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नैतिकता तथा व्यापार और चोरी, डकैती, लूटपाट में अन्तर

बौद्ध की बात यह है कि डकैती, लूटपाट, चोरी के जैसे दुत्कर्मों और व्यापार के मध्य में कोई भी अन्य अन्तर नहीं होता है सिवाय नैतिकता और आदर्शों के पालन के।

अगर नैतिकता को मध्य से हटा दिया जाये, तब फ़िर आसानी से whitewash करके किसी भी डकैती वाले दुत्कर्म को मेहनत वाला, लगन से किये जाने वाला व्यापार दिखाया जा सकता है।

भई, गब्बर सिंह जी अपने गाँव के लोगों को बाकी डाकुओं के क़हर से सुरक्षा देते थे, और उसके बदले अगर थोड़ा से अनाज ले लिए तो क्या ग़लत किया उन्होंने?
और फ़िर कितने ही लोगों को रोज़गार भी तो दिया हुआ था, अपने दल में सदस्यता दे कर। 
उनके काम में जोखिम कितना था, आप सच्चे दिल से सोचिये । बहादुरी किसे कहते हैं, यह गब्बर सिंह जी के भीतर अच्छे से कूट कूट कर भरी थी।

और अगर उसके बदले थोड़ी सी पी ली, मौज़ मस्ती कर ली, बसंती को नचवा लिया, तब इसमें क्या ग़लत किया ? मेहबूबा ओ मेहबूबा तो काम के समय की मीटिंग में होना कोई ग़लत नही है। शहर की डीएम साहिब लोगों की मीटिंग अपने क्या श्रीदेवी के गाने पर डांस करते नही देखा है?

मसलन, नैतिकता और आदर्शों को यदि त्याग कर ही दिया जाये तब फ़िर व्यापार और डकैती में बाकी कोई भी फर्क नही होता है।

एक रत्ती भी नहीं।





The थू थू model of decision-making within the Sanghi House

ये तो असल मे भाजपा और संघी व्यवस्था की "खुराक" (भोजन) है।

संघी व्यवस्था असल मे थू-थू किया जाने से ही चलती आयी है।  
 *The थू थू model of functioning within the Sanghi House* 

1) सबसे पहले तो कुछ भी औनापौना कर्म कर देते हैं। 

2) फ़िर लोगो की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते है। 

3) यदि ज्यादा थू थू हो जाती है, तब चुपके से उसमे बदलाव, सुधार या  कि पूरा से वापस (roll back) कर लेते हैं। 

लोग थूक कर चाटने को बेइज़्ज़ती का काम मानते हैं। संघियो ने बाकायदा इसे funcrioning technik बनाया हुआ है।

करोना vaccine के तीन दान मोदी जी ने बाकायदा announce किये थे।
वो तो जब केजरीवाल ने protocol तोड़ कर public में थू थू कर दी, तब चुपके से बदलाव कर दिया और अब free vaccine देने लगे हैं

साथ मे ads दे दे कर वाहवाही लूटने में जुगत लगा रखी है

यूपी के नेताओं की working theory

पता नहीं क्या चक्कर है,

मगर यूपी का हर नेता और नेता बनने की महत्वकांशा रखने वाले आदमी, उसमे एक stereotype हरकत देखी जा सकती है, कि-

Twitter और Facebook पर कुछ eloquent expressions वाली post करते रहते हैं,  कुछ limited सी vocabulary में, repetititve हो कर, जैसे मानो जैसे कोई good expression सम्बधित किसी intellectual impairment बीमारी से पीड़ित है।

Post एकदम संक्षिप्त सी होती है, कुछ भी नवीन नही होता - दर्शन, भावना , वर्णन - कुछ भी। और फ़िर ये पोस्ट शब्दकोश की कंगाली झलकाती से दिखाई पड़ने लगती हैं

बौद्धिक साहस (Intellectual Courage) से निर्धन ये नेता , कुछ भी ज्वलंत , उत्तेजनापूर्ण , अथवा विवादास्पद लिखने से डरते है। इनकी नेतागिरी करने की एक सोच और परिपाटी होती है, एक।working theory, जिसके अनुसार विवादास्पद कथनों और विचारो से बच कर निकल जाने से ही नेतागिरी चमकायी जा सकती है।

Consciousness और Knowledge के आपसी रूपांतरण के प्रति विचार

Consciousness को हम knowledge में transform कर सकते हैं, किसी नये शब्द का अविष्कार करके, जिसके अर्थ में बोध सलंग्न हो।

Consciousness can be transformed into a Knowledge by creation of a new Word which may carry within its meaning the Conscious about something.


This technique is useful. Because otherwise transfer of Consciousness from one person to another is a difficult task. However Knowledge is transferable easier.

खेल के विषय में भारतवासियों के रुख का एक संक्षिप्त इतिहास

खेलों के प्रति भारत वासियों के आचरण का सांस्कृतिक इतिहास बड़ा विचित्र रहा है।

भारत में भी कई सारे खेलों का आरम्भ हुआ है, मगर इनमें से शायद ही कोई अंतराष्ट्रीय स्पर्धा में शामिल किया गया है। चौसर से आधुनिक लूडो को प्रेरणा मिली जो छोटे बच्चों में प्रिय है, मगर ये अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा में नही होता है। शतरंज काफी समय तक भारतवासियों में प्रिय रहा है, हालांकि ये खेल फ़ारसी मूल का है।
एक खेल जो कि अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में कुछ वर्षो तक पहुंचा, वो था कबड्डी। मगर अधिक प्रिय नही हो सकने पर वो आजकल शामिल नहीं होता है।

बरहाल, बात है समाज के रुख की ।
भारत में खेलो को अधिक सम्मान से नही देखा गया है। चौसर के खेल से स्त्री के अपमान का किस्सा जुड़ा है (द्रौपदी चीरहरण, और राजपाठ को खो बैठने की कहानी) , और इसलिये ये खेल लोगों में हीन भावना से देखा गया। शतरंज से लत लग जाने का सामाजिक दोष जुड़ा हुआ है। 
हालांकि खेल का चलन भारतीय समाज में था, मगर ये सब असम्मानित कर्म के तौर पर देखे गये हैं। कहीं कहीं कुछ खेल केवल राजा महाराजों की शोभा माने गये, और प्रजा में आम आदमी खुद ही एक दूसरे का तिरस्कार तथा हतोत्साहित कर देते थे खेल खेलने पर - "क्या खुद को कही का राजा महाराज समझते हो क्या ?"

तो वर्तमान काल के बदलाव के पूर्व में भारतवासियों का असल आचरण खेलो के प्रति हीन रुख वाला हुआ करता था। खेल खेलने वाले बच्चे को सम्मान के संग नही देखा जाता था। खेलने वाले व्यक्ति के लिए आर्थिक भविष्य ज़्यादा कुछ नहीं हुआ करता था।  खिलाड़ियों का अक्सर कंगाली के हालातों में जीवन गुज़ार देना आम बात हुआ करती थी। कई सारी अतीत की घटनाएं हैं जिसमे खिलाड़ियों ने अपने मेडल बेच कर जीवन गुज़ारा हुआ है।

आजकल इस रुख में बदलाव कैसे आया है, ये भी एक विचित्र और दिलचस्प कहानी से सोचने समझने के लिए।
ये बदलाव वास्तव में फिर "हीन भावना" के मार्ग से ही आया है, जब आजकल टीवी जैसे यंत्र घर घर पहुंच चुके हैं, और फिर उस पर भी , सीधा प्रसारण कर सकने वाली तकनीक विकसित हो गयी है। 
टीवी के आने से धीरे धीरे खेलों को भारत के लोगों में राष्ट्रवाद से जोड़ा जाने लगा है। भारतीयों में राष्ट्रवाद भी असल में "हीन भावना" वाले मार्ग से ही आया है। 
लोग जब एक दूसरे का अपमान करने लगे कि भाई "भारत में तो भारत की फिक्र करने वाला कोई है ही नहीं ", तब लोग भीतर ही भीतर आत्म-निरक्षण और आत्म-सुधार करने लगे। इससे लोगों में राष्ट्रवाद प्रसारित होना आरम्भ हुआ। 
टीवी के आगमन के साथ खेलों में मेडल जीतने पर राष्ट्रवाद प्रदर्शित करने का चलन निकलने से खेलों को सम्मान मिलना आरम्भ हुआ है। उसमे भी , हालांकि कई सारे खिलाड़ियों ने यही टीवी के माध्यम से अपना दुखी जीवन व्यक्त किया और समाज का अपमान किया, (या कहे तो , समाज से समाज की शिकायत करि) कि कैसे उनको उचित सम्मान - आर्थिक प्रोत्साहन- नही दिया समाज और सरकार ने, खेल के क्षेत्र में उचित उपलब्धि होने पर भी। तब जा कर लोगों ने, तथा सरकार ने आत्म-निरीक्षण किया और आत्मसुधार किया।

भारत के लोग केवल थू थू किये जाने से ही आत्म-निरीक्षण करते है। और तब जा कर कुछ ग़लत सांस्कृतिक आचरण में अपने आप को बदलाव करते हैं। इस प्रक्रिया को ही "हीन भावना" मार्ग पुकार सकते है।

और शायद फिर अपमान किये जाने से उतपन्न  प्रतिरुख में लोग यकायक अत्यधिक "गर्व करण" करने लग जाते है उसी विषय के प्रति। ये "अत्यधिक गर्व" अतीत की हीन भावना की प्रतिक्रिया में से  निकला हुआ होता है, और इस एहसास के चलते वास्तव में अशोभनीय हो जाता है, जब विशाल आबादी में यकायक दिखाई प्रकट हो जाता है, जबकि तमाम अन्य मुद्दों पर विलुप्त रहता है। ऐसा होने से ये पता लग जाता है कि यकायक राष्ट्रवादी गर्व वास्तव में एक प्रतिक्रिया है, अतीत काल की किसी हीन भावना का।

आजकल ऐसा ही "अशोभनीय गर्व" olympic खेलों के दौरान खिलाड़ियों के मेडल जीत जाने के उपरान्त लोगों की सोशल मीडिया की पोस्ट में दिखाई पड़ रहा है। - अत्यधिक गर्व मयि राष्ट्रवाद।

ये गर्व मयि reaction है, और इसका जन्मभूमि वास्तव में अतीत में व्याप्त अत्यधिक हीन भावना रही है - severe inferiority complex।

अतीत काल में तो खिलाड़ियों के हालात इतने खराब हुआ करते थे , सामाजिक सम्मान इतना निम्म की उनके रोने धोने और तमाम शिकायत, समाज से ही समाज की थूथू करि गयी,  तब जब कर ये किया गया कि खिलड़ियों को कुछ नौकरियों में थोड़ा से quota (आरक्षण) दिया जाने लगा था। इसी श्रृंख्ला में सचिन तेंदुलकर ने भी नौकरी करि है, और हरभजन सिंह ने भी पंजाब पुलिस में नौकरी करि है। आरम्भ में ये quota सिपाही, जवान जैसे पदों तक सीमति था। बाद में कुछ बड़े खिलाड़ियों के आने पर पद तक की पहुँच को भी बढ़ाया गया। आज dcp तक के पद और पुलिस में सेवा देना आसान हो चुका है।

ये सब वास्तव में इतनी सहजता से नही प्राप्त हुआ है। इसमे बहोत कुर्बानियां गयी है, और "हीन भावना" मार्ग से होते हुए प्रतिक्रियात्मक "गर्व मयि करण" तक की सामाजिक बदलाव की यात्रा हुई है। 

A Commentary on Punishing of a Govt official

किसी को दंड देना भी एक कला होती है। दंड देना आवश्यक होता है, नहीं तो इंसान उद्दंता करता ही चला जाता है। रोके टोके बिना उसको feedback नहीं मिलता कि उसके कर्म में कुछ ग़लत हो रहा है, और वो ग़लत क्या है।

अब, सवाल है कि उचित दंड क्या है, और कैसे दें?

