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नैतिकता तथा व्यापार और चोरी, डकैती, लूटपाट में अन्तर

बौद्ध की बात यह है कि डकैती, लूटपाट, चोरी के जैसे दुत्कर्मों और व्यापार के मध्य में कोई भी अन्य अन्तर नहीं होता है सिवाय नैतिकता और आदर्शों के पालन के।

अगर नैतिकता को मध्य से हटा दिया जाये, तब फ़िर आसानी से whitewash करके किसी भी डकैती वाले दुत्कर्म को मेहनत वाला, लगन से किये जाने वाला व्यापार दिखाया जा सकता है।

भई, गब्बर सिंह जी अपने गाँव के लोगों को बाकी डाकुओं के क़हर से सुरक्षा देते थे, और उसके बदले अगर थोड़ा से अनाज ले लिए तो क्या ग़लत किया उन्होंने?
और फ़िर कितने ही लोगों को रोज़गार भी तो दिया हुआ था, अपने दल में सदस्यता दे कर। 
उनके काम में जोखिम कितना था, आप सच्चे दिल से सोचिये । बहादुरी किसे कहते हैं, यह गब्बर सिंह जी के भीतर अच्छे से कूट कूट कर भरी थी।

और अगर उसके बदले थोड़ी सी पी ली, मौज़ मस्ती कर ली, बसंती को नचवा लिया, तब इसमें क्या ग़लत किया ? मेहबूबा ओ मेहबूबा तो काम के समय की मीटिंग में होना कोई ग़लत नही है। शहर की डीएम साहिब लोगों की मीटिंग अपने क्या श्रीदेवी के गाने पर डांस करते नही देखा है?

मसलन, नैतिकता और आदर्शों को यदि त्याग कर ही दिया जाये तब फ़िर व्यापार और डकैती में बाकी कोई भी फर्क नही होता है।

एक रत्ती भी नहीं।





The थू थू model of decision-making within the Sanghi House

ये तो असल मे भाजपा और संघी व्यवस्था की "खुराक" (भोजन) है।

संघी व्यवस्था असल मे थू-थू किया जाने से ही चलती आयी है।  
 *The थू थू model of functioning within the Sanghi House* 

1) सबसे पहले तो कुछ भी औनापौना कर्म कर देते हैं। 

2) फ़िर लोगो की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते है। 

3) यदि ज्यादा थू थू हो जाती है, तब चुपके से उसमे बदलाव, सुधार या  कि पूरा से वापस (roll back) कर लेते हैं। 

लोग थूक कर चाटने को बेइज़्ज़ती का काम मानते हैं। संघियो ने बाकायदा इसे funcrioning technik बनाया हुआ है।

करोना vaccine के तीन दान मोदी जी ने बाकायदा announce किये थे।
वो तो जब केजरीवाल ने protocol तोड़ कर public में थू थू कर दी, तब चुपके से बदलाव कर दिया और अब free vaccine देने लगे हैं

साथ मे ads दे दे कर वाहवाही लूटने में जुगत लगा रखी है

यूपी के नेताओं की working theory

पता नहीं क्या चक्कर है,

मगर यूपी का हर नेता और नेता बनने की महत्वकांशा रखने वाले आदमी, उसमे एक stereotype हरकत देखी जा सकती है, कि-

Twitter और Facebook पर कुछ eloquent expressions वाली post करते रहते हैं,  कुछ limited सी vocabulary में, repetititve हो कर, जैसे मानो जैसे कोई good expression सम्बधित किसी intellectual impairment बीमारी से पीड़ित है।

Post एकदम संक्षिप्त सी होती है, कुछ भी नवीन नही होता - दर्शन, भावना , वर्णन - कुछ भी। और फ़िर ये पोस्ट शब्दकोश की कंगाली झलकाती से दिखाई पड़ने लगती हैं

बौद्धिक साहस (Intellectual Courage) से निर्धन ये नेता , कुछ भी ज्वलंत , उत्तेजनापूर्ण , अथवा विवादास्पद लिखने से डरते है। इनकी नेतागिरी करने की एक सोच और परिपाटी होती है, एक।working theory, जिसके अनुसार विवादास्पद कथनों और विचारो से बच कर निकल जाने से ही नेतागिरी चमकायी जा सकती है।

Consciousness और Knowledge के आपसी रूपांतरण के प्रति विचार

Consciousness को हम knowledge में transform कर सकते हैं, किसी नये शब्द का अविष्कार करके, जिसके अर्थ में बोध सलंग्न हो।

Consciousness can be transformed into a Knowledge by creation of a new Word which may carry within its meaning the Conscious about something.


