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कोई क्यों बने विज्ञान-संगत? आख़िर क्या आत्म-सम्मानजनक दिया है विज्ञान ने , लोगों को?

भारतीय समाज शुरू से ही मूर्ख और बौड़म रहा है।

इसके कई कारण है। जिनमें कि एक बड़ा कारण यह है कि यहां का अध्यात्म , यानी भारतीय समाज का आध्यात्मिक परिवेश ही ऐसे लोगों की कब्ज़े में है जो कि इच्छित नही है कि भारतीयों की बुद्धि का विकास हो सके। 

दरअसल, भारतीय समाज वैसे तो ब्राह्मण विरोधी होने के लक्षण दिखाता है, मगर वास्तव में यह सब झगड़ो और विवाद के बाद शाम को घर लौट कर ब्राह्मणवाद के दरवाज़े पर ही सुस्ता कर सो जाता है।

ऐसा क्यों? 
क्योंकि ब्राह्मण वाद के मुखर विरोधियों ने कुछ अन्य विकल्प नही दिया है भारत की जनसंख्या को किसी और के दरवाज़े जा कर अपना ग़म , अपने भावुक हालातों को सामना कर सकने के लिए। जब इंसान बीमार पड़ता है, तब आधुनिक विज्ञान से उपलब्ध चिकित्सा इतनी अधिक महंगी पड़ती है कि आम आदमी उसके व्यय को झेल ही नहीं सकता है। फिर वह मज़बूरन आयुर्वेद, योग, आत्म नियंत्रण, भोजन परहेज़, यूनानी, वैध जी, हाक़िम जी, के दरवाज़े जाने को आ पड़ता है।

खुद ही सोचिये, कोई इंसान किस मुंह से विज्ञान समर्थक बनेगा, जागरूक होने में आत्मसम्मान देखेगा, जब की शाम को उसे इन्हीं मूर्खों के दरवाज़ों से ही सहायता मिलनी होगी।

यह वो त्रासदी है जो कि कोई भी सामाजिक जागृति की संस्थान भारतीय समाज को निराकरण नही दे रही है।

आलम यूँ है कि आज विज्ञान भी यदि भारतीयों तक पहुंच रहा है तो वह भी तब जब वह वैध जी या हाक़िम जी के झोलों में से निकाल कर जनता में बेचा जाता है। कहने का अर्थ है कि आम आदमी आज विज्ञान और उसके उत्पाद को वैसे ही समझता-बूझता है जैसा की उसे वह लोग परिचय करवाते है जो की खुद विज्ञान के सबसे बड़े शत्रु होते हैं !!

भारतीय जनता विज्ञान और रीत रिवाज़ के रूड़ी वादी धर्म की शत्रुता के इतिहास से तनिक भी परिचित नही है। जाहिर है, क्योंकि विज्ञान ने खुद से- first hand- भारतीय समाज में कोई सेवा, योगदान नही किया है। आश्चर्यजनक तौर पर विज्ञान की सेवा आम भारतीय के दरवाज़े पहुंची भी है तो धर्म कर्मकांडियों की दुकानों से होते हुए। जाहिर तौर पर उन्होंने अपनी इस परिस्थिति का लाभ कमाते हुए विज्ञान के उत्पाद पर label को बदल कर धर्म, वेद -पुराण, उपनिषदों का फ़ल दिखाया है, और पूरा मौका लिया है जनता पर अपनी पकड़ को मज़बूत बनाये रखने का।

यह है भीतरी , अनकही त्रासदी की क्यों औसत भारतीय आज भी महा बौड़म होता है, वह तर्क संगत , विज्ञान विचार शैली में क्यों नही सोच-समझ सकता है। 

हम लाख कोशिश कर ले मगर लोग गौमूत्र तथा गोबर में ही ईलाज़ को इसी लिए तलाश कर रहे हैं। क्योंकि कोई अन्य सम्मानदायक विकल्प नही है, उनकी आर्थिक क्षमता के भीतर में रहते हुए। वह आर्थिक दबाव में मज़बूर है, अपने विश्वास के भरोसे अपना जीवन चलाने को, जहां की रोगों का ईलाज़ करवाने का विकल्प सिर्फ गौमूत्र और गोबर में ही मिलता है।

विज्ञान वादियों ने गलतियां करि है। 
प्रथम तो यह की वह भारत के समाज को जागृति एक किताबी ज्ञान के रूप में बांटना चाहती है। यह तरीका एक window shopping करने जैसा है। जब तक की लोग दुकान के भीतर घुसने का साहस नही कर सके, और विज्ञान के उत्पाद को उसकी असली दुकान से खुद उठा कर भोग नही कर सके, तब तक वह भले ही window shopping इधर करे, अन्त में वह प्रयोग का समान ख़रीदने रूढ़िवाद के दुकान पर ही जाने वाले हैं। हमारे प्रशासन और समाज ने विज्ञान के सीधा उपयोग करने का सरल मार्ग बनाया ही नही है। बल्कि विज्ञान की किताबे लिख कर बेचने का धंधा खुद ही जमा लिया है। 

आज सरकारी अस्पतालों की हालात किसी से भी छिपी नही है। तो आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि लोग विज्ञान के दरवाज़े आएंगे, जहां उनको सम्मान मिलेगा?

आज isro के शीर्ष वैज्ञानिक भी मंदिर में शीश नमन करके ही अंतरिक्ष यान को प्रक्षेपित करते हैं। आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि आम आदमी रूढ़िवाद में ग्लानि देखेगा और विज्ञान में विश्वास करेगा की यह धर्म से जुदा मार्ग होता है जीवन जीने का।

गलतियां हमारी ही है कि हम विज्ञान को बेचने की कोशिश कर रहे हैं, विज्ञान को समाज सेवा हेतु जनता तक सीधे पहुँचने का मार्ग निर्मित नही कर रहे हैं।

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