यवस्था से अलग थलग रहता बस चुपचाप टैक्स ही देता था, उसको गांधी ने अपनी तमाम आंदोलनों से झकझोर कर जागृत कर दिया था शासन नीति के प्रति शामिल होने के लिए। जनता ने गांधी की अगुवाई में पहली बार दांडी पद मार्च करके टैक्स देने से इंकार किया था - जो की नमक जैसे साधारण मगर आवश्यक और सहज़ उपलब्ध वस्तु पर ज़बरन उल्टे-पुल्टे कानून बना कर वसूला जा रहा था। जब नमक यूँ ही गुजरात के तटों पर प्रकृति से निर्मित हो ही रहा था, तब फिर कैसे कोई सरकार उसको उठाने के ख़िलाफ़ प्रतिबंध कानून बना कर फिर उसे बेच कर टैक्स वसूली कर सकती थी? यह कहां का न्याय हुआ?

मगर भारत का सीधा-साधा ग्रामीण जनमानस इस प्रकार की स्वचेतना तक नही रखता था कि उनके संग कुछ ग़लत कर रही है "सरकार"। वह तो बस चुप-चाप कानून का पालन करते हुए लगान(tax) पर लगान देता ही रहता था। यह तो गांधी के आंदोलन ही थे जिसने जनता को एक जुट किया था , और फिर जिस एकजुटता के बदौलत वह क्रूर, जालिम और चतुर सामर्थ्य वाली सरकार के ख़िलाफ़ लोहा ले सके थे

मगर संघ तो हमेशा से गांधी का विरोधी ही रहा है। जैसे वह गांधी को नही मानता है, वैसे ही वह "प्रजातंत्र" को भी प्रधान सामाजिक मूल्य नही मानता है। उसके अनुसार आज भी जनमानस इस लायक बौद्धिक क़ाबिलियत नही रखता है कि उसको शासन नीति के निर्माण में शामिल किया जाये। संघ liberal arts education की आवश्यकता को स्वीकार करने को तैयार नही है कि कैसे liberal arts और इसके विद्यालय तर्कों के शोध की भूमि होते हैं, जहां से श्रेष्ठ सामाजिक और मानव नीतियां जन्म लेती हैJNU उसी liberal arts का प्रतिनिधित्व करता है, जो की किसी भी प्रजातंत्र के जन्म लेना का और उसके सफ़ल होने का मार्ग प्रदान करवाते हैं।

तो मोदी सरकार की JNU से जो लड़ाई है , जिसमे एक तरफ़ संघ घराने के लोग"राष्ट्र" की भावना को कुरेद कुरेद कर जनता से वोट की अपील आकर रहे हैं, वह यही है कि "राष्ट्र" को प्रधान माना जायेगा या की राष्ट्र को चलाने वाले मूल्य - सामाजिक संकल्प - प्रजातंत्र - को ?

अब एक सवाल यह है कि जब संघ सामाजिक संकल्प के विचार पर मूक खड़ा है तब फिर संघ का "राष्ट्र" वास्तव है क्या? क्या है वो ,जिसके लिए संघ सोचता है कि जनता को उसकी रक्षा के लिये अपने प्राणों का बलिदान देना चाहिये? क्या है वह और उसके शासन की बागडोर किसके हाथों में होगी? कौन होगा यहां का राजा , और कैसे नियुक्त किया जायेगा उसे? कैसे यहाँ पर सर्व कल्याणकारी नीति तय करि जायेगी?

संघ की विचाधारा यहां पर मूक हो जाती है। संघ का "राष्ट्र" कुछ और नही बल्कि "देश" का पर्यायवाची है, जो की भूमि से अभिप्राय रखता है। संघ घराने ने "राष्ट्र" में सामाजिक एकता और सामाजिक संकल्प की आवश्यकता को अभी  चिन्हित नही किया है। संघ अपने "राष्ट्र" को प्राचीन वैदिक तौर तरीकों से चलाने पर अमादा है, शायद वही व्यवस्था जब राजा-महाराजा लोग जनता से पूछे बग़ैर ही राजभवन के भीतर कुछ भी नीति बना कर जनता पर थोप दिया करते थे, और टैक्स(लगान) वसूल-वसूल कर जनता का कचूमर बना देते थे।

