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वैश्विक समस्याओं के मूल कारकों में ‘दंडवत‘ फिरकी

देश में समस्याएं पहले भी थी और सभी सरकारें उनसे निपटने के उचित उपाय कर रही थीं।

मगर मोदी जी के आगमन के बाद से जो अचरज वाली बात हुई है वो ये कि इन समस्याओं के मूल कारण ही फिरकी कर गए हैं।

उदाहरण के लिए :-
बेरोजगारी पहले भी हुआ करती थी, और सरकारें इस समस्या से निपटने का उपाय किया करती थी - अधिक निवेश और फैक्ट्री लगा कर, जिससे की रोजगार बढ़े।

मगर अब , मोदी जी के आगमन के बाद, बेरोजगारी का मूल शिनाख्त ही बदल गई है। अब पकोड़े बेचने और चाय बेचने वालों को भी रोजगार गिना जाने लगा है।  जबकि सभी अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठनों की मान्य परिभाषा के अनुसार वो सब "छोटे मोटे" व्यवसाय रोजगार में नही गिने जाते है !( पी चिदंबरम जी की टिप्पणी को ढूढिये इस विषय पर)।सामान्य अकादमी शिक्षा इसी तर्कों के अनुसार अर्थशास्त्र विषय ज्ञान आधारित किए हुए थी।

अब बेरोजगारी के मूलकारणों में सीधे सीधे अथाह जनसंख्या को दोष दिया जाने लगा है, जबकि अतीत में विश्व में कोई भी मानववादी प्रजातांत्रिक सरकार  आबादी को स्पष्ट तौर पर मूलकारक लेते हुए कार्यवाही नहीं करती थी। ऐसा केवल वामपंथी, कम्युनिस्ट सरकारें जैसे की चीन करती था, जो कि जनसंख्या को दोषी मानते हुए सीधे- सीधे देश में बच्चो की पैदाइश को सरकारी permissiom अनुसार करने की विफल कोशिश कर रहा था/ कर चुका है।

मोदी जी के आगमन के उपरांत जनसंख्या को सीधे सीधे दोषी मान कर , फिर आगे जनसंख्या की बढ़त के लिए दोषी किसी के खास विशेष संप्रदाय को माना जाने लगा है । और देश का मीडिया उनके पीछे हाथ धो कर पड़ गया है।

शैक्षिक और बुद्धिजीवी वर्ग में जनसंख्या को वैश्विक समस्याओं का सपष्ट दोषी अभी तक नहीं समझा जाता था, क्योंकि स्पष्ट कार्यवाही मानववादी विचारो से मेल नही रखती थी । हालांकि आबादी पर नियंत्रण लगाने की पहल जरूर रखी जाती थी, और आबादी नियंत्रण के लिए उपायों में महिला सशक्तिकरण जैसे मानववादी समाधानों को ही सकारात्मक समाधान मानते हुए, इन्हे स्वीकार किया जाता था। बाकी , ऐसा सोचा जाता था कि बढ़ती हुई मंहगाई, घटते और खपत होते हुए प्राकृतिक संसाधनों का दबाव वर्तमान आबादी पर उचित दबाव बनाएगी की जनता स्वयं से अपना जीवन गुणवत्तापूर्ण जी सकने की क्षमता के अनुसार ही बच्चे पैदा करेगी ।

मगर अब, मोदी जी के आने से, ये मानववादी सोच तहस नहस हो चुकी है। लोग अब एक दूसरे पर आबादी बढ़ाने का दोष देने लगे हैं, और आपस में मार- काट करने पर उतारू हो चुके हैं। इसके लिए उन्होंने सबसे प्रथम दोषी किसी विशेष वर्ग , अल्पसंख्यक, को चुना है।

ये सब मोदी जी के धार्मिक -राजनैतिक पाठशाला की शिक्षा दीक्षा का कमाल है, (यदि दोष नहीं है तो )। अब सभी सामान्य तर्क, नीतियां, इतिहास का ज्ञान, संस्कृति का ज्ञान, धर्म का ज्ञान अपने सर के बल पर पलटी मार चुका है। सभी पुराने सोच "दंडवत" फिरकी हो गए हैं। संभी समस्याओं के लिए किसी न किसी को दोषी गिनाए जाना लगा है, जबकि पहले समस्याओं का उद्गम प्राकृतिक माना जाता था , यानी जिसकी उत्पत्ति मानव जाति की सांझा नीतियों और व्यवहारों से हुई थी , किसी एक वर्ग के विशेष दोषपूर्ण कर्मों से नहीं।

मगर अब ऐसा नहीं है। ये पता नही कि पहले वाले समय में वैश्विक स्मासायायो के मूल कारकों की पहचान कुछ ज्यादा शिथिल तरीके से हुई थी (-कि आबादी को सीधे से दोष नहीं दिया गया था)। या कि अब मोदी सरकार में मूल कारकों की पहचान में कुछ ज्यादा ही पक्षपाती दृष्टिकोण समाहित हो गया है (— आबादी के लिए विशेष वर्ग को दोषी माना जाने लगा है) । ये सवाल अब समाज को तय करना होगा।

वैश्विक , अंतर्देसीय संबंधों में भी अब मोदी सरकार के आगमन के बाद से बहुत कुछ "दंडवत" (head over heels) बदलाव हुए हैं। मोदी जी दूसरे देशों के राजनायको और शीर्षो से मुलाकात कुछ इस मनोदशा से करते हैं जैसे मानो ये कह रहे हैं कि हम सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ धर्म, राष्ट्र और संस्कृति के प्रतिनिधित्व करते हैं, —— एक ऐसा देश और ऐसा धर्म जिसका वैश्विक समस्याओं के मूल कारकों में तनिक भी योगदान नहीं है, ....क्योंकि इन समस्याओं का असल दोषी कोई और ही है।

मोदी जी इस व्यवहार को नादानी नहीं मानते हैं, अहंकार नहीं मानते हैं, बल्कि आत्मविश्वास, गर्व,  और एक 'ऊपर उठता हुआ मनोबल' करके बुलाते हैं।

किसी और के सर दोष मढ देने से अपना मनोबल कमजोर नही होता - मोदी जी जिस पाठशाला से आते हैं वहां पर ऐसी वाली युक्ति करना प्रचुर पाया जाता है। यानी, समस्याओं से निपटने के लिए यदि अपना मुंह रेंत में मूंह नहीं धसाये, तो फिर कम से कम दूसरे के मुंह पर कालिख जरूर पोत दें। ऐसा करने से आपका मनोबल नही गिरेगा।

मोदी जी की पाठशाला के लोग अभी तक वैश्विक विषयों पर मनोबल वाली भावनात्मक, मनोदशा दिक्कत से मुक्त नहीं हुए हैं । ये उनके निर्मोह प्राप्त कर सकने का माप है। और इसी मनोदशा के संग वो इस देश की नीतियों को निर्धारित कर रहे हैं। 

किसी तानाशाह का जन्म कैसे होता है?

तानाशाह की अक्ल कैसे काम करती है?