 यदि सरकारी अफ़सर आपकी बात नहीं मान रहा हो, या कि आपके साथ न्याय पूर्वक पेश नहीं आया हो, तब उसे दंड कैसे दें? यह पेंचीन्द मगर महत्वपूर्ण सवाल है। यदि सरकारी अफ़सर न्यायपूर्वक अपने आप को प्रस्तुत नहीं करते हैं, तो अब क्या किया जाये? 


सरकारी अफ़सर को दीर्घकालीन क्षति करना मुश्किल होता है। उसको केवल नौकरी चले जाने का भय ही एकमात्र तरीका होता है मर्यादा बद्ध (self restraining) करने का। मगर ये काम करना किसी सरकारी अफसर के संग में आसान नहीं होता है। उसकी नौकरी केवल अनुशासन टूटने पर ही जाती है। अनुशासन कैसे टूटता है, कब, यह जान सकना आम आदमी के लिए मुश्किल होता है। सरकारी आदमी के अनुशासन टूटने का खुलासा केवल उसके सहयोगी सरकारी आदमी ही बता सकते हैं। 

collegiate से ही तय होता है कि किसी सरकारी आदमी से ग़लती हुई है या नहीं। इसलिये बाहरी आदमी को अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि उसकी शिकायत पर किसी सरकारी आदमी को दंड मिलेगा या नहीं । सभी सरकारी आदमी अक्सर एक दूसरे का बचाव करते ही करते हैं।

तो फिर अब सरकारी आदमी को आखिर दंड कैसे दिया जाये? 
सरकारी आदमी के पास अपने बचाव के लिए न्यायसंहिता में प्रचुर संसाधन उपलब्ध होता है। रोमन भाषा की एक न्यायसूक्ति इस सभी बातों को संक्षित करके कहती है कि king can do no wrong। तो प्रत्येक सरकारी आदमी अपनी ग़लत हरकत को सरकारी कार्य के पालन के दौरान उत्पन्न व्यावहारिक घर्षण करके दिखाता है। यानी, यदि उससे कुछ ग़लत हुआ है तब वो सरकार यानी king का भी ग़लत माना जाना चाहिए। इसे सरकारी कार्य या सेवा की ग़लत करके बख्श दिया जाता है। 

दण्ड देने का मार्ग केवल ऊपर से ही खुलता है। किसी उच्च पद अधिकारी के आदेशों का पालन नहीं करने से उतपन्न अवज्ञा , या फिर अनुपस्थिति - निरंतर और दीर्घकालीन - यहीं से कोई सरकारी आदमी अनुशासनात्मक कार्यवाही के घेरे में लिया जा सकता है अपने वरिष्ठ के द्वारा। 

तो सरकारी आदमी को काबू करने का शायद यही एक रास्ता होता है, जो कि जाहिर तौर पर आम आदमी के पास में उपलब्ध नहीं होता है।


Knowledge अलग चीज़ होती है, और Consciousness अलग

Knowledge अलग चीज़ होती है, और Consciousness अलग। 

क्या क्या अन्तर पकड़ सकते हैं , इन दोनों में, आप? 

Knowledge और Consciousness को किसी number line की तरह से समझें। knowledge कोई number मात्र है, जबकि consciousness पूरी की पूरी number रेखा है। यानी knowledge को ईंट ईंट करके जोड़ कर के consciousness बनती है।

 Knowledge किसी एक दिशा में रखा हुआ एक नम्बर है। यानी, जब आप मात्र किसी एक ही number को देख रहे होते हैं, तब आप को सिर्फ knowledge मिल रही होती है। मगर जब आप दोनों विपरीत दिशाओं के अंकों को देखने लगते हैं, तब आपको पूरी number line दिखाई पड़ने लगती है, यानी अब आपमें consciousness आने लगती है।

 नम्बरों के विशेष पहचान वाले वर्ग से आप कोई group बना सकते है, जैसे कि odd numbers , prime numbers, integers। ये ऐसे हुआ कि आप छोटे छोटे knowledge को संग रख कर आप कोई theory बना लेते हैं। मगर theory भी अभी आपको सम्पूर्ण परिचय नही करवाती है विषय से। ऐसा परिचय की आप उस विषय पर एक सिद्ध नियंत्रण करना सीख जाएं, ऐसे जैसे आप ही उसके master हो। 

 तो theory भी अभी थोड़ा अधूरी होती है। theory मात्र आपके देखने के चक्षु को विस्तृत करती है - सूक्ष्म और विराट दोनों तरह से देख सकने में आपकी सहायता करती है। 

 मगर इसके आगे भी काम बाकी रह जाता है, consciousness तक पहुँचने के लिए। क्या? कि , अभी इस तरह की बहोत सारी theories को समझना पड़ता होता है। consciousness इसके बाद में मिलती है। 

Consciousness ही ब्रह्म है। consciousness ही इंसान में भगवान का अंश होती है।

संतुलन - एक बौद्ध विचार

मुझे लगता है कि दलित-हिन्दू(सवर्ण) द्वन्द, शिया सुन्नी झगड़ा, और रोमन catholic - protestant  जैसे द्वन्द का ईलाज़ "संतुलन" में है। हर एक के साथ कहीं कुछ न्याय और कुछ अन्याय हो रहा होता है। यानी हर व्यक्ति कहीं अन्याय झेलता है, तो कहीं न कहीं अन्याय करता भी है। हमें इस विस्तृत प्रक्रिया में छिपे संतुलन को समझना चाहिए। संतुलन अपने आप में भी एक न्याय है - distributive justice ।

जब भी हम(इंसान लोग) सिर्फ़ अपने ऊपर हुए अन्याय को सोचने लगते हैं, और अपने हाथों हुए अन्याय को देखना बन्द कर देते हैं, तब हम संतुलन को बिगाड़ देने के प्रयास करने लगते हैं। और फ़िर यहाँ से दौर निकल पड़ता है जो हमें जानवर बना कर छोड़ता है।

कल news beak करके यूट्यूब चैनल पर मार्कण्डेय काटजू के बारे में एक पोस्ट देख रहा था। बताया गया है कि मार्कण्डेय काटजू के अनुसार इस देश में असल जातिवाद तो ब्राह्नणों ने झेला है। !!!!! भेदभाव तो ब्राह्मणों के संग हुआ है, काटजू के अनुसार। दुराचार ब्राह्मणों के संग किया है दलितों ने । !!

सामाजिक समूह के संग अन्याय का ईलाज़ हमेशा "न्याय कर देना" नही है। बात को अतीत में ग़ुम हो जाने देना भी शायद ईलाज़ होता है। मैं बात को भूल जाने को नहीं कहता हूँ, मगर अतीत में चले जाने को जरूर कहता हूँ। वर्ना eye for an eye वाली गड़बड़ हो जायेगी, it will make whole world blind.

संतुलन के साथ चीज़ों को , घटनाओं को कैसे दर्शन करना सीखें?
इसका ज़वाब है - आत्म-दृष्टि पर संयम। हमारा perception, यानी हमारी चीज़ों को देखने-समझने वाली दृष्टि पर हमें नियंत्रण करना सीखना  चाहिए। यह भी एक "योग" ही होगा कि चीज़ों के perception संतुलन से करना आ जाये, निरंतरता से।  

(योग केवल mat बिछा कर करे जाने वाली शारीरिक मुद्राओं को नाम नही है। बौद्ध योग भी एक किस्म का योग है। अपनी खुद को psychology को दुरुस्त करने का संयम, एक परम योग है। अपने psychopathy से मुक्ति ले सकना, ये परम योग की सिद्धि है।)


तो बात perception की है, कि चीज़ों और घटनाओं को संतुलन से देखना कैसे सिखाये अपने आप को। इसके विषय में बात यह है कि perception एक किस्म की प्रवृति होती है - और यह अध्यात्म द्वारा इंसानो और समाज में प्रसारित होती रहती है।

यानी Perception का आरंभ spirituality से होता है। (यहां पर ही मैं अक्सर ब्राह्मणों की हिन्दू समाज पर प्रभावों की शिकायत करता हूँ। ब्रह्मवाद हिन्दू समाज के spiritual perception पर लगा हुआ एक psychopathic रोग है। यह विषय विस्तार में अन्य लेखों में चर्चा किया है मैंने।)

कहने का अर्थ है की लोगों के आध्यात्मिक गुरुओं को उन्हें संतुलन से दर्शन करना सीखना प्रेरित करना होता है। बार बार उन्हें उनके असंतुलित दर्शन करने पर टोकना होता है, और संतुलित दर्शन क्या होना चाहिए, ये बताना पड़ता है।  मगर brain washing से खुद को बचाते हुए ! यानी खुद भी एक किस्म का संतुलन चाहिये होता है, दूसरे को संतुलन सिखाते समय ! चक्र के भीतर में एक और चक्र।

पाश्चात्य संगीतकार elvis preseley का योगदान आधुनिक विश्व को

पश्चिमी जगत के आधुनिक काल के सांस्कृतिक इतिहास में elvis presley का जन्म बहोत महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसे 16वी और 17वी शताब्दी में reniassance और reformation सांस्कृतिक इतिहास की महत्वपूर्व काल थे, वैसे ही 20वी शताब्दी में elvis presely का आगमन !