वैसे वर्तमान मोदी सरकार ने संघ की उसी वैचारिक उपलब्धि का मुजाहिरा किया है। मॅहगाई ,टूटी हुई अर्थव्यवथा और जान कल्याणकारी नीतियों से कोसों दूर भटकती शासन नीति उसी संघी विचारधारा की देन दिखती है, जिसमे जनता को अयोग्य मान कर उससे पूछना फिज़ूल समझा जाता है, जहां liberal arts का महत्व और तर्कों के शोध की क्रिया के बारे में आत्मज्ञान आज भी नही है। जनता के आंदोलन को "विपक्ष का षड्यंत्र" या फिर "विदेशी ताकतों का षड्यंत्र" बता कर सरकारी संस्थाएं प्रयोग करि गयी है जनभावना को दमन करने के लिए। आख़िरकार संघ घराने ने तो हमेशा से जनमानस को अयोग्य ही माना है, और उसका सम्मान नही किया है।

Modern man and his knowledge societies

Knowledge-based society is producing its own kind of devils. Knowledge is being collected and being stored by people. The better use they are making use of this knowledge is somewhat like to play a quiz show to make great money. Knowledge is hardly being used to advance human societies, to take one more step forward towards the perfection, to search more values, the change the quality of our living. Knowledge is creating Intelligent people, those who can quickly store and quickly recall the vast pieces of knowledge, nomatter the selectively chosen knowledge or the mutually conflicting knowledge. The intelligent ones recall at their desire when 'prevention is better than the cure', and when they choice, 'the fore-warned is fore-armed'. The intelligent ones cannot do justice as to which to apply when. The intelligent ones are not at peace with themselves due to the immense mutually-conflicting knowledge repoitre they have developed. The intelligent ones are more egoist, more cruel, more inhuman than the older generation ignorant people. Intelligent ones are more oppressive, more dominating, more attacking than the ignorant people of the past. Knowledge without value, without the ability to search justice is very dangerous. It is a commodity unless the keeper of knowledge does not know which locus is the justice. To search the justice one has to continually practise the arguments, to continually look deeper and finer between the things, to know the difference between two values to learn where the overlap would end.

Logic और भक्त

अरे भाई deductive logic भी तो कोई चीज़ होती है , कि नहीं?
अगर केह दिया गया है कि 'सूरज सर पर चमक रहा है', तो क्या *deductive logic* को इंकार करते हुए यह बहस करोगे कि 'किसने कहा कि दिन हो रहा है ??'

उसी तरह CAA कानून और उनके संशोधन के अभिप्राय, *deductive logic* सभी को समझ आ रहे हैं। बेकूफों जैसे बहस मत करते दिखो की किसने कहा कुछ वर्ग/धर्म के लोगों की नागरिकता ख़त्म होने का संकट है !
Deductive logic कुछ तो होती है। या कि पूरी दुनिया को ही ' *भक्त* ' *mental ability* समझते हो?

आखिर क्या गड़बड़ है बीमारू राज्यों की छात्र राजनीति में

ये शायद उत्तर प्रदेश, बिहार , पश्चिम बंगाल जैसे बीमारू राज्य ही है जहाँ की घटिया, आपराधिक राजनीति समूची देश की जनता को प्रेरित करती है JNU मामले में यह कहने के लिए की छात्रों को राजनीति में नही, class room में होना चाहिए।
अन्यथा तो राजनीति जिन प्रक्रिया से जन्म लेती है - वह प्रक्रिया तो छात्र जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंश होता है क्योंकि ज्ञान की तलाश और मूल उत्पत्ति भी वही से होती है -- जिस वजहों से राजनीति और छात्रों के बीच एक अकाट्य संबंध होता है।
वह प्रक्रिया है - मंथन ।

मगर बड़ी ज्ञान की बात है कि मंथन के कई प्रकार होते है, जिसमे कि JNU और यह बीमारू राज्य एक दूसरे से भिन्न है। शायद आम आदमी, जनता इस बारीकी को नही समझती है, और वह सीधे सीधे उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों की छात्र राजनीति, अपराध औऱ यौन शोषण को जानते-समझते हुए यही प्रस्ताव लेती है कि छात्रों को तो राजनीति में आना ही नही चाहिए। जबकि मंथन प्रक्रिया के तमाम पहलुओं में मद्देनज़र यह तो असंभव विचार है। खुद भाजपा के ही दिग्गज़ नेता दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की देन थे और है। सूची में बड़े नाम हैं, जैसे स्व. अरुण जेटली, स्व. सुषमा स्वराज इत्यादि।

