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Modern man and his knowledge societies

Knowledge-based society is producing its own kind of devils. Knowledge is being collected and being stored by people. The better use they are making use of this knowledge is somewhat like to play a quiz show to make great money. Knowledge is hardly being used to advance human societies, to take one more step forward towards the perfection, to search more values, the change the quality of our living. Knowledge is creating Intelligent people, those who can quickly store and quickly recall the vast pieces of knowledge, nomatter the selectively chosen knowledge or the mutually conflicting knowledge. The intelligent ones recall at their desire when 'prevention is better than the cure', and when they choice, 'the fore-warned is fore-armed'. The intelligent ones cannot do justice as to which to apply when. The intelligent ones are not at peace with themselves due to the immense mutually-conflicting knowledge repoitre they have developed. The intelligent ones are more egoist, more cruel, more inhuman than the older generation ignorant people. Intelligent ones are more oppressive, more dominating, more attacking than the ignorant people of the past. Knowledge without value, without the ability to search justice is very dangerous. It is a commodity unless the keeper of knowledge does not know which locus is the justice. To search the justice one has to continually practise the arguments, to continually look deeper and finer between the things, to know the difference between two values to learn where the overlap would end.

Logic और भक्त

अरे भाई deductive logic भी तो कोई चीज़ होती है , कि नहीं?
अगर केह दिया गया है कि 'सूरज सर पर चमक रहा है', तो क्या *deductive logic* को इंकार करते हुए यह बहस करोगे कि 'किसने कहा कि दिन हो रहा है ??'

उसी तरह CAA कानून और उनके संशोधन के अभिप्राय, *deductive logic* सभी को समझ आ रहे हैं। बेकूफों जैसे बहस मत करते दिखो की किसने कहा कुछ वर्ग/धर्म के लोगों की नागरिकता ख़त्म होने का संकट है !
Deductive logic कुछ तो होती है। या कि पूरी दुनिया को ही ' *भक्त* ' *mental ability* समझते हो?

आखिर क्या गड़बड़ है बीमारू राज्यों की छात्र राजनीति में

ये शायद उत्तर प्रदेश, बिहार , पश्चिम बंगाल जैसे बीमारू राज्य ही है जहाँ की घटिया, आपराधिक राजनीति समूची देश की जनता को प्रेरित करती है JNU मामले में यह कहने के लिए की छात्रों को राजनीति में नही, class room में होना चाहिए।
अन्यथा तो राजनीति जिन प्रक्रिया से जन्म लेती है - वह प्रक्रिया तो छात्र जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंश होता है क्योंकि ज्ञान की तलाश और मूल उत्पत्ति भी वही से होती है -- जिस वजहों से राजनीति और छात्रों के बीच एक अकाट्य संबंध होता है।
वह प्रक्रिया है - मंथन ।

मगर बड़ी ज्ञान की बात है कि मंथन के कई प्रकार होते है, जिसमे कि JNU और यह बीमारू राज्य एक दूसरे से भिन्न है। शायद आम आदमी, जनता इस बारीकी को नही समझती है, और वह सीधे सीधे उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों की छात्र राजनीति, अपराध औऱ यौन शोषण को जानते-समझते हुए यही प्रस्ताव लेती है कि छात्रों को तो राजनीति में आना ही नही चाहिए। जबकि मंथन प्रक्रिया के तमाम पहलुओं में मद्देनज़र यह तो असंभव विचार है। खुद भाजपा के ही दिग्गज़ नेता दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की देन थे और है। सूची में बड़े नाम हैं, जैसे स्व. अरुण जेटली, स्व. सुषमा स्वराज इत्यादि।

तो सवाल है कि उत्त्तर प्रदेश, बिहार ,पश्चिम बंगाल की छात्र राजनीति में क्या गड़बड़ है?
गौर से देखै तो वास्तव में मंथन कई किस्म के होते हैं। अंग्रेज़ी भाषा मे इन किस्म की पहचान पहले ही करि गयी है, और अलग अलग शब्द दिए गए है - debate, dialectic, sophistry, polemics, rhetoric, इत्यादि।  बीमारू राज्यों की शिक्षा पद्धति कमज़ोर है, छात्रों की और अध्यापकों की विद्धवानता पर्याप्त नही है, वह debate , या dialectics जैसे मान्य किस्म में नही होते हैं। आखिर नीति निर्माण की बहस के प्रबल तर्क तो इन्हीं दोनों किस्म से  शोध किये जाते हैं। और फिर किसी भी प्रजातंत्र व्यवस्था के दो सर्वोच्च संस्थाएं तर्क करने के लिए ही निर्माण करि जाती हैं - संसद और न्यायालय।

मगर sophistry , polemics (हिंदी अनुवाद  तू-तू-मैं-मैं) , जो सब कुतर्क वाले अमान्य प्रकार होते मंथन के, वह ही इन बीमारू राज्यों के छात्र नेताओं को जन्म देते हैं। आप इन  राज्यों के युवा या छात्र नेताओं को कभी भी , सर्वप्रथम तो, तर्क करते दिखेंगे ही नही। अन्यथा वह अगर मुँह खोलेंगे तो भी इन अमान्य, कुतर्क वाले के प्रकारों में लिप्त पाएंगे।