क्यों? ऐसा क्या योगदान दिया elvis ने ?

आज हम जब भी बाज़ार जाते हैं तब कोई न कोई music cd यूँ ही आसान दिमाग से, बिना कोई ज्यादा सोच में समय व्यर्थ करे खरीद लेते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि ये music industry का आरम्भ कैसे हुआ है।

और तो और, अब आज के युग में "सभी किस्म का" music सुनना और प्रस्तुत करना पसंद किया जाता है। मगर क्या आपको मालूम है कि पहले के युग में ऐसा नहीं हुआ करता था।  पहले भेदभाव और असमानता का युग था। समाज में भेदभाव का चलन था। पश्चमी जगत काले-गोरे के रंगभेद से बहोत अधिक ग्रस्त हुआ करता था। राजनैतिक आयाम में जहाँ गाँधी और लूथर किंग जैसे महान नायक सामाजिक अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, वही किसी एक गायक ने अनजाने में अपने सुरों और संगीत से भेदभाव को सांस्कृतिक तौर पर समाप्त करने में भूमिका निभाई थी। इतनी सफलता के साथ, की शायद आधुनिक पीढ़ी को याद ही नही रह गया कि अतीत में तो संगीत और सुरों में तक इंसानी समाज ने भेदभाव किया हुआ है।

विश्व संस्कृति को ये दोनों ही धरोहर Elvis Presley से मिली है।

काले, अफ्रीकी मूल के लोग में कुछ गला फाड़ कर, चिल्ला कर गाने का चलन आज भी है। अफ्रीका महाद्वीप बेहद गर्म और कठोर क्षेत्र है, पानी दुर्लभ होता है, और जीवन बेहद मुश्किल। मगर उनके कबीली जीवन में संगीत फिर भी शुरू से ही था। हालांकि वो इनके विशिष्ट तरीके के था। मसलन ध्वनि के विभाग में -  गला फाड़ कर गाना, सुर- ताल के विभाग में - percussion यानी पीछे से गूँज करने वाले वाद्य यंत्रो (ढोल, drum, झुनझुना) का प्रयोग,  शब्दों के विभाग में - हल्के विचार, जो आँखों या शरीर के इंद्रियों से पकड़े जाने वाले बात को बताते है। कोई गेहरे जज़्बात नहीं।

आगे जा कर अफ्रीकी लोग जिस भी महाद्वीप में गये, अपना संगीत साथ ले गये। फ़िर उनकी संस्कृति में से jazz music और rythm and blues का जन्म हुआ। 

गोरे लोगों के समाज में ये दोनों ही कालो अफ्रीकियों का music देखा जाता था। वो इसे निम्म किस्म का संगीत मानते थे और इसे सुनाना पसंद नही करते थे। गोरों का आरोप था कि कालो का संगीत को गहरी,  दिमाग को जागृत करने वाले बात नही कह रहे होते थे। गौरे समाज का मानना था की कालों के संगीत में बस शारीरिक ज़रूरते - भोजन, कपड़ा, मकान, और sex तक ही इनकी बात सीमित होती थी। 

इसके बनस्पत गोरों का खुद का संगीत , उनके अनुसार - साफ़ सुथरा था। ईश्वरमयी, और कोई नयी जागृति को प्रस्तुत करने वाला। ईश्वर को धन्यवाद करने वाला। यंत्रो के मामले में - सटीक ध्वनि वाले यंत्र जैसे कि guitar, सीटी । गले को सजो कर गाने की शैली - मतलब , आवाज़ को बीच-बीच में ऊँचा नीचा करना , कहीं लंबा कहीं छोटा करना, एक लय को बनाये रखना, छद्म को पुनरावृति या लय को पुनरावृत्ती करना। गेहरे जज़्बातों को बयान करना। वगैरह। उनका संगीत country music कहलाता था। 

उस युग में भेदभाव न सिर्फ समाज में था-बल्कि एक मानसिकता बन कर हर क्ष्रेत्र में था। संगीत में भी । कालों का संगीत अलग, और गोरों का अलग। गोरों के अनुसार कालों का संगीत फूहड़ था,  हल्का और  छिछला।  कालों का अपने ही संगीत नायक थे -  bob marley। मगर वो गोरों को पसंद नही आते थे।

फ़िर elvis presley ने क्या योगदान दिया इन हालात में?

Elvis ने दोनों अखाड़ों को आपस में जोड़ दिया, fusion बना दिया ! और वही pop music कहलाने लगा। elvis को rock and roll एक ख़ास तौर की संगीत शैली का जनक माना जाता है। इस शैली में दोनों विशिष्ट अखाड़ों का मिलन हो जाता है। वाद्य यंत्र बीच-बीच में percussion वाले भी सुनाई पड़ते है, जो कि कालों के यंत्र समझे जाते थे। और lead में guitar भी था।

Elvis का बड़ा योगदान ये था कि उनका संगीत लोगों में इतना पसंद आने लगा कि उसे pop music करके बुलाया जाने लगा । और उसके इर्द गिर्द recording studio की नयी industry जन्म ले ली। elvis के गानों के ग्रामोफोन record हाथों हाथ बिकते थे और हर gramophone record पिछले वाले से भी अधिक संख्या में बिकता था।  इनकी विक्री लाखों से बढ़ कर करोड़ो की ओर जाने लगी। इतनी demand थी बाज़ार में । तो इतना gramophone player और record का निर्माण करने के लिए नये कारखाने भी चाहिए थे। ये सब करते करते एक पूरी music industry ही जन्म ले ली, जिसे हम आज इस नाम से जानते हैं।



ब्राह्मणवाद - महर्षि परशुराम की अर्चना के प्रचलन की कहानी


ब्राह्मणवाद के विषय में बात आगे बढ़ाते हुए, प्राचीन वैदिक मिथक कथाओं से इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताये, 

आज सोशल मीडिया के माध्यम से ब्राह्मणों का बड़ा गुट, फ़िर से, महर्षि परशुराम के नाम पर अस्त्र धारण कर के अपने अधिकारों और सम्मान/संपत्ति की रक्षा के लिए क्षत्रियों की भांति युद्ध करने और हिंसा करने को खुद को तैयार कर रहा है। 

मगर, सच ये है की अभी सं 2000 तक के आसपास तक तो समाज में बहुतायत चलन ये था कि परशुराम जी की तो पूजा ही नहीं करि जाती थी ! परशुराम जी को एक हिंसक, अशांत साधु माना जाता था, जो कि बहोत क्रोधी व्यक्तित्व वाले थे। रामायण में उनकी लक्ष्मण से तूतूमैंमैं का कांड ही जनता में प्रचलित था , वही उनकी छवि हुआ करती थी जनता के बीच में।  इसके अलावा उनका और कोई ज़्यादा महत्व नही था, ये तक भी नही की वो सनातन विचारो के अनुसार एक "अमर" व्यक्ति थे । जनता के बीच परशुराम की छवि  ऐसी थी की वो यूँ ही आजीवन भटकते रहने वाले प्राणी थे, जिन्हें कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नही मिलने वाली थी - शायद उनके हिंसक कर्मो के चलते !! उन्होंने अपनी माता का वध किया था, शीश काट कर। 

मगर, अब कलयुग चल रहा है, आजकल परशुराम की छवि को whitewash किया जाने लगा है, ख़ास तौर पर सोशल मीडिया के आ जाने के बाद से। इसके पीछे क्या मक़सद है, हम आगे वही चर्चा करेंगे।

गैर-ब्राह्मण जाति के युवाओं को अपने पिता और दादा से इस बात की तजदीक ले लेनी चाहिए - कि परशुराम जी कोई अर्चना के पात्र नही थे हिन्दू समाज में। वो बहोत हिंसक, क्रूर, क्रोधी व्यक्ति माने गये हैं, जिनसे दूरी बना कर रखना ही उचित था। 

वैदिक कथाओं के अनुसार जो सात पुरुष अमर हैं - वो अपने कर्मो के चलते ऐसे हैं - अच्छे कर्म और बुरे कर्म , दोनों। कुछ के लिए अमर होना एक सिद्धि माना गया है, और कुछ के लिए मौक्ष का इंकार। यानी भटकती आत्म।

हनुमान जी अपनी रामभक्ति के अच्छे कर्म के चलते अमर हैं। उनको रामभक्ति करके "अमरत्व" की सिद्धि प्राप्त हुई है। जबकि परशुराम और अश्वथामा अपने हिंसक कर्मों के चलते मोक्ष से वंचित हैं, और इसलिये "अमर" हैं। अश्वथामा को आजीवन भटकते रहने का श्राप था। वो "अमर" होते हुए भी श्रद्धेय नही है, अर्चना के पात्र नही है हिन्दू समाज में।

रामायण में से निकलती वास्तविक अवधारणा के अनुसार तो परशुराम की पूजा नही होती थी, हालांकि वो एक पौराणिक चरित्र अवश्य हैं, जिसके चलते उनके प्रति सम्मान अवश्य था।  शायद इसलिए की रामायण में रामचंद्र जी ने भी परशुराम जी को सम्मान दिया था। रामायण के वास्तविक जननायक रामचंद्र जी, लक्ष्मण जी, माता सीता हैं। परशुराम नहीं ! बल्कि हनुमान जी भी एक side hero ही है, मगर अपने नटखट स्वभाव के चलते आने वाली युग में जनता में सबसे प्रिय रामायण चरित्र बनते चले गये।

बरहाल,
बिहार में ये जो "भुमिहार" ब्राह्मण पाये जाते हैं, वो भी परशुराम को ही अपना प्रेरणास्रोत मानते है। भुमिहार ब्राह्मणों की वर्तमान राजनैतिक कहानी सभी को मालूम होनी चाहिए -रणवीर सेना इन्हीं की बनायी हुई थी/है - और फ़िर इन्होंने बिहार को जातिय भेदभाव, ऊंच नीच , हिंसा के हवाले झोंक दिया। हालांकि अब ये लोग हिंसा का आरोप नक्सलवादियों पर मढ़ते है, और लालू प्रसाद को बिहार की कहानी का खलनायक बताते हैं। (( नक्सलवादी तत्कालीन जनजातियां है, जो शायद सभ्यता से दूर आदिमानव लोग हुआ करते थे।  अतीत काल में उनके विरुद्ध हिंसक होना --उचित अथवा अनुचित, ये  एक अलग निबंध का विषय है। ))