तो सवाल है कि उत्त्तर प्रदेश, बिहार ,पश्चिम बंगाल की छात्र राजनीति में क्या गड़बड़ है?
गौर से देखै तो वास्तव में मंथन कई किस्म के होते हैं। अंग्रेज़ी भाषा मे इन किस्म की पहचान पहले ही करि गयी है, और अलग अलग शब्द दिए गए है - debate, dialectic, sophistry, polemics, rhetoric, इत्यादि।  बीमारू राज्यों की शिक्षा पद्धति कमज़ोर है, छात्रों की और अध्यापकों की विद्धवानता पर्याप्त नही है, वह debate , या dialectics जैसे मान्य किस्म में नही होते हैं। आखिर नीति निर्माण की बहस के प्रबल तर्क तो इन्हीं दोनों किस्म से  शोध किये जाते हैं। और फिर किसी भी प्रजातंत्र व्यवस्था के दो सर्वोच्च संस्थाएं तर्क करने के लिए ही निर्माण करि जाती हैं - संसद और न्यायालय।

मगर sophistry , polemics (हिंदी अनुवाद  तू-तू-मैं-मैं) , जो सब कुतर्क वाले अमान्य प्रकार होते मंथन के, वह ही इन बीमारू राज्यों के छात्र नेताओं को जन्म देते हैं। आप इन  राज्यों के युवा या छात्र नेताओं को कभी भी , सर्वप्रथम तो, तर्क करते दिखेंगे ही नही। अन्यथा वह अगर मुँह खोलेंगे तो भी इन अमान्य, कुतर्क वाले के प्रकारों में लिप्त पाएंगे।

आप ख़ुद से पड़ताल कर लें। बीमारू राज्यों के किसी वही युवा नेता के सोशल मीडिया profile और posts को देखें। ज्यादातर पोस्ट किसी ख़ास वर्ग की मिलेंगी, जिसकी समीक्षा करके आप उनके बौद्धिक अवस्था का अंदाज़ा लगा सकते है। तमाम posts के वर्ग में जो post होंगी वह है - किसी की मृत्यु के अफ़सोस जताने की, किसी त्योहार की बधाई, किसी दिवंगत महापुरष की स्मृति में शत-शत नमन करने वाली, और विपक्ष के कृत्यों पर कुछ छोटे मोटे अफ़सोस जताने भर,  जिसमे मानो की उन्हों खुद कोई पीड़ा या कष्ट नही था, वह तो मात्र हमदर्दी रखते हैं। आप इनको किसी भी controversial विचार को रखने से कतराते हुए आसानी से देख सकते हैं। बहोत होगा तो कुछ ताथयिक घटना का वर्णन कर देंगे, जैसे 'आज हमने फलां जगह उपस्थिति दी"। कोई समीक्षा, कोई विश्लेषण तो यह लोग कतई भी नही करेंगे।और हाँ, अपनी पार्टी के नेता से सम्बंधित हर पोस्ट में उसकी प्रशंसा और गुणगान करने अनिवार्य है, आलोचना नही कर सकते, भले ही मुंह बंद करके चुप्पी रख लें।

यह सब बीमारू राज्यों के छात्र नेता हैं। इनमे मजबूत तर्क देने की काबलियत जाहिर तौर पर नही होती है।क्योंकि इनके पास तर्क नही है। क्योंकि यह debate करने लायक बौद्धिक विकास को प्राप्त नही किया है।

इनका खुद का इतिहास छात्र जीवन मे अपराघी या हिंसक घटनाओं को अंजाम देने से ही आरम्भ होता है, जहां इनकी छवि दबंग गुंडे वाली बनती हो, जिससे कि वोट वसूल सकने की गंध मिले।