आप ख़ुद से पड़ताल कर लें। बीमारू राज्यों के किसी वही युवा नेता के सोशल मीडिया profile और posts को देखें। ज्यादातर पोस्ट किसी ख़ास वर्ग की मिलेंगी, जिसकी समीक्षा करके आप उनके बौद्धिक अवस्था का अंदाज़ा लगा सकते है। तमाम posts के वर्ग में जो post होंगी वह है - किसी की मृत्यु के अफ़सोस जताने की, किसी त्योहार की बधाई, किसी दिवंगत महापुरष की स्मृति में शत-शत नमन करने वाली, और विपक्ष के कृत्यों पर कुछ छोटे मोटे अफ़सोस जताने भर,  जिसमे मानो की उन्हों खुद कोई पीड़ा या कष्ट नही था, वह तो मात्र हमदर्दी रखते हैं। आप इनको किसी भी controversial विचार को रखने से कतराते हुए आसानी से देख सकते हैं। बहोत होगा तो कुछ ताथयिक घटना का वर्णन कर देंगे, जैसे 'आज हमने फलां जगह उपस्थिति दी"। कोई समीक्षा, कोई विश्लेषण तो यह लोग कतई भी नही करेंगे।और हाँ, अपनी पार्टी के नेता से सम्बंधित हर पोस्ट में उसकी प्रशंसा और गुणगान करने अनिवार्य है, आलोचना नही कर सकते, भले ही मुंह बंद करके चुप्पी रख लें।

यह सब बीमारू राज्यों के छात्र नेता हैं। इनमे मजबूत तर्क देने की काबलियत जाहिर तौर पर नही होती है।क्योंकि इनके पास तर्क नही है। क्योंकि यह debate करने लायक बौद्धिक विकास को प्राप्त नही किया है।

इनका खुद का इतिहास छात्र जीवन मे अपराघी या हिंसक घटनाओं को अंजाम देने से ही आरम्भ होता है, जहां इनकी छवि दबंग गुंडे वाली बनती हो, जिससे कि वोट वसूल सकने की गंध मिले।

यह होती है बीमारू राज्यों की छात्र राजनीति।

JNU के प्रति जन विरोधी माहौल, और जीवन मे Liberal Arts विद्यालयों का महत्व

जब आप JNU जैसी liberal arts संस्थानों को अपमानित करेंगे तब आपके घरों में मूर्ख ,अड़ियल और अल्प बुद्धि सन्तानें ही जन्म लेगा, बौद्धिक नही।

भाजपा घराने और मोदी जी खुद की सबसे जानी-मानी "खूबी" है कि करण थापर ने चार सवाल क्या पूछ लिए थे, पानी पीना पड़ गया था। यह लोग प्रश्न का उत्तर नही दे सकते हैं। अर्थात कि स्वतंत्र , स्वछन्द चिंतन नही है इनमें जो की समस्याओं के मूल कारक को सटीकता से पहचान कर के उसके समाधान दे।  यह लोग संसद में अपने सांसदों की उपस्थति कम होने पर उसे सज़ा तो देते हैं, मगर संसद के भीतर, बाहर कभी भी सवाल पूछने या तर्क- संवाद में शमल्लीत होने में भयभीत , व्याकुल हो जाते हैं। जबकि संसद और कोर्ट संस्थाएं बनाई ही गयी होती है तर्क-संवाद करने के लिए।
तो यह लोग कुछ ऐसे है की सिर्फ इन्हें स्कूल जाना ही पसंद आता हैं, मगर स्कूल में होने वाली पढ़ाई लिखाई का काम पसंद नही !!

तर्क की आवश्यकता मानव जीवन और समाज में महत्वपूर्ण है। तर्क ही मन को मोहित करते हैं, प्रेरणा देते हैं, व्याकुलता को शांत करते हैं, कर्म और निर्णय को दृढ़ बनाते हैं। तर्क से इंसान निष्पक्षता और न्याय करने के उच्च मानदंड प्राप्त करता है। तर्क और आलोचना से सुंदरता आती है। तर्क को साधना उच्च बौद्धिक क्षमता का कार्य है। जो की liberal arts जैसे विद्यालयों में प्रशिक्षण मिलता है, अच्छे, उच्च कोटि political science के माहौल में।

मगर यह लोग वह सब नही कर सकते हैं । क्यों?? क्योंकि JNU जैसी संस्थाओं का महत्व नही जानते हैं। यह liberal arts को तक नही पहचानते हैं।