"भुमिहार" के पीछे भी एक सामयिक कथा जान लेना ज़रूरी है, हिन्दू होने के नाते। कि, मूल सनातन और वैदिक मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मण तो भुमि का अधिपति कभी होता ही नही था। 
फिर "भुमिहार" का अपवाद कैसे उतपन्न हुआ हिन्दू समाज में, ये ब्राह्मणों के स्वार्थी और धूर्त बनने की कहानी है।

वास्तविक, मूल मान्यताओं में ब्राह्मण जनता में श्रद्धेय तभी हुआ करता था जब वो सब कुछ त्याग करके , भिक्षा ले कर जीवन यापन करता था। और जब वो आध्यात्मिक मार्ग दर्शक बन जाता था, सब कुछ त्याग देने के उपरान्त, तब समाज पर उत्तरदायित्व था कि समाज ऐसे ब्राह्मण महाज्ञानी मार्गदर्शक को दान दे - भुमि भी, पशु (गाय वगैरह) भी।  भुमि और पशु तत्कालीन समाज में संपत्तियों के सूचक थे। तो ब्राह्मण का "भुमिहार" हो जाना तो अवैध  विचार था। मूलतः ब्राह्मण भुमि पर भिक्षुक था, अहारी नही। 

जाहिर है, "भुमिहार ब्राह्मण" वैदिक मान्यताओं की दृष्टि से अपवाद है, मगर जो की आज के युग में प्रचलन में आ चुका है, मुख्यधारा की बात बन गया है। और इस अपवाद का प्रेरणास्रोत कौन है?  जातिय ब्राह्मण की धूर्तता से निर्मित रामायण कथा के एक चरित्र हैं -  महर्षि परशुराम। जातिय ब्राह्मणों ने ही परशुराम जी जननायक बना कर आरम्भ किया गया था - जो की वैदिक दृष्टि के मायने से समझने पर ब्राह्मणों द्वारा अपने स्वार्थी हितों की रक्षा करने की कहानी है। कोई ब्राह्मण नहीं बोलने वाला है कि - वेदों में, शास्त्रों में "भुमिहार" ब्राह्मण का जिक्र नही है। जाहिर बात है! ब्राह्मण आजकल "संस्कृति की रक्षा" तो गाते फिरेंगे, मगर अपने स्वार्थ वाली "कुसंस्कृति" के चलन को कदापि नहीं मिटायेंगे समाज में से। 

भूमिहारों के अनुसार ब्राह्मणों ने अपनी "सम्मान और सम्पति" की रक्षा करने के लिए अस्त्र धारण करना आरम्भ किया था, क्योंकि क्षत्रिय कमज़ोर हो चुके थे।  अस्त्र धारी  ब्राह्मण ही "भुमिहार" कहलाये। यानी दान में मिली भूमि को त्याग करना बन्द कर दिया - क्योंकि शायद मन में लालच आ बसा संपत्ति के प्रति !

और आजकल शायद आरक्षण विरोध करने के लिए, आरक्षणनीति से  आहत हुए  वाले  अपनेअधिकारों की रक्षा के लिए महर्षि परशुराम का अनुसरण करने की ज़रूरत लग रही है ब्राह्मणों को।

ब्राह्मण और बुद्ध विपरीत है एक दूसरे के

तुम डरते हो राम से! ब्राह्मण नही डरता हैं! अगर डरता तो 2 करोड़ की जमीन 18.5 करोड़ में खरीदकर जनता को राम के नाम की चपत नही लगाता! ब्राम्हण तो बस राम का ब्यापार करता है! 

ब्राह्मण समाज को आध्यात्मिक तौर पर निर्मित करता है - शोषण किये जाने के लिये, सहन कर जाने के लिए, भ्रष्टाचार को सांस्कृतिक आदत बना देने के लिए। ब्राह्मण समाज में से पाप और पुण्य की दूरियां समाप्त कर देता है, दोहरे मापदंड स्थापित कर देता , vvip संस्कृति को जन्म देता है , भेदभाव ऊंच नीच , आम आदमी-विशेष आदमी की संस्कृति चालू करता है। राम के नाम पर "विशेष आदमी"(vvip संस्कृति/चलन) इन्हीं की हरकतों से चालू होता है। 

ब्राह्मण अपनी "wisdom' से perverse और reasonable के बीच का फैसले नष्ट कर देता है। महाभारत में सब उच्च ब्राह्मण -- कृपाचार्य, द्रोणाचार्य बैठे हुए द्रौपदी का चीर हरण देख रहे थे, और भीष्म पितामह को भी दिखावा रहे थे। ये सब दुर्योधन के साथी थे। एकलव्य का अँगूठा कटवाया था, और आज तक उसे न्यायोचित बताते हैं, -- गुरु दक्षिणा ली थी । 

हिंदुओं के प्रधान ईष्ट - राम , कृष्ण - कोई भी ब्राह्मण नही है, न ही ब्राह्मण कुल में जन्म लिए है। ब्राह्मणों के देव - ब्रह्मा की तो पूजा ही नहीं करि जाती थी। पुराने समय में टीवी पर एक "सुरभि" करके कार्यक्रम आता था। उसमे एक बार यह सवाल था । पुष्कर (राजस्थान) में ब्रह्मा जी की पूजा का एकमात्र मंदिर है, संसार में। रावण भी ब्राह्मण था। उसके भय से एक बार ब्रह्मा जी ने झूठ बोल दिया था। इसलिये ब्रह्मा जी की पूजा नही होती है। रावण ने अपनी मृत्यु के बारे में कुछ जानकारी पूछी थी, ब्रह्मा जी से। दक्षिण में वामन अवतार में विष्णु आये थे। वामन एक ब्राह्मण था। उसने छल करके राजा बलि का राजपाठ ले लिए। आज भी दक्षिण में ओणम का पर्व राजा बलि की स्मृति में मनाया जाता है - वामन के लिए नही। लोग राजा बलि को प्रजापालक राजा मानते हैं, और वामन को चतुराई /धूर्तता का प्रतीक मानते हैं। 

ब्राह्मणों ने हिन्दू समाज को जैसे चलाया है, उसमे से पृथक होने का सिलसिला चलता रहा है। जैन की उत्पत्ति हुई, जब उन्हों भगवानों , देवी देवताओं को मानना ही बन्द कर दिया ! लोग नास्तिकता में चले गये। 

सिखों का जन्म हुआ जब वेदों और ब्राह्मणों को किनारे करके अपने खुद के नये "गुरु" बसाये, और नया ग्रंथ, "गुरु ग्रंथ साहब" लिखी गयी। वेदों का अतापता किसी को नही था - लिखी भी है या नहीं ? ब्राह्मण "वेद" के नाम पर समाज को चला रहे थे, basically मनमर्ज़ी और धूर्तता से, अपनी राजनैतिक सत्ता बसाने के भीतरी उद्देश्य से। तो, सिखों ने अलग हो कर "गुरु ग्रंथ साहब" एक "लिखी" हुई किताब अपनायी ली। you see, इंसान को समाज में जीने के लिए structure तो मांगता ही है न । ब्राह्मणों ने structure नही आने दिया है। सिख , जैन, बुद्ध - यह सब उसी इंसानी जरूरत में से जन्म लिए हुए धर्म हैं। 

Brahmins have dispelled the rise of Logic within Hindu wisdom. Instead they have kept Hindu wisdom soaked with Sophistry.
ब्राह्मण ने हिंदुओं में structured ness को उत्पन्न होने में बाधा पहुचाई है। हिन्दू वैसे भी polyism पंथ है। तो बहुमान्यताओं के चलते हिन्दू लोगों को तर्कभ्रम से पीड़ित रहना स्वाभाविक है। इसका निराकारण हो सकता है structure (तमाम ज्ञान कुंज को क्रम में सुनियोजित करने से)। ब्राह्मण (वेद और उपनिषद) के नाम पर structure को निर्मित नहीं होने देता है। वो अपने से मन से कुछ भी बोलता रहता है, लिखता रहता है - और label लगा देता है कि यह सब "वेद" और "उपनिषद" में लिखा है। जब, जहाँ अगर किसी तर्क (logic) में परास्त होने लगता है, तब चालंकि/धूर्तता से एक नया प्रसंग अन्वेषण(invent) कर देता है, और logic को हड़प लेता है। उसको यह सब करना आसान बनता है ज्ञान कुंज को structure "नही" बनने दे कर। 

Brahmin never let's an Order to come up within Hindu knowledge. He repels all attempts to bring any structure within Hindu wisdom repository. 

और फ़िर ब्राह्मण खुद एक स्वाभाविक धूर्त तो बनता ही है , समाज में से न्याय और धर्म को ही समाप्त कर देता है। समाज आपसी झगड़ो (अन्तर द्वन्द) में फँसा रहता है, क्योंकि समाज में न्याय ही नही है। आज भी सर्वोच्च न्यायालय में बैठा हुआ "मिश्रा गैंग" यही कर रहा पकड़ा जा सकता है। शुद्ध धूर्तता और मक्कारी। 

वैदिक गणित और आयुर्वेद भी उसी lack of structure की देन हैं ! ज्ञान कुंज में व्यवस्था एक पैसे की नहीं आने दी है। और समाज में "व्यवस्था" बसाने के नाम पर चढ़ने लगते है, इसको ऐसे दंड दो, इसको ऐसे बहिष्कृत करो । 


ब्राह्मण में आत्मबोध नहीं होता है। 

भारत भूमि से ही उपजे एक दूसरे धर्म ने संसार को प्रभावित किया था और पूर्व asia में आज भी धाक जमाये हुए है - बौद्ध धर्म। जापान, चीन, korea, विएतनाम , कंबोडिया में यह धर्म अधिक प्रभावित करता है। मज़े की बात है कि भारत में ही बौद्ध धर्म कम पालन होता है। कारण ब्राह्मणों की साज़िश है। ब्राह्मणों को बुद्ध धर्म से ईर्ष्या है। 

आज "हिन्दू धर्म" वास्तव में क्या है? 
राम और कृष्ण के नाम पर ब्राह्मणों ने हिन्दू समाज के आध्यत्मिक शीर्ष (spiritual Leadership) पर राजनैतिक सत्ता बना रखी है। साथ में अघोरियों को जोड़ लिया है - "महंत" और "साधु" का दर्ज़ा दे कर। बौद्ध की बात नहीं होने दी है। ऐसा करने से हिन्दू समाज बौड़म बन गया है। हिन्दू चिंतन "polytheism की भेंट" चढ़ गया है - multiple morality को एक संग पालन करता है, नीत और न्याय नही कर सकता है, धर्म और अधर्म अपने भीतर में ही तय नही कर सकता है। संसार में क्या चल रहा है - उसको समझ में ही नही आता है - (mental dumbness) । ज्यादातर हिन्दू समाज के पुराने शासक वर्ग "obc वर्ग" के आरक्षण में आते है। सांसारिक घटनाक्रम - democracy, secularism, आयुर्वेद, allopathy, आधुनिक चिकित्सा पद्धति, "योगा" (body contortion) , कुछ अक्ल में नहीं घुसता है। ऊपर से हिन्दू समाज शुद्र/दलित और किया रहता है। आपस में सहयोग नही कर सकता है। आपसी द्वन्द से ग्रस्त रहता है। और फ़िर बाहरी आक्रमणकारियों से रौंदा जाता है। 