यह होती है बीमारू राज्यों की छात्र राजनीति।

JNU के प्रति जन विरोधी माहौल, और जीवन मे Liberal Arts विद्यालयों का महत्व

जब आप JNU जैसी liberal arts संस्थानों को अपमानित करेंगे तब आपके घरों में मूर्ख ,अड़ियल और अल्प बुद्धि सन्तानें ही जन्म लेगा, बौद्धिक नही।

भाजपा घराने और मोदी जी खुद की सबसे जानी-मानी "खूबी" है कि करण थापर ने चार सवाल क्या पूछ लिए थे, पानी पीना पड़ गया था। यह लोग प्रश्न का उत्तर नही दे सकते हैं। अर्थात कि स्वतंत्र , स्वछन्द चिंतन नही है इनमें जो की समस्याओं के मूल कारक को सटीकता से पहचान कर के उसके समाधान दे।  यह लोग संसद में अपने सांसदों की उपस्थति कम होने पर उसे सज़ा तो देते हैं, मगर संसद के भीतर, बाहर कभी भी सवाल पूछने या तर्क- संवाद में शमल्लीत होने में भयभीत , व्याकुल हो जाते हैं। जबकि संसद और कोर्ट संस्थाएं बनाई ही गयी होती है तर्क-संवाद करने के लिए।
तो यह लोग कुछ ऐसे है की सिर्फ इन्हें स्कूल जाना ही पसंद आता हैं, मगर स्कूल में होने वाली पढ़ाई लिखाई का काम पसंद नही !!

तर्क की आवश्यकता मानव जीवन और समाज में महत्वपूर्ण है। तर्क ही मन को मोहित करते हैं, प्रेरणा देते हैं, व्याकुलता को शांत करते हैं, कर्म और निर्णय को दृढ़ बनाते हैं। तर्क से इंसान निष्पक्षता और न्याय करने के उच्च मानदंड प्राप्त करता है। तर्क और आलोचना से सुंदरता आती है। तर्क को साधना उच्च बौद्धिक क्षमता का कार्य है। जो की liberal arts जैसे विद्यालयों में प्रशिक्षण मिलता है, अच्छे, उच्च कोटि political science के माहौल में।

मगर यह लोग वह सब नही कर सकते हैं । क्यों?? क्योंकि JNU जैसी संस्थाओं का महत्व नही जानते हैं। यह liberal arts को तक नही पहचानते हैं।

मगर शायद यह भी हो सकता है कि JNU को अपमानित करना इनकी साज़िश हो , कि सिर्फ आपको-हमें ही JNU के प्रति विमुख करना चाहते हैं, जबकि उनकी खुद की सन्तानें तो विदेशों के उच्च कोटि liberal arts विद्यालयों में पढ़ने चली जाती है। विधि मंत्री रवि शंकर प्रसाद जी की बेटी law पढ़ने विदेश गयी है, स्मृति तो yale के 6 दिवसीय course पढ़ कर ही गदगद हुई हैं। बाकीयों की संतान London school of economics and political science , या cambridge , oxford जैसे विश्व स्तरीय liberal arts संस्थाओं में पढ़ती है।

और आपको-हमें यह JNU जैसे देसी, सस्ते मगर उच्च कोटि विद्यालय तक के लिए उदासीन बना देने की साज़िश करते हैं ताकि आपकी और हमारी पीढ़ियां भी मूर्ख , अल्प बुद्धि बनें।