मगर शायद यह भी हो सकता है कि JNU को अपमानित करना इनकी साज़िश हो , कि सिर्फ आपको-हमें ही JNU के प्रति विमुख करना चाहते हैं, जबकि उनकी खुद की सन्तानें तो विदेशों के उच्च कोटि liberal arts विद्यालयों में पढ़ने चली जाती है। विधि मंत्री रवि शंकर प्रसाद जी की बेटी law पढ़ने विदेश गयी है, स्मृति तो yale के 6 दिवसीय course पढ़ कर ही गदगद हुई हैं। बाकीयों की संतान London school of economics and political science , या cambridge , oxford जैसे विश्व स्तरीय liberal arts संस्थाओं में पढ़ती है।

और आपको-हमें यह JNU जैसे देसी, सस्ते मगर उच्च कोटि विद्यालय तक के लिए उदासीन बना देने की साज़िश करते हैं ताकि आपकी और हमारी पीढ़ियां भी मूर्ख , अल्प बुद्धि बनें।

जय शाह का जादूई करिश्मा

जय शाह, अमित शाह का बेटा, ने क्रिकेट बोर्ड ,BCCI के कोषाध्यक्ष बनते ही एक और दैविक करिश्मा कर दिखाया है। रातों रात उन्होंने मात्र 27 followers से बढ़ते हुए 10000 से भी अधिक followers प्राप्त कर लिए, वह भी एक भी tweet किये बगैर !
और साथ ही में twitter की तरफ से प्रमाणिकता का चिन्ह - double tick का निशान भी प्राप्त कर लिया।
यह जय शाह के पहले वाले दैविक करिश्मे से कम नही था जब उन्होंने विमुद्रिकारण वाले वर्ष में एक कंपनी बनाई मात्र 80 हज़ार रुपये में, और अगले ही साल 1600 करोड़ का कारोबार करके, मुनाफा देकर वह कंपनी कंगाल हो कर बंद भी हो गयी।
दलित और पिछड़े वर्ग से आये एक जाने माने पत्रकार दिलीप चंद मंडल को भी ट्विटर ने प्रमाणिकता का चिन्ह से अभी तन नवाज़ा नही है, जबकि उनके लेख बीबीसी  पर आये दिन प्रकशित होते हैं। twirter दिलीप मंडल को इतने लेखों के बावजूद नही जानता, और जय शाह को एक भी tweet किये बगैर जान जाता है।
यहाँ तक कि दिलीप मंडल के profile को कुछ दिन पहले twitter ने अवरोधित भी कर दिया था, हालांकि शिकायतें और पक्षपात के आरोप आने पर उसे जल्द ही अवरोध हटाने पड़े थे।
Twitter के शीर्ष भारत देश क्षेत्र में हाल में नियुक्त किया गया है, मनीष माहेश्वरी नाम से , जो की पहले नेटवर्क 18 ग्रुप में काम करते थे, जो कि रिलायंस की उप कंपनी है।
सच है, आरक्षण के भरोसे आप दुनिया नही जीत सकते हैं। आप twitter को न तो निर्माण कर सकते हैं, न उसके भारत शीर्ष नियुक्त किये जा सकते हैं।

Project Artificial Democracy : Instigated is NOT same as the Agitated

*Instigated is NOT same as Agitated*
I think that the Ruling party is conspiring to exploit a farcical "truth" that a protest should not be violent .

The hidden misbelief that the Ruling party wants the common people to buy through this farcical "truth" is that all the protests that happen against the Government are basically MOTIVATED, and a result of the Opposition parties' conspiracy.

BY ACCEPTING the farcical Truth , the common man sub-consciously begins to accept that violence during a protest is not a NATURAL reaction of the agitated masses BY THEIR OWN WILL , BUT NECESSARILY coming from the INSTIGATION they have received from handwork of the Opposition parties.

And therefore , the common man falls prey to justifying the VIOLENCE action done by the state forces AGAINST the common man involved in a protest ,  BY ASSUMING that all the violence during a protest is always a SPONSORED event , and NEVER from the NATRUAL REACTION OF AN AGITATED CROWD.

In Summary, the sub-conscious mind of the common man begins to think that all VIOLENCE is sourced from INSTIGATION fron someone else and none from the AGITATION of his own mind .
The Ruling party is perhaps abusing some recently researched tools from the field of MASS PSYCHOLOGY - (sort of a Project MIND-GAMES) - to MANUFACTURE the PUBLIC CONSENT in their favour by reversing the naturally and free existent PUBLIC IDEAS.