  ये सब उपलब्धियां ब्राह्मणों के आध्यत्मिक छत्रछाया की कृपा है। 

आज जब ब्राह्मण हिन्दू समाज को एक संग नही रख सका है, तब नये रणनीति लगाई है - common enemy की। "हिन्दू muslim" की राजनीति करने के पीछे ब्राह्मण बैठे है। 

आज के नियम कानून तंत्र व्यवस्था अंग्रेजों के बसाये हुए है। ब्राह्मणों ने उस तंत्र पर कब्ज़ा जमा लिया है। पकी पकाई खीर खा रहे है। ये सब christian thoughts पर बसाये गये तंत्र है। ब्राह्मण इसमे सुराख कर रहे हैं, अपनी निजी सुविधा की ख़ातिर।

बुद्ध वास्तव में हिन्दू धर्म से जुदा नही है। बुद्ध ब्राह्मणों के धर्म से जुदा है। बुद्ध खुद क्षत्रिय राजकुमार थे, नेपाल राज्य के। उन्होंने राजपाठ त्याग करके सन्यास लिया था, और "आत्मबोध" प्राप्त किया था - गया (बिहार) में। और सारनाथ (वाराणसी) में प्रथम उपदेश दिया था। Britannica और encyclopedia के अनुसार यह शायद पहली बार था जब इंसानियत ने अपने कष्टों का निराकरण देव-देवताओं, आत्माओं, भूतप्रेत के बाहर ढूंढना बन्द किया था और अपने अंदर "self"("आत्म") में ढूढ़ना शुरू किया था। आज अंग्रेज़ी dictionary में "self -" भरे हुए है, motivational speakers तमाम "self-" से लबालब वार्ता करते है , उस तरह से दर्शन करने की संस्कृति का आरम्भ बुद्ध से होता है। बुद्ध से पहले इंसान में अघोरीपना(animism) हुआ करता था। शिव , हिंदुओं के सबसे प्रथम देवता - वास्तव में अघोरी(animistic) ही हैं/थे। बुद्ध ने इंसान को "आत्म सयम" (self control) की ज्योति दी। यहां से मानवता (humanism) का आरम्भ हुआ है। 

  Animism versus Humanism 
ब्राह्मण और बुद्ध में निभी नही है कभी भी। ब्राह्मण बौद्ध नहीं रखता है , वो 'अघोरी पने' को भी संग ले कर चलते है, तर्क को भी।
  

Subramanian Swamy and his opposition to the idea of Secularism

Subramanian Swamy , a brahmin of South Indian origin , would never want us to understand how the socio-cultural-religious idea of SECULARISM connects with the fight of the common people against the dominance of the PREISTLY CLASS - that is, the BRAHMINS

The present form of Hinduism is essentially the *Brahminism* - a system , which has it  been laid with such crooked morality - (the right word to speak of it is PERVERSITY ) - that it brings about a dominance of the Brahmin class over the lives of people. The judiciary , the executive and the legislation is actually already dominated by the Brahmins . This is thanks to the BRAHMINCAL MORALITY which works such as to assert that everything that AKHILESH YADAV or LALU YADAV have done in the field of public governance was but JUNGLERAJ whereas whatever YOGI ADITYABATH or NITISH BABU is doing is but NATIONALISM and PATRIOTIC .
That kind of thought process , the exploitation of the belief of the common people in the devine powers , and then making them convinced to accept such dual standards is what is BRAHMINCAL MORALITY . 

The BRHAMINCAL MORLITY is the core reason how the common people are still there buying the fact the Manmohan Singh was  a bad guy, and Modi - whose all the credentials have been full of lies , right from the facts about his marriage , education , - he is the good guy.

The story of such dual standards being propagated by the PRIEST class of people is common all over the world. The idea of SECULARISM is about the fight of the common people who have successfully broken through such dual standards of morality .

But how would you know that , if you keep accepting everything that brahmins such as Subramanian Swamy tell you.

Why is there Narcissism in Hindu faith

 

मेरा ख्याल है कि भारत की आबादी मे आत्ममुग्धता इसलिए अधिक है क्योंकि लोगों का यह मानना है कि "घमंड" का सही उपचार होता है विनम्रता ।

 "विनम्रता" 
 इसके अभिप्राय में औसत भारतीय क्या समझता है? 
ये एक शोध करने वाला प्रश्न है। 

मेरा नज़रिया है कि "विनम्रता" का अर्थ एक आम भारतीय मात्र यहां तक ही समझता है कि दूसरों से अच्छे से बातचीत करना, शायद "आप-आप" करके। लोगों से हँस कर बोलना, जमीन पर बेहिचक बैठ जाना, वो भी तब जब आपके पास बहोत अधिक पैसा हो, तब। खाना खा लेना, गरीब आदमी के जैसे। और उसको स्पर्श कर लेना, कर लेने देना, ख़ास तौर पर गले मिल कर , गले लगा लेना। 

भारत के मौजूदा संस्कृति और फ़िल्मी नसीहतों के मद्देनजर यह सब आचरण पयार्प्त होते हैं खुद को "विनम्र" साबित करने के लिए। 

औसत भारत वासी मे आत्म-मुग्धता के प्रति चेतना नही है। वो आलोचना सुनना और करना दोनो ही नापसन्द करता है। उसे कतई "आईना देखना " या कि "आईना दिखाना ", दोनों, ही घोर "नीच" अथवा "घमंडी" काम लगते हैं।

 औसत भारतीय सदैव ही "प्रशंसा" तथा "स्तुति" करने को ही "विनम्रता" के आचरण में गिनती करता है। 

हालांकि बौद्ध विचारो के अनुसार मनुष्य को अपने कष्टो से मुक्ति लेने के लिए तमाम किस्म के संयम रखने चाहिए, तथा आत्म-ज्ञान रखना चाहिए, मगर यह विचार अधिक प्रचलन में नहीं है। बौद्ध धर्म, जो कि भारत भूमि से ही निकला है, मगर अधिकांश भारत वासी रामायण और महाभारत से निकली "ब्राह्मणी नैतिकता" के मद्देनजर ही "घमण्ड" और उसके उपचार "विनम्रता" दोनो को बूझते हैं। रामायण में रावण एक "घमंडी" आदमी था। 

ब्राह्मणी नैतिकता में धूर्तता में कोई दोष नही होता है, बस बातचीत करते समय प्रस्तुतिकरण में तथकथित "विनम्रता" होनी चाहिए। वास्तव में ब्राह्मण "विनम्रता" पर इतना अधिक बल देते हैं कि "धूर्तता" के प्रति आत्म-चेतना को करीब करीब सदैव ही अनदेखा कर देते हैं। हालांकि वह दूसरे में धूर्तता का दोष देखते हैं, मगर आश्चर्य पूर्वक वह खुद में धूर्तता को कदापि नही स्वीकृत करते है। ब्राह्मणों के ऐसा दोहरा आचरण करने का कारण अक्सर करके स्वयं का "विनम्र" व्यवहार बताते हैं। उनके अनुसार बात को यदि "मधुर , और निम्म ऊर्जा ध्वनि" में प्रस्तुत करा गया है, तब यह पर्यपत होता है की "बहोत अच्छे से समझाया है"। और यदि फिर भी सामने वाला उनकी बात से सहमत नही है, तो यानी "वही घमंडी है, अकड़ू है" , वगैरह। 

 ब्राह्मण नैतिकता आत्म-निरक्षण पर बल नही देती है, "विनम्रता" के अभिप्रायों में । तमाम किस्म के जो self- XYZ होते हैं, (जिन्हें emotional intelligence के विषय मे अक्सट पढ़ाया जाता है, ), ब्राह्मण कदापि अपनी "विनम्रता" में उनको गिनती करता है। 

दुविधा यह है कि तमाम ब्राह्मण भारत के वेदों के अनुसार समाज का श्रेष्ठ जन, बुद्धि जन होता है। ज़ाहिर है, बाकी तमाम हिन्दू समाज के लोगो का आचरण उनके श्रेष्ठ जन से मिलता जुलता ही होगा। 
ब्राह्मण वर्ग में कुछ गुण दूसरों के बनस्पत अधिक श्रेष्ठ माने जाते हैं। जैसे समीक्षा , विशेलेष्ण, सत्य कटुवचन , समालोचनात्मक चिंतन से अधिक श्रेष्ठ होता है वाकपटुता, प्रियं ब्रूयात , मधुर वाचन, सौहार्द्य बनाना इत्यादि।

 इन तमाम ब्राह्मणी "गुणों" ने भारतीय संस्कृति को सदियों से आत्मकेंद्रित बनाया है और आत्ममुग्धता दे दी है।

To make it madatory or to keep it recommendatory -- A socialist dilemma

I often think if we have ever debated over the mandate on Safety Shoes, the Hand Gloves, and so. It is important that we begin to appreciate why people resist / may resist any attempt to make mandatory any of these 'safety gears'. 

1) I think that one broad classification of reasoning will be that 'safety gears' hinder the body movements of the person to whom it has promised to give protection. In many situations, such restriction on his body movements may work to the disadvantage of the person. 

2) Marine piloting will require person to be as much light as is possible to aid the climbing of the ladders and the gangway stairs. 

3) The piloting company may see a cost on the maintenance of the equipment. Believe me, in the socialist models of the business, there are the Government Clerks sitting as the bosses of the company, and not well informed on the industrial practices. I can tell you, there are Government clerks as the boss who are debating why piloting is essential to ships , why can't we waive off the piloting !! 

4) In socialist models, the fact that there is a mandate on a safety item is exploited and abused as per convenience. For example, a person maybe warned/admonished for not 'obeying' the mandate 'repeatedly' even if he has some reasons -- genuine or not (which again debatable) . His career tracks records may thus be marred through such warning/admonishments. The inter-personal relations may be damaged in his work space. In fact, the compensations and insurances maybe altered in some extreme situations, under the cover of the fact that there was a mandate, which the victim had not properly obeyed. This logic should give us a prudence that the lesser we have item as mandatory, the better it is --from a legal prudence point of view. 

