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ब्राह्मणवाद - महर्षि परशुराम की अर्चना के प्रचलन की कहानी


ब्राह्मणवाद के विषय में बात आगे बढ़ाते हुए, प्राचीन वैदिक मिथक कथाओं से इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताये, 

आज सोशल मीडिया के माध्यम से ब्राह्मणों का बड़ा गुट, फ़िर से, महर्षि परशुराम के नाम पर अस्त्र धारण कर के अपने अधिकारों और सम्मान/संपत्ति की रक्षा के लिए क्षत्रियों की भांति युद्ध करने और हिंसा करने को खुद को तैयार कर रहा है। 

मगर, सच ये है की अभी सं 2000 तक के आसपास तक तो समाज में बहुतायत चलन ये था कि परशुराम जी की तो पूजा ही नहीं करि जाती थी ! परशुराम जी को एक हिंसक, अशांत साधु माना जाता था, जो कि बहोत क्रोधी व्यक्तित्व वाले थे। रामायण में उनकी लक्ष्मण से तूतूमैंमैं का कांड ही जनता में प्रचलित था , वही उनकी छवि हुआ करती थी जनता के बीच में।  इसके अलावा उनका और कोई ज़्यादा महत्व नही था, ये तक भी नही की वो सनातन विचारो के अनुसार एक "अमर" व्यक्ति थे । जनता के बीच परशुराम की छवि  ऐसी थी की वो यूँ ही आजीवन भटकते रहने वाले प्राणी थे, जिन्हें कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नही मिलने वाली थी - शायद उनके हिंसक कर्मो के चलते !! उन्होंने अपनी माता का वध किया था, शीश काट कर। 

मगर, अब कलयुग चल रहा है, आजकल परशुराम की छवि को whitewash किया जाने लगा है, ख़ास तौर पर सोशल मीडिया के आ जाने के बाद से। इसके पीछे क्या मक़सद है, हम आगे वही चर्चा करेंगे।

गैर-ब्राह्मण जाति के युवाओं को अपने पिता और दादा से इस बात की तजदीक ले लेनी चाहिए - कि परशुराम जी कोई अर्चना के पात्र नही थे हिन्दू समाज में। वो बहोत हिंसक, क्रूर, क्रोधी व्यक्ति माने गये हैं, जिनसे दूरी बना कर रखना ही उचित था। 

वैदिक कथाओं के अनुसार जो सात पुरुष अमर हैं - वो अपने कर्मो के चलते ऐसे हैं - अच्छे कर्म और बुरे कर्म , दोनों। कुछ के लिए अमर होना एक सिद्धि माना गया है, और कुछ के लिए मौक्ष का इंकार। यानी भटकती आत्म।

हनुमान जी अपनी रामभक्ति के अच्छे कर्म के चलते अमर हैं। उनको रामभक्ति करके "अमरत्व" की सिद्धि प्राप्त हुई है। जबकि परशुराम और अश्वथामा अपने हिंसक कर्मों के चलते मोक्ष से वंचित हैं, और इसलिये "अमर" हैं। अश्वथामा को आजीवन भटकते रहने का श्राप था। वो "अमर" होते हुए भी श्रद्धेय नही है, अर्चना के पात्र नही है हिन्दू समाज में।

रामायण में से निकलती वास्तविक अवधारणा के अनुसार तो परशुराम की पूजा नही होती थी, हालांकि वो एक पौराणिक चरित्र अवश्य हैं, जिसके चलते उनके प्रति सम्मान अवश्य था।  शायद इसलिए की रामायण में रामचंद्र जी ने भी परशुराम जी को सम्मान दिया था। रामायण के वास्तविक जननायक रामचंद्र जी, लक्ष्मण जी, माता सीता हैं। परशुराम नहीं ! बल्कि हनुमान जी भी एक side hero ही है, मगर अपने नटखट स्वभाव के चलते आने वाली युग में जनता में सबसे प्रिय रामायण चरित्र बनते चले गये।