जय शाह का जादूई करिश्मा

जय शाह, अमित शाह का बेटा, ने क्रिकेट बोर्ड ,BCCI के कोषाध्यक्ष बनते ही एक और दैविक करिश्मा कर दिखाया है। रातों रात उन्होंने मात्र 27 followers से बढ़ते हुए 10000 से भी अधिक followers प्राप्त कर लिए, वह भी एक भी tweet किये बगैर !
और साथ ही में twitter की तरफ से प्रमाणिकता का चिन्ह - double tick का निशान भी प्राप्त कर लिया।
यह जय शाह के पहले वाले दैविक करिश्मे से कम नही था जब उन्होंने विमुद्रिकारण वाले वर्ष में एक कंपनी बनाई मात्र 80 हज़ार रुपये में, और अगले ही साल 1600 करोड़ का कारोबार करके, मुनाफा देकर वह कंपनी कंगाल हो कर बंद भी हो गयी।
दलित और पिछड़े वर्ग से आये एक जाने माने पत्रकार दिलीप चंद मंडल को भी ट्विटर ने प्रमाणिकता का चिन्ह से अभी तन नवाज़ा नही है, जबकि उनके लेख बीबीसी  पर आये दिन प्रकशित होते हैं। twirter दिलीप मंडल को इतने लेखों के बावजूद नही जानता, और जय शाह को एक भी tweet किये बगैर जान जाता है।
यहाँ तक कि दिलीप मंडल के profile को कुछ दिन पहले twitter ने अवरोधित भी कर दिया था, हालांकि शिकायतें और पक्षपात के आरोप आने पर उसे जल्द ही अवरोध हटाने पड़े थे।
Twitter के शीर्ष भारत देश क्षेत्र में हाल में नियुक्त किया गया है, मनीष माहेश्वरी नाम से , जो की पहले नेटवर्क 18 ग्रुप में काम करते थे, जो कि रिलायंस की उप कंपनी है।
सच है, आरक्षण के भरोसे आप दुनिया नही जीत सकते हैं। आप twitter को न तो निर्माण कर सकते हैं, न उसके भारत शीर्ष नियुक्त किये जा सकते हैं।

Project Artificial Democracy : Instigated is NOT same as the Agitated

*Instigated is NOT same as Agitated*
I think that the Ruling party is conspiring to exploit a farcical "truth" that a protest should not be violent .

The hidden misbelief that the Ruling party wants the common people to buy through this farcical "truth" is that all the protests that happen against the Government are basically MOTIVATED, and a result of the Opposition parties' conspiracy.

BY ACCEPTING the farcical Truth , the common man sub-consciously begins to accept that violence during a protest is not a NATURAL reaction of the agitated masses BY THEIR OWN WILL , BUT NECESSARILY coming from the INSTIGATION they have received from handwork of the Opposition parties.

And therefore , the common man falls prey to justifying the VIOLENCE action done by the state forces AGAINST the common man involved in a protest ,  BY ASSUMING that all the violence during a protest is always a SPONSORED event , and NEVER from the NATRUAL REACTION OF AN AGITATED CROWD.

In Summary, the sub-conscious mind of the common man begins to think that all VIOLENCE is sourced from INSTIGATION fron someone else and none from the AGITATION of his own mind .
The Ruling party is perhaps abusing some recently researched tools from the field of MASS PSYCHOLOGY - (sort of a Project MIND-GAMES) - to MANUFACTURE the PUBLIC CONSENT in their favour by reversing the naturally and free existent PUBLIC IDEAS.

JNU की राजनीति बनाम उत्तर प्रदेश की छात्र राजनीति

हालांकि JNU में हुई छात्र दलों की झड़प की घटना के बाद हुए वाराणसी के संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्र संघठन चुनावों में abvp की शिकस्त हुई है, 

मगर निर्मोह में विचार मंथन किया जाये तो उत्तर प्रदेश की छात्र राजनीति में आदर्शों और मानकों के प्रति संघर्ष निम्म है, बल्कि समूचा संघर्ष ही शक्ति हरण का होता है - प्रशासनिक शक्ति को व्यक्तिगत मनमर्ज़ी से भोग करने का संघर्ष।

उत्तर प्रदेश की विधान सभा की राजनीति में भी नेताओं में आदर्शों के प्रति झुकाव कमज़ोर है। यहां की राजनीति जाति के संघर्ष की है - कि फलां-फलां जातियों को शक्ति सम्पन्न होने से रोकना है। और जातियों की पहचान कुलनाम के प्रयोग से ही है, किसी ख़ास किस्म के चारित्रिक , सांस्कृतिक या आदर्शों के पहचान से नही है।

यह सब ही समझा सकता है की क्यों यह प्रदेश बद से बदत्तर हुआ जा रहा है, तथा यह कि क्यों प्रदेश का राजनैतिक मुद्दा प्रशासनिक व्यवस्था - law and order का है। यह सब बाकी अन्य सम्पन्न आर्थिक राज्यों से काफ़ी भिन्न है, जहां की विधान सभा की राजनीति होती है व्यापारिक अंश को कब्ज़ा करने के, सरकारी ख़ज़ाने से बड़े मूल्यों के business contracts को छेकने की ।

उत्तर प्रदेश में घोटाले भी होते हैं तो किस किस्म के ? -- पुलिस में भर्ती के, अध्यापक नियुक्ति के, सरकारी नौकरी पाने के। !!