5) There are some sound technical reasons for the resistance to certain safety-gears. For example, a Helmet with a 'P" may block the view of the pilot while climbing up or down the ladder. 

5a) A safety shoe, it may obstruct swimming action , if the pilot has fallen in the water and is in urgent need to push himself away from the propellers. 
5b) A Helmet, when tightly wrapped over the head, oftentimes blocks the hearing ability. 

In summary, I think the question is whether to make mandatory , or to work by mere recommendation. And we should be clear on this.

Suez Canal blockage and the so-called malpractice of complimenting.

Some guys are jestingly saying that the Suez Canal blockage by that large box ship happened because her Captain refused to give a small box of Marlboro as good-services compliment to the marine pilot who was suppose to help, virtually substitute as the Captain of the ship, and navigate the ship through the Canal . 

Well, the trouble these days is that in all the socialists and the Communist countries , the professional services have all been turned into "paid jobs" which are controlled and operated by the Governments. Therefore, all types of practises of complimenting a service, even those which are happening from a voluntary expression of joy for receiving a good quality service, are straightforward perceived as an act of bribery and thereby, the corruption. . 

There is the trouble which the Socialist system of Public Administration has brought with it, in the mass psychology . 

 In the free and liberal Democratic societies, the perception about the act of Complimenting is that it is supposed to have come from an inner /heartiest expression of pleasure and the joy received by a person - as in the case at hand, the client, the captain of the ship, who is the receiver of a marine piloting service. 

 Some learned professors of Morality and Ethics from colleges of great repute , such as the Howard , have reasoned the matter when it came to examining the morality of receiving of compliments by the Government Officials /Public Officials. They said that what many people (particularly the socialist/communist countries) perceive as an act of bribery, those same act may get perceived as a free and voluntary expression of joy and happiness by other people, (e.g the liberal, democratic societies). Hence, a blanket ban of the exchange of compliments upon rendering of good quality services would rather be a curb on the freedom of expressions to human beings. According to their thoughts, at best, only the public officials should be barred from receiving the compliments in order to prevent any malpractices and the wrongdoings.

 It is during the examination of such question of Morality , the learned wise men have discovered that , among many other differences between a Socialist / Communist countries and the Free, Liberal Democratic countries , the one big point of difference is the very perception of what is a Bribe . 

 How the political administrative culture makes an impact on the perception of what is a Bribe ? 

In all the Socialist/Communists countries , the public officials are forbidden from making any exchange with the common people , INCLUDING the act of receiving any Compliments given voluntarily by the receiver of the services . That is because such complimenting has the potential of providing a cover of legitimacy to the public official to use his position of power for securing a bribe through the illegitimate , coercive means. 

Hence , in all the socialist /Communists countries , a blanket ban prevails over all such acts of complimenting, even if voluntarily taken by any person. As a result, in all the kind of services, the rendering of services have become bereft of the element of Quality. There is no separate means to indicate the joy and pleasure, if the quality of the services is good. Every act of rendering of services, no matter how good or how bad in its quality , is evenly seen as a "state duty". Neither there is a reward , no matter how good in quality the service may have been rendered, nor there is an easy punishment, no matter grave the negligence may have occurred from a public official.

 Now, the critics of the Socialist/Communists systems see the policy of blanket bans on the social practice of Complimenting, as yet another common Communist attitude where there is disregard of the Free Will , and a denial of space for a free expression of certain human feelings to take place . Human expressions , such as the in the form of arts, painting, poems, songs, cinema are characteristically denied a space very often, in the socialist system. this attitude of theirs is idiosyncratically identified through the architecture of the Communists systems when we see 'the blocks' style of living quarters which are so commonly replete in the Communists countries . India, a socialist country by its own declaration, has its own share of such Socialist mentality the "Indira Nagar Colonies " found in the cities of Lucknow , Bangaluru and similar such block-type architectures seen in the city of Chandigarh.

 The critics have consistently slammed the Socialist / Communists ideology for its denials of space to the free , voluntary expression of opinions by humans, and for the disregard of quality and the variety. They have consistently accused that the communist ruler often try to force the equality upon the people by giving each person the same "block housing" kind of living quarters. The say that the Socialist /Communists have very pathologically perceived every economic, professional services exchange between the people as a "duty" for which the only way of remuneration is through the intermediation of the state . The critics say that this political attitude itself is responsible for the siring the malice of corruption within every socialist/ communist systems. 

 The Suez Canal authority , in Egypt , operate the marine piloting , a professional services , through the socialist system . Consequently, the Suez authority too deny the space for Complimenting to happen , between the master and the Pilot . Meanwhile , many Liberal countries of western Europe have adopted a zero-tolerance policy for Corruption, and have started refusing the Complimenting of public officials in order to secure a public contract. By the given standards, the marine piloting service are also counted away as the "public contracts". 

I would like to comment that, --
 Unless, someone is really into supporting socialism/communism in his country, and thereof , unwittily support the evil of corruption to thrive, he should awaken his conscience and allow the professional services to take place in all the essential freedoms which are due to any marketplace for flourishing.

catholics और protestants में क्या भिन्नताएं होती है

 ईसाई धर्म में समयकाल में दो प्रमुख गुटों में विभाजन हो गया था मत-आधार पर।  क्या थे यह मत-आधार, क्या हैं इन दोनों गुटों की समानताएं, और भिन्न्नता , नीचे दिए गए चार्ट में यही ज़िक्र किया गया है (आम भारतीय की रूचि के प्रकाश में )


दो भिन्न गुटों के नाम हैं catholic  और protestants . 


catholics  प्राचीन और आरम्भिक समूह का नाम हुआ, जो विभाजन के पूर्व समस्त ईसाई पंथी हुआ करते थे। 


विभाजन का मुख्य कारण था चर्चों में बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार।  धार्मिक भ्रष्टाचार का अभिप्राय था कि आम जनता को बेवक़ूफ़ बनाया जाता था उनकी दैविक आस्था का अवैध लाभ लेते हुए।  मिसाल के तौर पर :- चर्च में बैठे पादरी समूह  आम जनता  को मुफ्त में चर्च के लिए श्रमिक और कारीगरी योगदान देने के धार्मिक तर्क देते थे।  

चर्च के पादरी कोई स्थाई और पूर्व घोषित नियामवली का पालन खुद तो करते नहीं थे, मगर दूसरों को किसी न किसी "ग़लती" का अपराधी बता कर उनके ऊपर धार्मिक पंचायत (inquisition ) बैठा कर उन्हें बेहद अमानवीय दंड देते थे।  आम आदमी को किसी भी साधारण तर्करेखा से यह बूझ सकना असंभव था कि  कब , किस कर्म को, किस हालत में आपराधिक होने की सम्भावना है !! ऐसे में आम आदमी सदैव एक चिंता से बंधा रहता था कि  पता नहीं उससे कब ,कहाँ , कुछ आपराधिक कर्म हो जाये ! तो अपराध बोध से डरा हुआ, दबा ,और चिंतित व्यक्ति कभी भी स्वछन्द जीवन नहीं जी सकता था।  मगर चर्च के पुजारी लोगो के परिवार और मित्र समूह स्वछन्द जीवन तो जीते ही थे, अगर कुछ वास्तव में कुछ आपरधिक हो जाये तब आसानी से धार्मिक पंचायत में मिली-भगति- करके बच भी निकलते थे !!!


चर्च के पादरियों की न्याय व्यवस्था में कुछ भी स्थाई मानदंड नहीं थे, तथा गुनाह पूर्व घोषित नहीं थे , न ही न्याय करने की प्रक्रिया ।  इंसान को अनुशासन के नाम पर डरा करके आपराधिक बोध से दबा कर रखा जाता था , आजीवन।  


चर्च के पादरियों का आचरण भारत की ब्राह्मणी व्यवस्था के सामान  समझा जा सकता है।  


चर्च की प्रभुसत्ता के विरोध में जन आंदोलन उठा , जो की कारीगर वर्ग ने आरम्भ किया।  इन्होने अपने खुद के संस्करण का चर्च स्थापित किया।  यह आंदोलन तत्कालीन जर्मनी से आरम्भ हुआ था।  यह लोग protestant  कहलाये।  इन्होनें अपनी सोच और विचारधारा के अनुसार जो चर्च बसाया उसका केंद्र(head quarter ) था  church  of  england . और ये चर्च  रोम शहर के बीच में बसे vatican के चर्च के विपरीत सोच का है। 


protestant  लोगों में चर्च मात्र एक अर्चना करने का गृह है , उसके पादरी के उपदेशों का जीवन में पालन करना अनिवार्य नहीं है।  जीवन में सिर्फ बाइबिल के वचन निभाना ही आवश्यक है , और वो भी अपने खुद के मतानुसार।  इस पंथ में प्रभु युसु से इंसान सीधा सम्बन्ध रखता है , पादरियों की मध्यस्थता आवश्यक नहीं होती है।  न ही पादरियों के प्रति कोई विशेष सम्मान भाव रखना।  जबकि catholic  पंथ में pope  तो साक्षात् प्रभु युसु के धरती पर अवतार माने जाते हैं।  और उनके वचनो को भी बाइबिल के समान महत्त्व देना होता है। 


protestant  पंथियों के अनुसार कभी भी , कोई भी इंसान न तो बाइबिल में कुछ जोड़ सकता हैं, और न ही निकाल सकता है।  इसका अर्थ है की तमाम संतों का कोई विशेष स्थान नहीं बनता है।  इसलिए protestant  समूह में christmas  के त्यौहार को मौजमस्ती और झूम मस्ती से मनाया जाता हैं।  जबकि catholics  में christmas  का त्यौहार एक पवित्र दिन है , जिस दिन बहोत सलीके से , शालीनता से रहना होता है (यानि झूमना , नाचना, धूम मस्ती करना सख्त मना है ) . और संत का समाना तो परम आवश्यक है --इसलिए maggi  और saint  nicholas  की स्तुति गयी जाती है।  इसके बनस्पत , protestant  पंथी तो संतों के नाम का भी मौज-मस्ती करण  करके उन्हें santa  बुलाते हैं, और उन्हें जोकर-नुमा लिबास पहना करके santaclaus  को घर-घर बुला कर सभी में तोहफे बांटे जाते हैं।  ( यह प्रथा norway  से आरम्भ हुई थी। )


protestant  पंथी लोग अनुशासन को अनावश्यक समझते हैं।  वह दंड देने की प्रथा से अधिक श्रेष्ठ सुधार की प्रथा को मानते है।  वह सभी समूहों, धर्मों, वर्गों में समानता के पालक लोग होते है।  वो हमेशा rational  तर्क रेखा के अनुसार न्याय और नियम की रचना करते है , और कारणों को सार्वजनिक करना परम धर्म मानते हैं।  इसलिए protestant  लोग विज्ञान प्रेमी भी होते हैं।  secularism  की धार्मिक संस्कृति इसी वर्ग की देन  है।  यह लोग मानव वाद को सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते हैं।  मानवधिकारों का मूल भी इन्ही लोगो की सोच की देन है।  आज यह लोग पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका पर शासन करते हैं।  इनके देशों के शासन को protestant  होना अनिवार्य होता है।  (इंग्लॅण्ड , नॉर्वे , स्वीडन , डेनमार्क, के राजशाही घरानों को protestant  पंथी होना अनिवार्य होता है। ) 