तानाशाह ये कतई नही सोचता है कि सही क्या है, और ग़लत क्या है। ज़ाहिर है, क्योंकि इतनी असीम, अपार शक्ति का स्वामी हो कर भी यदि ये सोचने लगेगा, तब फ़िर तो वो शक्ति बेकार हो कर स्वयं से नष्ट हो जायेगी। 

तानाशाह की शक्ति  आती है उसके आसपास में बैठे हुए उसके सहयोगियो और मित्रों से। वो जो की तानाशाही में भूमिका निभाते है बाकी आम जनता के मनोबल को कमज़ोर करके उन्हें बाध्य करते है हुए आदेशों का पालन करने हेतु। तानाशाही का निर्माण होता है जब सरकारी आदमी आदेशों के पालम करने लगते हैं अपने ज़मीर की आवाज़ को अनसुना करके।  

द्वितीया विश्व युद्ध के उपरान्त हुए, विश्व विख्यात न्यूरेम्बर्ग न्याययिक सुनावई के दौरान ये मंथन हुआ था कि आखिर हिटलर जैसा तानाशाह का जन्म कैसे हो जाता है किसी समाज में? कैसे अब भविष्य में हम किसी भी देश में किसी तानाशाह के जन्म को रोक सकेंगे? इस मंथन में बात ये सुझाई पड़ी थी कि तानाशाह तब पैदा होते हैं जब सरकारी आदमी बेसुध, बेअक्ल हो कर आदेशों का पालन करने लग जाते हैं। जन बड़ी संख्या में सरकारी आदमी (पुलिस, और सैनिक, जवान और अधिकारी) आदेशों से बंध जाते हैं --जाहिर है सभी अपनी अपनी नौकरी बचाने के ख़ातिर ही ऐसा करते है  -तब तानाशाही की प्रचंड शक्ति उतपन्न हो जाती है और किसी न किसी तानाशाह का जन्म हो जाता है।

न्यूरेम्बर्ग सुनवाई ने तभी से ये नियम यूरोप के समाज में अनिवार्य कर दिया कि यदि कोई सैनिक या अधिकारी अपने ज़मीर की आवाज़ के चलते कू आदेश का पालन नहीं करेगा, तब उसे दंड नहीं दिया जा सकेगा !

तानाशाह के पास जब प्रचंड शक्ति होती है तब उस पर बाध्यता होती है कि अपने समीप बैठे परामर्श देने वाले सहयोगियों को भी कुछ ईनाम दे उनकी ख़िदमत का। सभी परामर्श सहयोगी (counsellors) अपने अपने मुँहमाँगा ईनाम तराश कर बटोरने लगते हैं। किसी को धन चाहिये होता है, किसी को मस्ती और यौवन का ऐश्वर्य चखने का मज़ा, और किसी को ego kick चाहिए होती है अपने दुश्मनों पर हुकूमत कर सकने की। 

तानाशाह की मज़बूरी होती है कि वो ये सब लें लेने दे अपने परामर्श सहयोगियों को। और बदले में यही लोग फिर उस तंत्र को चलाते हैं जिसमे सरकारी आदमी आदेशों का अंधाधुंध पालन करता है, और तानाशाह की शक्ति को देशवासियों के ऊपर क़ायम रखता है।

तानाशाही शक्ति की एक परम ज़रूरत ये भी होती है कि वो रोज़ कुछ न कुछ करके अपने होने का सबूत जनता के सामने रखे! और इसके लिये उसे ज़रूरी हो जाता है कि थोड़ा बेकाबू होने का एहसास करवाती रहे आम जनता को। ये कैसे किया जा सकता है?  आसान है - मनमानी करके और अपेक्षाओं को झुठला करके। आम आदमी जो भी अपेक्षा करेगा प्रशासन से ,कि प्रशासन दयावान और न्यायप्रिय होने की अब्धयता में उसके संग सलूक कैसा करेगा, तो तानाशाही ताकत मात्र उस अपेक्षा को कुचल देने और झुठलाने की ख़ातिर ठीक उल्टा काम कर देगी। इससे लोगों को सदमा भी लगेगा कि अपनी-अपनी बचाओ, विद्रोह करने से दूर रहो। और इससे तंत्र के अंदर की तानाशाही शक्ति का परीक्षण भी समय-समय पर हो जायेगा कि कहीं कोई सैनिक, सिपाही या अधिकारी ऐसा तो नहीं बचा है जो तानाशाही आदेशों की अवहेलना करते हुए अपनी जमीर की आवाज के अनुसार कार्य करने को ललयनित हो अभी भी।

ये मनमर्ज़ी करना और महज़ आपकी अपेक्षाओं को झुठलाने की ख़ातिर उल्टा काम कर गुज़रना - ये तानाशाही की पहचान होती है।

और अपने परामर्श सहयोगियो को उस तानाशाही शक्ति का ईनाम देना उसकी बहोत बड़ी बाध्यता होती है । और जहां पर कि दुनिया भर की दरिंदगी और हैवानियत घटती है, आम आदमी के ऊपर।

क्यों तानाशाह नेतृत्व अंत में आत्म-भोग के अंतिम सत्य पर आ टिकती है

रूस-यूक्रेन युद्ध के आज 31 दिन हो चुके हैं,मगर अभी तक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना एक अदने से देश की अदनी सी सेना को मसल नहीं पायी है। अब तो उन पर लाले पड़ने लगे हैं आंतरिक विद्रोह हों जाने के, और खतरा बढ़ने लगा है की कहीं कमज़ोर मनोबल से ग्रस्त हो कर वो बड़ा "शक्तिशाली" देश कहीं जैविक /रासायनिक अस्त्र न चला दे !

ये सब देख कर सबक क्या मिलता है?

कि, तानासाही चाहे खुल्लम खुला प्राप्त हो, या election fraud करके मिली हो, वो देश और समाज को आत्म-घात की ओर ले जा कर रहती है।

तानाशाही में बड़े विचित्र और अनसुलझे मार्गों से समाज और देश की आत्म-तबाही आ गुजरती है।फिर ये तानाशाही उत्तरी कोरिया जैसे खुल्लम खुल्ला हो, या रूस के जैसे खुफ़िया एजेंसी से करवाये election fraud से हो।

कैसे, किस मार्ग से आ जाती है समाज और देश पर आत्म-तबाही?

कुछ नहीं तो विपक्ष का ही incompetent हो जाना समाज तथा देश की तबाही का मार्ग खोल देता है!
कैसे?
जब सत्ता परिवर्तन होना बंद हो जाता है, तब विपक्ष में से भी तो competent नेतागण वाकई में समाप्त होने लगते हैं जिनके पास प्रशासन चलाने तथा सरकारी नीतियों को जानने/समझने का पर्याप्त अनुभव हो, जिसके सहारे वो election fraud तानाशाह की सरकार की नीतियों पर पर्याप्त तर्क और कटाक्ष कर सकें!

है, कि नहीं?

और ऐसे में election fraud तानाशाह खुद ही अपने देश और उसके समाज को , सबको एक संग उन्नति के मार्ग पर नहीं, बल्कि "चूतिया पुरम" तंत्र की ओर ले कर बढ़ने लगता है!

