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Theoretical संभावना का प्रमाण पर्याप्त माना जाना चाहिए था, Emperical प्रमाण से तो मिली-भगत होने की गंध आती है

EVM के विषय मे केस तो तब ही ख़त्म हो जाना चाहिए था जब court में मामला theoretical प्रमाणों से आगे निकल कर emperical सबूतों पर आ गया था।

जब निर्वाचन आयोग ने evm की fixing की theoretical संभावनाओं को खंडन करके न्यायालय के समक्ष अपनी दलील दी कि कोई emperical प्रमाण आज तक नही मिला है कि evm मे छेड़छाड़ हुई है, तब ही वास्तव में चैतन्य जनमानस को समझ लेना चाहिए था कि केस अब बेवजह घसीटा जा रहा है। और असल बात यह है कि निर्वाचन आयोग और न्यायालय में मिली-भगत हो चुकी है।

मान लीजिए कि किसी परीक्षा के दौरान कक्षा में कोई छात्र cheating कर रहा है। 

सवाल आपके चैतन्य से यह है कि आप invigilator (निरक्षक) द्वारा कब , किस प्रमाण के आने पर यह मान लेंगे की वो छात्र cheating कर रहा था?

अगर निरक्षक उस छात्र के पास से ज़ब्त करि गयी किसी chit , या किताब को दिखा दे तो क्या यह पर्याप्त सबूत नही होगा कि cheating करि गई है?

दुनिया भर के न्यायायिक मानक में इतना सबूत पर्याप्त माना जाता है कि chit अथवा कुछ अन्य पदार्थ /दस्तावेज़ की प्राप्ति करि गयी है।

मगर यदि फिर भी कोई प्रधानाध्यापक किसी निरक्षक के इतने सबूत को स्वीकार नही करे, बल्कि उस दुराचारी छात्र के दावे को स्वीकार करे कि मात्र दस्तावेज़ को ज़ब्त करना पर्याप्त नही है , यह भी सबूत दीजिये की आरोपी छात्र उसमें किस विशेष पेज संख्या पर किस विशेष सवाल का ज़वाब cheating कर रहा था, 

तब समझदारी यही कहती है कि आप समझ जाएं कि प्रधानाध्यापक और उस आरोपी छात्र में मिली-भगत हो गया है।

क्योंकि प्रधानाध्यक theoretical सबूतों के आगे emperical सबूतों की मांग को पारित कर रहा है !

EVM प्रकरण में इस देश की न्यायपालिका में वही दुष्ट कारनामा चालू हो चुका है सन 2018 के बाद से।

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