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बच्चों का लालन पोषण में मातापिता की खामियां

16~17 साल की आयु के बच्चों को real world issues से वास्ता करना आरम्भ कर देना चाहिए।

हम middle class परिवारों में बच्चों के लालन पोषण में बहोत खामियां है जिसकी वजहों से हमारे बच्चे वयस्क हो कर सफ़ल , आर्थिक उन्नत कर सकने वाला तथा कामगार व्यक्ति नही बन पा रहें हैं।

दिक्कत यूँ है कि हमारे बच्चे किताब-कागज़ों के बीच में अपने चिंतनशील मस्तिष्क को खो रहे है, उनके ख़्वाब समाप्त हो जा रहे हैं, उनमें से उत्साह नष्ट हो जा रहा है।

ऐसा क्यों हो रहा है🤔 ?
क्योंकि बच्चों को वास्तविक दुनिया की समस्याओं से परिचय करने का अवसर और प्रोत्साहन नही मिल रहा है।

यह सही है की अत्यधिक छात्र राजनीति एक किस्म कि मानसिक रोग होता है, मगर छात्र जीवन में वैश्विक संवाद से अलग थलग पड़े रहना - वह भी पढ़ाई करने, "एग्जाम की तैयारी कर रहा हूँ" के नाम पर -- यह भी सरासर अनुचित है, और फलदायक के विपरीत होता है।


किताबों का ज्ञान आखिर में क्या होता है, और इसकी खुद की उत्पत्ति कहां से होती है? 
हम जब भी अपने ही बच्चे को, अपनी ही संतान को "तुम सिर्फ पढ़ाई करो/ पढ़ाई पर ध्यान दो", करके उसको मित्रों से, मंडलियों से, वैश्विक कलापों से जुदा करते है - असल में हम तब ही उनकी असफलता की किस्मत को खुद अपने ही हाथों से लिखना शुरू कर देते हैं।

क्योंकि सच तो यह है कि वास्तविक ज्ञान किताबो में तो मात्र संग्रहित ही होता है, मगर उसका अन्वेषण संवाद(dialecticalमें से होता है - वहां जहां पर राजनीति, मंथन और मत-विभाजन की क्रियाएं भी साथ ही साथ घट रही होती हैं।
और फिर किताबी ज्ञान का अधिग्रहण भी वापस संवाद से ही किया जा सकता है - मित्र मंडलियों के बीच संवाद और चर्चा के माध्यम से। इसलिये क्योंकि ज्ञान को पुस्तकों के द्वारा संरक्षण का उद्देश्य ही संवाद को प्रसारित करने का होता है, संवाद - जो की किताबी ज्ञान की जन्मभूमि होती है।

कहने का अभिप्राय यह है कि एकाकी छात्र का मात्र किताब पढ़-पढ़ कर के जीवन में सफ़ल हो सकना बहोत मुश्किल घटना होती है। क्योंकि यह किताबी ज्ञान उसे "लगने वाला" नही है - यानी उसके मस्तिष्क में बैठे गा नही, जमे गा नही, उसके किसी कार्य में उपयोग नही आयेगा - और शायद ही उसे किसी परीक्षा के उत्तीर्ण करा सके - जो की एक lottery घटना वश ही हो।

किताबी ज्ञान और "परीक्षा की तैयारी" में व्यस्त छात्र कुछ ऐसा होता है जो कुछ तो समाधान ढूंढ रहा व्यक्ति है, मगर जिसे समस्या ही नही पता हो ! 
और यह उद्देश्य-हीनता फिर धीरे धीरे -- 1 से डेढ़ साल के भीतर में - उसमे एक मनोचिकित्सीय रोग पैदा कर देती है - अर्थहीनता, गंतव्यहीन गति करते रहने की - आत्म स्वाहा करने की भावना का।

वैश्विक समस्याओं को पहचान सकना, परिचय बनाना -- किताबी ज्ञान की ओर झुकने से पूर्व का बढ़ा कदम होता है। मगर आश्चर्य जनक तौर पर हम अपनी संतानों को इस  प्रक्रिया से गुज़रने ही नही देते हैं।

क्यों ?
क्योंकि हम खुद भयभीत रहते हैं कि दोस्तों के बीच में रह कर कहीं हमारा बच्चा गुमराह नही ही जाये, वह पढ़ाई-लिखाई करने से भटक नही जाये !
मगर यह हमारे सोच की त्रुटि है

क्योंकि ऐसा करके हम बच्चे के बौद्धिक-सामाजिक विकास को अवरोधित कर देते है -खुद अपने ही हाथों अपनी संतान के विकास को रोक देते हैं। 

हम गलती यह कर रहे होते हैं कि मित्र-मंडली की क्रिया में समस्या यह बूझ लेते है कि हमारे बच्चे को भटका देगी, बजाये यह देखने के कि मित्र मंडली की गुणवत्ता कैसी है - वह समस्याओं को पहचान करने वाली, और खुल कर संवाद करने वाली है - या कि एक-दूसरे पर शिकंज कसने वाली है। 

एक अच्छी, दुरुस्त मित्र मंडली में छात्र को स्वयं को महसूस करने का और अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करने का अवसर मिलता है - बिना भय, तिरस्कार , अपमान , मज़ाक बने, और ताना कशी का शिकार हुए। जब कोई छात्र / युवा अपनी अनुभूतियों को चिन्हित करके अभिव्यक्त करना सीख जाता है, तब उसमे सामाजिक चेतना, अन्तरात्मा का उदय होना आरम्भ हो जाता है। और फिर वहां से उसमे प्रेरणा आने लगती है,जिससे उसमे अन्तर्ज्ञान होने लगता है। अंतर्ज्ञान एक ऐसी अवस्था है जब ज्ञान का उदय किताबो से नही , बल्कि अंदर से, - खुद के भीतर में से होने लगता है।