यदि किसी देश में नित-समय अनुसार सत्ता परिवर्तन होना बंद हो जाये, तो ऐसी election fraud तानाशाही का भी हश्र वही हो जाता है ,जो किसी सम्पूर्ण तानाशाही (जैसे की उतारी कोरिया) का हुआ है। सर्वप्रथम, समाज को आर्थिक नीति में आत्म-दरिद्रता को भोगना पड़ता है, जैसे की आज श्रीलंका में होने लगा है। महंगाई बढ़ती है। और फिर, क़िल्लत और गरीबी आ जाती है पूरे समाज पर।

कैसे हो जाता है ये सब?
सुचारू तरह से सत्ता परिवर्तन का होते रहने से राजनैतिक वर्ग  में मानसिक/बौद्धिक स्वस्थ कायम रहता था, क्योंकि समस्त राजनैतिक पक्षों में अनुभवी नेताओं की संख्या पर्याप्त बने रहती थी । मगर जब किसी election fraud व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन होना जब बंद हो जाता है, तब शायद विपक्ष में पर्याप्त competent और अनुभवी तर्कशील नेताओं की संख्या समाप्त होने लगती हैं! और फिर ऐसे में, election fraud करके आया तानाशाह बड़े-बड़े वादे करके अपने समाज को बहोत जल्द आत्म-तबाही की राह पर चल निकलता है,क्योंकि उसको रोकने वाले सामर्थ्य विपक्ष उपलब्ध ही नहीं रह जाता है समाज के अंदर !

तानाशाह नेताओं को अपने  समाज को  उनकी समस्याओं से मुक्ति दिलवा कर उन्नति की रहा तलाशने में ऐसे-ऐसे तर्क-विरर्क की भूलभुलैया आ घेरता है, जिसमे अंत में बस एक ही काबिल तर्क उनके सामने उनका पथ प्रदर्शक बन कर रह जाता है। वो ये, कि तानाशाही से भी समाज का उत्थान नही किया जा सकता है।

तो तर्क-वितर्क की भूलभुलैया में तानाशाह और उसके समर्थकों को यही तर्क पसंद आने लगता है कि- " बस ,अंत में अपनी निजी मौज़ मस्ती और जेब भर कर जियो !"

ज़्यादातर तानाशाही व्यवस्था का अंतिम तर्क यही रह जाता है - चुपचाप से बस अपना भला करके, अपनी जेब भर कर मस्ती से जिये,  दुनिया का भला आजतक न कोई कर पाया है, न ही कोई कर सकेगा।

तानाशाह और उसके मित्र मंडल की समस्त देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम , सामाजिक कल्याण के प्रवचनों का निचोड़ खुद-ब-खुद तानाशाह को इस एकमात्र राह पर ला खड़ा करता है जिसे अंग्रेज़ी में Nihilism शब्द से बुलाया जाता है।

और इस प्रकार से तानाशाही व्यवस्थाओं का अंतिम सत्य (चाहे election fraud से बनी तानाशाही हो, या फ़िर तंत्रीय ढांचे में फेरबदल करके जमाई गयी हो) आत्म-भोग ही उनका अंतिम परिणाम हो जाता है- जिसका अभिप्राय होता है -देश की बर्बादी ।

जैसे कुत्तों को घी नहीं पचता, वैसे ही मूर्खो को स्वाधीनता नहीं भाती

नीच आदमी को जब न्याय मिलने लगता है, लोग equality, समानता और बराबरी का ओहदा उसे देने लगते हैं, तब उनकी नीच मानसिकता वश उसे लगता है कि ये सब तो उसने अपनी लड़ाई जीत कर कमाया है, ये तो उसका हक था, इसमें दुनिया वालों की दरियादिली, मानवीयता का कोई योगदान नहीं है।

आज दुनिया के कई सारे तथाकथित प्रजातंत्र देशों में मूर्खनगरी तंत्र ने चुनाव प्रक्रिया पर घात करके कब्जा जमा लिया है , और उनमें विराजमान लोग ऐसी वाली नीच मानसिकता से भरे हुए हैं।

वो लोग अपनी जनता को देश पर गर्वानवित होने के नाम पर विश्व सूचना तंत्र यानी internet पर अंटबंट लगाम लगाने की नित दिन नई कवायद कर रहे हैं।
ऐसा करते समय ' चूतिया' (माफ करिएगा, मगर आजकल बताया जा रहा है की ये शब्द शुद्ध संस्कृत शब्द है) लोग ये भूल जा रहे हैं कि कितना और क्या -क्या संघर्ष किया था इन्ही "फिरंगी" अमेरिकी कंपनियों के मालिक -engineers ने, इस विश्व व्यापक सूचना तंत्र की स्थापना करने के लिए  1990 के दशक में। दुनिया भर की किताबो में ये संघर्ष और इसका ब्यौरा दर्ज है। मगर फिर चूतिया लोग तो परिभाषा के अनुसार जन्म ही ऐसे लेते हैं की उनको लगता है अनाज supermarket  से आता है, किसान की खेती करने से मालूम नही क्या होता है!
तो चूतिया लोगो को जब पकी पकाई खीर मिलने लगती है तब वो धन्यवाद देने की बजाए उसमे नुस्खे निकालने लगते हैं।

क्यों और कैसे इस वैश्विक सूचना तंत्र को मुफ्त और अवरोध विहीन बनाया गया, क्यों संघर्ष किया गया ताकि इसका जन्म हो सके, ये सब गहराई और नीति , न्याय नैतिकता वाली बातें चूतिया लोगो को कहां समझ में आने वाली हैं। उनको तो बस नुस्खे निकाल देने है, जो की हो सकता है की वाकई में हो भी, मगर जिनका होना इस व्यापक सूचना तंत्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक भी है

चूतिया कौन है? वो जिसको friction की शक्ति की कमियां दिखाई पड़ती है सिर्फ, उसकी संसार को चलाने के लिए आवश्यकता नहीं समझ आती है। या फिर की आवश्यकता तो समझ आती है, मगर कमियां नही दिखाई पड़ती।

कहने का अर्थ है की चूतिया वो होता है जो व्यापक हो कर दोनो विपरीत पहलुओं को एक संग नही देख पाता है

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अगर हमारे अंदर नमकहरामि नही हो, तब हमे ये साफ साफ दिखाई पड़ जाना चाहिए था कि इन्हीं फिरंगी , 'bloody capitalist ' अमेरिकियों की बदौलत वो सब अन्वेषण , अविष्कार हुए जिनसे कंप्यूटर जैसे यंत्र को जन्म हुआ। और फिर वापस इन्हीं "दौलतमंद" अमेरिकियों की बदौलत इस वैश्विक सूचना तंत्र यानी world wide web की रूपरेखा ऐसे ढली कि वो अधिकांश सेवाएं मुफ्त में देता है, और ऐसे ऐसी जानकारियां आज दुनिया के प्रत्येक नागरिक को आसानी से तथा निःशुल्क मिल जा रही है जो की कभी किसी जमाने में अमीर और गरीब के फासले को नाप दिया करती थी। गंदगी जरूरी नहीं की दौलतमंद अमेरिकियों में ही हो, कभी अपने गिरेबां में झांक कर देखिए शायद ऐहसान–फरमोशी हमारे ही भीतर में पड़ी हो।