JNU की राजनीति बनाम उत्तर प्रदेश की छात्र राजनीति

हालांकि JNU में हुई छात्र दलों की झड़प की घटना के बाद हुए वाराणसी के संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्र संघठन चुनावों में abvp की शिकस्त हुई है, 

मगर निर्मोह में विचार मंथन किया जाये तो उत्तर प्रदेश की छात्र राजनीति में आदर्शों और मानकों के प्रति संघर्ष निम्म है, बल्कि समूचा संघर्ष ही शक्ति हरण का होता है - प्रशासनिक शक्ति को व्यक्तिगत मनमर्ज़ी से भोग करने का संघर्ष।

उत्तर प्रदेश की विधान सभा की राजनीति में भी नेताओं में आदर्शों के प्रति झुकाव कमज़ोर है। यहां की राजनीति जाति के संघर्ष की है - कि फलां-फलां जातियों को शक्ति सम्पन्न होने से रोकना है। और जातियों की पहचान कुलनाम के प्रयोग से ही है, किसी ख़ास किस्म के चारित्रिक , सांस्कृतिक या आदर्शों के पहचान से नही है।

यह सब ही समझा सकता है की क्यों यह प्रदेश बद से बदत्तर हुआ जा रहा है, तथा यह कि क्यों प्रदेश का राजनैतिक मुद्दा प्रशासनिक व्यवस्था - law and order का है। यह सब बाकी अन्य सम्पन्न आर्थिक राज्यों से काफ़ी भिन्न है, जहां की विधान सभा की राजनीति होती है व्यापारिक अंश को कब्ज़ा करने के, सरकारी ख़ज़ाने से बड़े मूल्यों के business contracts को छेकने की ।

उत्तर प्रदेश में घोटाले भी होते हैं तो किस किस्म के ? -- पुलिस में भर्ती के, अध्यापक नियुक्ति के, सरकारी नौकरी पाने के। !!

यह सब पिछड़े पने के लक्षण हैं। आर्थिक सम्पन्न राज्यों में घोटाले होते है किसी सार्वजनिक कार्य के सरकारी contract को छेक कर अपने से संबंधित निज़ी कंपनी को देने के। तो फिर इन प्रदेशों में private नौकरियों का चलन होता है, और जिसमे उच्च कीमत नौकरियां, या मुनाफ़ा भी खूब मिलता है।

उत्तर प्रदेश की छात्र राजनीति कोई विशेष सामाजिक झुकाव को नही प्रदर्शित कर सकती है। क्योंकि इसमें आदर्शों का संघर्ष नही है, और इस लिए इसमे बड़ी आबादी को प्रभावित और प्रोत्साहित करने के गुण नही है। यहां लोगों की मानसिकता अभी भी राज-पाठ जैसे प्रशासनिक व्यवहार पर बंधी हुई है। न तो नागरिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता है, और न ही प्रशासन में उनके अधिकारों को सुरक्षा और संरक्षण देने के अपने उत्तरदायित्व का बोध है। सब कुछ एक राजा-प्रजा वाले संबंध पर चलता है। राजनेता अपने को जनता के विचारों का प्रतिनिधि नही मानते है, बल्कि जनता को उनके शक्ति सम्पन्न होने का साधन समझते हैं। इसलिये छात्र राजनीति का उद्देश्य मात्र यह है की शक्ति शाली "गुंडों" को जन्म देती रहे, जिसके माध्यम से नेता लोग शक्ति सम्पन्न हो सकें। न कि यह की छात्र राजनीति कोई राजनीतिक आदर्शो के संघर्षो की भूमि प्रदान करे, तर्कों के शस्त्र प्रदान करे।

यह सब दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और JNU की छात्र राजनीति से बिल्कुल ही अलग सा है। वहां संघर्ष होता है आदर्शों और मानकों के प्रति । इसलिये वह छात्र राजनीति जनमानस को अधिक प्रभावित करती है। वहां के छात्र आज देश के कई सारे प्रभावशील पदों पर बैठे हुए हैं। वह अच्छा वाचन करते है, प्रभावकारी तर्कों से लैस है, ज़्यादा मनभावक बातों से लबालब है। ज़्यादा motivating तरहों से जन संवाद करते दिखाई पड़ते है।

जबकि उत्तर प्रदेश में छात्र राजनीति शायद सिर्फ सेक्स , power और पैसे का संघर्ष ही है। इसलिये यहां अमानवीय हिंसा अक्सर होती है -क़त्ल , बकैती, अभद्रता , वग़ैरह। यही वह छात्र राजनीति का संस्करण है जिसके प्रति जनमानस में उदासीनता है, लोग छात्र और विश्वविद्यालयों की भीतर की राजनीति के महत्व को ही देखना- समझना भूल गये हैं। बल्कि छात्र राजनीति के संग संग विश्वविद्यालय के भीतर वैश्विक मंथन से उत्पन्न राजनीति को भी धिक्कार देते रहते हैं। क्योंकि छात्र राजनीति और वैश्विक मंथन के मध्य फांसले बहोत कम होते हैं, साधारण जनमानस दोनों को ही एक रूपी देखता है, और दोनों को ही नापंसद कर देता है।

Abvp की वाराणसी के विद्यालय में हुई शिकस्त ज़्यादा कुछ नही दर्शाती है। पिछड़े , ग़रीब राज्य की छात्र राजनीति मात्र एक बहती गंगा में बहता कचरा है, यह खुद में कोई धारा नही है। इस राजनीति से सामाजिक संसाधनों का विध्वंस ही किया जा सकता है, किसी भी आवश्यकता को पूर्ण करने का निर्माण नहीं हो सकता है।