This technique is useful. Because otherwise transfer of Consciousness from one person to another is a difficult task. However Knowledge is transferable easier.

खेल के विषय में भारतवासियों के रुख का एक संक्षिप्त इतिहास

खेलों के प्रति भारत वासियों के आचरण का सांस्कृतिक इतिहास बड़ा विचित्र रहा है।

भारत में भी कई सारे खेलों का आरम्भ हुआ है, मगर इनमें से शायद ही कोई अंतराष्ट्रीय स्पर्धा में शामिल किया गया है। चौसर से आधुनिक लूडो को प्रेरणा मिली जो छोटे बच्चों में प्रिय है, मगर ये अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा में नही होता है। शतरंज काफी समय तक भारतवासियों में प्रिय रहा है, हालांकि ये खेल फ़ारसी मूल का है।
एक खेल जो कि अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में कुछ वर्षो तक पहुंचा, वो था कबड्डी। मगर अधिक प्रिय नही हो सकने पर वो आजकल शामिल नहीं होता है।

बरहाल, बात है समाज के रुख की ।
भारत में खेलो को अधिक सम्मान से नही देखा गया है। चौसर के खेल से स्त्री के अपमान का किस्सा जुड़ा है (द्रौपदी चीरहरण, और राजपाठ को खो बैठने की कहानी) , और इसलिये ये खेल लोगों में हीन भावना से देखा गया। शतरंज से लत लग जाने का सामाजिक दोष जुड़ा हुआ है। 
हालांकि खेल का चलन भारतीय समाज में था, मगर ये सब असम्मानित कर्म के तौर पर देखे गये हैं। कहीं कहीं कुछ खेल केवल राजा महाराजों की शोभा माने गये, और प्रजा में आम आदमी खुद ही एक दूसरे का तिरस्कार तथा हतोत्साहित कर देते थे खेल खेलने पर - "क्या खुद को कही का राजा महाराज समझते हो क्या ?"

तो वर्तमान काल के बदलाव के पूर्व में भारतवासियों का असल आचरण खेलो के प्रति हीन रुख वाला हुआ करता था। खेल खेलने वाले बच्चे को सम्मान के संग नही देखा जाता था। खेलने वाले व्यक्ति के लिए आर्थिक भविष्य ज़्यादा कुछ नहीं हुआ करता था।  खिलाड़ियों का अक्सर कंगाली के हालातों में जीवन गुज़ार देना आम बात हुआ करती थी। कई सारी अतीत की घटनाएं हैं जिसमे खिलाड़ियों ने अपने मेडल बेच कर जीवन गुज़ारा हुआ है।

आजकल इस रुख में बदलाव कैसे आया है, ये भी एक विचित्र और दिलचस्प कहानी से सोचने समझने के लिए।
ये बदलाव वास्तव में फिर "हीन भावना" के मार्ग से ही आया है, जब आजकल टीवी जैसे यंत्र घर घर पहुंच चुके हैं, और फिर उस पर भी , सीधा प्रसारण कर सकने वाली तकनीक विकसित हो गयी है। 
टीवी के आने से धीरे धीरे खेलों को भारत के लोगों में राष्ट्रवाद से जोड़ा जाने लगा है। भारतीयों में राष्ट्रवाद भी असल में "हीन भावना" वाले मार्ग से ही आया है। 
लोग जब एक दूसरे का अपमान करने लगे कि भाई "भारत में तो भारत की फिक्र करने वाला कोई है ही नहीं ", तब लोग भीतर ही भीतर आत्म-निरक्षण और आत्म-सुधार करने लगे। इससे लोगों में राष्ट्रवाद प्रसारित होना आरम्भ हुआ। 
टीवी के आगमन के साथ खेलों में मेडल जीतने पर राष्ट्रवाद प्रदर्शित करने का चलन निकलने से खेलों को सम्मान मिलना आरम्भ हुआ है। उसमे भी , हालांकि कई सारे खिलाड़ियों ने यही टीवी के माध्यम से अपना दुखी जीवन व्यक्त किया और समाज का अपमान किया, (या कहे तो , समाज से समाज की शिकायत करि) कि कैसे उनको उचित सम्मान - आर्थिक प्रोत्साहन- नही दिया समाज और सरकार ने, खेल के क्षेत्र में उचित उपलब्धि होने पर भी। तब जा कर लोगों ने, तथा सरकार ने आत्म-निरीक्षण किया और आत्मसुधार किया।

