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Secularism-विरोधी तंत्र मूर्ख तंत्र होते हैं

मूर्खों के देश में विज्ञान अस्तित्व नही करता है। वैज्ञानिक सत्य कुछ नही होता है, कोई भी वस्तुनिष्ठ मापन पैमाना नही होता है। मूर्खों को लगता है कि सब वैज्ञानिक सत्य भी तो कहीं न कहीं इंसानी हस्तक्षेप से प्रभावित किये जा सकते हैं। यानी सब किस्म के सत्य राजनैतिक वर्चस्व के द्वारा संचालित होते हैं। जो राजनैतिक वर्चस्व बनायेगा, वही तय करेगा की वैज्ञानिक सत्य क्या है।

विज्ञान दो प्रकार के होते हैं। perfect science और imperfect science । imperfect science के अस्तित्व को मूर्ख देश में कला-बोधक विषय के समान मानते हैं। यानी इस विषय के सवाल को मूर्ख नागरिक पूर्णतः व्यक्तिनिष्ठ मानते है - यानी, जिसका राजनैतिक वर्चस्व होगा, सत्य वही होगा।

कुल मिला कर मूर्ख देश के लोग राजनैतिक वर्चस्व को ही सत्य का अंतिम पायदान समझते हैं। वह सत्य की तलाश नही करते है, अनुसंधान या शोध धीरे-धीरे उनके देश में खुद ही घुटन से दम तोड़ देते हैं, क्योंकि कोई इंसान इतनी मानसिक बुद्धि का बचता ही नही है जो सत्य की तलाश में यह सब मार्ग पर चल कर साधना करे। मूर्ख देश के सभी नागरिक राजनैतिक वर्चस्व की आपसी लड़ाई में तल्लीन होते हैं।

इसलिये मूर्ख देश में महामारी फैल जाना लाज़मी होता है। 

क्यों? 

क्योंकि कोई भी योग्य डॉक्टर बचता ही नही है। आखिर डॉक्टर की योग्यता की नाप का कोई तो पैमाना होना ही चाहिए, जिससे की पदार्थ
वादी ईलाज़ दे सकने योग्य आदमी चिकित्सा तंत्र पर पहुंचे। मगर जब वस्तुनिष्ठ पैमाना नही है, तो डॉक्टर की योग्यता खुद भी राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई बन कर रह जाती है। ऐसे लोग डॉक्टर और इंजीनयर की उपाधि ले कर तंत्र में उच्च पदस्थानों में विराजमान हो जाते है, जो कुछ भी पदर्थिय समाधान दे सकने में नाक़ाबिल होते हैं। सिर्फ placebo पद्धति के ईलाज़ से काम।चलाते हैं। फिर जब जनता की पीड़ा बढ़ती है, जनता सहायता की गुहार करती हैं तब अमानवीयता से उनकी आवाज़ को दमन करने का मार्ग ही उनका एकमात्र युक्ति रह जाती है।

तो मूरखतंत्र में संस्थाओं का नेतृत्व अयोग्य डॉक्टर और इंजिनीयर करते है, जिनका सबसे प्रचुर नेतृत्व तरीका होता है दमनकारी अनुशासन, तथा पाबंदी। अमानवीयता।

मूर्ख तंत्र नाकबिलों से निर्मित होते है। ऐसे नाक़ाबिल जो कि एक से एक महारत उपाधि से सुसज्जित होते हैं, मगर व्यवहारिकता में कोई भी समाधान नही दे सकते हैं।

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