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भक्त गिरी की गंगोत्री है "यदि" के क्षितिज से उठाये गये प्रश्न

 संघ ने देश में इतनी बड़ी तादाद में भक्त कैसे पैदा किये है ? जबकि संघ का खुद का इतिहास काला है। वो अंग्रेजों से अपना आर्य जाति का भाई वाद रिश्ता जोड़ते थे।  वो भारत के ग्रामीण जीवन मे गर्व करने को प्रसारीत करते हुए इसी गर्व मई लेप् में छिपा कर जातिवादी भी प्रसारित करते थे।

इतने अपरस्पर विचारों के  बावजूद इतनी बड़ी आबादी में लोगो का संघ की ओर झुकाव आखिर बना ही कैसे? आज यह लोग पूर्ण बहुमत न सही, मगर फिर भी, एक विशालकाय सम्मानजनक संख्या में हैं। ऐसा कैसे हुआ?

संघ ने चतुराई से कार्य किया है। संघ ने जन चिंतन में जो कथा - narrative - बहोत जुगत लगा कर बेची है इतने वर्षों से , वह एक hypothetical - परिकल्पनिक कथा है - जिसका आरम्भ "यदि" के विशेषण से होता है --- "यदि" नेहरू की जगह पटेल देश के प्रधानमंत्री होते तब क्या होता? "यदि" गांधी की जगह सुभाष बोस देश की आज़ादी के सूत्रधार होते तो क्या होता?

गंम्भीर सत्यवचन यह है कि परिकल्पनिक कथाओ में बसे सवालो और पहेलियों को सटीकता से उत्तर तो धरती का कोई भी इंसान नही दे सकता है। मगर फिर इन परिकल्पनिक सवालों को उठाने से आप आबादी में दुखी मन से बैठे हुए कई सारे लोगो को उकसा कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तैयार कर सकते हैं। ऐसे लोग जो कि मनोचिकितसिय तौर पर identity pride-  - स्वपरिचय अभिमान को तलाश करने में भटक रहे होते हैं। वो जो कि गर्व की kick चखते रहने के addict होते हैं । ऐसे गर्व-addict लोगो को reality distort करना, illusion में डालना आसान होता है। drug addicts तो वैसे भी hallucinations से पीड़ित रहते हैं।

तो गर्व-addicts आबादी को यह नही मालूम है कि संघ के काले इतिहास के तथ्य क्या है। मगर इन्हें पूरे यकीन से यह ज़रूर मालूम है कि यदि नेहरू की जगह पटेल आ जाते तो क्या होता, और गांधी की जगह सुभाष होते तो क्या होता।

संघ ने कांग्रेस को धिक्कारने वाली नस्ल 70 साल मेहनत करके फसल बोई थी। अब corporate साथियो की धनशक्ति से IT Cells का tractor लगा कर फसल काट रही है।

जबकि कांग्रेस तब एक राजनैतिक पार्टी नहीं थी, बल्कि एक मंच था, जहां से भारत का जनमानस अंग्रेज़ो से अपनी स्वायत्ता के लिए तमाम न्यायोचित तरीको से संघर्ष करता था। इस मंच को congress नाम इसी वजह से दिया गया था। आज जब आप आज़ादी के युग वाली congress को धिक्कारते हैं, तब आप वास्तव में भारत के जनमानस को धिक्कार दे रहे होते हैं। यह अलग बात है कि आज तो congress एक पार्टी बन कर रह गयी है, कितने बड़े जनमानस की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है, यह सवालों के घेरे में है।

तो ऐसा तरीको से संघ ने "यदि" के क्षितिज पर कथा रच कर, गौरव- करण मनोरोग से ग्रस्त आबादी को अपने "अंधभक्त" में तब्दील करने में सफलता प्राप्त करि है।

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