भारत के लोग केवल थू थू किये जाने से ही आत्म-निरीक्षण करते है। और तब जा कर कुछ ग़लत सांस्कृतिक आचरण में अपने आप को बदलाव करते हैं। इस प्रक्रिया को ही "हीन भावना" मार्ग पुकार सकते है।

और शायद फिर अपमान किये जाने से उतपन्न  प्रतिरुख में लोग यकायक अत्यधिक "गर्व करण" करने लग जाते है उसी विषय के प्रति। ये "अत्यधिक गर्व" अतीत की हीन भावना की प्रतिक्रिया में से  निकला हुआ होता है, और इस एहसास के चलते वास्तव में अशोभनीय हो जाता है, जब विशाल आबादी में यकायक दिखाई प्रकट हो जाता है, जबकि तमाम अन्य मुद्दों पर विलुप्त रहता है। ऐसा होने से ये पता लग जाता है कि यकायक राष्ट्रवादी गर्व वास्तव में एक प्रतिक्रिया है, अतीत काल की किसी हीन भावना का।

आजकल ऐसा ही "अशोभनीय गर्व" olympic खेलों के दौरान खिलाड़ियों के मेडल जीत जाने के उपरान्त लोगों की सोशल मीडिया की पोस्ट में दिखाई पड़ रहा है। - अत्यधिक गर्व मयि राष्ट्रवाद।

ये गर्व मयि reaction है, और इसका जन्मभूमि वास्तव में अतीत में व्याप्त अत्यधिक हीन भावना रही है - severe inferiority complex।

अतीत काल में तो खिलाड़ियों के हालात इतने खराब हुआ करते थे , सामाजिक सम्मान इतना निम्म की उनके रोने धोने और तमाम शिकायत, समाज से ही समाज की थूथू करि गयी,  तब जब कर ये किया गया कि खिलड़ियों को कुछ नौकरियों में थोड़ा से quota (आरक्षण) दिया जाने लगा था। इसी श्रृंख्ला में सचिन तेंदुलकर ने भी नौकरी करि है, और हरभजन सिंह ने भी पंजाब पुलिस में नौकरी करि है। आरम्भ में ये quota सिपाही, जवान जैसे पदों तक सीमति था। बाद में कुछ बड़े खिलाड़ियों के आने पर पद तक की पहुँच को भी बढ़ाया गया। आज dcp तक के पद और पुलिस में सेवा देना आसान हो चुका है।

ये सब वास्तव में इतनी सहजता से नही प्राप्त हुआ है। इसमे बहोत कुर्बानियां गयी है, और "हीन भावना" मार्ग से होते हुए प्रतिक्रियात्मक "गर्व मयि करण" तक की सामाजिक बदलाव की यात्रा हुई है। 

A Commentary on Punishing of a Govt official

किसी को दंड देना भी एक कला होती है। दंड देना आवश्यक होता है, नहीं तो इंसान उद्दंता करता ही चला जाता है। रोके टोके बिना उसको feedback नहीं मिलता कि उसके कर्म में कुछ ग़लत हो रहा है, और वो ग़लत क्या है।

अब, सवाल है कि उचित दंड क्या है, और कैसे दें?

 यदि सरकारी अफ़सर आपकी बात नहीं मान रहा हो, या कि आपके साथ न्याय पूर्वक पेश नहीं आया हो, तब उसे दंड कैसे दें? यह पेंचीन्द मगर महत्वपूर्ण सवाल है। यदि सरकारी अफ़सर न्यायपूर्वक अपने आप को प्रस्तुत नहीं करते हैं, तो अब क्या किया जाये? 


सरकारी अफ़सर को दीर्घकालीन क्षति करना मुश्किल होता है। उसको केवल नौकरी चले जाने का भय ही एकमात्र तरीका होता है मर्यादा बद्ध (self restraining) करने का। मगर ये काम करना किसी सरकारी अफसर के संग में आसान नहीं होता है। उसकी नौकरी केवल अनुशासन टूटने पर ही जाती है। अनुशासन कैसे टूटता है, कब, यह जान सकना आम आदमी के लिए मुश्किल होता है। सरकारी आदमी के अनुशासन टूटने का खुलासा केवल उसके सहयोगी सरकारी आदमी ही बता सकते हैं। 

collegiate से ही तय होता है कि किसी सरकारी आदमी से ग़लती हुई है या नहीं। इसलिये बाहरी आदमी को अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि उसकी शिकायत पर किसी सरकारी आदमी को दंड मिलेगा या नहीं । सभी सरकारी आदमी अक्सर एक दूसरे का बचाव करते ही करते हैं।