तो इसी मुफ्त, निःशुल्क सूचना तंत्र सेवा से दुनिया के ना जाने कितने लोगो को शिक्षा मिली, प्रेरणा मिली,नौकरी मिली,व्यापार और व्यवसाय भी मिले , मगर अब मूर्खो ने दुनिया पर कब्जा जमा लिया है। मूर्ख वो होते हैं जो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को पहचाना नहीं पाते है और उसे ही हलाक करके दावत उड़ा लेते हैं।

ऐसे में अब twitter को स्वामित्व में थोड़ा और निजी हो जाना तो सही हो लक्षण और भविष्य सूचक माना जाना चाहिए। जैसे जैसे चूतिया लोग दुनिया के देशी पर काबिज हुए जा रहे हैं और अनापशनप तर्क देकर जनता को बेवकूफ बनाने, बरगलने में देश की धन शक्ति को खर्च कर रहे हैं, तब तो सही होगा कि एलान musk जैसे निजी स्वामी अब twitter पर से किसी सरकार की ’दरख्वास्त’ पर कोई सूचना अवरोध करने का भाड़ा लेने लगे और निजी जेब गरम करे, बजाए की मुख लोगो को सहयोग दे अपने ही देश को बर्बाद करके इल्जाम अमेरिका पर ठोक देने से !

क्यों ये देश हमेशा वास्तविक उद्योगपति से रिक्त बना रहेगा और विदेशी कंपियों के द्वारा लूटा जाता रहेगा

 जैसा की मैं हमेशा से बताता आय हूँ, 

भारत में "उद्योग पति" के नाम पर वास्तव में सिवाए "मारवाढ़ी गिरी " के कुछ नहीं है , - वो सामुदायिक परिवार के लोग जो की बड़े स्तर पर परच्युन की दुकान चलाते हैं , बिचौलिया-दलाली के धंधे के कमाई करते , और कुछ नहीं।  

और अक्सर करके अपने राजनैतिक -बाबूशाही संबंधों का फायदा ले कर monopoly जमा लेते, समाज को कंगला कर देते हैं।  

भारत में वास्तविक कौशल कामगार professional (व्यवसायी) नहीं होता है , जो की उद्योगिक जोखिम ले, मुद्रा बाजार से सार्वजनिक धन को ले कर नवीन , अनजाने क्षेत्र में किसी अनदेखे , अनसुने उद्योग की नीव डाले और समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाते हुए कामयाबी के शिखर तक पहुँच जाये। 


माइक्रोसॉफ्ट का बिल गेट्स खुद एक कंप्यूटर इंजीनियर कौशल कामगार (पेशेवरिय कंप्यूटर professional ) है, और अपना उद्योग ऐसे क्षेत्र में (कंप्यूटर जन्य सॉफ्टवेयर उत्पाद सेवा ), वो भी तब जमाया था जब कोई भी उस क्षेत्र मे नहीं था।  ये पूरा अनजान और अनसुना-अनदेखा  क्षेत्र था जिसमे कोई भी उद्योग था ही नहीं ।  


एलोन मस्क ने battary ऊर्जा संचालित कारों के निर्माण में अपन उद्योग जमाया , जब की इस क्षेत्र में अभी तक रिक्त बना हुआ है , कोई भी आसानी से जोखिम लेने वाला नहीं आया है।  एलान मस्क खुद एक पेशेवरिया इंजीनियर है , दक्षिण अफ्रीका देश से अमेरिका में आ कर बसा है।  


जेफ़ बेज़ोस (amazon ) का मालिक , ने अपना उद्योग internet आधारित दुकान के क्षेत्र में बनाया है , जहाँ की अभी भी बहोत रिक्त बना हुआ है उद्यम करने वालों के लिए।  पूरी तरह से नवीन तकनीक, संसाधनों को विक्सित करके उद्योग को ढांचा दिया है , एकदम आधारभूत तिनके-तिनके से संसाधनों को एकत्र करके जोड़ना आरम्भ करते हुए ।  पेशेवरिया शिक्षा से कंप्यूटर इंजीनियर स्वयं भी है। 


मगर अब परिचय करते हैं भारत के धन्ना सेठ से ,-


श्रीमान जी पेशेवरिय शिक्षा से  "10वी पास " भी नहीं है।  पूरी तरह से राजनैतिक जोड़ -जुगत लगाने में माहिर हैं। अपने अशिक्षित , स्कूली शिक्षा से नदारद परम मित्र मोई जी के राजनैतिक हेंकड़ी गिरी से प्राप्त, और बहोत बेशर्मी और पक्षपात से मिले संसाधन से अपना उद्योग बसाया है। आर्थिक-आपराधिक घोटाला  कहलाये जाने वाले  बैंक loan 'सहयोग' से एक monopoly बसाई है , अपने समुदाये के पारम्परिक धंधे - परचूनी बेचने के क्षेत्र में। 

-- wilmar कंपनी की सहायता से अनाज-गल्ला को खरीद फरोख्त  करने के दौरान  बिचौलिया-गिरी का ज़बरदस्ती फायदा बनाया है , और  जिसमे की वास्तव में सीबीआई जैसी investigation संस्थाए बता रही है की देश के अहित में आर्थिक अपराध हुए है बिचौलिया फायदा बनाने के खातिर।   

पोर्ट बनाने के क्षेत्र में भी राजनैतिक सम्बन्ध का फायदा लेते हुए मुफ्त में सार्वजनिक जमीन हड़पी है , और फिर सार्वजनिक सरकारी नियंत्रण वाले बैंको  से राजनैतिक समबधों के जुगत से लिए गए loan  से port बनाया , और फिर वापस राजनैतिक संबंधों की जुगत से अन्य सार्वजनिक सरकारी नियंत्रण वाले पोर्ट को भीतर में से बर्बाद करके उनका कारोबार खुद में हड़प लिया !

डार्विन के तर्क अनुसार महिलाएं क्यों निम्म होती हैं पुरुषों से

महान चिंतक और वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन अपने एक मतविचार मे महिलाओं को पुरुष से निम्म होने का तर्क रखते हुए कहते हैं कि स्त्रियाँ यदि अपने gut feelings(आने वाले खतरों का अंतर्ध्यान के प्रयोग से पूर्वानुमान कर लेना) में पुरुषों की अपेक्षा ज़्यादा बेहतर होती है तब यही अपने आप मे प्रमाण होता है कि वो पुरुषो से बौद्धिक कौशल में निम्म हैं।
डार्विन का यह मत उनके अपने सिद्धांतों पर आधारित था कि प्रकृति में gut feeling का प्रयोग करने वाले जीव जंतु food chain या भोजन श्रृंखला में निम्म होते हैं। इस प्रकार के आचरण को डार्विन instinctive behaviour बुलाते थे , और जो कि ज्यादातर जीवजंतुओं में देखा जाता है। इसके बनस्पत होता है उच्च बौद्धिक कौशल वाला आचरण जो कि आधारित होता है सूचना , ज्ञान , जानकारी पर। उसे informed behavior बुलाते है। 

