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आरएसएस का देश के बौद्धिक चिंतन, जागृति पर दुष्प्रभाव

आरएसएस ने देश भर में तमाम 'सरस्वती शिक्षा मंदिर' स्कूल चलाये, बहोत जनसेवा करि हुई है, मगर इसके साथ ही देश के समाज में ज़हर भी खूब फैलाया है।

जैसा कि आरएसएस का प्रचलित उपनाम है, रॉयल सेक्रेट सर्विस, आरएसएस ने एक किस्म की विध्वंसक मानसिकता का प्रसार भी किया हुआ है, जो बाल्यकाल से ही ब्रेनवाश करके एक ऐसे समाज की नींव डालता है जो कि गुप्तचरों द्वारा संचालित होता है। यदि कोई समाज सेक्रेट सर्विसेस के द्वारा चलाया जाये तब वो कैसे, किसी एक वर्चस्ववादी वर्ग के द्वारा हड़प लिया जाता है, और वो देश किस प्रकार के आत्मघाती और तबाही मंज़र को देखता है, इसे समझने के लिए आपको जिस देश की ओर देखना चाहिए, वो है रूस ।

रूस और हिटलर के जमाने वाली जर्मनी के इतिहास के जानकार लोग ये बताएंगे आपको कि कैसे सेक्रेट सर्विसेस के बल पर प्रशासन किया जाने वाला समाज किसी एक वर्ग के द्वारा अपने  समाज के दूसरे वर्गों  पर वर्चस्व की दास्तान बन गया। वो देश तकनीक और उद्योगिक विकास से तो वास्तव में दूर भाग रहा होता है, हालांकि एक आभासीय मकड़जाल , एक भ्रम अपने इर्दगिर्द बांध लेता है (और खुद से ही खुद के फैलाये झूठों का शिकार बन कर ये मानने लगता है )कि वो अब तकनीकी विकास करने लगा है।

दोनों, रूस और जर्मनी, में हुई परमाणु शक्ति पर ये कयास हमेशा लगाये जाये रहें हैं कि परमाणु अस्त्र उनके वैज्ञानिकों ने उपलब्धि से नहीं हुआ है, ये तो उनके जासूसों के दम पर है । nuclear weapons के विषय में जो prolifiration (प्रसार) का विषय है, वो वास्तव में रूस की जासूसी संघठन के द्वारा किये गये कार्यवाहियों से बढ़ी वैश्विक चिंता में से उपजा है।

हमारे यहाँ आरएसएस ने भी देश व्यापी स्तर पर एक ऐसा सेक्रेट सर्विस संघठन बना दिया है , उन "सरस्वती शिशु मंदिरों" के बहाने। 

ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद की मानसिकता की कमी ये रही है कि वो सदैव स्वयं को श्रेष्ठ होने की चेष्टा करते हुए समाज में भ्र्म और कुतर्को को प्रसारित करते रहे हैं। जब , जो भी गुण जनप्रिय हुए या चलन में आये, आरएसएस की ब्राह्मणवादी मानसिकता ने ये परमचेष्टा करि है सिद्ध कर देने की, कि वो गुण "तो " भारतीय संस्कृति में पहले से ही विधमान है।

दरअसल आरएसएस के द्वारा "भारतीय संस्कृति" को अपने मिशन का केंद्र बनाये जाने के पीछे एक गहरी औत साज़िश भारी सोच है । वो ये कि यदि तमाम वर्गों को वो साथ रख कर केवल ब्राह्मण जाति की श्रेष्ठता सिद्ध करने कि कोशिश करेंगे, तब तो कोई भी अन्य वर्ग उनके संग नहीं चलेगा। तो फ़िर दूसरा तरीका ये है कि ब्राह्मण वर्चस्व के मिशन को "भारतीय संस्कृति" का चोंगा पहना दो, और अब भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता को साबित करवाने में सब को पीछे लगा दो। लोग-बाग जितना अधिक प्राचीन भारत के वेदों, उपनिषदों , ग्रंथों की श्रेष्ठता को साबित करने में आपसी जुगत करेंगे, वो ये अनदेखा भी करेंगे कि साथ में वो ये भी स्वीकार करने लग रहें है कि ये सब ब्राह्मणों की उपलब्धि से हुआ है। तो यदि सब कुछ अच्छा-अच्छा और भला-भला हुआ है, तो फिर हमे ये सब वापस वैसे ही चलाना होगा जिसा तंत्र के चलने से ये सब भला हुआ था - ब्राह्मणों की सोच के अनुसार देश के समाज को व्यवस्थापित करना पड़ेगा !!!!

आरएसएस ने जब, जो श्रेस्ठ गुण चलन में देखा, त्यों हिंदुओं में भी "शुरू से ही" विद्यमान होने का दाव खेला है। यदि आज secularism और liberalism को समाज और सरकारों के आपसी संबंध के संचालन का श्रेष्ठ गुण माना जाता है, तब उन्होंने ये कुतर्क प्रसारित करे हैं कि हिन्दू तो स्वभाव से ही secular और liberal होता है। ऐसा करने में आरएसएस ने समाज की चेतना में न सिर्फ अप्रमाणित तर्को का समावेश किया है, बल्कि secularism और liberalism प्रत्यय के सत्य अर्थो को भी तब्दील कर दिया है। लोग-बाग अब ये सही अर्थ में समझते ही नही है कि secularism के अभिप्राय क्या-क्या होते हैं ,उन्हें क्या सामाजिक तब्दीलियां करनी चाहिये। क्योंकि वो बड़े आत्म विश्वास में रहते हैं कि उन्हें अच्छे से मालूम है कि secularism और liberalism क्या होता है, और कि वो हिंदुओं में पहले से ही मौजूद है।

यदि कल को कही से ये चलन में आ गया कि देशों को संचालन करने के लिए आवश्यक गुण होगा धार्मिक कट्टरता, तब आरएसएस सुविधानुसार ये भी सिद्ध कर देने वाले तर्क प्रसारित करने लगेगा कि हिन्दू तो शुरू से ही कट्टर था !!

कुल मिला कर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद , दोनों ही छद्म तर्कों को समाज में प्रसारित करने को तात्पर रहते हैं, केवल अपने वर्चस्व (patriarchy) को कायम रखने के ख़ातिर। वो इस देश की विद्या और ज्ञान संस्कृति में वृद्धि नहीं कर रहे है, हालांकि वो दिखाते ज़रूर ऐसा हैं कि आध्यात्मिक और वैदिक ज्ञानकोष इस देश की संस्कृति से विश्व धरोहर को दिया गया है। और ऐसा कुतर्क कर कर के ब्राह्मणवाद देश की चेतना में वास्तव में सुराख कर रहें है। सत्य को जानने - समझने वालो को सबसे प्रथम कठिन युग्न ये करना पड़ेगा कि लोगों को ये बताये कि वो जो कुछ भी इतने आत्मविश्वास से जानते-समझते आये हैं, वो सब कुतर्क, भ्रामक और छद्म ज्ञान है !!!!!

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