तो फिर अब सरकारी आदमी को आखिर दंड कैसे दिया जाये? 
सरकारी आदमी के पास अपने बचाव के लिए न्यायसंहिता में प्रचुर संसाधन उपलब्ध होता है। रोमन भाषा की एक न्यायसूक्ति इस सभी बातों को संक्षित करके कहती है कि king can do no wrong। तो प्रत्येक सरकारी आदमी अपनी ग़लत हरकत को सरकारी कार्य के पालन के दौरान उत्पन्न व्यावहारिक घर्षण करके दिखाता है। यानी, यदि उससे कुछ ग़लत हुआ है तब वो सरकार यानी king का भी ग़लत माना जाना चाहिए। इसे सरकारी कार्य या सेवा की ग़लत करके बख्श दिया जाता है। 

दण्ड देने का मार्ग केवल ऊपर से ही खुलता है। किसी उच्च पद अधिकारी के आदेशों का पालन नहीं करने से उतपन्न अवज्ञा , या फिर अनुपस्थिति - निरंतर और दीर्घकालीन - यहीं से कोई सरकारी आदमी अनुशासनात्मक कार्यवाही के घेरे में लिया जा सकता है अपने वरिष्ठ के द्वारा। 

तो सरकारी आदमी को काबू करने का शायद यही एक रास्ता होता है, जो कि जाहिर तौर पर आम आदमी के पास में उपलब्ध नहीं होता है।


Knowledge अलग चीज़ होती है, और Consciousness अलग

Knowledge अलग चीज़ होती है, और Consciousness अलग। 

क्या क्या अन्तर पकड़ सकते हैं , इन दोनों में, आप? 

Knowledge और Consciousness को किसी number line की तरह से समझें। knowledge कोई number मात्र है, जबकि consciousness पूरी की पूरी number रेखा है। यानी knowledge को ईंट ईंट करके जोड़ कर के consciousness बनती है।

 Knowledge किसी एक दिशा में रखा हुआ एक नम्बर है। यानी, जब आप मात्र किसी एक ही number को देख रहे होते हैं, तब आप को सिर्फ knowledge मिल रही होती है। मगर जब आप दोनों विपरीत दिशाओं के अंकों को देखने लगते हैं, तब आपको पूरी number line दिखाई पड़ने लगती है, यानी अब आपमें consciousness आने लगती है।

 नम्बरों के विशेष पहचान वाले वर्ग से आप कोई group बना सकते है, जैसे कि odd numbers , prime numbers, integers। ये ऐसे हुआ कि आप छोटे छोटे knowledge को संग रख कर आप कोई theory बना लेते हैं। मगर theory भी अभी आपको सम्पूर्ण परिचय नही करवाती है विषय से। ऐसा परिचय की आप उस विषय पर एक सिद्ध नियंत्रण करना सीख जाएं, ऐसे जैसे आप ही उसके master हो। 

 तो theory भी अभी थोड़ा अधूरी होती है। theory मात्र आपके देखने के चक्षु को विस्तृत करती है - सूक्ष्म और विराट दोनों तरह से देख सकने में आपकी सहायता करती है। 

 मगर इसके आगे भी काम बाकी रह जाता है, consciousness तक पहुँचने के लिए। क्या? कि , अभी इस तरह की बहोत सारी theories को समझना पड़ता होता है। consciousness इसके बाद में मिलती है। 

Consciousness ही ब्रह्म है। consciousness ही इंसान में भगवान का अंश होती है।

संतुलन - एक बौद्ध विचार

मुझे लगता है कि दलित-हिन्दू(सवर्ण) द्वन्द, शिया सुन्नी झगड़ा, और रोमन catholic - protestant  जैसे द्वन्द का ईलाज़ "संतुलन" में है। हर एक के साथ कहीं कुछ न्याय और कुछ अन्याय हो रहा होता है। यानी हर व्यक्ति कहीं अन्याय झेलता है, तो कहीं न कहीं अन्याय करता भी है। हमें इस विस्तृत प्रक्रिया में छिपे संतुलन को समझना चाहिए। संतुलन अपने आप में भी एक न्याय है - distributive justice ।

