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"Market पैदा करना" का क्या अभिप्राय होता है

Gym खोलने बनाम Library खोलने के तर्क वाद में आयी एक बात "मार्केट पैदा करो" का अर्थ ये कतई नही होता है कि पेट से पैदा करके लाएंगे ग्राहकों को library के सदस्य बनने के लिए।

"Market पैदा करो" का अभिप्राय क्या हुआ, फ़िर?

आज जब gym का business करना जो इतना आसान दिखाई पड़ रहा है, सत्य ज्ञान ये है कि आज से पच्चीस सालों पहले ये भी कोई इतना आसान नही था। क्यों? तब क्या था? और फ़िर ये सब बदल कैसे गया? आखिर में gym की सदस्यता के लिए "मार्केट कहां से पैदा" हो कर आ गया है?

पच्चीस साल पहले लोग (और समाज) ये सोचता था कि ये सब gym और खेल कूद करके बच्चे बर्बाद ही बनते है। बॉडी बना कर बच्चा क्या करेगा? गुंडागर्दी? वसूली? सेना में जायेगा? या कुश्ती लड़ कर फिर क्या करेगा?  Gym में तो बस माहौल के मवाली, आवारा लौंडे ही जाया करते थे, जिनसे सभ्य आदमियों को डर लगता था। gym के बाहर में ऐसे ही लौंडे bikes पर बैठे हुए जमघट लगाये रहते थे। तब दूर दूर तक के इलाको में जा कर एक आध ही gym मिलता था।

फ़िर ये सब बदला कैसे? यही बदलाव की कहानी ही है "market पैदा करने" की कहानी । ये सामाजिक छवि बदली है फिल्मों से, अखबारों में प्रकाशित "लोगों से लोगों की ही शिकायत करने वाले" लेखों से। advertisement से, लड़कियों को gym करते हुए ads ,  फ़िल्म, - सामाजिक चलन को बदल देने वाले हालातों से, जो कि किसी प्रयत्क्ष , प्रकट षड्यंत्र के अधीन तो नही चलाये गये, मगर फिर भी, किसी सोची-समझी बहती हुई शक्ति के आवेश में समाज को आ जाने से खुद ब खुद ऐसा होता चला गया है।

जब कोई सोची समझी सोच, बार बार कहीं किसी रूप में प्रकट हो कर समाज की सोच पर चोट करने की बजाये , एक नयी धारा की सोच डालने लगती है तब कुछ दशकों के समय में समाज की सोच बदल जाती है।

Diamonds के मामले में यही काम de beers corporation ने कभी किसी जमाने में किया था। इसके लिए ही उन्हीने कभी diamonds बेचने का सीधा प्रचार नही किया। लोग और समाज सोचता था कि आखिर diamonds का करेगा क्या? उससे पेट नही भर सकता, उससे घर नही बना सकता, उससे पूरा शरीर नही ढक सकता है। diamonds एक दम बेकार का सामान था। लोग diamonds को precious नहीं मानते थे!!

De beers ने लोगों की सोच कैसे बदल दी? Diamonds की जन छवि बदला कर precious होने की कैसे बना दी? और अपने diamonds के लिए Market कैसे पैदा कर दिया?

De beers ने लेखक, कहानीकारों, फिल्मकारों का सहयोग लिया - मगर कोई ad बनाने के लिए नही ! ऐसी फिल्मे बनाने के लिए जिनमे कोई money heist का रोमांचक किस्सा हो। कोई जबर्दस्त diamond की चोरी करने वाला hero हो, या villain हो जिसे एक हीरो police वाले ने कैसे पकड़ा हो। ये फिल्मे और कहानियाँ दर्शकों को निरंतर अवचेतना में (subconscious mind में) बात को जमती रही की diamond वाकई में precious होता है।

De beers ने सोची समझी साज़िश के तहत कभी भी diamonds को बेचने का ad नही किया। उसने लोगों का बस इतना बताया किया diamonds are precious। मगर ये भी सीधे शब्दों में कभी नही कहा ! बल्कि किस्से, कहानी और फिल्मों में छिपा कर ऐसा ही दिखवाया! यानी sponsor किया ऐसे लोगों को जो ऐसे विचारो पर कार्य करके अपना योगदान दे रहे हो !

ये होता है "market पैदा कर देना"

Gym के मामले में ये काम पिछले 20 सालों में काफी हद तक हो चुका है। 
Library जो किताबो से सुसज्जित हों, न कि केवल study centre की तरह वाली, इस क्षेत्र में अभी भी vacuum (रिक्त) है।


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