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हिन्दुओं का देश क्यों सहत्र युगों से रौंदा गया है ?

 दस सदियों से हिंदुओं को रौंदा गया और ग़ुलाम बनाया गया है। क्यों? क्या वज़ह है?


A Hindu thugs but another Hindu.

एक हिन्दू दूसरे हिन्दू से ही बेईमानी करता है, झूठ बोलता है, धोखाधड़ी करता। हिंदुओं के समाज में सामाजिक न्याय नही है। आपसी विश्वास नही है। और इसलिये इतिहास में कभी भी ,(सिवाय बौद्ध अनुयायी मौर्य वंश शासकों के) हिन्दू कभी भी शक्तिशाली राजनैतिक और सैन्य शक्ति नही बन सके। 

मोदी काल में ही जीवंत उदहारण देखिये। EWS आरक्षण  कोटा तैयार करके सवर्णो को भी आरक्षण दे दिया है। और तो और गरीबी सर्वणों की गरीबी रेखा तय करि है 8 लाख रुपये सालाना !

EVM और उससे सम्बद्ध चुनावी प्रक्रिया पर अवैध, अनैतिक कब्ज़ा जमा लिया है।

न्यायलय में दशकों से सवर्णो ने अनैतिक कब्ज़ा किया हुआ था, जिसका खुलासा अब जा कर हो पा रहा है , कि जजों की नियुक्ति में क्या जातिवाद घोटाले करते आये हैं दशकों से।

मीडिया में जातिवाद का ज़हर भरा हुआ है। जनता को झूठ और गुमराह करने वाले समाचारिक ज्ञान प्रसारित हैं, विषेशतः तब जब ,जिस मामलों में  भाजपा और संघ के आदमी की गर्दन फँसी होती है।


RTI को कुचल कर रख दिया है ।अपने से सम्बंधित विषयों के प्रति पारदर्शिता नहीं रखी है , यानि खुद के घोटाले और भ्रष्टाचार उजागर न होने पाए।  जबकि किसी और के हो, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। लालू, मुलायम मायावती को सफलतापूर्वक भ्रष्टाचारी घोषित कर चुके हैं। लालू को जेल में तक रखा है।


राजनैतिक प्रतिद्वंदियों की जिस जिस विषयों पर आलोचना करि, खुद उससे भी बदत्तर प्रदर्शन किया है । और अपने प्रदर्शन के सत्य मापन से बचने के लिए  जनता को गुमराह करने के हथकंडे लगाये। कभी बॉलीवुड के सितारो का प्रयोग करके। कभी तो सामाजिक चिंतन को अर्थहीन विषयों में झोँक  कर -- अर्थहीन सावरकर-नेहरू-गाँधी बहस में उलझा करके। झूठे, मिथक काल्पनिक, अप्रमाणित "पुनर्लेखन" कर-करके।

समाज में देशभक्ति की लहर बजवाई,मगर गीत निजीकरण का गाया। देशवासियों को युद्ध के बादल दिखाए, मगर बादलों की आड़ में  खुद के मित्र मंडली की तिजोरियां भर दी बेशुमार दौलत से ।

देश में गरीबी, भुखमरी बढ़ी, मगर इनके सहयोगियों, मित्रों की संपत्ति की बढ़त सातों आसमानों  के आगे जा चुकी है। 

कदम कदम पर, झूठ, गुमराह, मिथक बातें जैसे अस्त्र प्रयोग किये जा रहे हैं। और तो और संवैधानिक संस्थाएं, कोर्ट, पुलिस, सीबीई , ईडी, मिलिट्री , सब के सब लपेटे में कर उनसे झूठ को सच साबित करवाया जा रहा है इतने प्रकट अनैतिक तरीकों से।
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कोई भी समाज सशक्त तब होता है जब उनमे न्याय का  निवास आता है। क्योंकि न्याय में से आपसी विश्वास का जन्म होता है, जो लोगों को आपस में बांधता हैं।

और, समाज में न्याय के निवास में अड़ंगा कैसे होता है?
जब  किसी भी समाज के आधारभूत धर्म में दोहरी नैतिकता का प्रसार होता है, तो उन दोहरी नैतिकताओं में से दोहरे न्याय निकलते है। दोहरे न्याय ही पाखंड होते हैं। 

मतलब, कोई भी समाज जब दोहरी नैतिकताओं से से मुक्ति प्राप्त करते है, तब ही जा कर वो सशक्त राजनैतिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति बनते हैं। 
किसी कूटनीतिज्ञ आह्वाहन से कभी भी कोई भी समाज न तो संघठित हुआ है, और न ही हो सकता है। (किताबो में , कहानियों में , पंचतंत्र वाले "लकड़ी के गट्ठे" या "कबूतर और बहेलिया का जाल" वाले किस्से पढ़ा-पढ़ा कर कोई भी समाज संघठित आज तक नही किया जा सका है। शिक्षा या स्कूली पाठ्यक्रमों में छेड़छाड़ कर के, छोटे अबोध बालकों को "राष्ट्रभक्ति" का injection  लगवा कर राष्ट्रभक्त जनता पैदा नहीं करि जा सकती है।  )

हिन्दू समाज स्वभाविक तौर पर दोहरी नैतिकताओं का समाज रहा है। आदिकाल से। मोदी राज उसी परिपाटी को  चला रहा है। हिन्दू नैतिकता को बनाने का ठेका स्वघोषित तरीके से ब्राह्मणों ने उठा रखा है।  ब्राह्मण तर्कों की शुद्धता में परिपक़्व नहीं होता है। 

देश इसलिये आक्रमणकारियों से युद्ध नहीं हार जाया करते हैं क्योंकि चंद गद्दार, देशद्रोही शत्रुओं के संग जा मिलते हैं, और उन्हें घर के भेद बता देते हैं। देश इसलिये युद्ध हारते हैं क्योंकि उनका राजा धर्म और नैतिकता का पालन नही करता है, और फिर  असंतुष्ट समूहों को जन्म देता है। रावण ने नैतिकता नही निभाई तब विभीषण असंतुष्ट हुआ। पृथ्वीराज चौहान ने संघमित्रा का अपहरण किया तब जयचंद का जन्म हुआ है। धर्म (सामाजिक नीति के अर्थ में)  को निभाना राजा के लिए प्रधान होता है।

भारत भूमि के सांस्कृतिक इतिहास में धर्म को बारबार दुरपयोग होते देखा जा सकता है,-- धंधे , व्यापार का अस्त्र बनते हुए, जनसमुदाय को गुमराह करने का अस्त्र बनते हुए, सामाजिक अन्याय और ऊँच-नीच, भेदभाव को प्रसारित करते हुए।

अतीत काल में भी शायद ऐसी वजह वो वास्तविक कारण रहे हैं कि क्यों ये देश रौंदा गया है।

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