जब भी हम(इंसान लोग) सिर्फ़ अपने ऊपर हुए अन्याय को सोचने लगते हैं, और अपने हाथों हुए अन्याय को देखना बन्द कर देते हैं, तब हम संतुलन को बिगाड़ देने के प्रयास करने लगते हैं। और फ़िर यहाँ से दौर निकल पड़ता है जो हमें जानवर बना कर छोड़ता है।

कल news beak करके यूट्यूब चैनल पर मार्कण्डेय काटजू के बारे में एक पोस्ट देख रहा था। बताया गया है कि मार्कण्डेय काटजू के अनुसार इस देश में असल जातिवाद तो ब्राह्नणों ने झेला है। !!!!! भेदभाव तो ब्राह्मणों के संग हुआ है, काटजू के अनुसार। दुराचार ब्राह्मणों के संग किया है दलितों ने । !!

सामाजिक समूह के संग अन्याय का ईलाज़ हमेशा "न्याय कर देना" नही है। बात को अतीत में ग़ुम हो जाने देना भी शायद ईलाज़ होता है। मैं बात को भूल जाने को नहीं कहता हूँ, मगर अतीत में चले जाने को जरूर कहता हूँ। वर्ना eye for an eye वाली गड़बड़ हो जायेगी, it will make whole world blind.

संतुलन के साथ चीज़ों को , घटनाओं को कैसे दर्शन करना सीखें?
इसका ज़वाब है - आत्म-दृष्टि पर संयम। हमारा perception, यानी हमारी चीज़ों को देखने-समझने वाली दृष्टि पर हमें नियंत्रण करना सीखना  चाहिए। यह भी एक "योग" ही होगा कि चीज़ों के perception संतुलन से करना आ जाये, निरंतरता से।  

(योग केवल mat बिछा कर करे जाने वाली शारीरिक मुद्राओं को नाम नही है। बौद्ध योग भी एक किस्म का योग है। अपनी खुद को psychology को दुरुस्त करने का संयम, एक परम योग है। अपने psychopathy से मुक्ति ले सकना, ये परम योग की सिद्धि है।)


तो बात perception की है, कि चीज़ों और घटनाओं को संतुलन से देखना कैसे सिखाये अपने आप को। इसके विषय में बात यह है कि perception एक किस्म की प्रवृति होती है - और यह अध्यात्म द्वारा इंसानो और समाज में प्रसारित होती रहती है।

यानी Perception का आरंभ spirituality से होता है। (यहां पर ही मैं अक्सर ब्राह्मणों की हिन्दू समाज पर प्रभावों की शिकायत करता हूँ। ब्रह्मवाद हिन्दू समाज के spiritual perception पर लगा हुआ एक psychopathic रोग है। यह विषय विस्तार में अन्य लेखों में चर्चा किया है मैंने।)

कहने का अर्थ है की लोगों के आध्यात्मिक गुरुओं को उन्हें संतुलन से दर्शन करना सीखना प्रेरित करना होता है। बार बार उन्हें उनके असंतुलित दर्शन करने पर टोकना होता है, और संतुलित दर्शन क्या होना चाहिए, ये बताना पड़ता है।  मगर brain washing से खुद को बचाते हुए ! यानी खुद भी एक किस्म का संतुलन चाहिये होता है, दूसरे को संतुलन सिखाते समय ! चक्र के भीतर में एक और चक्र।

पाश्चात्य संगीतकार elvis preseley का योगदान आधुनिक विश्व को

पश्चिमी जगत के आधुनिक काल के सांस्कृतिक इतिहास में elvis presley का जन्म बहोत महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसे 16वी और 17वी शताब्दी में reniassance और reformation सांस्कृतिक इतिहास की महत्वपूर्व काल थे, वैसे ही 20वी शताब्दी में elvis presely का आगमन !

क्यों? ऐसा क्या योगदान दिया elvis ने ?