डार्विन का सिद्धांत बताता था कि informed behaviour करने के लिए बुद्धि की अधिक क्षमता चाहिए होती थी, 
क्योंकि सूचना को मंथन करके अर्थ निकालने के लिए मस्तिष्क में स्थान, वजन दोनो चाहिए होते हैं । प्रकृति में बड़ा वजन और आकार का मस्तिष्क सभी जीव जंतुओं को देना संभव नहीं था।
इसलिए प्रकृति ने  instinctive behaviour के कार्य वाले छोटे मस्तिष्क जीव-जंतुओं को दे कर काम चला लिया था।

तो यदि महिलाएं अपने अन्तर्धानी शक्ति (यानी instinctive behaviour से प्राप्त शक्ति) में पुरुषों से बेहतर है, तो वो छोटी मस्तिष्क की है, यानी निम्म है 

आधुनिक विज्ञान अभी तक ये पूर्ण तटस्थ हो कर तय नहीं कर पाया है कि स्त्री और पुरुष में श्रेष्ठ कौन है, मगर डार्विन के तर्क की रेखा को उचित जरूर मानता है। 

Instinctive behaviour एक नैसर्गिक आचरण होता है , जो सुनने में भले सुहाता हो,मगर डार्विन सिद्धांतो से कमज़ोर और निम्म मस्तिष्क वाले प्राणियों में पाया जाता है। ऐसे लोग अच्छा समाज, तकीनीकी विकसित समाज  , न्यायपूर्ण समाज बसा सकंने के काबिल नहीं होते है। instinctive behvaiour प्रायः ग़लत निर्णय या न्याय करता है बनस्पत informed behaviour के ।

इलेक्शन फ्रॉड से निपटने में कुछ बौद्धिक आत्म ज्ञान रखना ज़रूरी है।

 इलेक्शन फ्रॉड से निपटने में कुछ बौद्धिक आत्म ज्ञान रखना ज़रूरी है। 

सर्वप्रथम ये, कि  evidence  तो अब कुछ भी जमने वाला नहीं है देश की किसी भी संस्था और न्यायालय में।  मगर जबजब जहाँ जहाँ फ्रॉड के चिन्ह(indicators, signs) दिखाई पड़ें. आरोप लगा कर विषय को कोर्ट में शिकायत करना ज़रूरी होगा, ताकि कम से कम close indicators तो बन सकें की इस देश में "शायद"  election  fraud  करके सरकार बनायीं और चलायी जा रही है। 

ये समझना ज़रूरी है की evidence  अलग चीज़ होते हैं, और closest  indicators  अलग।  कुछ विषयों के evidence होते ही नहीं है, और तब उनको close  indicators  से ही दर्शा करके बात को जनचेतना के हवाले छोड़ दिया जाता है कि वो खुद से तय कर ले सत्य क्या है। 

दुनिया वालों के पास में पर्याप्त बौद्धिक बल मौजूद है कि वो close indicators  को दर्शाये जाने पर खुद से बात पकड़ ले कि  आखिर चल क्या रहा है इस देश में।  

इसलिए evidence  के पीछे मत भागिए क्योंकि अब वो तो बचा ही नहीं है।  और न ही निरुत्साहित हो जाईये कि  अब अबकी बात कोई सुन नहीं रहा है, और न ही मानी जा रही है।  आप बस चुपचाप अपने कर्तव्य निभाते जाइये , एक जागरूक नागरिक होने के, और close indicators को दर्शाते जाइये दुनिया वालों को ।  

Why Autocratic countries stop making scientific and technological progress

(This post is copied from somewhere on the Internet) 

 Autocratic states are NEVER able to keep pace with the scientific and the technological progress made by the Liberal Democracies. 

 There is a sound explanation why so. 

 In an Autocracy, there is in-built burden to promote people based on the POLITICAL CONSIDERATIONS alone, and not the Technological Competency because a Technologically Competitive person MAY NOT BE politically supportive, favourable to the ruling Autocratic class. Thus lots of innovative thoughts and ideas get nipped in the bud by the Autocratic people, resulting into the lag. 

 Autocracies have for their elite business class only the GENERAL MECHANDISING and GENERAL PROVISIONS sellers & traders. Why so, is so obvious to understand. And they become dependant on Espionage and Surveillance for getting their hands at the scientific Information.

अंततः election fraud तानाशाह भी समाज को मुक्ति नहीं दिलवा पाते है, और आत्म-तबाही में ले कूदते हैं

रूस-यूक्रेन युद्ध के आज 31 दिन हो चुके हैं,मगर अभी तक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना एक अदने से देश की अदनी सी सेना को मसल नहीं पायी है। अब तो उन पर लाले पड़ने लगे हैं आंतरिक विद्रोह हों जाने के, और खतरा बढ़ने लगा है की कहीं कमज़ोर मनोबल से त्रस्त कर वो बड़ा "शक्तिशाली" देश कहीं जैविक /रासायनिक अस्त्र न चला दे !

ये सब देख कर सबक क्या मिलता है?

कि, तानाशाही चाहे खुल्लम खुला प्राप्त हो, या election fraud करके मिली हो, वो देश और समाज को आत्म-घात की ओर ले जा कर रहती है।

तानाशाही में बड़े विचित्र और अनसुलझे मार्गों से समाज और देश की आत्म-तबाही आ गुजरती है। फिर ये तानाशाही उत्तरी कोरिया जैसे खुल्लम खुल्ला हो, या रूस के जैसे खुफ़िया एजेंसी से करवाये election fraud से हो।

कैसे, किस मार्ग से आ जाती है समाज और देश पर आत्म-तबाही?

कुछ नहीं तो विपक्ष का ही incompetent हो जाना समाज तथा देश की तबाही का मार्ग खोल देता है!
कैसे?
जब सत्ता परिवर्तन होना बंद हो जाता है, तब विपक्ष में से भी तो competent नेतागण वाकई में समाप्त होने लगते हैं जिनके पास प्रशासन चलाने का भीतरी ज्ञान तथा सरकारी नीतियों को जानने/समझने का पर्याप्त अनुभव हो, जिसके सहारे वो (election fraud तानाशाह की ) सरकार की नीतियों पर पर्याप्त तर्क और कटाक्ष कर सकें!

है, कि नहीं?

और ऐसे में election fraud तानाशाह खुद ही अपने देश और उसके समाज को , सबको एक संग उन्नति के मार्ग पर नहीं, बल्कि "चूतिया पुरम"(kleptopia) में ले कर बढ़ने लगता है!

यदि किसी देश में नित-समय अनुसार सत्ता परिवर्तन होना बंद हो जाये तो ऐसी election fraud तानाशाही का भी हश्र वही हो जाता है जो किसी सम्पूर्ण तानाशाही (जैसे की उतरी कोरिया) का हुआ है। सर्वप्रथम, आर्थिक नीति में समाज आत्म-दरिद्रता को भोगने लगता है, जैसे की आज श्रीलंका में होने लगा है। महंगाई बढ़ती है। और फिर, क़िल्लत और गरीबी आ जाती है पूरे समाज पर।

कैसे हो जाता है ये सब?
सुचारू तरह से सत्ता परिवर्तन का होते रहने से राजनैतिक वर्ग  में मानसिक/बौद्धिक स्वस्थ कायम रहता था, क्योंकि अनुभवी नेताओं की संख्या पर्याप्त बने रहती थी । मगर जब किसी election fraud व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन होना जब बंद हो जाता है, तब शायद विपक्ष में पर्याप्त competent और अनुभवी तर्कशील नेता ही नही रह जाते हैं! और फिर ऐसे में, election fraud करके आया तानाशाह बड़े-बड़े वादे करके अपने समाज को बहोत जल्द आत्म-तबाही की राह पर चल निकलता है,क्योंकि उसको रोकने वाले सामर्थ्य विपक्ष उपलब्ध ही नहीं रह जाता है समाज के अंदर !