JNU जैसे संस्थान क्यों ज़रूरी होते हैं प्रजातंत्रों के लिए

प्रजातंत्रों का अस्तित्व बिना liberal arts के उच्च गुणवत्ता विश्वविद्यालयों के सम्भव नही होता है।
विश्वविद्यालय और उनके भीतर चलने वाली वाद-विवाद ही मंथन की वह प्रक्रिया होती है जिससे शोध होते हैं, अंतर्मन निखरता है, पैना बनता है, नए मानक तलाशता है।
यह जो आज हमारा समाज जो सदियों की नारी दमन वाली परम्पराओं से होता हुआ समानता के अधिकारों तक पहुंचा है, जो ग़ुलामी और शोषण से मुक्त होता है वैश्वीकरण में गया है, -- यह सब यूँ नही हुआ है -- इसके लिये इंसानियत के नए मानक को निरन्तर तलाश यात्रा करनी पड़ी है समाज को , तब जाकर यह पर पहुंचे है।

और यह सब तलाश मोदी जी ने नही करि है। पश्चिमी दुनिया के उच्च कोटि विश्वविद्यालयों ने करि है - oxford, harward, ivy league ने करि है।

JNU हमारे देश का एक प्रयास था उसी मानक को भारत मे भारत मे भी प्राप्त करने का। अफसोस है कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था में political neutrality को सुनिश्चित करने के प्रबंध ही उपयुक्त नही है।

मुझे पक्का विश्वास है कि बहोत बड़ी मूर्ख आबादी यह समझती है कि सोध का अभिप्राय बहोत सारे लोग -प्रायः भक्त वर्ग - विज्ञान और प्रयोद्योगिकी से समझते हैं।
यह ग़लत है। शोध का सर्वप्रथान पड़ाव आत्म-चेतना के मानक विस्तृत करने से होता है।
Einstien के वैज्ञानिक शोध किसी वैज्ञानिक चेतना की देन नही थे। बल्कि तत्कालीन समाज मे भगवान के अस्तित्व को लेकर चल रही बहस का अंश थे -जिस पर europe के समाज मे राजनीति गरम हुआ करती थी। secularism भी उसी बहस का परिणाम है।

Charles darwin की शोध भी अनजाने में इसी वाली बहस का ही उपज है। आस्तिक विचारों में इंसान का अविष्कार "स्वयंभू" हुआ करता था, जबकि darwain ने कोशिकाओं के क्रमिक विकास से होता है इंसानों को बंदर से होते हुए वर्तमान homo sapien स्तर तक पहुंचने की बात करि थी। यह विषय तत्कालीन समाज का राजनैतिक विवाद का बिंदु भी था।

Newton की गुरुत्व की खोज भी जिन वातावरण में हुई है , वह धार्मिक-राजनैतिक विवाद का विषय थी। भगवान के दुनिया को चलाने के दो अलग नियम होते है - ऐसा आस्तिक sacramental विचारको का मानना था। newton की खोज ने पहली बार यह दावा दिया था कि नही, ब्रह्मांड के नियम कुछ एक स्तर पर एक ही होते है- धरती पर जी नियम है, ऊपर आकाश और स्वर्ग में भी वही नियम लागू रहते हैं।

तो छात्र राजनीति, शोध - वैज्ञानिक और सामाजिक चिंतन की -- सब आपस मे उलझी हुई गुत्थी हैं।

मगर आस्तिक विचारधारा कीसाज़िश हमेशा यही यही की वह वैज्ञानिक अविष्कारों को प्राप्त कर लेना चाहती है, बिना उनके साथ संलग्न नास्तिकता की विचारधारा के। और फिर उन अविष्कारों को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करती है एक नए चरित्र-चित्रण के संग --- आस्तिकता के उपहार बना कर।

आरएसएस और भाजपा , abvp उसी आस्तिकता की बहस के प्रायोजक है भारतीय समाज पर। जिनके खेमे में से दावे निरंतर आते हैं कि वायुयान , गुरुत्व, nuclear शक्ति- सब कुछ वेद पुराणों में दिया हुआ है।

और तथाकथित "वामपंथ", यानी libertard उनके दुश्मन हैं, जो कि नास्तिकता तथा नास्तिकतावाद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं भारतीय समाज पर।

JNU और इनके जैसे अनेक अन्य विश्वविद्यायल को होना भारत के प्रजातंत्र को कायम रखने और सफ़ल बनाने के लिए आवश्यक है।

गदहे को hero कैसे साबित कर सकते हैं ?

