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Cultural Sickness में से निर्मित भक्तों का भ्रमपूर्ण कुतर्क

हमारे एक भक्त-विरोधी मित्र बड़ा अटपटा सा आचरण करते देखे जा सकते हैं #CAA यानी नागरिकता संसोधन कानून के विषय मे।

यह मित्र हैं तो किसी पिछड़ी या दलित आरक्षित जाति से ही, और अधिकांतः भक्तों और आरएसएस के विरोध में रहते हैं, मगर यहां #CAA में वह मोदी जी और भक्तों के पक्ष में मोर्चा थामे हुए हैं।

ऐसे क्यों? क्या वज़ह है उनकी इस कानून को समर्थन देने के प्रति?

जब यह सवाल मेरे ज़ेहन में आया तो भाग्यवश उत्तर ढूढंने का मार्ग इस बात से प्रशस्त हो गया कि वह मित्र बंधु एक लेख़क है और इसलिए सवाल का उत्तर सीधे मुंह-जबानी प्रशन के बजाए उनके लेखन में छिपे उनके विचारों में से ढूंढ सकने की संभावना मिल गयी।

सीधे, मुंह जबानी जवाबों में अक्सर इंसान कुछ तुरंत प्रभावी विचार के आवेश में आ कर सटीकता से अपनी बात रख नही पाता है। इससे न तो अपनी अच्छे आत्मीय सपंर्क का उद्देश्य सधता है, न उत्तर पता चल पाता है।
लंबे , दीर्घकालीन चलते आ रहे लेखी में ज़्यादा बेहतर अवसर मिलते हैं इंसान को जानने-समझने के।

तो फिर भाग्यवश उस मित्र ने एक लेख इस विषय पर भी लिख ही दिया कि वह क्यो #CAA विषय पर मोदी जी के पक्ष में है। मगर उसके तर्क को पढ़ कर मैं चौंक कर रह गया कि आख़िर भक्तों की रणनीति किस तरह , किन अबूझ कोण से आ कर हमारे मन-मस्तिष्क को भेद देती है।

भक्तों ने हाल-फिल के मोदी राज में एक cultural sickness वाले तर्क का जंजाल भी निर्माण कर दिया है। इसके लिए ही उन्होंने सद्गुरु और उनके जैसे कई सारे धार्मिक विषयों पर वाचन करने वाले गणमान्य लोगों को चुपके से अपने गुट में शामिल किया हुआ है।

Cultural sickness यानी सांस्कृतिक बीमारी के तर्क के आधीन यह बात और तर्क प्रचारित किया गया है कि भारत मे लोगो की आदत होती है कि जब भी कोई सरकार कुछ proactive हो कर कोई सार्थक कार्य कर गुज़रती है तब कहीं न कहीं लोगों का एक समूह होता ही है जो कि सांस्कृतिक बीमारी वश उस कार्य का विरोध करता ही करता है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई dam निर्माण होना तय हुआ है, तब कहीं न कहीं कोई गांव डूबेगा, जिस घटना पर कि गांववाले विरोध करेंगे; जंगल काटना पड़ेगा, तो पर्यावरण वादी विरोध करेंगे, निर्माण कार्य मे धन व्यय होगा, तो निर्माण contract नही मिलने से असंतुष्टों का गुट भ्रस्टाचार-निरोधी बन कर विरोध करेगा। कुछ न कुछ public interest petition डाली जाएगी। इस प्रकार तमाम तरह के विरोध होंगे।
तो भक्तों ने इन सब घटनाक्रमों को एक "सांस्कृतिक आचरण" की उपमा दे कर एक तर्क रेखा को तैयार कर दिया है कि यह सब एक "सांस्कृतिक बीमारी वश" यानी cultural sickness में होता है, न की प्रत्येक वरोध में कहीं कुछ भी तर्क-संगत भी ग़लत हो ही रहा है।

जबकि वास्तव में 'सांस्कृतिक बीमारी वश' आचरण वाला कोई भी तर्क कानूनन मान्य नही हो सकता है, मगर दिक्कत यूँ है कि जब जनता का अंतर्मन इतना शक्तिवान न हो, तब यह बौद्धिकता होती ही नही है जनता में कई प्रेत्यक विवेकपूर्ण विरोध को बीमारू आदतवश से अलग पहचान कर के उनका निराकरण और समाधान किया जाए।

तो फिर भक्त cultural sickness के नकली तर्क को तैयार करके अपने कटाक्ष के तुरीण में रख चुके हैं। और जब भी चाहा , इसको अपने social media और टीवी मीडिया के मित्रों के माध्यम से जनता के विचारों में प्रसारित करवा देते हैं कि जैसे इस बार किया जा रहा विरोध में कुछ भी विवेकपूर्ण नही है, यह सब तो एक cultural sickness के आवेश में हो रहा है।

मेरे वह मित्र भक्तो के इसी वाले तर्क से प्रभावित थे। उनका भी यही मानना था कि हमारे देशवासी बिना सोचे-समझे, बस एक मिथ्य-आदत-आवेश में हर एक सरकारी कार्यवाही का विरोध कर देते है।
रोचक मगर दुखदायी बात यह थी कि मेरे मित्र का खुद का नाम "विवेक" था !!

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