तानाशाह नेताओं को अपने  समाज को  उनकी समस्याओं से मुक्ति दिलवा कर उन्नति की रहा तलाशने में ऐसे-ऐसे तर्क-विरर्क की भूलभुलैया आ घेरता है, जिसमे अंत में बस एक ही काबिल तर्क उनके सामने उनका पथ प्रदर्शक बन कर रह जाता है। वो ये, कि तानाशाही से भी समाज का उत्थान नही किया जा सकता है। तो बस अंत में अपनी निजी मौज़ मस्ती और जेब भर कर जियो !

आधुनिक ज्ञानकारी तंत्र आपको बुद्धिमान नहीं, बौड़म बना रहे हैं

 धोखा खाने से बचिए ,

ये गूगल , यूट्यूब और इंटरनेट के तमाम 'ज्ञानकारी' सेवाएं इंसान को ज्ञानवान और बुद्धिमान नहीं बना रहे हैं, बल्कि वास्तव में मूर्ख और बौड़म बना रहे हैं। 

कैसे ?

ज्ञान की उत्पत्ति का स्रोत क्या होता है ? 

यदि आप ज्ञान की उत्पत्ति का स्रोत समझते हैं - किताबें , गूगल , यूट्यूब , इंटरनेट , - तब आप गलत है। 

ज्ञान की उत्पत्ति का स्रोत होता है - विमर्श ( संवाद और उसके नाना प्रकार - बातचीत, वार्तालाप , चर्चा, बहस,  वाद), खोज,(और अन्य प्रकार जैसे - तफ्तीश, अध्ययन, शोध, अन्वेषण , अविष्कार, ) . 

ये पके-पकाये स्रोत - यानि गूगल, यूट्यूब, इंटरनेट - वास्तव में आपको आसानी से पकाया हुआ ज्ञान का भोजन देकर आपको मूल से दूर कर रहे हैं। 

सचेत रहिये।  

रूस की हिन्दू धर्म ग्रंथों की समझ

 पुतिन बाबू और रावण के चरित्र में बहोत समानताएं दिखाई पड़ रही है। दोनों ही आत्ममुग्धता से पीड़ित हैं, और इसके चलते अपने देश और अपने परिवार को खुद ही बर्बादी के मंज़र पर ले गए हैं।  जिस तरह से रूस आज दुसरे अन्य देशों को डरा-धमका रहा है कि अमेरिका से मैत्री न करो, रूस के सैन्य कार्यवाही की आलोचना न करो, रूस को यूक्रैन से सेना हटाने की चुनौती मत दो , ये सब पुतिन के अंदर जमे 'अभिमान' की निशानदेही है। गर्व चाहे राष्ट्र की श्रेष्ठता का हो, चाहे धर्म का -- ये इंसान में आत्ममुग्धता का रोग प्रवेश करा देता है। 

मॉस्को में ISKCON के मंदिरों को खुलने की अनुमति को लेकर रूसी सरकार ने अभी चंद वर्षो पहले आपत्ति उठाई थी। रूसी सरकार का कहना था की हिन्दुओं का धर्मग्रन्थ भगवद गीता और महाभारत , दोनों का वितरण और शिक्षण रूसी समाज और रूसियों के परिवार में आपसी-कलह करवाएंगे। दरअसल इन दोनों ग्रंथो के प्रति ये वाली आलोचना अक्सर छाया बन कर साथ चलती है। और रूसी सरकार ने उसी आलोचना के अनुसार आपत्ति रखी थी।  बरहाल भारतीय दूतावास के समझाने बुझाने पर अनुमति मिल गयी थी।

रामायण का मर्म भी अक्सर ऐसी आलोचना छवि का शिकार होता रहा है।  -- परमज्ञानी, श्रेष्ठा प्रजापालक, शिवभक्त रावण का अभिमान कैसे उसे, उसके परिवार और उसके देश लंका को बर्बादी में ले गया -- मर्यादाओं (moral self restraining force) को मानने वाले श्रीराम के आगे, आलोचनक ये वाले सबक नहीं देख कर राम के चरित्र की भावुक कमज़ोरी देखने लग जाते हैं - कि, कैसे मर्यादाओं का पालन इंसान के जीवन में से सुख और ऐश्वर्य हो समाप्त कर देते है; इंसान को श्रीराम के जैसे ही दुखों ,आत्म-पीड़ा, और self-defeat  से भरे जीवन में ले जाते है , उससे 'बेवकूफी' वाले decisions करवाते है। 

"typical UP-type of an answer" का मसला क्या है ?

 "typical UP-type of an answer" का मसला क्या है ?



बजट के उपरांत पत्रकार सभा के संग वित्त मंत्री के प्रश्नोत्तर काल के दौरान एक पत्रकार महोदय ( श्री आनंद, इंडिया टीवी से ) ने सवाल किया था की बजट पर विपक्ष के नेता रहल गाँधी जी की जो प्रतिक्रिया है -- कि यह है zero sum  बजट है (यानि बकवास, व्यर्थ बजट है आम आदमी के हितों के मद्देनज़र )-- तो कैसे पता चलेगा की राहुल को यह बजट समझ में नहीं आया है, या राजनीती के चलते, बस यूँ ही, आलोचना करने की duty कर दी है ?

विश्लेषण :-

इस वाले प्रश्नोत्तर के दौरान प्रत्रकार  सवाल कर्त्ता  ने वास्तव में खुद ही "राजनीती"(कूट आचरण ) करि है, जब उसने अपने सवाल में "विकल्प" को डाल कर निर्मला जी से प्रश्नन किया है।  विकल्प धारक प्रश्नों में जवाबकर्ता के विचार और ज़बान को पहले से ही बांध दिया जाता है कि वो विशेष दिशा में ही खोज करे जवाब को !  सवाल करने की ये शैली , ये आचरण, अपने आप में ही "कूटनीति " है पत्रकार की !!


बरहाल, आगे क्या हुआ   .... 