आज हम जब भी बाज़ार जाते हैं तब कोई न कोई music cd यूँ ही आसान दिमाग से, बिना कोई ज्यादा सोच में समय व्यर्थ करे खरीद लेते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि ये music industry का आरम्भ कैसे हुआ है।

और तो और, अब आज के युग में "सभी किस्म का" music सुनना और प्रस्तुत करना पसंद किया जाता है। मगर क्या आपको मालूम है कि पहले के युग में ऐसा नहीं हुआ करता था।  पहले भेदभाव और असमानता का युग था। समाज में भेदभाव का चलन था। पश्चमी जगत काले-गोरे के रंगभेद से बहोत अधिक ग्रस्त हुआ करता था। राजनैतिक आयाम में जहाँ गाँधी और लूथर किंग जैसे महान नायक सामाजिक अन्याय के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, वही किसी एक गायक ने अनजाने में अपने सुरों और संगीत से भेदभाव को सांस्कृतिक तौर पर समाप्त करने में भूमिका निभाई थी। इतनी सफलता के साथ, की शायद आधुनिक पीढ़ी को याद ही नही रह गया कि अतीत में तो संगीत और सुरों में तक इंसानी समाज ने भेदभाव किया हुआ है।

विश्व संस्कृति को ये दोनों ही धरोहर Elvis Presley से मिली है।

काले, अफ्रीकी मूल के लोग में कुछ गला फाड़ कर, चिल्ला कर गाने का चलन आज भी है। अफ्रीका महाद्वीप बेहद गर्म और कठोर क्षेत्र है, पानी दुर्लभ होता है, और जीवन बेहद मुश्किल। मगर उनके कबीली जीवन में संगीत फिर भी शुरू से ही था। हालांकि वो इनके विशिष्ट तरीके के था। मसलन ध्वनि के विभाग में -  गला फाड़ कर गाना, सुर- ताल के विभाग में - percussion यानी पीछे से गूँज करने वाले वाद्य यंत्रो (ढोल, drum, झुनझुना) का प्रयोग,  शब्दों के विभाग में - हल्के विचार, जो आँखों या शरीर के इंद्रियों से पकड़े जाने वाले बात को बताते है। कोई गेहरे जज़्बात नहीं।

आगे जा कर अफ्रीकी लोग जिस भी महाद्वीप में गये, अपना संगीत साथ ले गये। फ़िर उनकी संस्कृति में से jazz music और rythm and blues का जन्म हुआ। 

गोरे लोगों के समाज में ये दोनों ही कालो अफ्रीकियों का music देखा जाता था। वो इसे निम्म किस्म का संगीत मानते थे और इसे सुनाना पसंद नही करते थे। गोरों का आरोप था कि कालो का संगीत को गहरी,  दिमाग को जागृत करने वाले बात नही कह रहे होते थे। गौरे समाज का मानना था की कालों के संगीत में बस शारीरिक ज़रूरते - भोजन, कपड़ा, मकान, और sex तक ही इनकी बात सीमित होती थी। 

इसके बनस्पत गोरों का खुद का संगीत , उनके अनुसार - साफ़ सुथरा था। ईश्वरमयी, और कोई नयी जागृति को प्रस्तुत करने वाला। ईश्वर को धन्यवाद करने वाला। यंत्रो के मामले में - सटीक ध्वनि वाले यंत्र जैसे कि guitar, सीटी । गले को सजो कर गाने की शैली - मतलब , आवाज़ को बीच-बीच में ऊँचा नीचा करना , कहीं लंबा कहीं छोटा करना, एक लय को बनाये रखना, छद्म को पुनरावृति या लय को पुनरावृत्ती करना। गेहरे जज़्बातों को बयान करना। वगैरह। उनका संगीत country music कहलाता था। 

उस युग में भेदभाव न सिर्फ समाज में था-बल्कि एक मानसिकता बन कर हर क्ष्रेत्र में था। संगीत में भी । कालों का संगीत अलग, और गोरों का अलग। गोरों के अनुसार कालों का संगीत फूहड़ था,  हल्का और  छिछला।  कालों का अपने ही संगीत नायक थे -  bob marley। मगर वो गोरों को पसंद नही आते थे।

फ़िर elvis presley ने क्या योगदान दिया इन हालात में?

Elvis ने दोनों अखाड़ों को आपस में जोड़ दिया, fusion बना दिया ! और वही pop music कहलाने लगा। elvis को rock and roll एक ख़ास तौर की संगीत शैली का जनक माना जाता है। इस शैली में दोनों विशिष्ट अखाड़ों का मिलन हो जाता है। वाद्य यंत्र बीच-बीच में percussion वाले भी सुनाई पड़ते है, जो कि कालों के यंत्र समझे जाते थे। और lead में guitar भी था।