भाई, भक्तों की तारीफ एक बात पर तो खुल कर करनी ही होगी।

कि उन्होंने गदहे को hero साबित कर देने का जो challenge लिया था, उसको पूरा करने के लिए क्या खूब रणनीतियां चलाई थी और अभी तक दो बार लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज़ कर चुके हैं।

आप शांत मन से और सभी विरोध विचारो को समाप्त करके उनकी रणनीतियों, उनकी चाल की समीक्षा करें कि कैसे किया उन्होंने गदहे को हीरो साबित।

गदहे के पारिवारिक इतिहास एकदम अमान्य था जिससे उनमे कुछ भी हीरो जैसा दिखाई पड़े। वह घर छोड़ कर भागा हुआ था, अपनी शादी के तथ्य को दुनिया से छिपाया हुआ था; वह कहीं किसी और स्त्री पर मुहँ मारी कर रहा था, वह स्कूली शिक्षा से महरूम रहा था, अनपढ़-गँवार था , और गुंडागर्दी, असामाजिक तौर-तरीकों में श्रेष्ठ ।

तो फिर कैसे साबित होता ऐसा परम नालायक गदहा, एक hero ?

रणनीति के अनुसार सबसे प्रथम तो उसके सबसे बड़े विपक्ष के नेता को पप्पू की छवि - perception - में trap कर देना था। रणनीति का सिद्धांत साफ-साफ है - जब आप अपनी खींची लकीर को लंबा नही कर सकते हैं, तो दूसरे की लकीर को ही मिटाने की कोशिश करो !! (उल्टी-खोपड़ी उद्देश्यों की रणनीतियां अक्सर करके कमर के नीचे हमला करने पर टिकती है। जो सही सिद्धांत होते है, उनके ठीक उल्टा...!)

तो विपक्ष के नेता को "पप्पू"की छवि में बांध देना इसलिए जरूरी था, की अगर जनमानस के मन मे कहीं भी तनिक भी कोई तुलना करि जाए तब यह गदहा ,गदहा ही साबित न हो जाये !

फिर, निरन्तर उन विषयों पर जनमानस को फँसाये रखना ज़रूरी था, जहां गदहा थोड़ा सा हीरो-गिरी कर सकता था।
जनमानस उसे सं 2002 के कारनामे में हीरो बना था। तब फिर बात साफ थी - कि कैसे भी करके हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे को जनमानस के स्मृति पटल पर टिकाये रखना था। इससे ही गदहा heropanti करके एक हीरो साबित हो सकता था।

फिर आगे की मुश्किल थी कि बाकी का राजपाठ कैसे चलता , शेर की खाल में गीदड़ को बैठाने से?

इसके लिए बाकी सभी मंत्रियों को भी गदहा बन कर रहने के निर्देश दे दिए गए। गदहे के सामने smart बनेंगे तो गदहा अपने ही लोगो से तुलना हो जाने से पकड़ में आ सकता था।

तो देश मे मूर्ख देश की व्यवस्था को लागू कर देना बड़ी कीमत थी गदहे को hero बनाने की। मगर यह ज़रूरी भी था। देश वैसे ही कौन सा सोन-चिरइया बना हुआ था ? अरे भई, अंधेर नगरी पहले से ही था, थोड़ा और घना अंधेरा ही करने की कीमत थी। दे दो कीमत- कम से कम challenge तो पूरा हो जाएगा।

Terrorism cannot be stereotyped from the clothes or the religion of a person

Just wondering what do people understand from the word "Terrorist" ?

As I see, some people seem to say that "Terrorist" word applies to person of some specific (or say, "listed") class and Religion.

Others have different opinion

In my thinking,

"Terrorist" means only that persons who use the means of Violence against innocent(=unaware) masses  in order to achieve their political demands.

The important point is that use of violence in certain cases is waived of- especially the case of DIMINISHED RESPONSIBILITY .

Also , it must be highlighted that having a Political Demand TO SEPARATE AWAY from the state is not the wrong which should be resisted by any civilized society , but ONLY THE COMPONENT of PUBLIC VIOLENCE.

Therefore , a political demand of any kind , INCLUDING THE SECESSION cannot be held invalid merely on the face of it . Because, otherwise, what will be the difference between an OCCUPATIONIST and a FREE COUNTRY .

THEREFORE mere holding a placard "Free Kashmir" , or so cannot be held invalid merely on its face.

Rather , by doing so we might run in the danger of denying someone his free expression,which then bring to that person the valid justification for the state of DIMINISHED REPSONSIBILTY, thereby , to use violent means in order to convey one's message to the world, and to ask the world community to come for help.

India was not a OCCUPATIONIST state. It never was. It has been formed from the union of Free , willing people. As in any country of the world , there is always some amount of dissenters , people having bitterness, grievances, disgruntlement. Their call for secession cannot be granted on a snap. The process of amalgamation and fragmentation of state is never an easy action, which maybe done or undone with convenience.

Hence , the demands of fragmentation cannot be met instantly. However , the valid , legitimate grievance will surely be attended , the doors of opportunity to participate in the Governance process be allowed so that the aggrieved persons may by themselves act to eradicate their causes of grievances.

Important is that Terrorism should be understood distinctly from the POLITICAL DEMAND . Terrorist is the unwarranted use of Public Violence so to get the demands Ratified , while the DIMINISHED RESPONSIBILITY did not exist. The people had their free expression available with them in order to raise their political demands by other peaceful , civil means .