इस प्रश्न का जवाब वित्त मंत्री सुश्री निर्मला सीतारमण जी ने देने का प्रस्ताव दिया श्री पंकज चौधरी , उप राज्य मंत्री, को। शायद इसलिए क्योंकि सवाल हिंदी भाषा में उठाया गया था जिसमे निर्मला जी इतनी दक्ष नहीं है।  और सवाल राहुल गाँधी से सम्बंधित था , श्री चौधरी यूपी से आते है , गोरखपुर जिले से।  

पंकज जी ने जवाब में आसान वाला विकल्प चुना कि, 'राहुल गाँधी को बजट समझ में भी आता है, क्या?' ।

इसके बाद निर्मला जी ने इसी प्रश्न पर अपनी भी प्रतिक्रिया दी , अंग्रेजी भाषा में। इसके दौरान उन्होंने कहा , "typical UP-type of an answer"

 विश्लेषण :-

गौर करें कि निर्मला जी की प्रतिक्रिया का सन्दर्भ श्री पंकज चौधरी के जवाब से बनता है, न कि राहुल गाँधी से और न ही पत्रकार से ! सत्य शब्दों में , यदि किसी का अपमान हुआ है कि वो 'यूपी type'  है , तब वो श्री पंकज चौधरी ही है --  निर्मला जी का अपना खुद का पार्टी अवर सहयोगी, व  मंत्री !!


'UP-type'  से क्या अभिप्राय हो सकता है निर्मला  मस्तिष्क में ?

शायद ये, कि यूपी वाले 'वैसे भी'(a presumed idea) बौड़म होते है ।  उनकी सोच और उनके शब्द स्पष्ट नहीं होते है -- सुनने वाले के मस्तिष्क में स्पष्ट तरह से कोंधते नहीं है, केंद्रीय बिंदु पर। शायद निर्मला जी के मन में जो छवि है यूपी वालों के प्रति, उसके अनुसार यूपी वालों की बातों में केंद्रीय बात को पकड़ सकना मुश्किल होता है। यूपी वाले लोग अपनी हिंदी भाष्य संवाद को अजीबोगरीब, बड़े-बड़े शब्दों से सजावट करने में इतना अधिक व्यसन करते है कि अपने मन के विचार, उसके केंद्रीय तर्क को बातों में प्रस्तुत करना भूल ही जाते है।   तो फिर श्री पंकज चौधरी ने जो कुछ भी उत्तर दिया था, चूंकि वो भी यूपी के ही है, तो फिर उनका जवाब भी वैसा ही अस्पष्ट , 'गोलमटोल' , क़िस्म का है।  (और जो की राहुल गाँधी जैसे विपक्ष नेता के लिए उचित जवाब मान लिया जाना चाहिए। )

'गोलमटोल' से अभिप्राय है , फिल्म Munnabhai MBBS के एक डायलॉग की की भाषा में , ---  round  round  में जितनी भी बात कर लो, मगर centre  की बात ही अंत में मांयने रहती है, जिसको अक्सर कहना ही भूल जाते है यूपी वाले अपनी बातचीत के दौरान !

संसद भवन में कानून को पारित करने का उद्देश्य क्या होता है

कानून का लेखन (संसद में पारित करने की प्रक्रिया) का उद्देश्य ये कतई भी नहीं होता है कि कोई उद्योगिक/अर्थ चक्रिय/सामाजिक कार्य कर गुज़ारा जाये।
कानून लेखन और फरमान निकालने में अंतर को समझिये। 
कानून लेखन का उद्देश्य समाज का दमन करके या बाध्य करके प्रशासन चलाना भी नही है।  न ही स्मृति बढ़ाना मात्र है।


कानून लेखन का उद्देश्य प्रशासनिक और न्यायायिक धूर्तता को समाज और प्रशासन में से समाप्त करना है।  कहने का अर्थ है कि जो कार्य जिस तर्क और सिद्धान्त से आज किया जा रहा है, उस तर्क, सिद्धांत को स्थापित करके समाज की स्मृति में बसा देना कानून-लेखन का विशिष्ट उद्देश्य होता है।

 इसका अभिप्राय हुआ कि यदि दमनकारी या जबदस्ती तरीकों से किसी लेखन कर देने के बाद में, भविष्यकाल में यदि विपक्षी दल सत्ता में आने के उपरान्त "संसोधन" को आसानी से या सस्ते/कपट तरीकों से करके तर्क और सिद्धांतों को बदल कर कुछ और करने लग जाये, तब फ़िर कानून लेखन का विशिष्ट उद्देश्य मात खा जाता है। समाज में धूर्तता प्रवेश कर जायेगी और वो समाज, फिर, आपसी द्वन्द से ही समाप्त हो जायेगा। बाहरी आक्रमणकारी का आना तो बस एक बहाना होगा, क्योंकि आन्तरिक गलन से समाज तो पहले ही खोखला हुआ ,  तैयार होगा रौंदे जाने के लिए।

केहने का अर्थ है कि कानून का सर्वसम्मत होना उसके उद्देश्य प्राप्ति की उच्च कसौटी है, समाज को बचाने के लिए। कानून को पारित होने से पूर्व ये आश्वस्त हो जाना चाहिए कि विपक्षी दल भी उसे वैसे ही चलायेगा, जब यदि सत्ता परिवर्तन होगा।

संसद में कानून को पारित करवाने के विशिष्ठ उद्देश्य को समझना ज़रूरी है।  धूर्तता को रोक सकना समाज में आपसी विश्वास को बढ़ाने का महायज्ञ होता है।


क्यों गुप्त पड़ा हुआ है भारतीय समाज के भीतर में बसा हुआ ब्राह्मण विरोध? कहाँ से आया और क्यों ये अभी तक अगोचर है?

औसत ग्रामीण भारत वासी के जीवन में दुःख और कष्ट इतना अधिक होता है कि उसका सामना करने का आसान तरीका बस ये है कि दुःख की वास्तविकता से मुँह मोड़ कर उसे ही सुखः मानने लग जाएं। यानी reality को distort कर लें।ब्राह्मण reality /सत्य/वास्तविकता के प्रति चेतना नही देता समाज में, जागृति नही देता, उनको सामना करना नही सिखाता है समाज को, बल्कि distortion का फ़ायदा उठाता है और अपना व्यक्तिगत लाभ लेने लगता है। यद्यपि भारत के समाज में ऐसे विद्वान और सिद्ध पुरुष आते रहे जो कि ब्राह्मणों के जैसे नही थे, और समाज को दुःखों का सामना करने तरीका बता कर सत्य के प्रति बौद्ध भी देते रहे हैं। भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु नानक ऐसे ही नामो में से हैं।

स्कूली पाठ्यक्रमो के रचियता इतिहासकारों ने यहाँ अच्छा कार्य नही किया मौज़ूदा पीढ़ी के प्रति, जब उन्होंने किताबों में राजनैतिक इतिहास को अधिक गौड़ बना कर प्रस्तावित कर दिया है। धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को दर्ज़ नही किया, खास तौर पर वो अंश जो की समाज में चले आ रहे ब्राह्मण बनाम अन्य समूहों के संघर्ष को दर्शाता है। मौर्य शासकों का अंत कैसे हुआ, भुमिहार कहाँ से आये, पुष्यमित्र शुंग कौन थे, उनका शासन कैसा था, भारत की अखंडता के संग क्या किया, बौद्धों के संग शुंग भूमिहारों ने क्या बर्ताव किया, जैन चार्वाक संस्कृति पर हमला क्यों किया ब्राह्मणों ने, क्यों चार्वाक के साहित्य को नष्ट कर दिया -- ये सब ज्ञान औसत भारत वासी को तनिक भी नही है। वहीं , अभी अगर सावरकर बनाम गाँधी , नेहरू, सुभाष , भगत सिंह पर debate करवा लो , तब संघ घराने से निकला भारतवासी ऐसे-ऐसे बिंदु और "तथ्य" का बयाना देने लगेगा मानो जैसे उसने अपनी आँखों से देखा और कानों से सुना है !