Elvis का बड़ा योगदान ये था कि उनका संगीत लोगों में इतना पसंद आने लगा कि उसे pop music करके बुलाया जाने लगा । और उसके इर्द गिर्द recording studio की नयी industry जन्म ले ली। elvis के गानों के ग्रामोफोन record हाथों हाथ बिकते थे और हर gramophone record पिछले वाले से भी अधिक संख्या में बिकता था।  इनकी विक्री लाखों से बढ़ कर करोड़ो की ओर जाने लगी। इतनी demand थी बाज़ार में । तो इतना gramophone player और record का निर्माण करने के लिए नये कारखाने भी चाहिए थे। ये सब करते करते एक पूरी music industry ही जन्म ले ली, जिसे हम आज इस नाम से जानते हैं।



ब्राह्मणवाद - महर्षि परशुराम की अर्चना के प्रचलन की कहानी


ब्राह्मणवाद के विषय में बात आगे बढ़ाते हुए, प्राचीन वैदिक मिथक कथाओं से इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताये, 

आज सोशल मीडिया के माध्यम से ब्राह्मणों का बड़ा गुट, फ़िर से, महर्षि परशुराम के नाम पर अस्त्र धारण कर के अपने अधिकारों और सम्मान/संपत्ति की रक्षा के लिए क्षत्रियों की भांति युद्ध करने और हिंसा करने को खुद को तैयार कर रहा है। 

मगर, सच ये है की अभी सं 2000 तक के आसपास तक तो समाज में बहुतायत चलन ये था कि परशुराम जी की तो पूजा ही नहीं करि जाती थी ! परशुराम जी को एक हिंसक, अशांत साधु माना जाता था, जो कि बहोत क्रोधी व्यक्तित्व वाले थे। रामायण में उनकी लक्ष्मण से तूतूमैंमैं का कांड ही जनता में प्रचलित था , वही उनकी छवि हुआ करती थी जनता के बीच में।  इसके अलावा उनका और कोई ज़्यादा महत्व नही था, ये तक भी नही की वो सनातन विचारो के अनुसार एक "अमर" व्यक्ति थे । जनता के बीच परशुराम की छवि  ऐसी थी की वो यूँ ही आजीवन भटकते रहने वाले प्राणी थे, जिन्हें कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नही मिलने वाली थी - शायद उनके हिंसक कर्मो के चलते !! उन्होंने अपनी माता का वध किया था, शीश काट कर। 

मगर, अब कलयुग चल रहा है, आजकल परशुराम की छवि को whitewash किया जाने लगा है, ख़ास तौर पर सोशल मीडिया के आ जाने के बाद से। इसके पीछे क्या मक़सद है, हम आगे वही चर्चा करेंगे।

गैर-ब्राह्मण जाति के युवाओं को अपने पिता और दादा से इस बात की तजदीक ले लेनी चाहिए - कि परशुराम जी कोई अर्चना के पात्र नही थे हिन्दू समाज में। वो बहोत हिंसक, क्रूर, क्रोधी व्यक्ति माने गये हैं, जिनसे दूरी बना कर रखना ही उचित था। 

वैदिक कथाओं के अनुसार जो सात पुरुष अमर हैं - वो अपने कर्मो के चलते ऐसे हैं - अच्छे कर्म और बुरे कर्म , दोनों। कुछ के लिए अमर होना एक सिद्धि माना गया है, और कुछ के लिए मौक्ष का इंकार। यानी भटकती आत्म।

हनुमान जी अपनी रामभक्ति के अच्छे कर्म के चलते अमर हैं। उनको रामभक्ति करके "अमरत्व" की सिद्धि प्राप्त हुई है। जबकि परशुराम और अश्वथामा अपने हिंसक कर्मों के चलते मोक्ष से वंचित हैं, और इसलिये "अमर" हैं। अश्वथामा को आजीवन भटकते रहने का श्राप था। वो "अमर" होते हुए भी श्रद्धेय नही है, अर्चना के पात्र नही है हिन्दू समाज में।

रामायण में से निकलती वास्तविक अवधारणा के अनुसार तो परशुराम की पूजा नही होती थी, हालांकि वो एक पौराणिक चरित्र अवश्य हैं, जिसके चलते उनके प्रति सम्मान अवश्य था।  शायद इसलिए की रामायण में रामचंद्र जी ने भी परशुराम जी को सम्मान दिया था। रामायण के वास्तविक जननायक रामचंद्र जी, लक्ष्मण जी, माता सीता हैं। परशुराम नहीं ! बल्कि हनुमान जी भी एक side hero ही है, मगर अपने नटखट स्वभाव के चलते आने वाली युग में जनता में सबसे प्रिय रामायण चरित्र बनते चले गये।