To label some one a terrorist by distinction of his religion , clothes , or so is INVALID .

सेवा और व्यवसाय के मध्य अन्तर करने की बौद्धिक जागृति चाहिए भारत के समाज को

शायद महाभारत काल से लेकर आजतक भारतीय समाज मे सेवा और व्यवसाय के मध्य भेद कर सकने की बौद्धिक प्रवीणता आजतक विकसित नही हो सकी है।
यह सवाल महाभारत काल मे भी उठा था कि महाराज भरत के दत्तक पुत्र शांतनु के उपरांत आने वाली पीढ़ी में ऋषि व्यास के दोनों पुत्रों में अगला महारज किसे बनाना चाहिए - बड़े पुत्र, धृतराष्ट्र को जो कि अंधे थे, या की छोटे पुत्र पांडु को, जो कि अनुज थे।
राजा की योग्यता का सवाल यही से उठा था की महाराज बनने की योग्यता क्या होनी चाहिए। *मगर लगता है कि इस सवाल के समुन्द्र मंथन में से निकलते तमाम सिद्धांत आज भी भारत के जनगण को उचित बौद्धिकता नही दे सके है।*

भारत की जनता आज भी *सेवा* और *व्यवसाय* के भेद और उसके महत्व को समझ नही सकी है।

*योग्यता* का प्रश्न महाराज बनाये जाने की विषय मे ही प्रधान होता है, न कि किसी चर्मकार की संतान को अगले चर्मकार बनाये जाने के विषय मे। या की किसी ग्वाल के पुत्र को अगले ग्वाल बनाये जाने के विषय मे।
क्यों? क्या चर्मकार या ग्वाल बनने के लिए *योग्यता* की आवश्यकता नही महत्वपूर्ण होती है।
क्यों हम महाराज नियुक्त किये जाने के विषय मे यह तर्क और सिद्धांत नही लगा सकते हैं कि जैसे किसी चर्मकार की संतान स्वतः चर्मकार ही बनती है, तो फिर राजा की संतान को ही अगला नरेश बनाया जाना चाहिए। या कि नेता के पुत्र को अगले पुत्र ?
कारण है कि बाकी अन्य कार्य व्यापारिक प्रवृत्ति के होते हैं - बाज़ार की स्वेच्छा पर निर्भर करते है। यदि किसी खरीदार को कोई उत्पाद पसंद नही है, तब वह दूसरी दुकान पर जा कर दूसरा कुछ खरीद सकता है। मगर नरेश या महाराज का पद बाजार वाले तर्ज़ पर नही चलता है। दूसरा, की उसके पास राजदंड होता है - जिससे वह किसी भी ग़लत करने वाले को दंड देने का अधिकारी बन जाता है।

ऐसे में कोई नरेश का योग्य होना आवश्यक है कि वह उचित अन्तर्मन , उचित न्याय, उचित भाव से जन सेवा करेगा।
मगर बाकी किसी भी व्यक्ति - कौशल कार्य के पास यह सब कर्तव्य नही होते है। न तो राजदंड होता है, न ही उसे न्याय करने के उत्तरदायित्व का निर्वाहन करना होता है।

तो ज़ाहिर है कि राजा या नरेश की नियुक्ति को इस उपमा पर करने का तर्क अपर्याप्त है कि मात्र क्योंकि उसके पिता भी नरेश थे, इसलिए वही अगला नरेश माना जाना चाहिए, जिसके पास आवश्यक योग्यता होगी।
स्मरण करें कि रामायण काल के दौरान भी यही सवाल राजा राम और भरत के  अयोध्या नरेश नियुक्त किये जाने के समय मंथन हुआ था। राम ने वनवास पर जाने से पूर्व भारत के नरेश नियुक्त किये जाने के विषय मे उनकी योग्यता के प्रति जन समूह को यही समझाया था। किष्किंधा नरेश बाली के वध से पूर्ण उनके छोटे भाई सुग्रीव को नियुक्त करने पर यही मंथन फिर हुआ था। बाली ने नरेश रहते हुए सुग्रीव की पत्नी को हर लिया था, जो कि एक नरेश के पद को शोभा नही देता था।
और रावण के वध के उपरांत उसकी राजपाठ और प्रशासनिक कौशल पर यह योग्यता का प्रश्न दुबारा सामने आया था।

*सेवा* और *व्यवसाय* में अन्तर होता है। *योग्यता* का प्रश्न सेवादार कार्यों और पदों के प्रति महत्वपूर्ण होता है, न कि व्यवसाय के विषय मे।
और इसलिए नरेश की नियुक्ति उस तर्क पर नही करि जा सकती है जिस तर्क पर व्यावसायिक कौशल में होता है।

Cultural Sickness में से निर्मित भक्तों का भ्रमपूर्ण कुतर्क

हमारे एक भक्त-विरोधी मित्र बड़ा अटपटा सा आचरण करते देखे जा सकते हैं #CAA यानी नागरिकता संसोधन कानून के विषय मे।

यह मित्र हैं तो किसी पिछड़ी या दलित आरक्षित जाति से ही, और अधिकांतः भक्तों और आरएसएस के विरोध में रहते हैं, मगर यहां #CAA में वह मोदी जी और भक्तों के पक्ष में मोर्चा थामे हुए हैं।

ऐसे क्यों? क्या वज़ह है उनकी इस कानून को समर्थन देने के प्रति?