यह सब पिछड़े पने के लक्षण हैं। आर्थिक सम्पन्न राज्यों में घोटाले होते है किसी सार्वजनिक कार्य के सरकारी contract को छेक कर अपने से संबंधित निज़ी कंपनी को देने के। तो फिर इन प्रदेशों में private नौकरियों का चलन होता है, और जिसमे उच्च कीमत नौकरियां, या मुनाफ़ा भी खूब मिलता है।

उत्तर प्रदेश की छात्र राजनीति कोई विशेष सामाजिक झुकाव को नही प्रदर्शित कर सकती है। क्योंकि इसमें आदर्शों का संघर्ष नही है, और इस लिए इसमे बड़ी आबादी को प्रभावित और प्रोत्साहित करने के गुण नही है। यहां लोगों की मानसिकता अभी भी राज-पाठ जैसे प्रशासनिक व्यवहार पर बंधी हुई है। न तो नागरिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता है, और न ही प्रशासन में उनके अधिकारों को सुरक्षा और संरक्षण देने के अपने उत्तरदायित्व का बोध है। सब कुछ एक राजा-प्रजा वाले संबंध पर चलता है। राजनेता अपने को जनता के विचारों का प्रतिनिधि नही मानते है, बल्कि जनता को उनके शक्ति सम्पन्न होने का साधन समझते हैं। इसलिये छात्र राजनीति का उद्देश्य मात्र यह है की शक्ति शाली "गुंडों" को जन्म देती रहे, जिसके माध्यम से नेता लोग शक्ति सम्पन्न हो सकें। न कि यह की छात्र राजनीति कोई राजनीतिक आदर्शो के संघर्षो की भूमि प्रदान करे, तर्कों के शस्त्र प्रदान करे।

यह सब दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और JNU की छात्र राजनीति से बिल्कुल ही अलग सा है। वहां संघर्ष होता है आदर्शों और मानकों के प्रति । इसलिये वह छात्र राजनीति जनमानस को अधिक प्रभावित करती है। वहां के छात्र आज देश के कई सारे प्रभावशील पदों पर बैठे हुए हैं। वह अच्छा वाचन करते है, प्रभावकारी तर्कों से लैस है, ज़्यादा मनभावक बातों से लबालब है। ज़्यादा motivating तरहों से जन संवाद करते दिखाई पड़ते है।

जबकि उत्तर प्रदेश में छात्र राजनीति शायद सिर्फ सेक्स , power और पैसे का संघर्ष ही है। इसलिये यहां अमानवीय हिंसा अक्सर होती है -क़त्ल , बकैती, अभद्रता , वग़ैरह। यही वह छात्र राजनीति का संस्करण है जिसके प्रति जनमानस में उदासीनता है, लोग छात्र और विश्वविद्यालयों की भीतर की राजनीति के महत्व को ही देखना- समझना भूल गये हैं। बल्कि छात्र राजनीति के संग संग विश्वविद्यालय के भीतर वैश्विक मंथन से उत्पन्न राजनीति को भी धिक्कार देते रहते हैं। क्योंकि छात्र राजनीति और वैश्विक मंथन के मध्य फांसले बहोत कम होते हैं, साधारण जनमानस दोनों को ही एक रूपी देखता है, और दोनों को ही नापंसद कर देता है।

Abvp की वाराणसी के विद्यालय में हुई शिकस्त ज़्यादा कुछ नही दर्शाती है। पिछड़े , ग़रीब राज्य की छात्र राजनीति मात्र एक बहती गंगा में बहता कचरा है, यह खुद में कोई धारा नही है। इस राजनीति से सामाजिक संसाधनों का विध्वंस ही किया जा सकता है, किसी भी आवश्यकता को पूर्ण करने का निर्माण नहीं हो सकता है।