और अन्तर्ज्ञान की इस अवस्था को प्राप्त सकने की condition होती है - दो क़िस्म की चेतना का विकास - अनुभूति(feelings) कर सकने की क्षमता, विचार(thinking) कर सकने की क्षमता ।
यह दोनों चेतना - आप इसे दिमाग के "CPU" की processing box समझ सकते है।  और इनमें से output आता है - अभिव्यक्ति (यानी expresssions) , और कल्पना (यानी imagination, dreams) बन कर। 
छात्र जब dreams देखने लगे तब यह एक लक्षण होता है कि वह चेतना प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। यह dreams ही तो उसकी विकसित होती हुई अंतरात्मा का सूचक होते है। और जब dreams आते है तभी inspiration और motivation आता है - अंदर से, खुद के भीतर में से। self वाला motivation

मगर यह self motivation तभी तक टिक सकता है जब तक इसे कुछ कर गुज़रने के ललक मिलती रहे। 

क्योंकि यह self-motivation कुछ कर गुज़रना चाहता है ।
यह दुनिया की किसी समस्या को हल कर देना चाहता है। 

यानी, यदि किसी छात्र को दुनिया की समस्या का पता ही नही हो, तब वह क्या करेगा self-motivation के प्रवाह में रहते है ? 
--"कुछ नही!"

और जब वह कुछ भी नही करेगा , तब क्या होगा उसके self motivation से ? 
कुछ नहीं, थोड़े समय में वह self motivation की ज्योत खुद ही बूझ जाती है, और वह छात्र विफल हुआ सा, depression में प्रवेश कर जाता है।

हर एक स्वस्थ बालक के युवा अवस्था में एक न एक बार यह self-motivation की ज्योंति को जलने का समय आता ही है - यदि उसके लालन पोषण में कोई बाधा नही हुई हो तो। दिक्कत यूँ होती है कि अक्सर माता-पिता ही इस ज्योंति को बढ़ने की बजाये बुझा देने की गलतियां कर देते है - उसको कर्महीनता में  डाल कर - उसको मित्र मंडली और उसके सहयोगियों से जुदा करके - पढ़ाई के नाम पर किताबों के अंधे कुँए में धकेल कर के।उसे वैश्विक कलापों में शाम्मलित होने के लिए प्रोत्साहित नहीं करके।

छात्र को पूर्ण मानसिक विकास प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि माता पिता उसे खुद को अनुभूति और अभिव्यक्त कर सकने में सहयोग दें। इसके लिए आवश्यक होता है कि उसे उसके दोस्तो से दूर नही करें। उसका मेल-जोल नही रोके, पढ़ाई-लिखाई करने के दबाव बना बना कर के। उसे वैश्विक कलापों में शाम्मलित होने के लिए प्रोत्साहित करें ।  

संग में, यह भी आवश्यक होता है की छात्र की मित्र मंडली ऐसी हो जो उसके ललक और झुकावों में सहयोग देती हो,न कि उसकी अभुभूति को अभिव्यक्त करने पर उसका मज़ाक बनाती हो, या उसमे desonance प्रकट करती हो । यानी मित्र मंडली में आपसी विश्वास - trust कर सकने वाली व्यक्तियों को होना चाहिए। मित्र मंडली का संवाद आपसी झगड़े वाले , रंजिश पैदा करने वाला नही होना चाहिए,  बल्कि विचारो को और अधिक सरलता से बूझने में सहयोग देने वाला चाहिए। उसकी मित्र मंडली का वैश्विक दर्शन - world  view  - दुखद और विसंगत नहीं होना चाहिए।  

छात्र को अपने विचार और अनुभूति को दर्ज़ करते रहना आवश्यक प्रकिया है। 
क्योंकि आवश्यक नही कि छात्र की अनुभूति और विचार को हर बार उसके माता पिता , या मित्र समझ ही लें। यह भी आवश्यक नहीं की उसकी अनुभूति और विचार वैश्विक विचार धारा के अनुरूप, सही ही हों।  अक्सर करके बात को समझते-समझते अरसा लग ही जाता है। ऐसे में बात को कही न कही लिखित दर्ज़ करके संरक्षित करना आवश्यक होता है। आखिर में जब कोई विचार कहीं पर संरक्षित होता है, तब ही तो वह किसी दिन बूझने लायक पल को प्राप्त कर सकता है। वर्ना अनुभूति और विचारो का क्या है-यदि संरक्षण नही करे कोई इन्हें, तब यह पल भर में छू हो जाते है - जितनी जल्दी यह हमारे भीतर में जन्म लेते है, उतनी ही जल्दी छू भी हो लेते है।

तो फ़िर छात्र को प्रशिक्षित रहना चाहिये कि अपने क्षणभिंगुर विचारों को छू हो जाने से पूर्व ही संरक्षित कर सके - उनको कही पर दर्ज़ करके -या तो डायरी में नोट बना कर के, या एक email करके , या  किसी को संदेश बना कर भेज करके, या कि audio note बना करके, या किसी से फोन पर बात करके, जिस फोन call का recording बना ले। 
मगर कही न कही उसको दर्ज़ ज़रूर करे।  शायद कभी भविष्य में अपने ही अनुभूति और विचार को यदि वह पलट कर देखे तब शायद वह खुद ही अपनी अभिव्यक्ति को थोड़ा अधिक सरलता और स्पष्टता का रूप दे दे ।

अनुभूति और विचार को दर्ज़ करने का , यानी संरक्षण करने का यही परम उद्देश्य होता है।

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