धर्म प्रचारकों और धर्म सुधारकों के मध्य की राजनीती क्रीड़ा

 भारत की साधुबाबा industry में बतकही करने वाले ज़्यादातर साधुबाबा लोग के अभिभाषण एक हिंदू धर्म के प्रचारक(promoter) के तौर पर होते हैं, न कि हिंदू धर्म के सुधारक(reformer) के तौर पर।

अगर आप गौर करें तो सब के सब बाबा लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म की तारीफ़ , प्रशंसा के पक्ष से ही अपनी बात को प्रस्तावित करते हैं, आलोचना(-निंदा) कभी भी कोई भी नही करता है। यह प्रकृति एक प्रचारक (promoter) की होती। इन सब के व्याख्यान बारबार यही दिखाते है, सिद्ध करने की ओर प्रयत्नशील रहते हैं कि "हम सही थे, हमने जो किया वह सही ही था, हमने कुछ ग़लत नही किया"।

मगर एक सुधारक की लय दूसरी होती है। सुधारक गलतियों को मानता है; सुधारक का व्याख्यान ग़लत को समझने में लगता है। 

दिक्कत यूँ होती है कि सुधारक को आजकल "apolgists" करके भी खदेड़ दिया जाता है। उसके विचारों को जगह नही लेने दी जाती है जनचिंतन में।

 वैसे promoter और reformer के बीच का यह "राजनैतिक खेल" आज का नही है, बल्कि सदियों से चला आ रहा है।  धार्मिक promoters हमेशा से ज़्यादा तादात में रहे हैं धार्मिक reformers के। reformatiom(सुधार) अनजाने में promoters(प्रचारकों) के business पर attack कर रहे होते हैं। इसलिये प्रचारक कभी भी उन्हें पसंद नही करते हैं। बल्कि promoters की लय यह होती है कि आलोचना करने की कोई आवश्यकता नही होती है। क्योंकि यदि आपको कुछ भी ग़लत या ख़राब लगता है, तब फ़िर आप धर्म की आलोचना करने के स्थान पप्रचारक के तौर पर अपना खुद का नया सुधारकृत पंथ आरम्भ कर सकते है ! इस प्रकार आप मौजूद स्थिति का विश्लेषण और आलोचना करने से बच जाएंगे और फिर आप अप्रिय भी नही होंगे।

आलोचना और सुधार की बात करने वाले लोग हमेशा अप्रिय होते है।  'प्रचारक' लोग इस तथ्य का लाभ कमाते हैं। वह अंत में अपने बिंदु वही से ग्रहण कर रहे होते है जो बातें (और कमियां) कि आलोचक या सुधारक बोल रहे होते हैं, बस प्रचारक लोग चतुराई से उस बात कि लय बदल देते हैं जिससे की वह अप्रिय न सुनाई पड़े। वह बात में सुधार की लय को बदल कर प्रचार की लय को रख देने में माहिर होते है। इस तरह वह बात जनप्रिय बन जाती है।

प्रचारकों और सुधारको के मध्य ये "राजनीति का खेल" जनप्रियता को प्राप्त करने के इर्दगिर्द चल रहा होता है। जबकि एक कड़वी सच्चाई यह है कि प्रचारकों की प्रवृति के चलते ही धर्म और संस्कृति में बारबार ग़लत को प्रवेश करने का मार्ग मिलता है। इसलिये क्योंकि प्रचारक कभी भी ग़लत को स्पष्ट रूप से ग़लत नही कहते हैं। ऐसा करने से जनचेतना विकसित होने में अपरिपक्व बनी रहती है कि आखिर ग़लत होता ही क्या है।  जनमानस ग़लत को समझने में क्षुद्र होने लगता है। और कहीं न कहीं हर बार कोई ग़लत किसी प्रचारक की थोड़ा से चतुराई के चलते मरोड़े हुए परोक्ष रूपरेखा से धर्म में प्रवेश कर जाता है। 

प्रचारक और सुधारक , दोनों के अपने अपने महत्व होते हैं। 

मगर दिक्कत यह है की जनचेतना पर इस बिंदु पर चर्चाएं अभी तक भरपूर नही हो सकी है। इसलिये जनता बारबार प्रचारकों के प्रिय सुनाई पड़ने वाले अभिभाषणों से मोहित होकर उनकी ओर झुकाव रखती है। सुधारकों के अप्रिय "कड़वे बोल" से दूर भागती है और फ़िर गलत को स्पष्टता से समझने में पर्याप्त बौद्ध विकसित नही कर पाती है।

पश्चिम में संसद भवनों को दो भागो में विभाजित करके रचने के पीछे में जो दार्शनिक उद्देश्य है - bi cameral system -  जिसमे एक upper house होता है, और एक lower house , उसका दर्शन प्रचारकों और सुधारकों में मध्य निरंतर चलने वाले "राजनैतिक खेल" से ही होता है।

one core property that describes the Consciousness

 Among other things about what the Consciousness is, one core property that describes the Consciousness as per the physicists , is the ability of the Universe to receive a feedback from its ownself, and then, to use that feedback to improve upon itself - in other words , to grow wiser by gaining from own experience.

भौतिकशास्त्रियों के अनुसार अंतर्ज्ञान का एक गुण यह होता है कि व्यक्ति अथवा पदार्थ अपने स्वयं के दर्शन एक बाह्य दृष्टिकोण से करने की क्षमता विकसित कर लेता है और फ़िर इस प्रकार बुद्धिमान बनने लगता है। अपने स्वयं के प्रति प्राप्त ज्ञान से आत्म-सुधार करता है और सुन्दरता, निर्मलता, व्यवस्था और पवित्रता को प्राप्त करने लगता है।

the most tangible difference between Communism and a genuine gold-standard Democracy

 Another thing -- the most tangible difference between Communism and a genuine gold-standard Democracy is that -

the Communist(/socialist) are resistive to the holding of Private Properties and the Rights.

noam chomsky के विचार एक anarchist के विषय पर

 महान विचारक noam chomsky एक anarchist के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि anarchist वो होते हैं जो कि राज्य को उसकी हदों में रहने पर बाध्य बनाये रहते हैं जिससे कि राज्य व्यक्ति से बड़ा न हो जाये । anarchist का अर्थ उपद्रवी नही होता है, क्योंकि उपद्रवी तो insurgent कहलाता है। anarchist का अर्थ होता है वो जो की सदैव राज्य नीति का विरोधी और आलोचक होता है। कोई भी नीत perfect कभी भी नहीं बनाई जा सकती है, सिर्फ एक best नीत ही बनाई जा सकती है -समय और हालात के माकूल। तो इसका अर्थ हुआ कि नीति कभी भी परिपक्व नही होती है, उसे निरंतर बदलते रहना आवश्यक क्रिया है dynamic equilibrium क़ायम रखने के लिए।

तो ऐसे में anarchists ही वो व्यक्ति होते हैं जिनके विचार सरकारों को बाध्य बनाते है कि वह निरंतर बदलते equilibrium की टोह लेती रहे और नीति में समय-आवश्यक परिवर्तन करती रहे।
Chomsky स्वयं को एक anarchist के रूप में ही पहचान करते हैं और वर्तमान में विश्व के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवी हैं - राजनैतिकविज्ञान -अर्थनीति-समाजशास्त्र विषयों पर ।

#भारत की मनोरोगी प्रथाएं और संस्कृति

 भक्त गण sadistic pleasure लेने वाले psychopath हैं। 

इंदौर में पुलिस द्वारा हिरासत में लिए comedian मुन्नवर फ़ारूक़ी को आरोप के कोई भी सबूत नहीं होने के बावज़ूद कैद करके जेल में रखे जाने की घटना से भक्तगण उसके संग हुए अन्याय के प्रति रुष्ट नहीं है, बल्कि आनंद निकाल रहे हैं कि comedian ने कैसे #CAA कानून  के प्रति अपना विरोध दिखाया था।

मनोचिकित्सा विज्ञान में इसे sadistic pleasure लेना माना गया है, जब एक इंसान कि संवेदनशीलता किसी अन्य के संग हुए अन्याय के प्रति नही हो कर, किसी अन्य कारण से अन्याय के पलों में आनंद लेने की हो जाती है। यह एक मनोरोगी होने के लक्षण होते हैं।

कल्पना करिये की जिस प्रकार एक अन्यायी कानून से आज हम सबके सामने मुसलमानों को जबर्दस्ती उनके कागज़ दिखाने के लिए मज़बूर किया जा रहा है, और फ़िर असम्बद्ध आरोप लगा कर प्रताड़ित करके sadistic pleasure ले रहे हैं, 

तब फ़िर अतीत में दलितों और पिछड़ों को कैसे असम्बद्ध कारणों से कुँए से पानी लेने, स्कूलों में विद्यालयों में प्रवेश पर पाबंदी, इत्यादि करके अन्याय के प्रति संवेदनशीलता नही रख कर उल्टे sadistic pleasure लिए गये होंगे !

#भारत की मनोरोगी प्रथाएं और संस्कृति

भोजपुरी समाज में anti-intellectualism

भोजपुरी समाज में अक्सर करके एक anti learning आचरण दिखाई पड़ता है। लोगों में दूसरे के विचारों को सुनने , समझने और सोचने की बौद्धिक क्षमता क्षीर्ण होती है। और वो इस कमी से विचलित होने की बजाये इस पर गर्व करते हैं। 


यह बौड़मता संस्कृति से प्रसारित होती आ रही है। 


लोगों के चिंतन में एक शोर noise कहीं से बचपन से ही प्रवेश कर जाती है। तमाम किस्म के दरिद्रता से निकले complex उनके दिमाग में भरे हुए रहते हैं और वह उनके दिमाग में एक शोर मचा रहे होते हैं। नतीज़ों में व्यक्ति अपनी युवा अवस्था से ही learning resistive आचरण भर लेता है।

'शक्तिशाली होने में' और 'प्रभावशाली होने में' अंतर होता है

 'शक्तिशाली होने में' और 'प्रभावशाली होने में' अंतर होता है। गांधी एक प्रभावशाली व्यक्ति थे, शक्ति तो उनके पास कोई थी ही नहीं। देखा जाये तो वह किसी भी औपचारिक पद पर नहीं थे ! मगर तब भी, ब्रिटिश उनसे ही वार्तालाप करते थे, क्योंकि जनता के दिलों पर गांधी का ही राज था।

शक्ति आखिर में क्या होती है?