JNU जैसे संस्थान क्यों ज़रूरी होते हैं प्रजातंत्रों के लिए

प्रजातंत्रों का अस्तित्व बिना liberal arts के उच्च गुणवत्ता विश्वविद्यालयों के सम्भव नही होता है।
विश्वविद्यालय और उनके भीतर चलने वाली वाद-विवाद ही मंथन की वह प्रक्रिया होती है जिससे शोध होते हैं, अंतर्मन निखरता है, पैना बनता है, नए मानक तलाशता है।
यह जो आज हमारा समाज जो सदियों की नारी दमन वाली परम्पराओं से होता हुआ समानता के अधिकारों तक पहुंचा है, जो ग़ुलामी और शोषण से मुक्त होता है वैश्वीकरण में गया है, -- यह सब यूँ नही हुआ है -- इसके लिये इंसानियत के नए मानक को निरन्तर तलाश यात्रा करनी पड़ी है समाज को , तब जाकर यह पर पहुंचे है।

और यह सब तलाश मोदी जी ने नही करि है। पश्चिमी दुनिया के उच्च कोटि विश्वविद्यालयों ने करि है - oxford, harward, ivy league ने करि है।

JNU हमारे देश का एक प्रयास था उसी मानक को भारत मे भारत मे भी प्राप्त करने का। अफसोस है कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था में political neutrality को सुनिश्चित करने के प्रबंध ही उपयुक्त नही है।

मुझे पक्का विश्वास है कि बहोत बड़ी मूर्ख आबादी यह समझती है कि सोध का अभिप्राय बहोत सारे लोग -प्रायः भक्त वर्ग - विज्ञान और प्रयोद्योगिकी से समझते हैं।
यह ग़लत है। शोध का सर्वप्रथान पड़ाव आत्म-चेतना के मानक विस्तृत करने से होता है।
Einstien के वैज्ञानिक शोध किसी वैज्ञानिक चेतना की देन नही थे। बल्कि तत्कालीन समाज मे भगवान के अस्तित्व को लेकर चल रही बहस का अंश थे -जिस पर europe के समाज मे राजनीति गरम हुआ करती थी। secularism भी उसी बहस का परिणाम है।

Charles darwin की शोध भी अनजाने में इसी वाली बहस का ही उपज है। आस्तिक विचारों में इंसान का अविष्कार "स्वयंभू" हुआ करता था, जबकि darwain ने कोशिकाओं के क्रमिक विकास से होता है इंसानों को बंदर से होते हुए वर्तमान homo sapien स्तर तक पहुंचने की बात करि थी। यह विषय तत्कालीन समाज का राजनैतिक विवाद का बिंदु भी था।

Newton की गुरुत्व की खोज भी जिन वातावरण में हुई है , वह धार्मिक-राजनैतिक विवाद का विषय थी। भगवान के दुनिया को चलाने के दो अलग नियम होते है - ऐसा आस्तिक sacramental विचारको का मानना था। newton की खोज ने पहली बार यह दावा दिया था कि नही, ब्रह्मांड के नियम कुछ एक स्तर पर एक ही होते है- धरती पर जी नियम है, ऊपर आकाश और स्वर्ग में भी वही नियम लागू रहते हैं।

तो छात्र राजनीति, शोध - वैज्ञानिक और सामाजिक चिंतन की -- सब आपस मे उलझी हुई गुत्थी हैं।

मगर आस्तिक विचारधारा कीसाज़िश हमेशा यही यही की वह वैज्ञानिक अविष्कारों को प्राप्त कर लेना चाहती है, बिना उनके साथ संलग्न नास्तिकता की विचारधारा के। और फिर उन अविष्कारों को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करती है एक नए चरित्र-चित्रण के संग --- आस्तिकता के उपहार बना कर।

आरएसएस और भाजपा , abvp उसी आस्तिकता की बहस के प्रायोजक है भारतीय समाज पर। जिनके खेमे में से दावे निरंतर आते हैं कि वायुयान , गुरुत्व, nuclear शक्ति- सब कुछ वेद पुराणों में दिया हुआ है।

और तथाकथित "वामपंथ", यानी libertard उनके दुश्मन हैं, जो कि नास्तिकता तथा नास्तिकतावाद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं भारतीय समाज पर।

JNU और इनके जैसे अनेक अन्य विश्वविद्यायल को होना भारत के प्रजातंत्र को कायम रखने और सफ़ल बनाने के लिए आवश्यक है।

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