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JNU जैसे संस्थान क्यों ज़रूरी होते हैं प्रजातंत्रों के लिए

प्रजातंत्रों का अस्तित्व बिना liberal arts के उच्च गुणवत्ता विश्वविद्यालयों के सम्भव नही होता है।
विश्वविद्यालय और उनके भीतर चलने वाली वाद-विवाद ही मंथन की वह प्रक्रिया होती है जिससे शोध होते हैं, अंतर्मन निखरता है, पैना बनता है, नए मानक तलाशता है।
यह जो आज हमारा समाज जो सदियों की नारी दमन वाली परम्पराओं से होता हुआ समानता के अधिकारों तक पहुंचा है, जो ग़ुलामी और शोषण से मुक्त होता है वैश्वीकरण में गया है, -- यह सब यूँ नही हुआ है -- इसके लिये इंसानियत के नए मानक को निरन्तर तलाश यात्रा करनी पड़ी है समाज को , तब जाकर यह पर पहुंचे है।

और यह सब तलाश मोदी जी ने नही करि है। पश्चिमी दुनिया के उच्च कोटि विश्वविद्यालयों ने करि है - oxford, harward, ivy league ने करि है।

JNU हमारे देश का एक प्रयास था उसी मानक को भारत मे भारत मे भी प्राप्त करने का। अफसोस है कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था में political neutrality को सुनिश्चित करने के प्रबंध ही उपयुक्त नही है।

मुझे पक्का विश्वास है कि बहोत बड़ी मूर्ख आबादी यह समझती है कि सोध का अभिप्राय बहोत सारे लोग -प्रायः भक्त वर्ग - विज्ञान और प्रयोद्योगिकी से समझते हैं।
यह ग़लत है। शोध का सर्वप्रथान पड़ाव आत्म-चेतना के मानक विस्तृत करने से होता है।
Einstien के वैज्ञानिक शोध किसी वैज्ञानिक चेतना की देन नही थे। बल्कि तत्कालीन समाज मे भगवान के अस्तित्व को लेकर चल रही बहस का अंश थे -जिस पर europe के समाज मे राजनीति गरम हुआ करती थी। secularism भी उसी बहस का परिणाम है।

Charles darwin की शोध भी अनजाने में इसी वाली बहस का ही उपज है। आस्तिक विचारों में इंसान का अविष्कार "स्वयंभू" हुआ करता था, जबकि darwain ने कोशिकाओं के क्रमिक विकास से होता है इंसानों को बंदर से होते हुए वर्तमान homo sapien स्तर तक पहुंचने की बात करि थी। यह विषय तत्कालीन समाज का राजनैतिक विवाद का बिंदु भी था।

Newton की गुरुत्व की खोज भी जिन वातावरण में हुई है , वह धार्मिक-राजनैतिक विवाद का विषय थी। भगवान के दुनिया को चलाने के दो अलग नियम होते है - ऐसा आस्तिक sacramental विचारको का मानना था। newton की खोज ने पहली बार यह दावा दिया था कि नही, ब्रह्मांड के नियम कुछ एक स्तर पर एक ही होते है- धरती पर जी नियम है, ऊपर आकाश और स्वर्ग में भी वही नियम लागू रहते हैं।

तो छात्र राजनीति, शोध - वैज्ञानिक और सामाजिक चिंतन की -- सब आपस मे उलझी हुई गुत्थी हैं।

मगर आस्तिक विचारधारा कीसाज़िश हमेशा यही यही की वह वैज्ञानिक अविष्कारों को प्राप्त कर लेना चाहती है, बिना उनके साथ संलग्न नास्तिकता की विचारधारा के। और फिर उन अविष्कारों को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करती है एक नए चरित्र-चित्रण के संग --- आस्तिकता के उपहार बना कर।

आरएसएस और भाजपा , abvp उसी आस्तिकता की बहस के प्रायोजक है भारतीय समाज पर। जिनके खेमे में से दावे निरंतर आते हैं कि वायुयान , गुरुत्व, nuclear शक्ति- सब कुछ वेद पुराणों में दिया हुआ है।

और तथाकथित "वामपंथ", यानी libertard उनके दुश्मन हैं, जो कि नास्तिकता तथा नास्तिकतावाद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं भारतीय समाज पर।

JNU और इनके जैसे अनेक अन्य विश्वविद्यायल को होना भारत के प्रजातंत्र को कायम रखने और सफ़ल बनाने के लिए आवश्यक है।

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