तमाम तरह की परिभाषाओं में एक बिंदु यह भी है कि प्रभावशाली होना ही तो वास्तविक शक्ति होती है। वो जो दिलो पर राज करें, वो जिनकी बातों को जनता सुनने को तैयार हो, बिना किसी ज़ोर ज़बरदस्ती , भय या दबाव के - वही जनप्रिय व्यक्ति ही वास्तविक शक्तिशाली होता है। वर्ना, शक्ति यानी Power तो सरकारी ओहदों पर बैठे हुए व्यक्तियों के पास भी होती है - प्रशासनिक शक्ति, जिसमे राज्य की तमाम सैनिकिय शक्ति कानून के व्यूह से बंधी हुई आदेशों का पालन करने हेतु बाध्य होती हैं। मगर ऐसी प्रशासनिक शक्ति के प्रयोग से कोई भी दीर्घ प्रभावी उद्देश्य प्राप्त नही किया जा सकता है। न ही इस शक्ति के प्रयोग से सत्य निष्ठा से इंसानो को बदला जा सकता है।
तो प्रशासनिक शक्ति (Administrative Power) होती तो तुरंत प्रभावी है, और आसानी से हस्तांतरित करि जा सकती है। इससे तुरत उद्देश्य प्राप्त किये जा सकते है, ,मगर जनता के भीतर बदलाव नही किये जा सकते है। समाज में बदलाव के लिए influential power (प्रभावशाली व्यक्तिव की शक्ति) ही चाहिए होती है। वो जो कि गांधी के चरित्र में थी, या आज अमिताभ बच्चन में दिखाई पड़ती है।
तो प्रभावशाली होना एक प्रकार से शक्तिशाली होने जैसा ही है, मगर जिसमे कोई औपचारिक ओहदा नही मिलता है। प्रभावशाली व्यक्तिव की शक्ति को कभी भी हस्तांतरण करके प्राप्त नही किया जा सकता है। इसे तो हर व्यक्ति को कमाना पड़ता है, अपने खुद के कर्मों , विचारों और व्यक्तिव से, दशकों की मेहनत करके। एक साख़ (reputation) बना कर के, जिसके निर्माण में दशकों की सिंचाई की मेहनत लगती है।
गांधी को जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता है कि भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिये गांधी ने कुछ कार्यवाही नही करि थी। गाँधी शक्तिशाली नही थे, बल्कि प्रभावशाली थे। और उनके प्रभाव की शक्ति जिन कर्मो और विचारों से निर्मित हुई थी, भगत सिंह उन विचारो के विपरीत थे, हालांकि गंतव्य गांधी और भगत सिंह - दोनों का ही एक था।
गाँधी की शक्ति उनके प्रभाव शाली व्यक्तिव की थी।

बच्चों में प्रोत्साहन ऊर्जा क्यों क्षीर्ण हो जाती है

XYZ Singh एक निहायत ही talent less, skill less "बेरोज़गार" किस्म का युवक है, जो कि इधर-उधर यार दोस्तों में घूम-घूम कर अपने आप को कामगार साबित करने की मिथ्या रचते हुए अपना समय जाया करता रहता है। XYZ Singh का world view भी विकृत है, वो short cuts से  तुरन्त और सस्ते अवगुणी तरीकों से achievement प्राप्त करना चाहता है अपने जीवन में। achievement जैसे कोई  स्थान, पद, व्यापरिक कामयाबी, धन सम्पति, इत्यादि।

सवाल है कि XYZ Singh ऐसा बना ही कैसे?  उसमें यह सब ऐब आये कहां है? आखिर जन्म से तो कोई भी ऐसा नही होता है, फ़िर XYZ Singh ऐसा कैसे हुआ?

इसके राज XYZ Singh के मातापिता के जीवन-निर्णयों में छिपे हुए हैं। कौन थे XYZ Singh के मातापिता और कैसा व्यक्तिव था उनका, शायद यह जान कर हमें पता चल सके कि XYZ Singh के लालनपोषण में क्या कमियां रेह गयी कि XYZ Singh एक निट्ठल्ला , झूठा, टालू, बहानेबाज, स्वाभिमान से ख़ाली व्यक्ति बना युवावस्था में।

निर्णय ले सकने की काबलियत की दृष्टि से संसार में दो किस्म के लोग होते है - वो जो अपने खुद के चिंतन से निर्णय ले सकने के काबिल होते है Conscious man, और वो जो की चलन से दूसरों के पीछे पीछे चलते हैं -Complaint man. XYZ Singh के मातापिता एक narcissist किस्म के व्यक्ति थे। ऐसे व्यक्ति जिनका अपने सगे भाई बहनों के संग खूब झगड़ा रहता है। narcissist व्यक्ति एक मातापिता या एक बंधु के तौर पर कैसा आचरण रखते हैं, यह दिलचस्प होगा जानना, अगर हमें XYZ Singh के आचरण के मूल कारणों को समझना है तो। Narcissist व्यक्ति परायों और दुनिया से तो खूब खुशामद करके बात करते हैं, एकदम तलवे चाटते हुए, मगर अपने खुद के सगे संबंधियों को भौंक-भौंक कर खदेड़ देते हैं। इसलिये narcissist एक चलन-निर्णय(-Complaint )  वाला व्यक्ति होता है। 

narcissist अपने सगे लोगों पर ही आक्रामक हो कर हमला करते हैं, यातना देते है, जहरीले शब्द बोलते हैं, बेइज़्ज़त करते रहते हैं। 

यहाँ से आरम्भ होती है एक narcissist व्यक्ति की स्वाभिमान से ख़ाली जीवन लीला। narcissist व्यक्ति में self respect क्षीर्ण पड़ने लगता है, और self respect का रिक्त एक arrogant, घमण्ड भरे आचरण से भर जाता है, "शोशेबाजी, बड़बोली, दिखावा," इत्यादि ऐब से।

Self respect ही self confidence की कमी भी देता है, और अक्सर करके हम narcissist व्यक्तियों में self confidence की कमी भी दिखाई पड़ती है, जो की self respect के संग चलने वाली कमी होती है।

मगर यह self respect क्यों कम होता है, narcissist पालन पोषण के दौरान? क्योंकि self confidence कमज़ोर होता है। narcissist व्यक्ति अपनों से प्रताड़ना झेलते ( /देते रहने) की वजहों से सहयोग करने में कमज़ोर हो जाते हैं। फ़िर धीरे धीरे उनमे प्रोत्साहन ऊर्जा भी कमज़ोर हो जाता है।  वह कोई भी कार्य स्वेच्छा से, आनंद से , स्व-ऊर्जा से नही कर रहे होते हैं, बल्कि ईर्ष्या उसकी ऊर्जा को कमज़ोर करती रहती है। उनको दुर्र-प्रोत्साहित करती रहती है। ईर्ष्या उन्हें अक्सर दूसरे अन्य "ईर्ष्यावश" विचारों में भी घेर कर झोंक देती है। वह भटक जाते हैं, और तब वह सीखने में, पठन में, या अनवरत अभ्यास करने में भी भटक जाने लगते हैं और धीरे धीरे talent less , skill less हो जाते हैं। 

मगर कुछ एक narcissist, उल्टे, ईर्ष्या को अपनी ऊर्जा बना लेते हैं, वह तो जीवन में कुछ कामयाबी प्राप्त कर लेते हैं। हालांकि यह कामयाबी कुछ हद तक की ही होती है।

 कई सारे narcissist अपने भीतर की ईर्ष्या से ग्रस्त मन भटकने की वजह से ध्यान भंग हो जाते हैं। वो कोई भी कार्य दीर्घकालीन और अनवरत अभ्यास से पूर्ण नही कर पाते है। कार्य जैसे की अध्ययन , पठन,  अभ्यास, चिंतन, मंथन , इत्यादि। XYZ Singh के संग भी यही सब कुछ घटा था। उसके मातापिता ने नकारात्मक ऊर्जा से उसका पोषण कर दिया था।

छोटे बच्चों को जादू सीखाना

 छोटे बच्चों को जादू सीखाना बहोत बड़ी कला होती है।

असल में मासूम बच्चों को जादू सीखाने में वास्तविक बात जो कि उनको सिखाए जाने के लिए कठिन होती है, वह होती है दूसरे को मंत्रमुग्ध करते हुए अपनी tricks को पूरा कर गुज़रना, बिना पकड़ में आये। मगर अक्सर करके सीखाने वाले जो ग़लती करते हैं, वह यह कि वो tricks की पोलपट्टी उजागर करने में ज़्यादा ज़ोर दे देते हैं, जिससे कि बच्चे दूसरे को विस्मयी बनाने की कला को पकड़ ही नही पाते हैं।

वास्तविक कला जो कि सिखाई जानी होती है, वह है presentation यानी दूसरे को मंत्रमुग्ध करते हुए अपनी tricks को पूरा करने की कला।

देखा जाये तो आज की दुनिया भी "जादू की कला" पर ही चलती है - दूसरे को बुद्धू बनाने की कला , दूसरे को उल्लू/बेवकूफ़ बनाने की कला। और हम लोग ग़लती यह कर देते हैं की अपमे बच्चों को "जादू करना" सीखने की बजाये "जादू की पोलपट्टी पकड़ना" सीखने पर बल दे देते हैं। यह ग़लती है। बच्चे दुनिया को चलाने वाली शक्ति के संग नही हो कर उसके विपरीत चलने लगते हैं।
बच्चों की मासूमियत अक्सर करके रास्ते का रोहड़ा होती है, उनको जादू करना सीखने में। मगर ज़्यादा बड़ा रोहड़ा तो सीखाने वाले की बुद्धि का भी होता है कि वह tricks की पोलपट्टी सीखने में ज़्यादा दम लगा देता है, बजाये की कैसे tricks को कामयाबी से कर गुज़रे।
जो बालक presentation की कला में प्रवीण बनते हैं, चेतना अक्सर उन्हीं में आती है, और वही आज की व्यापारिक दुनिया में क़ामयाबी की ओर अग्रसर हो पाते हैं।

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