बरहाल,
बिहार में ये जो "भुमिहार" ब्राह्मण पाये जाते हैं, वो भी परशुराम को ही अपना प्रेरणास्रोत मानते है। भुमिहार ब्राह्मणों की वर्तमान राजनैतिक कहानी सभी को मालूम होनी चाहिए -रणवीर सेना इन्हीं की बनायी हुई थी/है - और फ़िर इन्होंने बिहार को जातिय भेदभाव, ऊंच नीच , हिंसा के हवाले झोंक दिया। हालांकि अब ये लोग हिंसा का आरोप नक्सलवादियों पर मढ़ते है, और लालू प्रसाद को बिहार की कहानी का खलनायक बताते हैं। (( नक्सलवादी तत्कालीन जनजातियां है, जो शायद सभ्यता से दूर आदिमानव लोग हुआ करते थे।  अतीत काल में उनके विरुद्ध हिंसक होना --उचित अथवा अनुचित, ये  एक अलग निबंध का विषय है। ))

"भुमिहार" के पीछे भी एक सामयिक कथा जान लेना ज़रूरी है, हिन्दू होने के नाते। कि, मूल सनातन और वैदिक मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मण तो भुमि का अधिपति कभी होता ही नही था। 
फिर "भुमिहार" का अपवाद कैसे उतपन्न हुआ हिन्दू समाज में, ये ब्राह्मणों के स्वार्थी और धूर्त बनने की कहानी है।

वास्तविक, मूल मान्यताओं में ब्राह्मण जनता में श्रद्धेय तभी हुआ करता था जब वो सब कुछ त्याग करके , भिक्षा ले कर जीवन यापन करता था। और जब वो आध्यात्मिक मार्ग दर्शक बन जाता था, सब कुछ त्याग देने के उपरान्त, तब समाज पर उत्तरदायित्व था कि समाज ऐसे ब्राह्मण महाज्ञानी मार्गदर्शक को दान दे - भुमि भी, पशु (गाय वगैरह) भी।  भुमि और पशु तत्कालीन समाज में संपत्तियों के सूचक थे। तो ब्राह्मण का "भुमिहार" हो जाना तो अवैध  विचार था। मूलतः ब्राह्मण भुमि पर भिक्षुक था, अहारी नही। 

जाहिर है, "भुमिहार ब्राह्मण" वैदिक मान्यताओं की दृष्टि से अपवाद है, मगर जो की आज के युग में प्रचलन में आ चुका है, मुख्यधारा की बात बन गया है। और इस अपवाद का प्रेरणास्रोत कौन है?  जातिय ब्राह्मण की धूर्तता से निर्मित रामायण कथा के एक चरित्र हैं -  महर्षि परशुराम। जातिय ब्राह्मणों ने ही परशुराम जी जननायक बना कर आरम्भ किया गया था - जो की वैदिक दृष्टि के मायने से समझने पर ब्राह्मणों द्वारा अपने स्वार्थी हितों की रक्षा करने की कहानी है। कोई ब्राह्मण नहीं बोलने वाला है कि - वेदों में, शास्त्रों में "भुमिहार" ब्राह्मण का जिक्र नही है। जाहिर बात है! ब्राह्मण आजकल "संस्कृति की रक्षा" तो गाते फिरेंगे, मगर अपने स्वार्थ वाली "कुसंस्कृति" के चलन को कदापि नहीं मिटायेंगे समाज में से। 

भूमिहारों के अनुसार ब्राह्मणों ने अपनी "सम्मान और सम्पति" की रक्षा करने के लिए अस्त्र धारण करना आरम्भ किया था, क्योंकि क्षत्रिय कमज़ोर हो चुके थे।  अस्त्र धारी  ब्राह्मण ही "भुमिहार" कहलाये। यानी दान में मिली भूमि को त्याग करना बन्द कर दिया - क्योंकि शायद मन में लालच आ बसा संपत्ति के प्रति !

और आजकल शायद आरक्षण विरोध करने के लिए, आरक्षणनीति से  आहत हुए  वाले  अपनेअधिकारों की रक्षा के लिए महर्षि परशुराम का अनुसरण करने की ज़रूरत लग रही है ब्राह्मणों को।

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नौकरशाही की चारित्रिक पहचान क्या होती है?

भले ही आप उन्हें सूट ,टाई और चमकते बूटों  में देख कर चंकचौध हो जाते हो, और उनकी प्रवेश परीक्षा की कठिनता के चलते आप पहले से ही उनके प्रति नत...

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