बरहाल,
बिहार में ये जो "भुमिहार" ब्राह्मण पाये जाते हैं, वो भी परशुराम को ही अपना प्रेरणास्रोत मानते है। भुमिहार ब्राह्मणों की वर्तमान राजनैतिक कहानी सभी को मालूम होनी चाहिए -रणवीर सेना इन्हीं की बनायी हुई थी/है - और फ़िर इन्होंने बिहार को जातिय भेदभाव, ऊंच नीच , हिंसा के हवाले झोंक दिया। हालांकि अब ये लोग हिंसा का आरोप नक्सलवादियों पर मढ़ते है, और लालू प्रसाद को बिहार की कहानी का खलनायक बताते हैं। (( नक्सलवादी तत्कालीन जनजातियां है, जो शायद सभ्यता से दूर आदिमानव लोग हुआ करते थे।  अतीत काल में उनके विरुद्ध हिंसक होना --उचित अथवा अनुचित, ये  एक अलग निबंध का विषय है। ))

"भुमिहार" के पीछे भी एक सामयिक कथा जान लेना ज़रूरी है, हिन्दू होने के नाते। कि, मूल सनातन और वैदिक मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मण तो भुमि का अधिपति कभी होता ही नही था। 
फिर "भुमिहार" का अपवाद कैसे उतपन्न हुआ हिन्दू समाज में, ये ब्राह्मणों के स्वार्थी और धूर्त बनने की कहानी है।

वास्तविक, मूल मान्यताओं में ब्राह्मण जनता में श्रद्धेय तभी हुआ करता था जब वो सब कुछ त्याग करके , भिक्षा ले कर जीवन यापन करता था। और जब वो आध्यात्मिक मार्ग दर्शक बन जाता था, सब कुछ त्याग देने के उपरान्त, तब समाज पर उत्तरदायित्व था कि समाज ऐसे ब्राह्मण महाज्ञानी मार्गदर्शक को दान दे - भुमि भी, पशु (गाय वगैरह) भी।  भुमि और पशु तत्कालीन समाज में संपत्तियों के सूचक थे। तो ब्राह्मण का "भुमिहार" हो जाना तो अवैध  विचार था। मूलतः ब्राह्मण भुमि पर भिक्षुक था, अहारी नही। 

जाहिर है, "भुमिहार ब्राह्मण" वैदिक मान्यताओं की दृष्टि से अपवाद है, मगर जो की आज के युग में प्रचलन में आ चुका है, मुख्यधारा की बात बन गया है। और इस अपवाद का प्रेरणास्रोत कौन है?  जातिय ब्राह्मण की धूर्तता से निर्मित रामायण कथा के एक चरित्र हैं -  महर्षि परशुराम। जातिय ब्राह्मणों ने ही परशुराम जी जननायक बना कर आरम्भ किया गया था - जो की वैदिक दृष्टि के मायने से समझने पर ब्राह्मणों द्वारा अपने स्वार्थी हितों की रक्षा करने की कहानी है। कोई ब्राह्मण नहीं बोलने वाला है कि - वेदों में, शास्त्रों में "भुमिहार" ब्राह्मण का जिक्र नही है। जाहिर बात है! ब्राह्मण आजकल "संस्कृति की रक्षा" तो गाते फिरेंगे, मगर अपने स्वार्थ वाली "कुसंस्कृति" के चलन को कदापि नहीं मिटायेंगे समाज में से। 

भूमिहारों के अनुसार ब्राह्मणों ने अपनी "सम्मान और सम्पति" की रक्षा करने के लिए अस्त्र धारण करना आरम्भ किया था, क्योंकि क्षत्रिय कमज़ोर हो चुके थे।  अस्त्र धारी  ब्राह्मण ही "भुमिहार" कहलाये। यानी दान में मिली भूमि को त्याग करना बन्द कर दिया - क्योंकि शायद मन में लालच आ बसा संपत्ति के प्रति !

और आजकल शायद आरक्षण विरोध करने के लिए, आरक्षणनीति से  आहत हुए  वाले  अपनेअधिकारों की रक्षा के लिए महर्षि परशुराम का अनुसरण करने की ज़रूरत लग रही है ब्राह्मणों को।

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