और मुग़लों को अपशब्द कहलवाने हो, तब तो पूछिये ही नही कहाँ तक जा कर ये कर सकते है हिंदुत्ववादी घराने का वर्तमान काल के भारतवासी।

पुष्यमित्र शुंग की करनी पर औसत भारतवासी , इतिहास का छात्र क्यों जागृत नही है, ये सवाल पूछने लायक है। कौन था शुंग वंश और क्या किया था उसने, ये बातें इतिहास पाठ्यक्रम के लेखकों ने क्या सोच कर गौढ़ नही मानी तथा गायब कर दी, इस सवाल को खोजने की जरूरत है। इसी तरह, आचार्य ओशो रजनीश (जैन) के lecture की audio record आज भी सुनाई पड़ती है जिसमे वो सवाल उठाते हुए व्याख्यान दे रहे हैं कि आखिर क्यों चार्वाक के साहित्य को नष्ट कर दिया (ब्राह्मणों ने)।

हिंदुओं के अपने धार्मिक इतिहास  की दृष्टि से ये सब गौढ़ तथ्य माने जाने चाहिए थे। मगर , अद्भुत की ये सब तो कहीं भी पुस्तकों में हैं भी नही, इनका जिक्र भी नही हैं।कौन है ये लेखक और क्या सोच ,या साज़िश है इनके दिमाग़ की, इस पर जाँच करवाई जानी चाहिए और पाठ्यक्रमो में बदलाव लाया जाना चाहिए । ऐसा पाठ्यक्रम जो कि छात्रों में जागृति दे सके की भारत की वर्तमान राजनीति में जो कोई भी बल देने वाले छोर है , वो कौन कौन से है और क्या उत्पत्ति मूल है उन छोर का। वर्तमान स्कूली पाठ्यक्रम सिर्फ स्तुतिगान करके गांधी/नेहरू परिवार का चेला-चपाटी बनाने के अनुसार रचा गया मालूम देता है। न कि समाज को समझने के अनुसार और उसकी मूल प्राकृतिक घुमावों का लाभ ले कर उसे नियंत्रित करने के अनुसार !

क्या भेद है अमरीकी प्रजातंत्र और ब्रिटिश प्रजातंत्र में

गहराई में देखा जाये तो अमेरिकी डेमोक्रेसी उनकी संस्कृति में free gun running की बदौलत टिकी हुई है, जबकि ब्रिटिश democracy को उनके समाज में टिके रहने का स्तम्भ है: standards तथा checks and balance विधि। ब्रिटिश समाज में equality और mutual respect शांतिप्रिय विधि से प्राप्त किया जा सकता है, मगर अमेरिकी समाज में हिंसा (या हिंसा के भय) की बदौलत ही ये प्राप्त होता है। मानक और संतुलन  को तय करने की भूमि यदि प्रिय है, तब वो निश्चय ही अंतरात्मा को बुलंद करने के लिए किये गए उपायों से प्राप्त होती है। अन्यथा उसको अशांत हो जाना तयशुदा है। तब ऐसे में दूसरी जिस विधि से शांति प्राप्त हो जाती है, वो है free gun running। 

 अमेरिकी और ब्रिटिश प्रजातंत्र के उपज का ये सूक्ष्म अंतर बहोत कम लोगों को समझ में आयेगा और दिखाई पड़ेगा। आम जनता को लगता है कि free gun running की व्यवस्था अमेरिकी समाज पर अभिशाप है। जब भी हमें किसी अमेरिकी college , विश्वविद्यालय में कोई बड़ी gun shooting की घटना की खबर सुनाई पड़ती है, तब हम भारतीय लोग उसपे दुःख व्यक्त करते हुए सोचते हैं की कानून बना कर gun running को free होना बंद कर देना चाहिए। मगर अमेरिका के गेहरे चिंतक, बुद्धिजीवी गुपचुप ऐसा कोई कानून बनाने का समर्थन नही करते है। क्यों? ऊपर लिखा हुआ विचार वो वास्तविक दार्शनिक कारण है कि अमेरिका के गेहरे चिंतक किस गहराई से तंत्र तथा समाज पर अपनी बैद्धिक पकड़ रखते है, और आसानी से अनुमान लगा ले रहे है, कि यदि gun running पर license लागू हो गया, तब समाज और देश की व्यवस्था पर इनका क्या बद असर पड़ जायेगा !

आगे,
ब्रिटिश समाज कैसे , किन कारणों से शांतिप्रिय होते हुए मानकों और check and balance को तय कर लेता है, जबकि अमेरिकी समाज नहीं कर पाता है?
ब्रिरिश समाज में इसका भेद छिपा है उनके राजशाही व्यवस्था , उसके protestant church के परिवेश में प्राप्त विशेष प्रकार के लालन तथा शिक्षा व्यवस्था में ! 

अब, इसके आगे बात को पूर्ण स्पष्ट करने में लंबा व्याख्यान लगेगा कि कैसे protestant church उनकी राजशाही में कुछ ऐसे चारित्रिक गुणों का समावेश करता है, जो की आगे जा कर उनके समाज में प्रजातंत्र को पनपने की भूमि प्रदान करवाते हैं।
 

बौद्ध इंसान को instinctive व्यवहारों को तलाशने के लिए प्रेरित करता है

 छोटे बच्चों पर नज़र रखना ज़रूरी होता है की कहीं वो खुद ही अनजाने में आपस में "गन्दी बात" या "गन्दा काम" करना न शुरू कर दें!

ऐसा क्यों? 

क्योंकि वास्तव में ये सब instinctive भी सकता है , ज़रूरी नहीं कि कहीं, किसी ख़राब फ़िल्म या फोटो को देखने से ही आये। 

इस नज़र से ये बात समझ आती है कि  माता-पिता को अपनी बच्चों को 'गन्दे काम' से बचाने के लिए न सिर्फ ज्ञान को रोकना होता है , बल्कि रोकते समय यह भी ध्यान रखना होता है कि कहीं उनकी मनाही का तरीका ही बच्चों में "बौद्ध" नहीं जगा दे , यानि उनके instinct को जागृत कर दे, और वो curious (जिज्ञासु ) हो जाये उसके प्रति ! और यदि ऐसा हो गया तब बच्चों को लग जायेगा कि कहीं कुछ तो है जो उनके मातापिता उनसे छिपा रहे हैं, और वो नहीं चाहते है की बच्चों को उसके बारे में पता चले ! ये जिज्ञासा बच्चों को वापस उस "अनजान' 'गन्दी' चीज़ की तलाश की तरफ खुद-ब-खुद ले जाएगी, वो भी माता पिता से छिप छिप कर। 



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भले ही आप उन्हें सूट ,टाई और चमकते बूटों  में देख कर चंकचौध हो जाते हो, और उनकी प्रवेश परीक्षा की कठिनता के चलते आप पहले से ही उनके प्रति नत...

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