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जन्मजात पंडित और व्यक्तिव का confidence का भारत के जनमानस पर धाक

हमारे एक मित्र, मxxष मिश्रा, कुछ भी लेख लिखते समय confidence तो ऐसा रखते हैं जैसे विषय-बिंदु के 'पंडित' है, जबकि वास्तव में ग़लत-सलत होते हैं। तब भी, उनके व्यक्तित्व में confidence की झलक होने से उनके लाखों followers है !

सोच कर मैं दंग रह जाता हूँ कि देश की कितनी बड़ी आबादी अज्ञानी है, जिसका कि जगत को पठन करने का तरीका ही मxxष मिश्रा जैसे लोगों के उल्टे-शुल्टे लेखों से होता है, सिर्फ इसलिये क्योंकि मxxष जी जन्मजात पंडिताई का confidence रखते हुए लोगों को आसानी से प्रभावित कर लेते हैं ।

भारतीय सांस्कृतिक परिवेश में तमाम प्रबंधन शिक्षा के गुरु लोग ऐसे ही नहीं बार-बार 'व्यक्तिव में confidence' रखने की बात दोहराते रहते हैं। बल्कि वो लोग तो सफाई भी देते रहते हैं कि अगर आप के व्यक्तिव में confidence है, तब अगर आप ग़लत भी हो, तब भी आप अपनी बात को जमा सकते हैं।

प्रबंधन गुरु लोग ग़लत नहीं हैं। हमारे देश की आबादी में औसत आदमी किताबी अध्ययन करने वाले बहोत ही कम हैं। ऐसे हालात में लोगों को किसी भी विषय पर सही-ग़लत का फैसला करने के संसाधन करीब न के बराबर होते हैं। ये देश अज्ञानियों का देश है। मूढ़ लोगों का देश, जहां की संस्कृति में मूर्खता समायी हुई है। कम संसाधनों के चलते लोग बाग हल्के तरीकों से गूढ़ विषय पर तय करने को बाध्य होते हैं कि बात सच है या कि झूठ। सत्यज्ञान है, या कि नहीं। ऐसे में, व्यक्तिव का confidence , भले ही बनावटी हो, विषय की गहन पकड़ में से नहीं उभरता हो, सत्यज्ञान के स्वाभाविक आवेश में से नहीं उद्गम करता हो, तब भी लोगों की बीच वो धाक जमा सकता है।

यानी,

अगर आप असल ज्ञानी पंडित न भी हो, बनावटी अथवा जन्म-जात पंडित होने से भी यदि "व्यक्तिव का confidence" रखते हो, तब भी , कम से कम भारतीय संस्कृति में तो आपकी धाक जम जायेगी !

जय हो !


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