जब यह सवाल मेरे ज़ेहन में आया तो भाग्यवश उत्तर ढूढंने का मार्ग इस बात से प्रशस्त हो गया कि वह मित्र बंधु एक लेख़क है और इसलिए सवाल का उत्तर सीधे मुंह-जबानी प्रशन के बजाए उनके लेखन में छिपे उनके विचारों में से ढूंढ सकने की संभावना मिल गयी।

सीधे, मुंह जबानी जवाबों में अक्सर इंसान कुछ तुरंत प्रभावी विचार के आवेश में आ कर सटीकता से अपनी बात रख नही पाता है। इससे न तो अपनी अच्छे आत्मीय सपंर्क का उद्देश्य सधता है, न उत्तर पता चल पाता है।
लंबे , दीर्घकालीन चलते आ रहे लेखी में ज़्यादा बेहतर अवसर मिलते हैं इंसान को जानने-समझने के।

तो फिर भाग्यवश उस मित्र ने एक लेख इस विषय पर भी लिख ही दिया कि वह क्यो #CAA विषय पर मोदी जी के पक्ष में है। मगर उसके तर्क को पढ़ कर मैं चौंक कर रह गया कि आख़िर भक्तों की रणनीति किस तरह , किन अबूझ कोण से आ कर हमारे मन-मस्तिष्क को भेद देती है।

भक्तों ने हाल-फिल के मोदी राज में एक cultural sickness वाले तर्क का जंजाल भी निर्माण कर दिया है। इसके लिए ही उन्होंने सद्गुरु और उनके जैसे कई सारे धार्मिक विषयों पर वाचन करने वाले गणमान्य लोगों को चुपके से अपने गुट में शामिल किया हुआ है।

Cultural sickness यानी सांस्कृतिक बीमारी के तर्क के आधीन यह बात और तर्क प्रचारित किया गया है कि भारत मे लोगो की आदत होती है कि जब भी कोई सरकार कुछ proactive हो कर कोई सार्थक कार्य कर गुज़रती है तब कहीं न कहीं लोगों का एक समूह होता ही है जो कि सांस्कृतिक बीमारी वश उस कार्य का विरोध करता ही करता है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई dam निर्माण होना तय हुआ है, तब कहीं न कहीं कोई गांव डूबेगा, जिस घटना पर कि गांववाले विरोध करेंगे; जंगल काटना पड़ेगा, तो पर्यावरण वादी विरोध करेंगे, निर्माण कार्य मे धन व्यय होगा, तो निर्माण contract नही मिलने से असंतुष्टों का गुट भ्रस्टाचार-निरोधी बन कर विरोध करेगा। कुछ न कुछ public interest petition डाली जाएगी। इस प्रकार तमाम तरह के विरोध होंगे।
तो भक्तों ने इन सब घटनाक्रमों को एक "सांस्कृतिक आचरण" की उपमा दे कर एक तर्क रेखा को तैयार कर दिया है कि यह सब एक "सांस्कृतिक बीमारी वश" यानी cultural sickness में होता है, न की प्रत्येक वरोध में कहीं कुछ भी तर्क-संगत भी ग़लत हो ही रहा है।

जबकि वास्तव में 'सांस्कृतिक बीमारी वश' आचरण वाला कोई भी तर्क कानूनन मान्य नही हो सकता है, मगर दिक्कत यूँ है कि जब जनता का अंतर्मन इतना शक्तिवान न हो, तब यह बौद्धिकता होती ही नही है जनता में कई प्रेत्यक विवेकपूर्ण विरोध को बीमारू आदतवश से अलग पहचान कर के उनका निराकरण और समाधान किया जाए।

तो फिर भक्त cultural sickness के नकली तर्क को तैयार करके अपने कटाक्ष के तुरीण में रख चुके हैं। और जब भी चाहा , इसको अपने social media और टीवी मीडिया के मित्रों के माध्यम से जनता के विचारों में प्रसारित करवा देते हैं कि जैसे इस बार किया जा रहा विरोध में कुछ भी विवेकपूर्ण नही है, यह सब तो एक cultural sickness के आवेश में हो रहा है।

मेरे वह मित्र भक्तो के इसी वाले तर्क से प्रभावित थे। उनका भी यही मानना था कि हमारे देशवासी बिना सोचे-समझे, बस एक मिथ्य-आदत-आवेश में हर एक सरकारी कार्यवाही का विरोध कर देते है।
रोचक मगर दुखदायी बात यह थी कि मेरे मित्र का खुद का नाम "विवेक" था !!

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